बारी बारणा खोल दो - सुलोचना रांगेय राघव Bari Barna Khol Do - Hindi book by - Sulochana Rangey Raghav
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बारी बारणा खोल दो

सुलोचना रांगेय राघव

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :260
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1274
आईएसबीएन :81-263-0905-9

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प्रस्तुत है बारी बारणा खोल दो...

Bari Barna Khol Do

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दरअसल यह उपन्यास जितना कृष्णस्वामी की गौरवगाथा बयान करता है उससे किसी भी अंश में कम जानकी के महत्व की अनदेशी नहीं करता। खासतौर पर सन् 1944 में अपने पति की अकाल मृत्यु के बाद जिस तरह उसने घनघोर विपत्ति में भी अपनी गृहस्थी को बिखरने से बचाया और कृषि कार्य से अपना नाता नहीं तोड़ा,वह मन पर गहरी छाप छोड़ता है। आजादी के आन्दोलन की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह उपन्यास एक स्वप्नजीवी क्रान्तिकारी का जीवनचरित ही नहीं,भारतीय नारी के संघर्षों में पलते हुए जुझारू व्यक्तित्व की धूप-छांह भरी महागाथा भी है।

बा और अप्पा को

इस रचना में समय-समय पर मिले सहयोग के लिए श्रीमती ए.एस.के. अय्यंगार, श्री द्वारकानाथ अय्यंगार, श्री एस. वेंकटेश कृष्णन, स्वामी अलखगिरी, श्रीमती शकुंतला आचार्य, पुलिस कांस्टेबल तळगे, श्री बहराम ईरानी, श्री हरीश भादानी, श्री मधुसूदन आजाद, श्री सुरेन्द्र कुमार गुप्ता और श्री अशोक शास्त्री की विशेष आभारी हूँ। सीमन्तिनी के सुझावों और अथक परिश्रम के बगैर तो यह पुस्तक शायद ही मूर्त रूप ले पाती...
‘‘अड़ै, अड़ै, किच्चा भाग गया !’’ कोई जोर से बोल उठा।
‘‘कौन ! एच्चा का दूसरा बेटा ?’’
‘‘अड़ैडा !’’
‘‘कहाँ ?’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘कब ?’’
सवाल अग्रहारम् में आग की तरह फैल गये।
अपने घर के दरवाजे पर खड़ी एच्चा शून्य में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोज रही थी।
घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला और किच्चा के छोटे भाई-बहन भूखे पेट ही चटाई बिछाकर लेटे रहे। माँ बेचारी विवश-सी कभी बच्चों की ओर देखती तो कभी बाहर। जरा-सी आहट उसे चौका देती। सारा दिन यों ही बीत गया।
कुछ दिनों तक इस घटना की चर्चा पूरे अग्रहारम् में उबलती रही। लोग तरह-तरह की अटकलें लगाते-बिठाते आखिर थक गये, और बात धीरे-धीरे ठण्डी पड़ी गयी।

किच्चा का अग्रहारम् का नाम अनन्तकृष्णापुरम् था। इस अग्रहारम् के एक छोर ताम्रपर्णी नदी की शाखा इठलाती हुई बहती, जिसके किनारे काले, चिकने पत्थर डिठौनों की भाँति सूर्य की किरणों से चमक से चमक उठते थे। दक्षिण की इस पवित्र नदी का उल्लेख प्राचीन संस्कृत काव्यों में भी किया गया है। नदी किनारे फैले मैदानों में केले के पेड़ और कीरे (चौलाई) के पौधे काफी मात्रा में उगते थे। दूर-दूर तक फैले मारूदु पेड़ तिनेवेली (तिरुनेलवेल्ली) पुल तक दिखाई देते।
प्रातःकाल की हलचल से गाँव जाग उठता। अग्रहारम् के लोग नहाने-धोने यहीं आते। पौ फटने के पूर्व अँधेरे में ही सुहागिनें पीतल-ताँबें के कोड़म ले आतंगरे की ओर चल पड़तीं। वे कमर तक पानी में उतर अपने लम्बे काले केश खोल डुबकी लगातीं; साथ लायी हल्दी अपने तिरुमंगल्यम् (मंगलसूत्र), भाल, गले और कान के आसपास लगाकर नहातीं; उसके बाद नदी की मिट्टी से कोड़म को रगड़-चमकाकर उसमें पानी भरतीं और पुरूषों के आतंगरे पर आने से पहले कमर पर पानी भरा कोड़म रख गीली साड़ियों में ही जल्दी-जल्दी अपने-अपने घर की ओर बढ़ जातीं। और जब सूर्य की किरणों से आतंगरे का पानी पूरी तरह चमक उठता, तब चार-पाँच के झुण्ड में ऊँची आवाज में बतियाते पुरुष पहुँचते। फिर वे आंतगरे के पानी में अपना पूणल (जनेऊ) धोते हुए मन्त्रोच्चार के साथ डुबकी लगाकर गीली वेष्टी में ही लगभग दौड़ते हुए अग्रहारम् के दूसरे छोर पर स्थित विष्णु कोविल पहुँच बड़े-बड़े कुत्तिवळकु (दीपक) के प्रकाश में अपने कुलदैवम् के दमकते विग्रहम् दीपक से आरती, अर्चना कर सबको तीर्थम्, पंचामृतम् देने के बाद सबके सिर पर दिरुपड़ी-शट्टारी (मुकुट) छुआते, आशीर्वाद देते।

पुरुषों के घर पहुँचने के पूर्व ही स्त्रियाँ नित्य की भाँति घर के आँगन, चूल्हे-चौके, पेरिमाळ शनै (देवस्थान) आदि को गोबर से लीप-पोंछकर कोलम (रंगोली) माँडने में जुट जातीं। वैसे तो कम से कम दो कोलम नित नये होते, पर इनके बीचोंबीच एक-दूसरे को काटते ऊर्ध्वमुखी और अधोमुखी त्रिकोण अनिवार्य रूप से बनाये जाते। ऊपर से नीचे देखता त्रिभुज मनुष्य पर दैव-दृष्टि का द्योतक था, और नीचे से ऊपर देखता त्रिकोण धरती के आदमी की दैव तक पहुँचने की आकांक्षा।
पुरखे बताते की अनन्तकृष्णापुरम् अनन्तय्या और कृष्णय्या नायकर के नाम पर पड़ा। लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व इस क्षेत्र के नायकरों ने श्रीनिवास अय्यंगार, उनकी पत्नी रंगनायकी और दो बेटों को ‘मान्यम्’ देकर यहाँ बसने में मदद की थी। सही मायने में श्रीनिवास अय्यंगार के दो बेटों में से एक वेदान्त अय्यंगार के एक बेटे और एक बेटी अर्थात भाई और बहन के परिवारों का ही इस अग्रहारम् को बसाने में योगदान था। दोनों ने आमने-सामने अपने-अपने घरों की नीवें डाली थीं। कालान्तर में यही दो घर बसते-बसते करीब तीस घरों की कतार बन गये थे और अब मुख्य रूप से इन्हीं घरों की आबादी अपने को उच्चतर माननेवाले श्री वैष्णव ब्राह्मण वड़कले अय्यंगारों का अग्रहारम् बन गया।

श्री वैष्णव ब्राह्मण अय्यंगारों की दो शाखाओं के वड़कलै-वड़क (उत्तर) और तेंकलै-तीरक (दक्षिण) के बीच यों यह विवाद असमाप्य था, कि कौन श्रेष्ठ है। दोनों ही अपनी-अपनी मान्यताओं और सिद्धान्तों में काफी कट्टर थीं। दोनों के बीच विवाह आदि आपसी सम्बन्ध नहीं होते थे। तेंकलै, तमिळ दिव्य प्रबन्धम् को ही सर्वोच्य मान्यता देते थे। वड़कलै वेद, वैदिक आधारों एवं प्रबन्धन को अत्यन्त महत्त्व देते थे। अपनी अलग पहचान के लिए दोनों अलग-अलग शीशर्णम् (श्रीचरणम्) लगाते। तेंकलै में यह नासिका मूल पर कुछ हद तक अँग्रेंजी के ‘वी’ जैसा नुकीला तथा सीधा होकर भाल तक जाता था। वड़कलै में यह नीचे से अँग्रेजी ‘यू’ जैसा कुछ गोलाई लिये होता था। केवल बीच का तिरुमणम् दोनों में समान था।
अनन्तकृष्णापुरम् में वड़कलै अय्यंगार वेदों के ज्ञाता तथा पंचसूत्रों के जानने वाले थे। अग्रहारम् के वृद्ध लोग घरों के चबूतरे पर बैठ वेदों की चर्चा किया करते। वड़कलै अय्यंगार वेदान्त देशिकन को अपना गुरू मानते थे। जो वेदों-वेदांगों के महान ज्ञाता तथा संस्कृत के अनेक श्लोकों के रचयिता थे। तिनेवेली जिले में ब्राह्मण तथा अन्य ऊँची जातियों के अतिरिक्त अनेक निम्न जाति के लोग रहते थे। वे आजीविका के लिए जमींदारों के खेतों पर मजदूरी करते। इसके अलावा जीविकोपार्जन के लिए, वे इस इलाके में लाखों की तादाद में पाये जाने वाले पंखिया ताड़वृक्ष पर निर्भर रहते। इन पेड़ों के पत्तों से वे पंखे, सूप, चटाइयाँ, छोटी-बड़ी टोकरियाँ बनाते। इस क्षेत्र में ‘कायामाझी’ के पास काफी मात्रा में तेरी (बंजर जमीन) फैली थी। इन प्राकृतिक कारणों की वजह से यहाँ गरीबी अधिक थी।

अनन्तकृष्णापुरम् के इर्द-गिर्द की भूमि में धान, उड़द और अरहर की खेती होती थी। यहाँ के ब्राह्मण जमींदार परियन (शूद्रों) से खेती करवाते। निम्न जाति के लोग अग्रहारम् के बाहर बस्ती बनाकर रहते थे। ब्राह्मणों के अग्रहारम् में उनका प्रवेश लगभग वर्जित था बहुत ही आवश्यकता पड़ने पर वे इन ब्राह्मणों के घरों से काफी फासले पर खड़े हो उन्हें पुकारते। उनके सामने वे अपना सिर नीचा ही रखते। इनकी औरतें जब कभी बचा-खुचा खाना लेने आतीं, काफी दूर रहकर अपने घुटने मोड़, जमीन पर माथा टेक तीन बार दण्डवत करतीं। पळेदु (पुराना भात) केले के पत्ते मे बाँधकर उनकी तरफ फेंका जाता। उसे वे लपककर अपनी फटी साड़ी में धर लेतीं। तनतोड़ मेहनत के बाद भी ये लोग किसी तरह अपना आधा ही पेट भर पाते। पहनने को वस्त्र तो दूर की बात, पुरूष अपने शरीर का निचला भाग भी बमुश्किल ढँक पाते थे। और स्त्रियाँ माँगी हुई फटी साड़ियों में अपने तन को छिपाने का विफल प्रयास करतीं। अग्रहारम् में जब भी वे आते तब रास्ता देने के लिए उन्हे वळी-वळी (रास्ता-रास्ता) की पुकार लगानी पड़ती। परियन ब्राह्मणों के सामने स्वयं को पावी (पापी) कहने को मजबूर थे। उनकी परछाईं तक ब्राह्मणों पर नहीं पड़ सकती थी।

किच्चा इसी रूढ़िग्रस्त अग्रहारम् में बहन के वंश का था। लगभग पन्द्रह-सोलह वर्ष की आयु में उसके अप्पा (पिता) श्रीनिवास का देहान्त हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद उसकी शिक्षा में विध्न पड़ा। अप्पा के सामने जैसे-तैसे उसने पाळमकोट्टेय, जो उन दिनों गैरिसन टाउन था, से मैट्रिक्युलेशन कर लिया था। किन्तु आगे की पढ़ाई के लिए उसे चिन्ता सताने लगी। अप्पा के छोड़ हुए एकाध खेतों से जो भी आता वह परिवार के लिए मुश्किल से पूरा पड़ता था। वैसे किच्चा के बड़े भाई वेदान्त वेण्णारपेट के एक स्कूल में बाहर रुपये महीने की नौकरी में मास्टर थे। वेण्णारपेट उपनगर, पाळमकोट्टेय और तिनेवेली जंक्शन को जोड़नेवाले रास्ते पर था। वे सुबह-सुबह धोती, कोट और माथे पर सफेद पगड़ी बाँधकर पैदल ही स्कूल के लिए निकलते थे। दो बड़ी बहनों पोन्नु और कुप्पु का अप्पा के सामने गरीब अय्यंगार ब्राह्मण घरों में विवाह हो चुका था। एक छोटा भाई वरदन और छोटी बहन लक्ष्मी यहीं माँ के साथ थे। अपने भविष्य को लेकर किच्चा काफी चिन्तित रहने लगा था। बेटे को कई बार गुमसुम बैठा देख माँ ने एक-दो बार टोका भी, कुछ नहीं करने के लिए फटकारा भी, पर किच्चा मौन ही रहा, और अचानक आज चुपचाप घर छोड़कर चला गया था।

किच्चा जैसे-तैसे तिनेवेली पहुँचा। उस समय वहाँ स्वदेशी आन्दोलन छिड़ा हुआ था। लेकिन किशोर किच्चा के आँतें कुलबुला रही थीं। उसे घर की याद आयी। आँखों के सामने अम्मा के हाथों बना तइरशादम (दही-भात) और वड़माँगा (पानी में भिगोकर बनाया कच्ची कैरी का अचार) दिखने लगा। घर छोड़ने का मन में दुख भी होने लगा। लेकिन भविष्य भी एक प्रश्नचिह्न की तरह सामने खड़ा था। इसी पशोपेश में वह इधर-उधर घूमता रहा। कुछ देर चलने के बाद उसे एक होटल में केले के पत्ते पर परोसा खाना खाते लोग दिखे तो भूख ने और जोर पकड़ा। अचकचाते हुए होटल के मालिक के पास जाकर उसने काम माँगा।
‘‘बर्तन साफ कर लोगे ?’’
सुनकर मन में एक हिचक हुई, वड़कलै अय्यंगार ब्राह्मण के बेटे को दूसरे के जूठे बर्तन साफ करने पड़ेंगे ! यदि अग्रहारम् में लोगों को पता चल गया तो ? एक क्षण के लिए उसके शरीर में कँपकँपी छूटी लेकिन मन को दृढ़ कर काम में जुट गया। शाम तक काम करने एवज में उसे दो इडली और थोड़ी-सी नारियल की चटनी मिली, साथ में कुछ पैसे भी। किच्चा घर से पहने कपड़ों में ही निकला था। दूसरे दिन नहाकर कपड़े पहनने का सवाल उठा। वेष्टी के दो टुकड़े घर धोकर एक को सुखाया और दूसरा गीला ही लपेट लिया। कमीज जब तक सूखी नहीं, वह वहीं नदी किनारे नंगे बदन बैठकर आगे की सोचता रहा।

कुछ दिन काम करके उसने थोड़े-बहुत पैसे इकट्ठे किये और तुतीकोड़ी (तुतीकोरिन) बन्दरगाह पहुँचा। यह बन्दरगाह व्यापार की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण था। बाहर के देशों में अधिक माँगवाली वस्तुएँ जैसे चन्दन, चावल, काली मिर्च, सोंठ इलायची, हल्दी, हाथी दाँत और अनेक कीमती पत्थर आदि इसी बन्दरगाह से जाते थे।
किच्चा को एक धुँधली-सी राह दिखाई दी। उसने जहाज के कप्तान के पास जाकर अपने को साथ ले चलने का आग्रह किया, ‘‘मेरे पास पैसा नहीं हैं, यदि कोई काम हो तो मै वह कर सकता हूँ।’’

कप्तान ने किच्चा पर ऊपर से नीचे तक एक नजर दौड़ायी। ‘‘क्या तुम केबिन बॉय के रूप में काम कर सकते हो ? मैं तुम्हें कोलम्बो तक ले जा सकता हूँ, ‘‘कप्तान ने किच्चा की मनस्थिति ताड़ते हुए कहा। बात तय हो गयी। जहाज मालवाहक था, अतः यात्री बहुत कम थे। जहाज का माल ढोने के लिए मजदूर और खलासी ही थे, उसमें किच्चा का जहाज में बैठने का यह पहला ही अनुभव था। मन में उमंग थी और डर भी। जहाज की रेलिंग को पकड़कर वह नीचे विशाल सागर में उठती लहरों को एकटक देख रहा था। लहरें सीधी उछाल मारकर एक-दूसरे से टकरातीं, फिर अनन्त सागर में विलीन हो जाती थीं। उस अथाह समुद्र की लहरों का कोलाहल उसके मन की गहराइयों से टकराने लगा।
‘कहाँ ले जाएगा यह समुद्र मुझे ? इस विशाल जगत् में मैं कहीं तो पहुँचूँगा !’
‘‘सुनों, तुम काम अच्छा कर रहे हो। हम तुम्हें आगे भी ले जाएँगे,’’ कुछ दिनों बाद कप्तान ने किच्चा की पीठ थपथपाते हुए कहा।
‘दुनिया कितनी बड़ी है लोगों का जीवन कितना समृद्ध’-उसने सोचा। यात्रा के अनुभवों ने उसे परिश्रम करना सिखा दिया। जीवन में आगे बढ़ने की ललक उसमें थी। पढ़-लिखकर जीवन को सार्थक बनाने का जो ध्येय था अब वह दृढ़ होने लगा। ‘गरीबी मनुष्य को कितना नष्ट कर देती है, गरीबी को नष्ट करने के लिए मेहनत ही एकमात्र हथियार है’- यह बोध उसे उस समय हुआ।
अम्मा को किच्चा का प्रमाण !
मेरे अचानक घर से गायब होने से मैं जानता हूँ, तुम सब लोग बहुत ही परेशान हुए होंगे लेकिन क्या करता। मुझे आगे की बात सोचनी थी। इसलिए ऐसा निर्णय मुझे लेना पड़ा।
अम्मा, बुरा मत मानना और मुत्ता (बड़े भाई) को भी समझा देना।
मैं दूर-दूर तक घूमकर आया हूँ। मैंने अपनी आगे की पढ़ाई के पैसे इकट्ठे कर लिये हैं। तूतीकोड़ी के कॉलेज में मैंने दाखिला ले लिया है। मेरी चिन्ता मत करना। तुम सब ठीक होंगे। मुत्ता को नमस्कार, वरदन, लक्ष्मी को प्यार। पत्र लिखता रहूँगा।
-तुम्हारा किच्चा

वरदान की चिठ्ठी पढ़कर अम्मा को सुनायी।
बेटे के जाने के बाद एच्चम्मा ने अपने आप को घर में लगभग बन्द कर लिया था। अब जब बेटे का पत्र आया तो उसकी आँखों में आँसू छलक उठे। ताड़ के पत्तों की बनी टोकरी में से उसने पतली लाल किनारीवाली चन्दन रंग की साड़ी निकाली। उसे पहनते समय वह सोचने लगी-‘अब मैं सबको बता दूँगी। मेरा बेटा घर छोड़कर नहीं भागा है।’
‘‘अड़ै, रघुनाथ, ‘‘अपनी ननद के बेटे को चिट्ठी दिखाकर वह बोली, ‘‘देख, मेरा किच्चा कहीं भागा नहीं है। देख, देख तो उसका पत्र आया है। वह दूर-दूर तक घूम आया है, ‘‘एच्चम्मा पूरे जोश में बोले जा रही थी। उसकी आवाज सुनकर आस-पास के घरों में से कुछ बाहर आ गये।
‘‘अय्यो, अय्यो, इतनी सुबह एच्चम्मा को क्या हो गया है ? चिल्ला क्यों रही है ?’’ एक-दो ने पूछा। रघुनाथ ने सबके सामने किच्चा का लिखा पढ़कर सुनाया तो सभी चुप्पी साध गये। क्या बोलते ! इन्हीं लोगों ने कहा था कि वह किच्चा हमेशा के लिए घर से सम्बन्ध तोड़कर भाग गया। अब इन्हीं में से एक-दो ने पत्र सुनकर एच्चम्मा को इस शुभ समाचार के लिए बधाई दी।

जब बड़ा बेटा वेदान्त वेण्णारपेट से आया तो एच्चम्मा जतन से सँभाली हुई चिट्ठी दिखाते हुए बोली, ‘‘देख तान्दु, किच्चा की चिट्ठी आयी है, तू भी पढ़ ले, ‘‘एच्चम्मा अपने बेटे के नाम से नहीं बुलाती थी क्योंकि उसके श्वसुर का नाम वेदान्त था और वह उनका नाम कैसे ले सकती थी ! अतः वह बेटे को तान्दु कहकर बुलाती थी।
‘‘ओहो, कब आयी ? तुम ठीक तो कह रही हो, अम्मा ? ’’ तान्दु को थोड़ा आश्चर्य हुआ। फिर चिट्ठी पढ़कर वह बोला,’’ अम्मा, यह ठीक है कि वह आगे पढ़ना चाहता है। और उसका इन्तजाम वह स्वयं कर रहा है। परन्तु इस तरह बिना बताये घर से चला जाना कहाँ तक ठीक था। लोग पता नहीं क्या-क्या कह रहे थे। शोल्लु, अम्मा (कहो, अम्मा)।’’
‘‘अड़ै, लोगों का क्या ? अब तो चुप पड़ गये सब ! मैंने उन लोगों को पत्र दिखा दिया है।’’ एच्चम्मा ने कहा।
‘‘शरी अम्मा, मैं उसके दिये हुए पते पर उत्तर दे देता हूँ।’’
‘‘अड़ै, तान्दु, तुम उसे यह जरूर लिख देना कि वह चिन्ता किये बिना अपनी पढ़ाई करे। लिख देगा न ?’’
‘‘आमाम्, अम्मा’’ वेदान्त ने माँ को तसल्ली दी।
तूतीकोड़ी में सालभर की पढ़ाई कर जब किच्चा मद्रास पहुँचा तो उसे वहाँ एनी बेसेण्ट की थियोसोफिफल सोसायटी के बारे में जानकारी मिली। समय गँवाये बिना वह आडियार के लिए चल पड़ा। मद्रास के दक्षिण में थियोसोफिफल सोसायटी के लिए अडियार प्रसिद्ध था। एनी बेसेण्ट इसकी अध्यक्षा थीं।

थियोसोफिफल सोसायटी का परिसर लगभग ढाई सौ एकड़ भूमि पर चौड़ी अडियार नदी के दक्षिणी छोर पर फैला हुआ था। नदी की बाँक पर खड़ा था मुख्यालय जिसमें एक पुस्तकालय, सभाकक्ष, पूजास्थली, दफ्तर, अथितिकक्ष और सोसायटी के प्रमुख लोगों के रहने के लिए कमरे बनाये गये थे। वहीं से समुद्र तक जाती पगडण्डी नारिकुंज से गुजरती। अडियार के विशालकाय वटवृक्षों के मण्डपों के नीचे से नदी विस्तृत बालू की तह से आ मिलती, यहीं से यह नदी बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती थी।

अडियार ने इस प्राकृतिक, रमणीय दृश्य एवं सोसायटी के परिसर से किच्चा अभिभूत हो गया। साथ ही एनी बेसेण्ट के भव्य व्यक्तित्व का प्रभाव उसके मन की गहराइयों तक बैठ गया। एनी बेसेण्ट ने किच्चा की कुशाग्र बुद्धि को परख ब्रुक्स के तहत काम करने की सलह दी। ब्रुक्स सोसायटी में ही भगवद्गीता तथा दर्शन के प्राध्यापक थे। उन्हीं के सचिव के रूप में किच्चा जो अब कृष्णा कहलाने लगा था, ने काम सँभाला।ब्रुक्स ने ही कहा था, ‘‘अनन्तकृष्णापुरम् श्रीनिवास कृष्णस्वामी अय्यंगार इज ए लौंग नेम फॉर ए स्माल बॉय लाइक यू, वी विल कॉल यू कृष्णा !’’ (अनन्तकृष्णापुरम् श्रीनिवास कृष्णस्वामी अय्यंगार; तुम्हारे जैसे छोटे लड़के के लिए लम्बा नाम है। हम तुम्हें कृष्णा कहकर बुलाएँगे !)
ब्रुक्स के सचिव के रूप में काम करने के अतिरिक्त कृष्णा ने वहीं के गार्डन सुपरिण्टेडेण्ट का सहायक बन सोसायिटी के बाग-बगीचों की देखभाल करना आरम्भ कर दिया। उसका काम और लगन, वहाँ के लोगों से छिपे नहीं रहे। देखते-देखते बगीचों के पेड़-पौधों को जैसे नया ही रूप मिल गया हो। हवा के झोकों से लहराते पेड़-पौधों को देख सुपरिण्टेडेण्ट ने कहा, ‘‘कृष्णा के ग्रीन फिंगर्स हैं। यदि उसे एग्रीकल्चर-हॉर्टिकल्चर में सही प्रशिक्षण मिले तो वह कमाल करके दिखा सकात है।’’
सोसायटी के लोग इस बात से सहमत हुए। अन्त में यही तय हुआ कि कृष्णा को पूना के एग्रीकल्चर कॉलेज में आगे पढ़ने के लिए भेज दिया जाए। इसी दौरान कृष्णा ने ब्रुक्स के सान्ध्यि में रहकर दर्शन तथा भगवदगीता का भी गहन अध्ययन किया। अपने इस अध्ययन के आधार पर आडियार में अनेक व्याख्यान दिये।
पूना में कृषिविज्ञान का अध्ययन करते समय, कृष्णा की निष्ठा और कर्मठता से प्रसन्न होकर प्रोफेसर जी.बी. पटवर्धन ने लिखा, ‘मोस्ट इण्टेलिजेण्ट स्टुडेण्ट ऐण्ड कीन वर्कर एट गणेश-खिंड बोटानिकल गार्डन्स इन दी ईयर्स 1908-09।’

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