जिन्दगी लहलहायी - कन्हैयालाल मिश्र Jindagi Lahalahayi - Hindi book by - Kanhaiyalal Mishra
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जिन्दगी लहलहायी

कन्हैयालाल मिश्र

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1995
पृष्ठ :215
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1201
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है नयी साज सज्जा के साथ जिन्दगी लहलहायी...

jindagii_lahalahai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लहलहाती ज़िन्दगी की खोज

गाँधी पार्क के लॉन में बैठा मैं चिन्तन का आनन्द ले रहा था कि एक युवक-युवती आये और मुझसे कुछ दूरी पर बैठ गये। उनके साथ एक बालक भी था; होगा मुश्किल से दो वर्ष का। वे दोनों अपनी बातों में घुल गये और बालक माँ से सटा बैठा रहा। पास ही एक क्यारी थी; बालक घुटनों के बल चल, वहाँ पहुँच गया। फूलों के पौधे अभी पनप ही रहे थे; केवल गेंदे के पौधे पर एक फूल खिला था।

बालक ने फूल देखा, तो देखता ही रह गया। उसके चेहरे पर आनन्द की दीप्ति दमक उठी। उसके मुख से कुछ स्वर निकले, वे अस्पष्ट थे, शब्दों का स्वरूप नहीं ले पा रहे थे, पर बालक के मन का उच्छवास उनमें स्पष्ट प्रतिध्वनित था। मेरी दृष्टि बालक पर थी, उसका आनन्दोच्छ्वास मैं अनुभव कर रहा था। मन में आया, बड़ा गहरा सौन्दर्य बोध है इस नन्हे बालक में; सम्भव है आगे चलकर यह एक सफल कवि बने ! बालक ने अपनी तोतली बोली में माँ को पुकारा। मेरी भावधारा टूट गयी, पर माँ बातों में मगन थी। बालक ने और जोर से पुकारा, फिर पुकारा, पर माँ ने न उधर देखा न कुछ कहा।
मुझे लगा बालक अब रो पड़ेगा, पर वह रोया नहीं, उसका आनन्द सशक्त था। वह तेजी से घुटनों के बल चल माँ के पास पहुँच गया और उसकी साड़ी का पल्ला पकड़ कर खींचने लगा। माँ ने चाहा कि वह न उठे, पर वह बालक का आग्रह तो गाँधी का सत्याग्रह था; उसे उठना पड़ा। बालक उँगली पकड़े-पकड़े उसे क्यारी के पास ले गया और फूल दिखाया। इस बार उसके मन का उच्छ्वास चहक उठा। माँ ने फूल तोड़कर बालक के हाथों में दे दिया और उसे गोद में उठा अपने स्थान पर लौट आयी।

बालक फूल से खेलने में तल्लीन हो गया, पर बीच-बीच में माँ को भी उसे दिखाता रहा।
बात पूरी हो गयी; हाँ जी बात पूरी हो गयी, पर बात पूरी कहाँ होती है; बात में बात जो निकल पड़ती है ! लो, माँ-बेटे की बात में से साहित्य की बात निकल आयी कि मनुष्य अपने सुख-दुख को लिखता क्यों है ? लिखने की इस वृति ने दुनियाँ भर में पुस्तकों का अम्बार लगा दिया है, इसलिए प्रश्न महत्त्वपूर्ण है और अपना उत्तर माँगता है। विद्वान् लोग युग-युगान्तरों से इस प्रश्न पर बहस कर रहे हैं और यह ‘कला कला के लिए’ से ‘स्वान्तःसुखाय’ तक फैली हुई है, पर इस लंबी बहस का मूल्य यह है कि प्रश्न अपने स्थान पर ज्यों का त्यों खड़ा है। बहस की इस धुआँधार में फिर वही त्रिमूर्ति मेरे सामने आ गयी-बालक, फूल, माँ !

सहसा मेरे चिन्तन में शरद पूर्णिमा का चाँद उग आया। बालक ने फूल देखा। उसका मन आनन्द से भर उठा। आनन्द और दुःख को बाँटकर भोगना मानव की सहज वृत्ति है, तो बालक ने चाहा कि वह इस सुख में किसी को भागीदार बनाए; उसके साथ इस सुख का उपभोग करे। इसीलिए उसने अपनी माँ को आग्रहपूर्वक अपने साथ लिया। मैंने अपने से पूछा-क्या अबोध बालक की इस सहज चेतना में साहित्य-सर्जन का उद्भव और विकास पूर्ण रूप में समाया हुआ नहीं है ? और क्या इसमें सामाजिक विषमता और मानव मानव को बाँटती विभिन्न दीवारों को तोड़कर मानवीय समता और एकता की स्थापना का आह्वान नहीं हैं ?

‘ज़िन्दगी लहलहायी’ कहने को इस पुस्तक का नाम है, पर सत्य यह है कि यह कोई पुस्तक नहीं, स्वयं मेरी लहलहायी ज़िन्दगी ही है, जो ‘ज़िन्दगी मुसकायी’, ‘बाजे पायलिया के घुँघरू’, ‘दीप जले शंख बजे’, ‘माटी हो गयी सोना’, ‘महके आँगन चहके द्वार’, ‘जियें तो ऐसे जियें’, ‘क्षण बोले कण मुसकाये’, जैसे चौराहों को पार कर लहलहाते खेत में यहाँ तक आ पहुँची है।
यह एक व्यावहारिक सत्य है कि इन रचनाओं का मैं निर्माता हूँ, पर यह एक महासत्य है कि इन्हीं रचनाओं के कारण मेरी ज़िन्दगी मुरझायी नहीं, अन्यथा पारिवारिक और शारीरिक परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं कि उनमें कोई ज़िन्दगी लहलहा सके। इन रचनाओं ने मेरी ज़िन्दगी को निर्माण के आनन्द से भर-भर दिया और मैं गाँधी पार्क के उस बालक की तरह सहज भाव से उस आनन्द में नयी पीढ़ियों को साझीदार बनाने के लिए उच्छ्वसित हो उठा। मैंने उत्तम, सुन्दर, स्वस्थ एवं जीवन-संवर्धक जो कुछ सोचा, देखा, सुना और समग्र रूप में जिया, उसका वितरण-अर्पण ही मेरा साहित्य है, मेरी पत्रकारिता है, मेरे जीवन की सार्थकता है।

इन रचनाओं में एक असहाय व्यक्ति के द्वारा, जो वीराने में जन्मा-पला, लहलहाती ज़िन्दगी की खोज है, जीवन के निर्माता सत्यों तक जिस सोपान-परम्परा द्वारा वह पहुँचा उसकी कथा है। वह व्यक्ति मैं हूँ, परन्तु इस ‘मैं’ का मतलब कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ही नहीं, -मैं, आप, यह, वह, अर्थात् हरेक वह व्यक्ति विश्व-नागरिकता का एकांश है, जो टूटे जीवन को जोड़ता अधूरे जीवन को पूर्ण करता, गिरकर उठता, उठकर चलता, लक्ष्य की ओर बढ़ता, निराशा के वातावरण में भी आशावान।

तभी तो उत्तर प्रदेश के एक सुदूर कोने में बैठकर लिखी इन रचनाओं के पाठक पंजाब, हरियाणा, कश्मीर, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, असम, कर्नाटक, तमिलना़डु, आन्ध्र, केरल, गोवा, दिल्ली, हिमांचल, मध्य प्रदेश, राजस्थान यानी पूरे भारत में फैले हुए हैं; और देश के बाहर के देशों में भी। प्राचार्य ए. कमला (तमिलनाडु) ने मेरठ विश्वविद्यालय से, प्राध्यापक विश्वास पाटिल महाराष्ट्र ने पूना विश्वविद्यालय से इस साहित्य पर शोध कर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है, ओ.पी. नायर (केरल) मराठवाड़ा विश्वविद्यालय में शोधकार्य कर रहे हैं और एक अन्य विश्वविद्यालय में चौथा शोधकार्य निर्णयाधीन है। यही नहीं, इन रचनाओं के पाठक प्राइमरी स्कूलों में हैं, कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में हैं, देहातों में हैं, कस्बों में हैं., शहरों में हैं, झोपड़ियों में हैं, कोठियों में हैं और ये सब भिन्न-भिन्न धर्मों में विश्वास रखने वाले हैं।
वे मुझे लिखते हैं, हमें इन रचनाओं में किसी लेखक के कला कौशल की झाँकी नहीं, स्वयं हमारी ही ज़िन्दगी, आशा, आकांक्षा, जिज्ञासा, भावनाओं का उतार-चढ़ाव मिला है।
वे मुझे लिखते हैं, हमें इन रचनाओं में एक नये ढंग का रस मिला है, हमनें इन्हें बार-बार पढ़ा है। इन्होंने हमारी जिज्ञासाओं को समाधान दिये हैं, हमारे जीवन को उठाया है, निराशा में आशा दी है, आत्महत्या से बचाया है हमें बदला है, पारस्परिक असहमति में सहमति दी है, हमें समन्वय-सामंजस्य की कला सिखाई है, बिगड़े सन्तुलन को स्थिरिता दी है, हमें शान्त-सन्तुलित जीवन का आनन्द दिया है, हम अनुत्तम से उत्तम और उत्तमोत्तम जीवन का अनुभव पा रहे हैं।
वे मुझे लिखते हैं—हम पहले भी पढ़ते थे, पर पढ़ते ही थे, इन्होंने हमें पढ़े का समझना और समझे को आचरण में उतारना सिखाया है; वह भी बिना प्रयास के, सहज भाव से ही।
वे मुझे लिखते हैं, और मुझे यह लिखना सबसे अधिक सुख देता है कि हमें ये रचनाएँ आपकी लगीं ही नहीं, सच मानिए अपनी ही लगीं, इसलिए ये हमारी ज़िन्दगी में रच-पच गयीं।

मैंने कहा, इन रचनाओं में एक असहाय व्यक्ति के द्वारा, जो वीराने में जन्मा-पला, लहलहाती ज़िन्दगी की खोज है। आधी सदी से भी अधिक समय से रात-दिन चालू इस खोज की मानव जीवन के लिए उपलब्धि क्या है ?
उपलब्धि है यह सत्य की परिस्थिति के बदलने से मनःस्थिति का बदलना अधूरी ज़िन्दगी की जगह भरी-पूरी, समग्र ज़िन्दगी पाने का सही मार्ग नहीं है। उसका सही मार्ग है मनःस्थिति के बदलने से पहले परिस्थिति का बदलना। इस जीवन-सूत्र को थोड़ा स्पष्ट करें  यदि हमारी परिस्थिति गरीबी की है, पराजय की है, भय की है, असफलता की है, पर हमारी मनःस्थिति समृद्धि, विजय, अभय और सफलता की बन जाए, हम बना पाऐं, जैसा कि बना सकते हैं, तो हमारी गरीबी, पराजय, भय, असफलता आप ही आप समाप्त हो जाते हैं। कहें, हमारा जीवन अपूर्णता से सम्पूर्णता में बदल जाता है; वैसा हो जाता है जैसा हम चाहते हैं, पर वह वैसा नहीं है।

बात को और आगे बढ़ाएँ कि बात साफ हो। व्यक्ति का व्यक्तित्व है उसकी मनःस्थिति, व्यक्ति का चरित्र है उसकी मनः स्थिति, व्यक्ति के जीवन का मानदण्ड है उसकी मनः स्थिति, व्यक्ति की कसौटी है उसकी मनःस्थिति, व्यक्ति की हीनता और महानता है उसकी मनःस्थिति, व्यक्ति का वर्तमान है उसकी मनःस्थिति और व्यक्ति का भविष्य है उसकी मनःस्थिति।
ये रचनाएँ मानव की मनःस्थिति को हीनता से महानता में, संकीर्णता से उदात्तता में, विध्वंस से रचनात्मकता में, असन्तुलन से सन्तुलन में, अगति से गति में परिवर्तित करने की संशोधन-शालाएँ (रिफाइनरीज़) हैं। मैं प्रसन्न हूँ इस विश्वास से कि जब मेरे हृदय की धड़कनें अपना काम बन्द कर देंगी, तब भी ये शालाएँ अपना कार्य, कि मनुष्य आज से कल और कल से परसों श्रेष्ठ हो, करती रहेंगी; जैसे प्रक्षेपणास्त्र से पृथक होने के बाद अन्तरिक्ष में घूमता उपग्रह !


मृत्युंजय चूहे की जय


मृत्युंजय चूहे की जय !

दैनिक पत्र में एक विचित्र समाचार छपा है कि जावरा में स्वामी माधवानन्द की कुटिया के सामने एक चूहा इधर-उधर घूम रहा था कि एक विकराल काला साँप झाड़ी से निकल कर झपटा और उस चूहे को एक रसगुल्ले की तरह निगल गया।

हाँ, रसगुल्ले की तरह, पर इतना अन्तर कि रसगुल्ला जीभ और तालू के बीच दबते ही घुल जाता है और चूहा एक हाड़-माँस का जीव; तो वह घुलेगा कैसे ? फिर साँप महाराज का भय-आतंक तो इतना कि वह नैपोलियन बोनापार्ट की खाट के नीचे भी ज़रा फूः कर दें तो वीरों का वीर एक बार तो गेंद-सा उछल ही पड़े, पर हाल बेचारों का यह कि मुँह में जाड़ न किल्ला और जीभ भी यों कि रेशम का धागा; तो न दाब, न चाब, बस लिया, सटका-धर गुल्लक, भज राम ! अब जठराग्नि जाने और उसका काम-गलाये, जलाये, पकाये, पचाये।
अब क़िस्सा यों कि चूहे का मुँह साँप ने अपने मुँह में लेकर इस तरह दबा लिया कि जैसे चिरबिछोह के बाद गले मित्र का हाथ दूसरा मित्र अपने गुदगुदे हाथ में ले लेता है। उनका मतलब साफ़-साफ़ यों कि चूहे मियाँ साँस के आवागमन से मुक्ति पा लें, तो इन्हें भीतर पहुँचाऊँ, पर वह निकले पूरे प्राणायामी और ज्यों ही साँप ने उन्हें गले के पार किया, तो यही नहीं कि वह साँस लेने लगे, यह भी उसकी लंबी कन्दरा में अपने पैरों स्वयं बढ़ चले।

अब देखिए गणेश-वाहन की चतुराई कि पल-भर में ही उन्होंने उस अँधेरी कन्दरा की सर्वे कर ली और यह भाँप गये कि पेट की जगह ही बैठने के लिए सबसे आराम की जगह है। बैठकर उन्होंने शान्ति के साथ दो-चार साँस लिए और अपने बिल से इस कन्दरा की तुलना की। अँधेरा वहाँ भी था यहाँ भी है, पर वहाँ अँधेरे से जब चाहें प्रकाश में जा सकते थे, यहाँ यह सम्भव नहीं। क्यों ?

दिल-दिमाग़ दोनों में सन्नाटा खा गये। ओह, यह कन्दरा नहीं, साँप का पेट है ! उन्हें याद आया साँप का आक्रमण, उसके मुँह की दाब और तब धीमी सटक, तो मौत ही मौत—बचने का कोई उपाय नहीं, यहाँ से निकलने का कोई मार्ग नहीं। उन्हें याद आ गयी अपनी चुहिया, तो उनकी आँखें तर हो आयीं—हाय, बेचारी प्रतीक्षा कर रही होगी।
चुहिया-चिन्तन ने सन्नाटे की गहराई कम की, तो उत्साह ने अँगड़ाई ली, उद्योग ने सिर ऊँचा किया। उन्हें याद आया कि जब वह शहर में थे, तो सेठानी जब खाने पीने का सामान अलमारी में रखने लगीं तो उन्होंने उसकी मज़बूत लकड़ी काटकर अपने लिए एक खिड़की खोल ली थी। उन्होंने सोचा, क्या साँप के पेट को काटकर बाहर नहीं निकला जा सकता ?
इस प्रश्न के उत्तर में उनकी बुद्धि ने ना नहीं की, तो मुलायम-सी जगह देखकर अपना पहला दाँत मारा। उनका मन हर्ष से खिल उठा और आप-ही-आप वह कह उठे, ‘‘अरे, यह तो न सीमेण्ट है, न लकड़ी, एकदम आलूबुख़ारा है—मुलायम और मज़ेदार !’’ और तब दूसरी चिकोटी काटते हुए उन्होंने सोचा, ‘‘बड़ा फुंकारता फिरता है शेषनाग का बच्चा, लो देख खिड़की तो यह बनी, पर ज्यादा अकड़ेगा तो छलनी बना दूँगा।’’

अब साँप के प्राण संकट में और अक़्ल हैरान कि हे भगवान, यह हुआ क्या ? आज कोई पहली बार ही तो यह मिठाई नहीं खाई ? फिर यह खुदड़-बुदड़ क्या हो रही है ? बाप रे, यह तो उस नेवले से भी तेज़ है। वह तो ऊपर ही दाँत मारता है, पर यह तो आँते काट रहा है ! उफ़ ! उफ़ !!
साँप फुंकारा, पर फुंकार भीतर तो पहुँचती नहीं। कच्च ! ओह, फिर उसने काटा ! साँप ने पूँछ फड़फड़ायी, जमीन पर मारी, पर उससे लाभ ? उसने फन उठाया, उसे ज़मीन पर मारा, सीधा हुआ, कुण्डली कसी, लोटपोट हुआ, पर चूहे के दाँत की आरी न रुकी, न रुकी, चली-चलती रही और सबने देखा कि कुछ ही देर में अपनी बनायी खिड़की से कूदकर चूहा बाहर आ गया।

आ गया ? अरे साहब, आ गया क्या, गया। वह कूदकर निकला और दौड़कर अपनी झाड़ी में पहुँचा। साँप कुछ देर छटपटाया, फिर सरककर एक झाड़ी में हो गया। जाने कौन-सी नस कट गयी थी कि कुछ ही देर में उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। और चींटियाँ-चीटे और चीलें चट कर गये !

‘‘हैलो ! मालवीयजी महाराज हैं ?’’
‘‘लीजिए उनसे बात कीजिए।’’
पूज्य पण्डित मदनमोहन मालवीयजी महाराज नयी दिल्ली आये हुए थे। मैं भी किसी काम से दिल्ली गया, तो चाहा उनके दर्शन करूँ। उनकी वाणी कानों में पड़ी। उनकी वाणी में एक निजी समतोल था। मुझे तो वह सदा पंचगव्य-सी मधुर लगी, ‘‘दूर से क्या बोलते हो, यहीं आ जाओ, आते हो ?’’ मालवीयजी बहुत भले थे और उनके चरित्र का गुण-दोष ही यह था कि वह किसी को इनकार नहीं कर सकते थे। मैं पहुँचा तो देखकर खिल गये और वह खिले तो मैं हिल गया—जाने कब तक कहाँ-कहाँ की बातें होती रहीं। अचानक उन्होंने घड़ी देखी और हड़बड़ाकर खड़े हो गये, ‘‘मुझे तो इस गाड़ी से मथुरा जाना है।’’
जल्दी-जल्दी कपड़े पहनते हुए अपने सेवक से बोले, ‘‘सामान मोटर में रखो।’’ सेवक ने घड़ी देखी, ‘‘महाराज, अब गाड़ी नहीं मिल सकती। उसे तो दिल्ली स्टेशन से छूटे भी काफ़ी समय हो चुका।’’

न घबराहट न परेशानी। वही शान्त चेहरा, ‘‘अरे रखो तो !’’ और वह मोटर में जा बैठे। मैं भी साथ। इधर से मालवीय जी स्टेशन आये, उधर से वह गाड़ी। जितने मिनट वह लेट, उतनी ही लेट गाड़ी। अब वह फर्स्ट क्लास के एक डिब्बे में और मैं खिड़की से बाहर। बोले, ‘‘लो एक सूत्र लिखो।’’

मैंने एक कॉपी निकाली, तो बोले, ‘‘जब तक असफलता छाती पर न चढ़ बैठे, दम ही न घोट दे, उसे स्वीकार मत करो।’’
मेरे मुँह से अनायास निकल गया, ‘‘और सफलता के लिए बराबर उद्योग करते रहो।’’ सुनकर बहुत खुश हुए--‘‘बस, तुम ठीक समझ गये।’’ सोचता हूँ, मैं तो जो कुछ समझा, पर यह चूहा मालवीयजी महाराज की बात को पूरी तरह समझता था, और समझता क्या था, उसने तो करके दिखा दिया। साँप को देखते ही आदमी मौत का घेरा देखता है। फिर यह जरा-सा चूहा और साँप को उसने देखा ही नहीं, साँप ने उसे निगल लिया, पर साँप के पेट में पहुँचकर भी उसने मौत का घेरा नहीं, ज़िन्दगी का मैदान ही देखा।
विद्यार्थियों की एक विचार-गोष्ठी में बात-चीत करने गया, तो मुझसे प्रश्न पूछा गया, ‘‘सफलता का क्या मार्ग है ?’’
मैंने उत्तर दिया, ‘‘स्वप्न, संकल्प, श्रम, सिद्धि।’’
व्याख्या में कहा, ‘‘स्वप्न देखो, कल्पना करो। इससे तुम्हारी चाह इच्छा को एक निश्चित रूप मिलेगा कि तुम क्या चाहते हो और तुम्हारी चाह कहीं ख्याली गुब्बारा ही तो नहीं है !

‘‘तब संकल्प करो, इरादा बांधो, फैसला करो कि मैं इस स्वप्न को साकार करूँगा, पूरा करूँगा, पाकर ही दम लूँगा। उस संकल्प में तुम्हारा स्वप्न तुम्हारे जीवन का एक यथार्थ हो जाएगा और उसे पूरा करने का बल तुम्हें अपने भीतर अनुभव होगा। यही नहीं, अब तुम्हें तुम्हारा स्वप्न आकाश का नक्षत्र नहीं, इसी पृथ्वी का फल मालूम देगा और उसकी दुर्लभता का निराशाजनक भाव नष्ट हो जाएगा। तुम सोचोगे, मैं इसे ज़रूर पा सकता हूँ।
‘‘तब श्रम करो, जुट जाओ, जुटे रहो, पर श्रम का प्राण है योजना, यह मत भूलो। युग-सन्त बाबा विनोबा का एक वाक्य है, ‘‘बे-अक़्ल और बे-काम अक़्ल से बचो’’ बे-अक़्ल काम का अर्थ है योजनाहीन श्रम और बे-काम का अर्थ है योजना ही योजना, ख्याली पुलाव। दोनों से बचो और योजना पूर्वक सोच-समझकर, श्रम करो—बस सिद्धि-सफलता सदा तुम्हारे द्वार खड़ी मिलेगी।’’
मालवीय जी महाराज ने उस दिन श्रम की सीमा ही तो बताई थी  ‘‘जब तक असफलता छाती पर न चढ़ बैठे, दम ही न घोट दे, उसे स्वीकार मत करो और सफलता के लिए बराबर उद्योग करते रहो।’’

श्रम और सिद्धि के बीच का मार्ग साफ़-सुथरा नहीं है। उसमें बाधाएँ है, रूकावटें हैं संकट हैं ख़तरे हैं, पर इनसे बचने के लिए ही तो अक़्ल की आवश्यकता है और इस अक़्ल के दो तक़ाज़े हैं। पहला तक़ाज़ा सुना था अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने, जब उन्होंने युवकों से कहा, ‘‘जिस काम के करने में रुकावटें, तकलीफें और संकट नहीं आते, मैं उसे मनुष्य के लायक काम ही नहीं समझता !’’

पूछा गया, ‘‘क्यों?’’ तो बोले, ‘‘मनुष्य की महत्ता इसमें नहीं कि वह काम करता रहे। उसकी महत्ता इसमें है कि वह विशिष्ट काम करे और काम की विशिष्टिता देते हैं मार्ग के संकट, पथ की बाधाएँ, राह की रुकावटें-तो जिस काम में ये नहीं, वह तो एक मामूली नगण्य काम हुआ !’’
अक़्ल का दूसरा तक़ाज़ा है इन पंक्तियों में, जो काव्यगद्य-सी मीठी मृदुल है 

संकट जब तक दूर है,
उससे कन्नी काटो, आँखें न मिलाओ
बचे-बचे रहो और उसे अपनी ओर
अभिमुख होने का अवसर न दो।
जब संकट तुम्हारी ओर अभिमुख हो,
बढ़कर तुम्हारे द्वार पर आ ललकारे,
तुम पल-भर भी बिना खोए,
उसकी ललकार स्वीकर कर लो,
और उससे भिड़ जाओ !
चिन्ता न करो,
उसके साथ अपनी ताक़त की तुलना भी न करो।
भय का विचार मन में भी न आने दो,
बस, उससे भिड़ जाओ।
याद रखो—
संकट इसलिए तुम्हारे द्वार नहीं आया
कि तुम्हारे दर्शन कर लौट
जाये।
पल-भर को भी न भूलो कि
वह तुम्हें एक रसगुल्ले की तरह
निगल जाने को आया है।
इस हालत में
चिन्ता, भय, बचने-भागने की वृत्ति
तुम्हारी चरित्र-हीनता होगी
और चरित्र-हीनों के साथ
संकट वही व्यवहार करता है,
जो बिलाव चूहे के साथ
कि खेल-खिलाकर उसे खा जाए।
एक बात याद रखो-
तुम्हारी झिझक, तुम्हारी भीति,
तुम्हारी सम्पूर्ण शक्ति को
तुम्हारे शत्रु की भुजाओं में
भर देती है।
लो, सुनो बुद्धि की एक बात-
जब संकट द्वार पर है,
तो विनाश की डाढ़ में तुम ही हो
और तुम्हारी निराशा, झिझक,
भय और दीनता,
विनाश की गति को,
तीव्रता ही देंगे,
और क्या ?
पर यदि झिझक छोड़कर
तुम भिड़ जाओ,
तो यह विनाश बच सकता है।
लो सुनो, सोचो, समझो-
संकट एक आँधी है, बाढ़ है,
जो उसके पहले झपाटे में नहीं गिरा,
पहले बहाव में नहीं बहा,
अपनी जगह जमा-टिका रहा,
आँधी और बाढ़ मान लेते हैं,
कि वह अजेय है,
और यह है युद्धनीति कि
शत्रु को तुम्हारी अजेयता का
आभास भी मिला कि वह उखड़ा,
तो दुविधा में मत पड़ो,
क्योंकि
बचाव की यह सम्भावना
यदि एक फीसदी है,
तब भी झिझक छोड़कर भिड़ पड़ो;
क्योंकि
इतिहास ने अनेक बार
एक फीसदी को सौ फीसदी
हो जाते देखा है।
कौन जाने तुम भी इतने भाग्यशाली
हो कि एक नयी नज़ीर
क़ायम कर सको।
तुम्हें विश्वास नहीं ?
लो तुम्हारी बात मान लेता हूँ
कि तुम नहीं जीत सकते,
संकट की ही विजय निश्चित है,
पर यह क्यों भूलते हो
कि मृत्यु का भी एक सौन्दर्य है !
कुत्ते की मौत
और बहादुरी की मौत में
क्या कुछ भी अन्तर नहीं ?
कौन कह सकता है इस पर हाँ ?
फिर यही क्या कुछ कम है
कि तुम आदमी की मौत मरो
यदि तुम विजय की एक नयी
नज़ीर क़ायम नहीं कर सकते,
तो सुन्दर मृत्यु की ही
एक नज़ीर क़ायम कर दो।
जाने इससे भविष्य में
कितने लोग प्रेरणा पाएँ।
जानते नहीं तुम
जौहर भी
इतिहास का शानदार पन्ना है !
बातें बहुत हो चुकीं,
संकट द्वार पर ललकार रहा है,
उठो और उठते उठते ही
भय, झिझक और चिन्ता को
दूर फेंक दो-
बिल्कुल उसी तरह
कि जैसे अपने ऊपर चढ़े
कानखजूरे को फेंक देते हो
और भिड़ जाओ पूरी ताकत से,
तुम्हारी विजय निश्चित है !
फिर निश्चित-अनिश्चित क्या
वह तत्त्वदर्शी था-
जिसने अतीत में गाया—
‘‘कार्यं वा साधयेयम्, शरीरं वा
पातयेयम्’’
-मैं अपना कार्य सिद्ध करूँ या मर जाऊँ
फिर भय क्या, झिझक क्या
जब एक मुट्ठी में विजय
और दूसरी में सन्तोष है


इन्हीं नन्हीं पंक्तियों में जो बड़ी बात कही गयी, वह बड़ी तो है ही, महत्त्वपूर्ण भी है। जब हम संकट में फँसते हैं, तो हमें संकटपूर्ण जीवन और शान्तिपूर्ण जीवन में चुनाव नहीं करना होता, हमें चुनाव करना होता है इस स्थिति में कि हम संकट के सामने सिर झुकाकर चुपचाप हार जाएँ, नष्ट हो जाएँ या संकट को परास्त करने के लिए हाथ-पैर मारकर बचाव की क्षीण से क्षीण सम्भावना की परीक्षा करें ?

जीवन का एक महत्त्वपूर्ण रहस्य यह है कि यह सम्भावना कभी क्षीण नहीं होती। हम अपनी मानसिक कमजोरी के कारण उसे क्षीण मान लेते हैं। सच्चाई यह है कि यह सम्भावना क्षीण-दुर्बल नहीं, सूक्ष्म होती है और हम इसे अपनी मानसिक आंखों की कमज़ोर दृष्टि के कारण ठीक समझ-आँक नहीं पाते। इसका उपाय है चश्मा। बाहरी आँखों के लिए शीशे का चश्मा, तो भीतरी आँखों के लिए साहसी जनों के अनुभवों का चश्मा। यह चशमा ही तो है कि चूहा साँप के पेट से जीता-जागता निकल आया। जहाँ चूहा पहुँच गया था, वहाँ से उसके बाहर आने की सम्भावना कितनी सूक्ष्म थी, पर वह कितनी मज़बूत निकली ?

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रश्न संकट के समय स्थिर रहने का नहीं है, प्रश्न तो सम्भावना की सूक्ष्मता का बल पहचानने का है—वही बात है कि असफलता को उस समय तक स्वीकर मत करो जब तक कि वह दम न घोट दे और विश्वास रखो कि जीवन में असफलता के अवसर कम और सफलता के अवसर अधिक हैं।
1944 में कुछ दिन के लिए गाँधी जी सेवाश्रम से वर्धा आकर रहे। वे कहीं भी और किसी भी चीज के बिना रह सकते थे, पर प्रार्थना के बिना नहीं। प्रभात की प्रार्थना का समय साढ़े चार बजे था। सब लोग प्रार्थना भूमि में आ बैठे थे। वल्लभ स्वामी अभी नहीं आये थे, उन्हें पाँच-छः मील से आना था और आज गीता पाठ करना था। गाँधी जी भी ठीक समय पर आकर अपनी जगह बैठ गये, तो सब में चंचलता हुई कि वल्लभ स्वामी नहीं आये और अविश्वास उगा-उभरा कि अब वह नहीं आयेंगे !
एक कण्ठ से यह अविश्वास फूटा, ‘‘वह अब क्या आयेंगे ! हम प्रार्थना शुरू कर दें’’
‘‘क्यों नहीं आयेंगे वह ?’’ यह प्रश्न और, ‘‘अब क्या आते, दो-तीन मिनट ही तो हैं !’’
यह उत्तर गुनगुनाहट में जागा कि गाँधीजी का विश्वास समाधान में उभरा, ‘‘अभी दो-तीन मिनट बाक़ी हैं, आयेगा क्यों नहीं !’’
भाषा के संकेत कितने प्यारे और मीठे होते हैं ? अविश्वास की भाषा है, ‘दो-तीन मिनट ही तो !’ और विश्वास की भाषा है, ‘अभी दो-तीन मिनट !’ ख़ैर, आधा मिनट शेष था कि वल्लभ स्वामी आ पहुँचे। गाँधीजी ने सबकी ओर ताड़कर देखा तुम लोग विश्वास की डोर इतनी जल्दी क्यों छोड़ देते हो ? वही बात की असफलता को इतनी जल्दी क्यों स्वीकार कर लेते हो ?

सचमुच जीवन में हार की, असफलता की सम्भावना से जय की, सफलता की सम्भावना अधिक सच्ची, अधिक वास्तविक है। मेरे बन्धु श्री जगदीशचन्द्र वैद्य बीमार थे। निराशा का वातावरण था, पर उद्योग थककर बैठा नहीं था—काशी में उनकी चिकित्सा हो रही थी। अन्तिम प्रयत्न के रूप में सर्वोत्तम चिकित्सकों का एक बोर्ड बैठाया गया, पर सबका ज्ञान-विज्ञान इस परिणाम पर पहुँचा कि जीवन की डोर कट चुकी है और अब प्रयत्न सिर्फ़ समय का है। परिवार को स्पष्ट कर दिया कि उन्हें घर ले जाएँ और वह घर ले आये गये।
मृत्यु आयी नहीं थी, पर उसके आने की प्रामाणिक घोषणा हो चुकी थी। रोगी ने, परिवार ने, मित्रों ने मान लिया था कि घोषणा अटल है। आशा की मसाल कहाँ जलती, जब सम्भावना का दीपक भी बुझ चुका था। इस दुर्घटना पर हमें किसी दिन रोना नहीं था, क्योंकि हम पहले से ही काफी रो चुके थे स्थिति यह थी कि अन्तिम दर्शन के लिए सम्बन्धी-मित्र आ रहे थे—आ चुके थे।

उस दिन हम सबके सहृदय मित्र डॉक्टर सूर्यप्रकाश गुप्त आये। डॉक्टर आख़िर डॉक्टर, रोगी को देखभाल कर बोले, ‘‘रात ही मैंने एक नयी दवा का विज्ञापन पढ़ा है। इंजेक्शन है। शाम को मैं लेकर आऊँगा।’’ वह शाम को आये और इंजेक्शन लगा गये, पर रोगी देह में इतनी भी चेतना न थी कि वह सुई के चुभने से चौंके, पर पाँचवे इंजेक्शन पर जगदीशचन्द्र के चेहरे पर आशा की पहली रेखा दिखाई दी और सौंवें इंजेक्शन पर वह अपनी मृत्यु शैय्या से कूदकर जीवन के आँगन में आ खड़े हुए !
क्या बात हुई यह ? यही कि सफलता की सूक्ष्म संभावनाओं का बल आँकने में हम सब चूक गये और डॉक्टर सूर्यप्रकाश गुप्त ने उसे आँक-तोल कर थाम लिया। उनकी सफलता ही यह है कि उन्होंने सफलता-असफलता पर विचार नहीं किया और सफलता की छोटी से छोटी संभावना को ही सबकुछ मानकर वह जुट गये।
लो, यह आ गये यशपाल-हिन्दी के वर्चस्वी लेखक और भारतीय स्वतंत्रता के लिए ख़ून का फाग खेलने वाले यशस्वी क्रान्तिकारी। इनकी भी एक कहानी है—सुनने लायक, विचारने लायक।

1929 की 23 दिसम्बर, घने कोहरे में डूबी ब्रह्मवेला। वाइसराय लार्ड इरविन कोल्हापुर से दिल्ली आ रहे हैं और दिल्ली में उसी दिन गाँधीजी से उनकी मुलाक़ात तय है। क्रान्तिकारी दल ने तय किया कि इस गाड़ी को बम से उड़ाकर वाइसराय को समाप्त कर दिया जाए। लाइन के बीच में बम रख दिया गया और ज़मीन के नीचे-नीचे दूर तक तार फैलाकर उसे बैटरी से जोड़ दिया गया कि गाड़ी के आने पर यशपाल इस बैटरी में पतीला लगा दें !
ठीक समय पर गाड़ी आयी, पतीला जला, डिब्बे के नीचे विस्फोट हुआ, पर बम कमज़ोर निकला। बिना विशेष नुक़सान उठाए गाड़ी सर्र से निकल गयी। अब यशपाल सड़क पर कि अपनी मोटर-साइकिल पर सवार हो नौ-दो ग्यारह बनें, पर साइकिल का इंजिन कोहरे की ठण्ड से फच्च और तभी आ पहुँची एक फ़ौजी टुकड़ी !

फ़ौजी टुकड़ी, यानी यशपाल के मौत का वारण्ट। यशपाल तनकर खड़े हो गये और अपनी जेब में पड़ी पिस्तौल पर उन्होंने हाथ साध लिया कि मरना तो है ही, पर दो-चार को मार कर मरेंगे। लो, यह आ गयी टुकड़ी सामने और फायर का हुक्म सुनने को यशपाल के कान तैयार, पर यह क्या कि कान सुन रहे हैं--‘‘आईज़ राइट।’’ यह तो मौत की हुंकार नहीं, जीवन की वंदना है-अँग्रेजी फ़ौज का अफ़सर अपने सिपाहियों को हुक्म दे रहा है कि वे यशपाल को सलाम करें। यशपाल भौंचक और विस्मय-विमुग्ध। बात यह हुई है कि यशपाल उस समय फ़ौजी वर्दी पहने हुए थे और उनके कन्धे पर मेजर का पदचिह्न लगा हुआ था। अंग्रेज़ी फ़ौज के अफ़सर ने समझा कि मेजर साहब अपनी मोटर-साइकिल पर हमसे पहले ही आ पहुँचे हैं और नियमानुसार उसने उन्हें सलाम किया। कोहरे में वह देख नहीं पाया कि मेजर के बिल्ले पर अंग्रेज़ी फ़ौज का नहीं, क्रान्तिकारी दल का नाम खुदा हुआ है।

यशपाल ने फ़ौजी शान से सलाम किया, टुकड़ी आगे बढ़ी। यशपाल अपने घर आये। स्पष्ट है कि मौत निश्चित थी और बचने की सम्भावना के सब धागे टूट चुके थे, पर विचारणीय तो यही है कि टूटे धागों में कितनी जान निकली ? क्या उस जान की जानदार घोषणा यह नहीं है कि जीवन में असफलता से सफलता के अवसर अधिक हैं, कम-से-कम नहीं हैं—कम भी नहीं हैं और संकट के आते ही, बाधा को देखते ही हाथ पर हाथ रख लेना, निराश हो जाना, असफलता को स्वीकार कर लेना और नये प्रयत्न न करना स्वयं हमारी कमज़ोरी है।








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