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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शिवपुराण

शिवपुराण

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :812
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1190
आईएसबीएन :81-293-0099-0

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भगवान शिव की महिमा का वर्णन...

अध्याय १२

मोक्षदायक पुण्यक्षेत्रों का वर्णन, कालविशेष में विभिन्न नदियों के जल में स्नान के उत्तम फल का निर्देश तथा तीर्थों में पाप से बचे रहने की चेतावनी

सूतजी बोले- विद्वान् एवं बुद्धिमान् महर्षियो! मोक्षदायक शिवक्षेत्रों का वर्णन सुनो। तत्पश्चात् मैं लोकरक्षा के लिये शिवसम्बन्धी आगमों का वर्णन करूँगा। पर्वत, वन और काननों सहित इस पृथ्वी का विस्तार पचास करोड़ योजन है। भगवान् शिव की आज्ञा से पृथ्वी सम्पूर्ण जगत् को धारण करके स्थित है। भगवान् शिव ने भूतल पर विभिन्न स्थानों में वहाँ-वहाँ के निवासियों को कृपापूर्वक मोक्ष देने के लिये शिवक्षेत्र का निर्माण किया है। कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जिन्हें देवताओं तथा ऋषियों ने अपना वासस्थान बनाकर अनुगृहीत किया है। इसीलिये उनमें तीर्थत्व प्रकट हो गया है तथा अन्य बहुत से तीर्थक्षेत्र ऐसे हैं, जो लोकों की रक्षा के लिये स्वयं प्रादुर्भूत हुए हैं। तीर्थ और क्षेत्र में जानेपर मनुष्य को सदा स्नान, दान और जप आदि करना चाहिये; अन्यथा वह रोग, दरिद्रता तथा मूकता आदि दोषों का भागी होता है। जो मनुष्य इस भारतवर्ष के भीतर मृत्यु को प्राप्त होता है, वह अपने पुण्य के फल से ब्रह्मलोक में वास करके पुण्यक्षय के पश्चात् पुनः मनुष्य-योनि में ही जन्म लेता है। (पापी मनुष्य पाप करके दुर्गति में ही पड़ता है।) ब्राह्मणो! पुण्य- क्षेत्र में पापकर्म किया जाय तो वह और भी दृढ़ हो जाता है। अत: पुण्यक्षेत्र में निवास करते समय सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अथवा थोड़ा- सा भी पाप न करे।

क्षेत्रे  पापस्य  करणं  दृढं भवति भूसुराः।
पुण्यक्षेत्रे निवासे हि पापमण्वपि नाचरेत्।।

(शि० पु० वि० १२।७)

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