सावयपन्नती (श्रावकप्रज्ञप्ति) मूल - हरिभद्र सूरि Savayapannati [Sravaka-Prajaapti] - Hindi book by - Haribhadra Suri
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सावयपन्नती (श्रावकप्रज्ञप्ति) मूल

हरिभद्र सूरि

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :262
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 10483
आईएसबीएन :0000000000000

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आचार्य हरिभद्रसूरि ने ४०१ गाथाओं में प्राकृत भाषा में निबद्ध इस 'सावयपन्नती (श्रावकप्रज्ञप्ति)' श्रावकाचार ग्रन्थ की रचना की.

आचार्य गृद्धपिच्छ या उमास्वामी के 'तत्त्वार्थसूत्र' का आधार लेकर आठवीं शताब्दी के आचार्य हरिभद्रसूरि ने ४०१ गाथाओं में प्राकृत भाषा में निबद्ध इस 'सावयपन्नती (श्रावकप्रज्ञप्ति)' श्रावकाचार ग्रन्थ की रचना की. श्रावकाचार का अर्थ है-- सम्यग्दृष्टि व्यक्ति का साधु-सन्त के निकट शिष्ट जनों के योग्य आचरण (समाचारी) को सुनना. सम्यग्दर्शन श्रावकधर्म का मूल है. समाचारी सुनने से व्यक्ति को जिन अपूर्व गुणों की प्राप्ति होती है उनका उल्लेख भी ग्रन्थकार ने किया है.


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