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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिवपुराण

शिवपुराण

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1190
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...

अध्याय २-३

शिवपुराण के श्रवण से देवराज को शिवलोक की प्राप्ति तथा चंचुला का पाप से, भय एवं संसार से वैराग्य


श्रीशौनकजी ने कहा- महाभाग सूतजी! आप धन्य हैं, परमार्थ-तत्त्व के ज्ञाता हैं, आपने कृपा करके हमलोगों को यह बड़ी अद्भुत एवं दिव्य कथा सुनायी है। भूतल पर इस कथा के समान कल्याण का सर्वश्रेष्ठ साधन दूसरा कोई नहीं है, यह बात हमने आज आपकी कृपा से निश्चयपूर्वक समझ ली। सूतजी! कलियुगमें इस कथा के द्वारा कौन- कौन-से पापी शुद्ध होते हैं? उन्हें कृपापूर्वक बताइये और इस जगत्‌ को कृतार्थ कीजिये।

सूतजी बोले- मुने! जो मनुष्य पापी, दुराचारी, खल तथा काम-क्रोध आदि में निरन्तर डूबे रहनेवाले हैं वे भी इस पुराण के श्रवण-पठन से अवश्य ही शुद्ध हो जाते हैं। इसी विषय में जानकार मुनि इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिसके श्रवणमात्र से पापों का पूर्णतया नाश हो जाता है।

पहले की बात है, कहीं किरातों के नगर में एक ब्राह्मण रहता था, जो ज्ञान में अत्यन्त दुर्बल, दरिद्र, रस बेचने वाला तथा वैदिक धर्म से विमुख था। वह स्नान- संध्या आदि कर्मों से भ्रष्ट हो गया था और वैश्यवृत्ति में तत्पर रहता था। उसका नाम था देवराज। वह अपने ऊपर विश्वास करनेवाले लोगों को ठगा करता था। उसने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा दूसरों को भी अनेक बहानों से मारकर उन-उनका धन हड़प लिया था। परंतु उस पापी का थोड़ा-सा भी धन कभी धर्म के काम में नहीं लगा था। वह वेश्यागामी तथा सब प्रकार से आचारभ्रष्ट था।

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