हँसे तो फूल झड़ें - अयोध्याप्रसाद गोयलीय Hansen To Phool Jharen - Hindi book by - Ayodhyaprasad Goyaliya
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हँसे तो फूल झड़ें

अयोध्याप्रसाद गोयलीय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1263
आईएसबीएन :81-263-0896-6

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प्रस्तुत है हास्य-व्यंग्य का उत्कृष्ट संग्रह...

Hansen To Phool Jharen

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

शेरो शाइरी के विशेषज्ञ और इस विधा के मर्मज्ञ सम्पादक अयोध्याप्रसाद गोयलीय को दीर्घकाल के अपने सम्पादन कार्य के दौरान शायरों, अदीबों के परिहास और हाजिरजवाबी के जो प्रसंग मनोरंजक और रेखांकित करने योग्य लगे, उन्हें  इस पुस्तक में उन्होंने संकलित किया है। इसके जरिये तत्कालीन समाज की मानसिकता का भी जैसे एक चित्र उपस्थित हो जाता है।

उर्दू का साहित्यिक परिवेश शुरू से हास-परिहास से भरपूर रहा है। व्यंग्य और हाजिरजवाबी के जो नमूने साहित्य में मिलते हैं वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। शेरो शाइरी की मजलिसों, महफिलों और दरबारी संस्कृति ने इस कला को निरन्तर समृद्ध किया है। गोयलीय जी ने इस संकलन में उर्दू के प्रख्यात शायरों-सौदा, जौक, गालिब, जोश मलीहाबादी से लेकर उस दौर के तमाम शाइरों और अदीबों के व्यंग्य-विनोद प्रसंग एकत्र किये गये हैं। इसके अलावा इसमें ऐसे विविध प्रसंग भी समाहित हैं जिन्हें पढ़ते हुए कोई भी हँसे बिना नहीं रह सकता।


निवेदन


प्रस्तुत पुस्तक में ‘आलिमान : मज़ाक़’ के अन्तर्गत शाइरों, अदीबों आदि के विनोद, परिहास, व्यंग्य और हाज़िरजवाबी के नमूने पेश किये गये हैं और ‘शाइरान: जवाब’ परिच्छेद में उनकी प्रत्युत्पन्न मति के पद्यात्मक (फ़िलबदी शाइरी के) अंश दिये गये हैं।

शेरो-शाइरी की 20 पुस्तकें सम्पादित करते हुए इन 20-22 वर्षों में जो मनोरंजन के प्रसंग मुझे रुचिकर लगे, उन्हें अपनी डायरी में चयन करता हूँ। अब वही संकलन इस रूप में प्रस्तुत है। आशा है, इन्हें पढ़कर पाठक भी मेरी तरह हँसें और हँसाएँगे।

मेरी उत्कट अभिलाषा थी कि इसी प्रकार महापुरुषों, सन्तों, राष्ट्र-निर्माताओं, साहित्य-सेवियों और लोक-हितैषी महानुभावों का प्रस्तुत किया जाए, किन्तु निम्नलिखित कारणों से मन मारकर रह गया—
मुद्रित पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में उक्त महानुभवों के जो हास-परिहास के उद्धरण मिलते हैं, उनसे यह विदित नहीं होता कि यह विनोद प्रस्तुत कर्ता ने किस प्रामाणिक व्यक्ति से सुना, किस ग्रन्थ में पढ़ा, अथवा परिहास के स्वयं उपस्थित था।1
राष्ट्रपिता गांधी, पं. नेहरू, सरदार पटेल, सरोजनी नायडू, पं. बनारसीदास चतुर्वेदी, पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि महानुभवों के कई हास-परिहास के उदाहरण तो इतने प्रचलित हैं कि उनमें से एक-एक प्रसंग को कई-कई महाशय अपने-अपने नामों से छपवाते रहते
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1.    साहित्य सेवियों के वास्तविक एवं प्रामाणिक कुछ विनोद, परिहास सरस्वती में आदरणीय पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी द्वारा प्रकाशित होते रहते हैं। इनके अतिरिक्त पुस्तकाकार कुछ प्रामाणिक आधार पर छपे हों, वह मेरे देखने में नहीं आये।

हैं और मनमाने ढंग से भाषा-भाव में भी परिवर्तन, परिवर्धन करते रहते हैं। इससे परिहास का वास्तविक महत्त्व घट जाता है और घटना वास्तविक है या मनगढ़न्त, इसका पता भी नहीं चलता। मुझे इस प्रसंग में एक वाक़िया याद आया। मैंने एक लतीफ़ा कुतुबमीनार की फूलवालों की सैर पर लिखा था। एक हज़रत ने उसी लतीफे को जामा मस्जिद से सम्बन्धित कर दिया। बेचारे ने न दिल्ली देखी थी, न कुतुब। न कभी फूलवालों की सैर मयस्सर हुई थी। उसे क्या पता था कि फूलवालों की सैर जामा मस्जिद से सम्बन्धित करना वैसा ही हास्यपद है, जैसा कि कालिदास को काबुल का राज्य-कवि लिखना।

उर्दू में यह बहुत पवित्र परंपरा है कि अदीब या शाइर किसी व्यक्ति का एक भी वाक्य या मिसरे का उपयोग करते हैं तो उसका नाम अवश्य देते हैं। उनके ऐसे उदाहरण मेरी पुस्तकों में यत्र-तत्र मिलेंगे। मैं भी इस परम्परा का अनुयायी हूँ और यथाशक्य उनके नाम देने का प्रयास करता हूँ। बाज़ दफ़ा उद्धरण देते समय नाम स्मरण नहीं आने पर कई-कई दिन नाम खोजने में लग जाते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक के परिहास जिन ग्रन्थों, पत्र-पत्रिकाओं के आधार पर लिखे हैं अथवा जिनसे सुने हैं, उनके नाम यथावश्यक पाद-टिप्पणियों और सहायक ग्रन्थ-सूची में दिये गये हैं ताकि शोध-खोज के विद्यार्थी उनसे लाभावन्वित हो सकें।

प्रसंगवश इतना निवेदन और है कि कई हज़रत ने उर्दू-शाइर की पुस्तकें संकलित की हैं। लेकिन उनसे यह पता नहीं चलता कि वे शेर शाइरों के किन-किन ग्रन्थों से संकलित किये हैं ? यह तो सम्भव हो सकता है कि उनकी जादू-भरी लेखन-शक्ति से प्रभावित होकर जीवित शाइर स्वयं उनके पास दौड़े हुए पहुँचे हों और गिड़गिड़ाकर अर्ज किया हो—‘‘शाइर नवाज़ हज़रत ! हमारा कलाम भी सुन लीजिए और किसी क़ाबिल समझे तो अपनी अमर कृति में हमें भी स्थान देकर अमर कर दीजिए।’’

लेकिन मीर, दर्द, आतिश, ज़ौक़, दाग़-जैसे शाइर जो कि संकलनकर्ताओं के जन्म लेने से पूर्व क़ब्र में आराम फ़र्मा रहे हैं (और जो क़यामत से पहले उठेंगे भी नहीं) उनका कलाम कैसे संकलित हुआ ? क्या उनकी क़ब्र पर जाकर उनसे सुना या वे ख़्वाब में तशरीफ़ लाकर फर्मा गये ?

एक ख्याति प्राप्त प्रकाशक तो मुझ पर इतने कृपालु हुए कि उन्होंने अपनी उर्दू-सीरीज़ की एक पुस्तक का नाम भी ‘शेर-शाइरी’ रख लिया जो कि मेरी पुस्तक सन् 1947 ई. में प्रकाशित हुई थी। सम्भव है, उनकी इस कृपा का कारण मेरी पुस्तक को अधिक ‘पब्लिसिटी’ देने का अभिप्राय रहा हो, किन्तु इस नाम-साम्य से हमारे मरने के बाद आलोचक भ्रम में पड़ जाएँगे कि कौन-सी कृति का प्रथम निर्माण हुआ और उनकी यह महती कृपा मेरे लिए क़त्ल का सामाँ होगी, बक़ौल शख़्से-


वही क़ातिल वही शाहिद1 वही मुंसिफ़2 ठहरे
अक़रिबा3 मेरे करें ख़ून का दावा किस पर ?


अयोध्या प्रसाद गोयलीय

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1. साक्षी, 2, न्यायाधीश, 3, अभिभावक।




दिल पै जब कई चोट खाते हैं
अहले-दिल और मुस्कराते हैं


नरेश कुमार शाद


उनका वोह मासूम तबस्सुम
जैसे कोई फूल बिखेरे


क़तील शिफ़ाई        


तेरी मुस्कराहट में क्या दिलकशी है
यह फूलों पै सोयी हुई चाँदनी है


सरदार जाफ़री


सवाल यह इम्तहाँ में आया कि ‘‘कोई बेहोश हो गया हो तो ऐसे मौक़े पै सबसे पहले बताइए आप क्या करेंगे’’ ? जो तालिबे-इल्म अव्वल आया, जवाब था लाजवाब उसका जवाब यह था कि ‘सबसे पहले हम उसकी जेबें सफा करेंगे’’

अज्ञात



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