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गीता प्रेस, गोरखपुर >> धर्म क्या है भगवान क्या हैं

धर्म क्या है भगवान क्या हैं

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :61
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1101
आईएसबीएन :81-293-0804-5

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प्रस्तुत पुस्तक में धर्म क्या है और भगवान क्या है पर प्रकाश डाला गया है।

Dharam Kya Hai Bhagwan Kya Hain-A Hindi Book by Jaidayal Goyandaka - धर्म क्या है भगवान क्या हैं - जयदयाल गोयन्दका

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


ॐ श्रीपरमात्मने नम:

धर्म क्या है ?

प्र.- कृपापूर्वक आप धर्म की व्याख्या करें।
उ.- धर्म की सच्ची व्याख्या कर सकें ऐसे पुरुष इस जमाने में मिलने कठिन हैं।
प्र.- आप जैसा समझते हैं वैसा ही कहने की कृपा करें।
उ.- धर्म का विषय बड़ा गहन है, मुझको धर्मग्रन्थों का बहुत ज्ञान है, वेद का तो मैंने प्राय: अध्ययन ही नहीं किया। मैं तो एक साधारण मनुष्य हूँ, ऐसी अवस्था में धर्म का तत्त्व कहना एक बालकपन-सा है। इसके अतिरिक्त मैं जितना कुछ जानता हूँ उतना ही कह नहीं सकता; क्योंकि जितना जानता हूँ स्वयं कार्य में परिणत नहीं कर सकता।

प्र.- खैर, यह बतलाइये कि आप किसको धर्म मानते हैं ?
उ.- जो धारण करने योग्य है।
प्र.- धारण करने योग्य क्या है ?
उ.- इस लोक और परलोक में कल्याण करने वाली महापुरुषों द्वारा दी हुई शिक्षा।
प्र.- महापुरुष कौन है ?
उ.- परमात्मा के तत्त्व को यथार्थरूप से जाननेवाले तत्त्ववेत्ता पुरुष।
प्र.- उनके लक्षण क्या हैं ?

उ.- अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।
निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी।।
संतुष्ट सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय:।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:।।

(गीता 12/13-14)

‘जो सब भूतों में द्वेष रहित एवं स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित एवं अहंकार से रहित सुख-दु:खों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला है।’


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