हीरामृग - महिन्दर सिंह सरना Hiramrig - Hindi book by - Manider Singh Sarana
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हीरामृग

महिन्दर सिंह सरना

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :166
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1203
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत ही हीरा मृग.....

Hiramrig

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पंजाबी के वरिष्ठ कहानीकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित महिंदर सिंह सरना की बहुचर्चित कहानियों का संग्रह है ‘हीरामृग’। इससे पहले उनके ‘काला नाग’ कथा संग्रह को भी हिंदी पाठकों से भरपूर सराहना मिल चुकी है।
अपने समय और परिवेश के बुनियादी सरोकारों से अपनी गहरे रूप से जुड़ी ‘हीरामृग’ संग्रह की कहानियाँ अपनी सच्ची और खरी अभिव्यक्ति की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण हैं ही, सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं पर भी ये बेलोस तेजाबी चोट करती हैं। वास्तव में स्वस्थ और उज्जवल जीवन-मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध कथाकार द्वारा लिखी गई इन कहानियों में मानवीय अस्मिता और उसकी आंतरिक संवेदना का कलात्मक चित्रण है। कहा जा सकता है कि सीधी सरल भाषा और सादगी भरे शिल्प में प्रस्तुत इन कहानियों में रची-बसी पंजाब की धरती की खुशबू, वहाँ धड़कन और लोंगों के सुख-दुख इन सबका साक्षात्कार कथा साहित्य के सुधी पाठक सहज ही कर सकेंगे।

भूमिका


मैंने कहानी लिखना 1943 से आरंभ किया। अपनी कहानियों के लिए सबसे पहली प्रशंसा मुझे सुप्रसिद्ध पंजाबी कवि प्रोफेसर मोहन सिंह से प्राप्त हुई, उन आरंभिक प्रयत्नों में उनकी पंजाबी मासिक-पत्रिका ‘पंज दरिया’ ने मुझे अत्यंन्त प्रोत्साहित किया। 1943 से 1946 तक लगभग मेरी पच्चीस-तीस कहानियाँ ‘पंच दरिया’ में प्रकाशित हुईं। इन पच्चीस-तीस कहानियों में से कोई कहानी बाद में मैंने अपने किसी कहानी संग्रह में सम्मिलित नहीं की। इन कहानियों में रोचकता मौलिकता एवं स्थानीय परिवेश था, किंतु इनमें सामाजिक या आर्थिक चेतनता नहीं थी यही मुख्य कारण था। कि ये कहानियाँ मेरे कहानी-संग्रह में स्थान नहीं पा सकीं।

मेरा पहला कहानी-संग्रह ‘पत्थर के आदमी’ 1949 में प्रकाशित हुआ था। पंजाबी साहित्य-जगत में इसका गरिमापूर्ण स्वागत हुआ था। अपनी पुस्तक ‘‘पंजाबी गल्पकार’ में डा. गुरुचरण सिंह ने इस संग्रह के आधार पर लिखा हैः ‘‘इस लेखक में सशक्त अभिव्यक्ति और निजी शैली है। उसने हमें कुछ प्रभावशाली छोटी कहानियाँ दी है मनोवेग और भाव चित्रण में सरना कलम का धनी है।’’ उसी समय के अन्य समीक्षक प्रो. बलबीर सिंह ‘दिल’ ने अपनी पुस्तक ‘पंजाबी कहानी का विकास’ में मेरे बारे में लिखा कि ‘‘वह अपने पात्रों की मानसिक व्याख्या बड़ी मनोवैज्ञानिक सूझ से करते है। लूट-खसोट करने वाली सरमायेदार श्रेणी पर उनका व्यंग्य बड़ा तीखा है.... सरना की कहानियों ने रूप और वस्तु दोनों ही पक्षों से पंजाबी कहानी-साहित्य में एक विशेष वृद्धि की है।’’ इन आरंभिक कहानियों में ही वे सब गुण विद्यमान थे, जिसका आगे चलकर मेरे कथा-साहित्य में विकास हुआ।

1945 में एक बार मैं निसबत रोड, लाहौर स्थिति ‘पंज दरिया’ के कार्यालय में प्रोफेसर मोहन सिंह से मिला। वहाँ मैंने उनको अपनी ताजा कहानी ‘चौधरी वारस’ सुनाई। सुनकर वे कहने लगे, ‘‘लगता है, ‘‘तुमने रूसी कहानीकारों को बहुत प़ढ़ा है !’’
‘‘नहीं’’, मैंने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘बिलकुल नहीं !’’
‘‘लेकिन पंच दरिया में छपी तुम्हारी कहानियों के पात्रों के नयन-नक्श तो रूसी किसान पात्रों जैसे हैं।’’
‘‘यह संयोगवश है’’, मैंने कहा, ‘‘लेकिन अब मैं रूसी कहानीकारों को अवश्य पढ़ूंगा।’’

और फिर मैंने रूसी कहानीकारों, विशेष रूप से गोर्की को पढ़ा। उर्दू के प्रगतिशील कहानीकारों, विशेषकर कृश्न चंदर को पढ़ा। सामाजिक और आर्थिक चेतनता के क्षेत्र में गोर्की और कृश्न चंदर मेरे प्रेरणास्त्रोत बने। जब सामाजिक और आर्थिक चेतना का बीज सृजन की कोख में रोपा गया। तो वर्तमान को उधेड़ने और भविष्य में नये सिरे से सीने के संकल्प ने जन्म लिया, और एक बात मेरी चेतना में बड़ी गहरी उतर गई कि जिस साहित्यकार के पास स्वस्थ्य मूल्यों की पूँजी नहीं, साहित्य की मंडी में उसका व्यापार खोटा है। और जो साहित्यकार समाज-शत्रुओं को निवारण नहीं करता, जो दरिद्रों, दलितों एवं अभावग्रस्तों की  फरियाद पाठकों तक पहुँचाता, उसके लिखने का कोई अर्थ नहीं।

कॉलेज के दिनों में जो पुस्तकें मैंने कॉलेज के पुस्तकालय से लेकर पढ़ी दो ऐसी थीं। जिन्होंने मेरे ह्रदय पर जीवन भर के लिए अमिट छाप छोड़ी। ये थी-सैमुअल समाईल्ज की ‘कैरेक्टर’ और लाला हरिदयाल की ‘हिंट्स’ फॉर सैल्फ कल्चर’। सहृदयता, उज्जवल एवं स्वस्थ मूल्य मुझे माता-पिता से विरासत में मिले थे। सैमुअल समाईल्ज और लाला हरिदयाल ने यह बात दृढ़ करायी कि वे मूल्य प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए कितने अमूल्य और सँभालने योग्य थे। और कैसे प्रसन्नता के अभिलाषिओं को इन मूल्यों के खजाने पर सजगता से पहरा देना अनिवार्य था। ये दो पुस्तकें मैंने उस आयु में पढ़ी जब हृदय की धरती संवेदनशील होती है। सैमुअल समाईल्ज और लाला हरिदयाल के बोए गये यह बीज बड़ी गहरी जड़ें पकड़ गये। ये दोनो लेखक हमें उन सिद्धान्तों के अनुयायी बनाते हैं, जो मानवीय सभ्यता के विकास की आधारशिला है, किन्तु जो रेत के घरौंदे की तरह बिखरते जा रहे हैं। लाला हरिदयाल और सैमुअल समाईल्ज मेरे अवचेतन में थे, जब मानववाद के मूल सिद्धान्तों और जीवन के स्वस्थ एवं उज्ज्वल मूल्यों को अपनी कहानियों द्वारा प्रचारित करने का मैंने प्रयत्न किया। प्रस्तुत संग्रह में ‘वृद्ध आश्रम’ ‘आखिरी पैग’ ‘मकोड़ा’ ‘बसंता बावला’ ‘एक बालिका दो बतासे’ ‘बस नंबर 541’ ‘गाजी’ एक किरण, एक दलदल’ और ‘मुंशी धनीराम’ इस संदर्भ की कहानियाँ हैं।

कहानियों में मैंने आरंभ से ही किसी ‘वाद’ को नहीं अपनाया। सदैव सार्थक और उद्देश्यपूर्ण कहानियाँ लिखने का लक्ष्य अपने सामने रखा है। प्रत्येक चेतन लेखक को अपने लक्ष्य एवं दिशाएँ निश्चित करनी पड़ती हैं और अपनी पहली-दूसरी प्राथमिकता तय करनी पड़ती है। दिशाहीनता या निरर्थकता साहित्य के सृजकों को शोभा नहीं देती है।
अपनी कहानियों को मैंने सदैव इनसानियत का पक्ष लेने का प्रयत्न किया है। यदि किसी वाद की आधीनता मेरी कहानियों में दिखाई देती है, तो वह मानववाद है। मैंने सदा पूँजीवादी व्यवस्था, भौतिकवादी दृष्टिकोण, और महाजनी मूल्यों की निंदा की है। सदा उनके लिए लिखना चाहा जिनको जिंदगी ने कुछ नहीं दिया। यदि दिया है तो भूख दी है,  कंगाली दी है, नासूर दिए हैं। सदा मैंने इनसानियत के उन शत्रुओं के विरुद्ध लिखना चाहा, जिनके मन में पैसे का अहंकार और दिल में पैसे की कठोरता है। मेरी कहानियाँ ऐसे समाज-शत्रुओं को निरावरण करती हैं, उनके चेहरों से दंभ के मुखौटे उतारकर उनकी भयानक और घिनौनी शक्ल नंगी करती है।

 सामाजिक कटाक्ष मेरी कहीनियों का ‘थीम’ है। व्यंग्य ही इनका प्रधान विषय है। मेरी चेतना-अवचेतना रूप में ही ऐसे विषय चुनती है, जिसमें व्यंग्य की पर्याप्त गुंजाइश हो। व्यंग्य के इस तीक्ष्ण शस्त्र को मैंने वर्तमान की गली-सड़ी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के विरुद्ध उपयोग किया है। इस व्यवस्था में विद्यमान अवशेष मूल्य भी लोप होते जा रहे हैं। इन मूल्यों को इस व्यवस्था ने निरर्थक कबाड़ समझकर खिड़की से बाहर कूड़े के ढेर पर फेंक दिया है। सामाजिक अन्याय, आर्थिक लूट-खसोट और भ्रष्टाचार जिंदगी के नियम बन गये है। समाज के पथ प्रदर्शक की कथनी और करनी के मध्य अंतर कम होने के बजाए बढ़ता जा रहा है। उनका दंभ, पाखंड और धूर्तता घिनौनी और ग्लानिजनक है। आज का समाज केवल पैसे को ही पीर समझता है। केवल धन के देवता की पूजा अर्चना में ही विश्वास रखता है। किन तरीकों से, किन साधनों से यह धन एकत्र होता है। और कितने ये साधन नैतिकता की कसौटी पर पूरे उतरते हैं। इससे किसी का कोई वास्ता नहीं, चाहे वह अत्यन्त काला हो। पैसा इष्ट बन गया है, क्योंकि इससे सामर्थ्य प्राप्त होता है समाज में अपनी शान दिखाने का और अपने से ही हीन व्यक्तियों को भँली-भाँति कुचलने का। इस संग्रह में सामाजिक एवं आर्थिक चेतनता की कहीनियाँ हैं।–काला मोतिया, मकोड़ा, एक अँधेरी शाम, पशीना और पानी, मुँशी धनीराम, कर्जदार, वृद्ध आश्रम, और एक किरण, एक दलदल !

आलोचकों और समीक्षकों ने मेरी कहानियों का तकनीक, सशक्त अभिव्यक्ति और जोरदार शब्दशक्ति और शैली को सराहा है। मनोवेग और भावचित्रण और प्रभाव द्वारा विषय के अनुकूल वातावरण सृजन की कला की प्रशंसा की है। मेरी मनोविश्लेषण प्रवीणता की ओर बारंबार संकेत किया है, किंतु पंजाबी कहानी साहित्य को मेरी सबसे बड़ी देन सामाजिक और आर्थिक चेतनता और व्यंग्य है।

‘प्यार के व्यापारी’, ‘1988 ईसवी’ और ‘काला मोतियाबिन्द’ का व्यग्यं तीक्ष्ण है, किन्तु जिन  कहानियों में मनुष्य का मानसिक और नैतिक दुरावस्था की तुलना पशुओं की उदारता और स्वस्थ्य मनोवृत्ति से की गयी है (हीरामृग एक किरण, एक दलदल) वहां व्यंग्य और भी तीखा और पैना हो गया है।
किंतु इस सारे व्यंग्य के बावजूद मैं निराशावादी नहीं निराशावाद का मार्ग मृत्यु और विनाश की ओर जाता है। इस मार्ग की ओर कदम उठाना कभी मेरा उद्देश्य नहीं रहा। जो व्यंग्य लेखक आशावादी नहीं, मेरे विचार में उसे व्यंग्य करने का कोई अधिकार नहीं।

देश-विभाजन के संबंध में पंजाबी में मैंने सबसे अधिक कहानियाँ लिखी हैं। इस संग्रह में भी सात कहानियाँ (हीरामृग, जुलूस, बसंता बावला, इनसानियत का सिपाही, परमेश्वरी, आशा, गाजी) देश-विभाजन से संबंधित है। देश विभाजन के बारे में लिखी गयी कहानियाँ मेरी अन्य कहानियों से अधिक आलोचकों और समीक्षकों की प्रशंसा का पात्र बनी हैं। इसका कारण यह है कि मैं स्वयं नंगे शरीर इस अंधेरगर्दी और कल्लेआम में से गुजरा हूँ। कट्टरता और दुष्टता की इन लज्जाजनक करतूतों का मैं चश्मदीद गवाह हूँ।

बँटवारे की बर्बरता की विषम घाटियों में भी मेरे आशावाद के कदम नहीं लड़खड़ाये। देश के विभाजन से संबंधित लिखी मेरी कहानियाँ इनसानियत खून और बोटियों की अँधेरी दलदल में गहरी धँसती हुई भी, अपना सिर उस दलदल से ऊँचा रखती है, जिस सिर पर आशा की किरणों की गठरी रखी है। वहशीपन के तूफानों में भी वे इस गठरी को बचाकर रखती हैं। ‘हीरामृग’ का अली मुहम्मद और उसकी घरवाली बरकते, ‘जुलूस’ की अविनाश, ‘बसंता बावला’ का बसंता ‘इनसानियत का सिपाही’ का ड्राइवर हुसैन, ‘परमेश्वरी’ की नायिका परमेशवरी, ‘गाजी’ का चौधरी खुदाबख्श और खलील ऐसे पात्र हैं, जिनमें मानवता का उज्जवल पक्ष रौशन हो उठता है।

अंत में, मैं आशा करता हूँ कि भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा 1989 में प्रकाशित हुए मेरे कहानी-संग्रह ‘काला नाग’ की भाँति पाठकों और समीक्षकों की ओर से मेरे संग्रह का भी हार्दिक स्वागत होगा
 

हीरामृग



संध्या होते ही गाँव में मचे हुए कुहराम की धमक धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती गई। और जब नारे लगाती चीखती-चिल्लाती टोली का आखिरी मुजाहिद गाँव से बाहर हो गया, तो अंधेरा छाने लगा

अली मुहम्मद ने कोठरी का कुंडा खोला और बाहर निकला। वह सूखे के मारे सरकंडे की तरह काँप रहा था। उसकी बीवी दो-चार बार कोठरी का दरवाजा खटखटाकर उसे बाहर निकलने के लिए कह गई थी, लेकिन अली मुहम्मद की हिम्मत नहीं पड़ी थी। उत्तर में, बल्कि वह बरकते को अंदर आकर छुप जाने के लिए प्रेरित करता रहा था। अब जब वह बाहर निकला तो मुट्ठी में कलेजा थामें घबराया हुआ था।
 

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