पिंजर - अमृता प्रीतम Pinjar - Hindi book by - Amrita Pritam
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पिंजर

अमृता प्रीतम

प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :156
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7571
आईएसबीएन :81-216-0279-3

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दुनिया की आठ भाषाओं में प्रकाशित होने वाला उपन्यास जिसकी कहानी भारत के विभाजन की उस व्यथा को लिए हुए है, जो इतिहास की वेदना भी है और चेतना भी...

Pinjar - A Hindi Book - by Amrita Pritam

‘‘कोई लड़की हिन्दू हो या मुसलमान, जो भी लड़की लौटकर अपने ठिकाने पहुंचती है, समझो उसी के साथ मेरी आत्मा भी ठिकाने पहुंच गई...’’

–अमृता

यह वह उपन्यास है, जो दुनिया की आठ भाषाओं में प्रकाशित हुआ है और जिसकी कहानी भारत के विभाजन की उस व्यथा को लिए हुए है, जो इतिहास की वेदना भी है और चेतना भी–
‘पूरो’ इसी उपन्यास की किरदार है, जो घटनाओं की आग में जलती-बुझती इस चेतना को पा लेती है– ‘कोई भी लड़की जो ठिकाने पहुँच रही है, वह हिन्दू हो या मुसलमान, समझना कि मेरी आत्मा ठिकाने पहुँच रही है।’’

पिंजर, 1935


मटमैला दिन था। बोरी के टुकड़े पर बैठी पूरो मटर छील रही थी। उंगलियों में पकड़ी हुई फली को खोलकर जब उसने दानों को मुट्ठी में सरकाना चाहा, तो एक सफेद कीड़ा उसके अंगूठे पर उतर आया...
जैसे एकाएक कीचड़ भरे गड्ढे में पांव जा पड़ने पर एक सिहरन-सी हो उठती है, वैसी ही सिहरन पूरो के सारे बदन में उतर गई। हाथ झटककर उसने कीड़े को परे फेंक दिया और अपने हाथों को अपने घुटनों में भींच लिया।

पूरो के सामने मटर की फलियां, निकाले हुए दाने और खाली छिलके बिखरे पड़े रहे। उसने घुटनों के बीच में से दोनों हाथ निकालकर अपने कलेजे को थाम लिया। लगा, सिर से पांव तक उसका बदन मटर की उस फली की तरह है जिसके भीतर मटर के दानों की जगह कोई कीड़ा पनप रहा है।

पूरो को अपने अंग-अंग से घिन आने लगी। मन चाहा कि वह अपने पेट में पल रहे कीड़े को झटक दे; उसे अपने से दूर कहीं झाड़ दे; ऐसे, जैसे कोई चुभे हुए कांटे को नाखूनों में लेकर निकाल देता है, जैसे कोई धंसे हुए गोखरू को उखाड़कर फेंक देता है, जैसे कोई चिपटी हुई किलनी को नोचकर अलग कर देता है, जैसे कोई चिपटी हुई जोंक को तोड़ फेंकता है।
पूरो सामने दीवार की ओर देखने लगी, बीते हुए दिन एक-एक करके वहां से गुजर रहे थे।

वह गुजरात जिले के एक गांव छत्तोआनी के शाहों की बेटी थी। शाह, जिनका साहूकारी का काम कब का बन्द हो चुका था, फिर भी वह शाह कहलाते थे। समय के चक्र से शाहों के उस घर का यह हाल हो गया कि देग और कंडाल जैसे उनके बड़े-बड़े बर्तन भी बिक गए–वे बर्तन, जिन पर उनके पूर्वजों के नाम खुदे हुए थे। प्रति दिन की इस जीती-जागती ग्लानि से बचने के लिए पूरो के पिता और चाचा अपना गांव छोड़कर सियाल चले गए। वहां उनके दिन सचमुच पलट गए।

उन दिनों पूरो बच्ची सी थी और उसकी मां की गोद में एक लड़का था। उजड़ हुए शाहों का यह परिवार फिर अपने गांव छत्तोआनी आया। पूरो के पिता ने अपना गिरवी पड़ा हुआ मकान छुड़वाकर अपने बाप-दादों के नाम की लाज रख ली। यद्यपि उसके पिता को नया मकान बनवाने में इससे भी कम पैसे खरचने पड़ते, पर उसने ब्याज की भी परवाह न की और एक बार दांत भीचकर अपने पूर्वजों के नाम की रक्षा कर ली।

अनाज, चारा और अन्य वस्तुओं की ठीक-ठीक व्यवस्था करके वह सियाम चले गए, किन्तु उनका मकान, उनका नाम, उनके पीछे गांव में बसता रहा। अगली बार जब वह अपने गांव लौटे, उस समय पूरो चौदह वर्ष की थी। उससे छोटा उसका एक भाई था, उससे छोटी पूरो की ऊपर तले की तीन बहने थीं और अब के पूरो की मां को छठी बार फिर किसी बच्चे की उम्मीद थी।

शाहों के उस परिवार ने गांव आकर पहला काम किया कि पास के गांव रत्तोवाल के एक अच्छे खाते-पीते घर में पूरो के लिए लड़का देखा। पूरो की मां सोचती थी कि जब वह नहा-धोकर उठेगी तो बड़े चाव से पूरो का काज करेगी। इस बार वे सोचकर आए थे कि इस भार को उतारकर ही लौटेंगे।

पूरो की होने वाली ससुराल में उन दिनों तीन दुधार पशु थे और गांव में उनका मकान अकेला था जिसके ऊपर की पक्की ईंटों की बरसाती बनी हुई थी। मकान के माथे पर उन्होंने ‘ऊँ’ लिखवाया हुआ था। लड़का सूरत का अच्छी दीख पड़ता था।
पूरो के पिता ने पांच रुपये और गुड़ की भेली देकर लड़का रोक लिया था। उन दिनों गुजरात जिले में अदला-बदली के सम्बन्ध होते थे। जिस लड़के से पूरो की सगाई हुई, उस लड़के की बहन की सगाई पूरो के भाई के साथ की गई, यद्यपि पूरो का भाई उस समय मुश्किल से बारह बरस का था और उसकी मंगेतर बहुत ही छोटी थी।

दो-दो बरस के अन्तर से ऊपर तले तीन लड़कियों को नज्म देने के कारण पूरो की मां का मन क्षुब्ध-सा हो गया था। अब जबकि उनके दिन फिर गए थे, घर में मन-भर खाने को था, जी-भर पहनने को था, उनका मन करता था कि उसके फिर एक लड़का हो।
इस बार पूरो की मां ने दूसरा काम यह किया कि विधिमाता की पूजा की। गांव की कुछ स्त्रियों ने पूरो के घर के आंगन में गोबर की एक गुड़िया बनाई, लाल चुनरी के किनारी लगाकर उसे उस गुड़िया के सिर पर उढ़ा दिया, दो माशे सोने की छोटी-सी नथ बनवाकर उसकी नाक में डाली और सबने मिलकर गाया–

विधमाता रुस्सी आवी ते मन्नी जावीं,
बिधमाता रुस्सी आवीं ते मन्नी जावीं।

उनके आपने गांव और आसपास के गांवों में स्त्रियों का यह विश्वास था कि हर बच्चे के जन्म के समय विधिमाता स्वयं आती हैं। यदि विधिमाता अपने पति से हंसती-खेलती आती है। तो आकर झटपट लड़की बनाकर चली जाती है, उसे अपने पति के पास लौटने की जल्दी होती है, किन्तु यदि विधिमाता अपने पति से रूठकर आती है तो उसे लौटने की कोई जल्दी नहीं होती वह आकर बहुत समय तक बैठती है और आराम से लड़का बनाती है। तो सब स्त्रियों ने मिलकर फिर गाना आरम्भ किया–

बिधमाता रुस्सी आवीं ते मन्नी जावीं,

विधिमाता शायद कहीं पास ही सुन रही थी, उसने उनका कहा मान लिया। पन्द्रह-सोलह दिन बार पूरो की मां के लड़का हो गया। शाहों के दूर-पार के सम्बन्धियों को भी बधाइयां मिलने लगीं। चिन्ताजनक एक बात थी और वह यह कि लड़का तेलड़ था। तीन बहनों पर भाई हुआ था। पूरो की मां को बड़ी चिन्ता थी, राम करे, किसी प्रकार लड़का बच जाए और बच जाए तो माता-पिता को भारी न हो। विधिमाता को मनानेवाली स्त्रियां फिर एक बार इकट्ठी हुईं और कांसी के एक बड़े-से थाल के बीच में बड़ा-सा छेद करके लड़के को उसमें से आर-पार निकाला, साथ में गाती रही–

त्रिखलां दी धाड़ आयी,
त्रिखलां दी धाड़ आयी।

तीन लड़कियों के बाद ईश्वर की कृपा से पैदा लड़के के सारे शगुन मनाकर अब सबको विश्वास हो गया कि लड़का बच जाएगा।
पन्द्रहवां वर्ष आरम्भ होते-होते पूरो के अंगों में एक हुलार-सा आ गया। पिछले बरस की सारी कमीजें तंग पड़ने लगी। पूरो ने पास की मंड़ी से फूलों वाली छींट लाकर नये कुरते सिलवाए। कितना सारा अबरक लगाकर चुनरियां तैयार कीं।
पूरो की सहेलियों ने उसे दूर से उसका मंगेतर रामचन्द दिखा दिया था। आंखों में उसकी छवि पूरी की पूरी उतर गई थी। उसका ध्यान आते ही पूरो का चेहरा सुर्ख हो जाता था।

पूरो बहुत कम बाहर निकल पाती, पास के गांववालों का इस गांव में आना-जाना बहुत रहता था, उसकी ससुराल के गांववाले कहीं पूरो को देख न लें...
बस ज़रा दिन ढले पूरो और उसकी सहेलियां खेतों में घूम-फिर आती थीं। कई बार पूरो अपने खेतों के पास से गुजरती हुई कच्ची सड़क के आसपास अटक रहती, कभी कोई साग चुनने बैठ जाती, कभी किसी बेरी के पेड़ से लगकर खड़ी हो जाती, बेर गिराती, उन्हें चुनती और सहेलियों को बातों में लगाए रखती। वह सड़क उसकी होनेवाली ससुराल को जाती थी।

मन ही मन सोचती, यदि उसका मंगेतर आज इधर से गुजर जाए। वह उसे गुजरते हुए एक बार देख ले। पूरो का दिल उस सड़क के किनारे खड़े होते ही धक-धक करने लगता। फिर सारी रात पूरो अपने मंगेतर के स्वप्नों में उतर जाती...
एक दिन पूरो की नई जूती उसकी एड़ी में बहुत लग रही थी। सहेलियों के साथ चलते हुए वह पीछे रह-रह जाती थी। पूरो और उसकी सहेलियां खेतों में से होकर घर लौट रही थी। सांझ पिघले हुए सिक्के की तरह चारों और बिखर गई थी। लड़कियां खेतों की डौल-डौल चलती अब गांव की पगडंडी पर आ गई थीं। यह पगडंडी कहीं चौड़ी और खुली खाली भूमि पर होकर जाती थी और कहीं कुछ पेड़ों, पीपलों और झाड़ियों के साथ-साथ, जैसे उनकी बांह पकड़कर आगे बढ़ती थी। सब लड़कियां आगे-पीछे इसी पगडंडी पर चली आ रही थीं। पूरो ज़रा पीछे रह गई थी। दायें पांव की एड़ी के पास एक बड़ा-सा छाला उभर आया था। पूरो ने तंग जूती दोनों पैरों से उतारकर हाथों में ले लीं और पांव तेज़ी से बढ़ाने लगी।

लड़कियां पूरो से कहा करती थीं कि उसका दायां पैर बायें पैर से भारी था, इसलिए उसके दाहिने पैर में जूती लगती थी। इसी तरह पूरो का दायाँ हाथ भी बायें हाथ से भारी था।
‘हां जी, चूड़ी पहनते हुए पता चलेगा’, कहकर लड़कियां पूरो को छेड़ा करती थीं।

पूरो की आंखों के सामने आ जाता, सुच्चे हाथीदांत की लाल चूड़ियां उसके हाथों में पहनाई जा रही हैं, पिछली बड़ी-बड़ी खुली खुली चूड़ियां पहनाने के बाद, आगे की छोटी चूड़ियां उसके दायें हाथ में फंस गई हैं। नाई ने तेल से उसके अंगूठे की हड्डी को मला, और हाथीदांत की लाल चूड़ी को उसके हाथ में जोर से धकेलने लगा। पूरो को ख्याल आया, कहीं उसकी हाथीदांत की लाल चूड़ी उसके दाहिने हाथ में टूट न जाये तो ! पूरो के कलेजे को एक धक्का सा लगा। यह शगुन कितना बुरा है। उसी शगुन की चूड़ी, उसके सुहाग की चूड़ी उसके हाथों में क्यों टूटे ! पूरो ने अपने दाहिने हाथ को तिरस्कार से देखा। भगवान ! उसका मंगेतर युग-युग जिए ! हजार-लाख वर्ष जिए पूरो के हृदय ने कामना की। फिर पूरो को याद आया, उसके गांव में चूड़ा चढ़ाते समय एक लड़की की चूड़ी सचमुच टूट गई थी। पास खड़ी हुई स्त्रियां ‘राम, राम’ कहकर भगवान से उसके पति की कुशल-कामना करने लगी थीं, फिर सुनार से सोने का एक पतला सा तार टूटी हुई चूड़ी में पुरवाकर उस लड़की को फिर वही चूड़ी पहनाई थी, जैसे उन्होंने उसके पति की टूटी हुई जीवन डोर को जोड़ दिया दो।


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