शिकारगाह - ज्ञानप्रकाश विवेक Shikargah - Hindi book by - Gyan Prakash Vivek
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शिकारगाह

ज्ञानप्रकाश विवेक

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :155
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1275
आईएसबीएन :81-263-0907-5

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प्रस्तुत है 15 श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह...

Shikargah

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

चर्चित कथाकार ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियों में सामाजिक विडम्बनाओं के विभिन्न मंज़र उपस्थित रहते हैं। जटिल होते सम्बन्धों को वे अपनी संवेदनशील दृष्टि तथा नुकीली एकाग्रता से जाँचते-परखते हैं। पात्रों का द्वन्द्व और अकेले होते जाने की वेदना उनकी कहानियों को मार्मिक ही नहीं बनाती, अपितु भावनात्मक आरोह-अवरोह के साथ, प्रश्नाकुलता भी पैदा करती है। ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियाँ बाज़ारवादी तन्त्र से संचालित होते नये समाज का अक़्स और नक़्स हैं। कहानियों के पात्र बेचैन और चिन्तातुर हैं तो इसलिए कि समाज इतना निस्संग और क्रूर क्यों होता जा रहा है। यही तनाव इन कहानियों में है।....संभतः ये कहानियाँ, मनुष्य की गरिमा को बचाये रखने के मक़सद से लिखी गयी हैं। कहानियों की खूबी इनकी विश्वसनीयता और भाषाई रवानी में है। सहज भाषा और शिल्प की प्रस्तुति तथा हृदय को गहराई तक छूनेवाली संवेदना ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियों की एक अलग ही पहचान बनाती है।

‘शिकारगाह’ संग्रह की ये कहानियाँ, आशा है पाठकों को रुचिकर लगेंगी।

अर्थ

पहाड़ों की शामें मुझे अकसर उदास महसूस होती हैं। धूप की तितलियाँ उड़ जाती हैं और किसी पहाड़ी बूढ़े जैसा अँधेरा, चढ़ाई चढ़ता, हाँफता-सा प्रतीत होता है। और अजीब रंग में रंगी खामोशी, पहाड़ों की ढालानों से फिसलती, मैदानों में आ जाती है। बिलकुल ऐसे वक्त में कोई याद, कोई नमी, कोई अभाव, कोई सवाल, जेहन में गुमनाम-सी हरारत पैदा करते हैं....।

शिमला के रिज पर टहलते हुए, फाउण्टेन पेप्सी पीते हुए लोगों का अपना सुख और संसार हो सकता है। मेरा मन करता है, जब-जब रिज पर आऊं, कुलियों और खच्चरवालों के बीच जा बैठूँ। थोड़ी देर के लिए ही सही, उनके दुःख-सुख का संगी-साथी बन जाऊँ। उनके साथ बीड़ी के सटटे मारूँ। लीद की दुर्गन्ध से बेखबर होकर, उनके साथ हँसूँ उनके साथ उदास हो जाऊँ.....।

एक बार....हाँ, वह सुबह का वक्त था। अक्तूबर या नवम्बर का महीना था। सुबह थोड़ी ठण्ड थी लोग अभी होटलों से बाहर नहीं निकले थे। मैं रिज पर टहल रहा था। मैंने एक बेंच पर एक कुली को लेटे देखा था। वह दीन-दुनिया से बेखबर, कोई गीत गा रहा था। उसकी आवाज में भीगापन था। दर्द था !....मैं पास जाकर खड़ा हो गया। अचानक उसने पलटकर देखा। उठ बैठा। गीत बन्द हो गया। कुली बैचैन नजर आया। वह बेंच के एक कोने तक सरक गया। यहाँ तक कि वह बेंच से उठा और बेंच के पास सड़क पर जा बैठा। मैंने उसके कन्धे पर हाथ रखा तो उसे झुरझुरी पैदा हुई। वह घबरा-सा गया। बाद में उसने बताया कि वह पहलगाँव के किसी देहात से आया था और आज भी खाली पेट निकल पड़ा है अपने दड़बे से।
वह लोकगीत गाते हुए अपनी उदासी और अपनी भूख को पुचकार रहा था ....।

यह शिमला का वाकया था। लेकिन अब मैं बनीखेत में था।
शाम गहराने लगी थी। मैं डलहौज़ी के पास बनीखेत के तिराहे पर खड़ा था। यहाँ कुछ भीड़ थी। लावारिस गायें गोबर, रेहड़ीवाले, कुछ दुकानें, बेकरी, कनफैक्शनर्ज़, रेस्तराँ.....जहाँ मैं खड़ा था वहाँ से गाडफादर बीयर का होर्डिंग था। जो काफी ऊँचा था उसमें बैठा दाढ़ीवाला गाडफादर बीयर का मग लिये अहंकारी मुद्रा में हम सबको देख रहा था। हम सब उससे काफी नीचे थे। बौने थे।
मैं जहाँ खड़ा था वहाँ एक आदमी ने बोरी पर मूँगफली का ढेर फैला रखा था, उस पर छोटी-सी सिगडी थी जो बुझ चुकी थी। एक चनेवाला था और साथ ही शराब की दुकान ....
यूँ तो मैं बेमसकद खड़ा था। इसके बावजूद मुझे यहाँ खड़े रहना अच्छा लग रहा था।

मैं आज ग्यारह-बारह बजे यहाँ पहुंचा था, यहाँ मतलब बनीखेत में डलहौजी में बहुत कुछ था। पिकनिक स्पाट। खूबसूरत होटल। महँगे रेस्तराँ। बार। बीयरशाप। भरी-भरी दुकानें। डिपार्टमेण्टल स्टोर। हंगामाखेज़ बाजार। युवक युवतियाँ ! रंगीन। रंगत ऐसा बहुत कुछ जो दिलो-दिमाग पर छा जाये। तिलिस्म पैदा करे। कुल मिलाकर डलहौज़ी ऐसी जगह थी जहाँ रहा जा सकता था। इसके बावजूद मुझे बनीखेत रहना अच्छा लग रहा था। मैं यहाँ पहली बार आया था। इसके बावजूद मुझे इस जगह ने अपना बना लिया।

एक दोस्त की मदद से मुझे पी. डब्ल्यू.डी रेस्ट हाउस की ऊपरी मंजिल का सूट नम्बर तीन मिल गया था। रेस्ट हाउस ऊँची जगह पर था। दूसरी मंजिल के कारिडोर में खड़े होकर दूर तक पहाड़ों को देखा जा सकता था। सिर्फ पहाड़ ही नहीं, अनन्त आकाश भी उड़ते परिन्दे भी। दरख्त और समतल बिछा हेलीपेड भी।
रेस्ट हाउस की इमारत के पास हरी दूब और क्यारियों में मोरपंखी के अतिरिक्त मौसमी फूल थे। लाल बजरी की सड़क थी जिस पर चलते हुए पैरों के नीचे से चरर्-मरर् की आवाज उभरती। और पुराने ज़माने के फ्लैग स्टेशनों की याद आती जिनके प्लेटफार्म पर ऐसी बजरी बिछी होती थी।

रेस्ट हाउस एकान्त में था। बाउण्डरीवाल और फेंस, कहीं-कहीं बाँस की खपच्चियाँ अद्भुत मंजर उपस्थित करती थीं। मैंने बाउण्डरीवाल के साथ-साथ कई चक्कर लगाये। बाउण्डरीवाल जहां खत्म होती, वहाँ से पक्की सड़क शुरू होती जो नीचे उतरती चली जाती  और तिराहे तक ला खड़ा करती। ऐसा प्रतीत होता था, तिराहा बनीखेत की धड़कन है और खामोशी-आत्मा !

एक तरफ सर्वेण्ट क्वार्टर थे। केयरटेकर का घर। उसकी एक छोटी-सी गोरी-चिट्टी लड़की जो सुन्दर थी और खूबसूरत मेमने के साथ खेल रही थी।  केयरटेकर लम्बा ऊँचा थोड़ा गंजा गेहुंआ रंग का, कुछ-कुछ बेवकूफ नजर आता था। लेकिन उसकी बीवी आकर्षक थी, कुछ-कुछ वैसे जैसे चम्पा की स्त्रियाँ होती हैं- तीखे नयन-नख्श, छरहरा शरीर।
मेरेवाले कमरे में कालीन बिछा था। एक खास तरह की गन्ध थी जैसे गर्मियों में जूते उतारने के बाद कइयों के पैरों से आती है, कुछ-कुछ वैसी। पुराने-ज़माने की टेबल थी। दो कुर्सियाँ और पलंग जिनकी लकड़ी मजबूत नजर आती थी। एक तिपाई थी, जिसकी एक टाँग कुछ छोटी थी।

बाथरूम की तरफ जो गैलरी थी, वहां से देखने पर बनीखेत गाँव का लैण्डस्केप तैरने लगता था।

कुछ देर के लिए मैं गेस्ट रूम में बैठा। टी.वी. चल रहा था और कोई हिंसक दृश्य अपनी क्रूरता का आडियो-विजुअल रूप प्रस्तुत कर रहा था। केयरटेकर की आकर्षक पत्नी वहां मौजूद थी जो मुझे देखकर थोड़ा सँभली, सिर पर पल्लू रखकर मुस्करायी। उसका मुस्कराना अच्छा और सच्चा प्रतीत होता था। वह उठकर चली गयी थी। वह बैठी रहती तो मैं टी.वी के बजाय उसे देखता रहता। वह चली गयी थी। बेवकूफ किस्म का केयरटेकर बैठा रहा था जो रिमोट को अपनी हथेली पर चिपकाये हुए था। विज्ञापन खत्म होते तो आवाज खोल देता। फिर विज्ञापन आते तो फिर आवाज ‘डेड’ और उसका लोकगीत शुरू।

मेरे पूछने पर उसने बताया कि रेस्ट हाउस में चार रूम में वी. आई. पी सूट बुक हैं। सब लोग सरकारी हैं। लेकिन वी. आई. पी. सूट में एक स्त्री रुकी हुई है। इस बीच केयरटेकर की आकर्षक पत्नी चाय ले आयी थी। वह अप्रत्याशित आतिथ्य था। मैं चकित था। उसने मेज़ पर चाय का कप रखा। मूक लेकिन गर्मजोशी-भरे आतिथ्य से मैं रोमांचित था।

पहाड़ों की शाम बहुत जल्दी रात में बदल जाती है। और अँधेरे के टाट में लिपटे पहाड़, बेंच पर बैठे मुसाफिरों जैसे लगते हैं जो किसी ट्रेन का इन्तजार कर रहे होते हैं। पहाड़ों को सूरज का इन्तजार होता है जो उन पर सुबह-सुबह धूप का पानी फेंकता है.....

मैं ट्वीड का पुराना कोट पहनकर, कमरे को ताला लगाकर नीचे आ गया था। तिराहे पर खड़ा, टैक्सियों और यात्रियों को देख रहा था। सामने गाडफादर वीयर का होर्डिग था। सड़क के पास एक मूँगफलीवाला था जिसकी सिगड़ी बुझ चुकी थी। दसेक गज़ के फासले पर एक रेस्तराँ था। सिर्फ एक रेस्तराँ। ...बहुत नीचे जाकर शायद कोई और ढाबा भी था। लेकिन तिराहे के पास यही रेस्तराँ था-क्वालिटी रेस्तराँ।

बार-बार मन करता था, खाना खाऊँ। भूख इतनी नहीं थी जितना कि भूख का अहसास। सामने रेस्तराँ न होता तो भूख का सवाल अभी पैदा न होता।....रेस्तराँ  के बाहर जो तन्दूर था वहाँ बैठा एक आदमी तन्दूर में रोटी थापने से पहले आटे के पेड़े को लम्बी गोल चपाती में बदलता। दोनों हथेलियों से ताली जैसी आवाज उभरती। तन्दूर में रोटी सिंक जाती तो खुशबू-सी उठती। मैं सोचता रहा-तन्दूर रोटी खुशबू और ताली की आवाजों में कोई अमूर्त रिश्ता है।....

यह मेरा निजी अनुभव रहा है कि पहाड़ पर कई सारे  लोग एक साथ हों तो वे पिकनिक के मूड में होते हैं और पहाड़ पर घूमता अकेला आदमी चिन्तक होने लगता है। पहाड़ों की ऊँचाइयाँ या फिर गहराइयाँ सोचने के लिए आमादा करती हैं। पहाड़ों की खामोशी का अनहद मन में उतरने लगे तो योग-वियोग की बातें खलबली मचाने लगती हैं।
चपातियों की आवाजें लगातार आ रही थीं। मैं तिराहे के एक कोने में खड़ा उस दृश्य को निरन्तर देख रहा था, जिसमें मैं स्वयं भी शामिल था।
मैंने दूसरी सिगरेट जलायी थी। आधी पी चुका था। गाडफादर बीयर के होर्डिग का गाडफादर अब भी मुझे देख रहा था। वह शायद सबको इसी तरह चौकन्नी नज़र से देखता रहता हो। शायद हम सब उसकी छत्रछाया में हो।

मैंने सिगरेट के लम्बे कश लिये। आधी खत्म हो चुकी सिगरेट को सड़क पर फेंककर रेस्तराँ में प्रविष्ट हुआ।
रेस्तराँ में जाकर मैंने नज़रें घुमायीं। पहले-पहल की अजनबीयत थी। लेकिन बदकिस्मती यह थी कि रेस्तराँ भरा हुआ था। लेकिन उससे भी ज्यादा विचित्र और चौंकानेवाली स्थिति यह थी कि एक सोफे के एक किनारे पर एक स्त्री बैठी थी। बाकी जगह खाली थी। सामने का सोफा भी खाली था। जहाँ छः लोग बैठ सकते थे वहाँ एक अकेली स्त्री बैठी थी। मैं हैरान-सा देखता रहा। मेरी तरह और लोग भी थे जो रेस्तराँ के अन्दर किसी पिलर के साथ खड़े थे और किसी जगह के खाली होने का इन्तजार कर रहे थे। लेकिन स्त्री के साथ या फिर उसके सामने वाले बिलकुल खाली सोफे पर बैठ नहीं रहे थे।

मेरे समेत और लोग भी थे जो खड़े थे। स्त्री दो सोफे घेरकर इत्मीनान से बैठी थी। ज्यादातर वक्त वह बाहर देखने में व्यतीत करती थी।....सूप के बावल के अतिरिक्त एक किताब थी जो औंधे मुँह पड़ी थी जिसका शीर्षक पता नहीं क्या था। जिसका शीर्षक शायद ‘अहंकार की मुद्राएँ’ हो और उन मुद्राओं में फिलहाल एक मुद्रा स्वयं इस स्त्री की।

मुझे और लोगों का पता नहीं कि वे क्या सोच रहे थे लेकिन मैं अजीब किस्म के पेचोताब में था। उधेड़-बुन में था। दुविधा में था। मैं क्यों खड़ा हूँ, जबकि सामने का सोफा खाली है- यह सवाल मैं अपने आपसे कई बार पूछ चुका था। मैं खड़ा क्यों रहूँ ? मुझे बैठने का पूरा हक है। सोफे पर बैठने के लिए मैं खुद को तैयार कर ही रहा था कि एक वेटर से मेरी नजरें मिलीं। वह संकेत को समझते हुए इनकार में सिर हिलाता हुआ चला गया। इस बीच दूसरा बड़ी फुर्ती से, मेरे पास से गुजरा। बोला कि मैं थोड़ा इन्तजार करूँ। यानी स्त्री के साथ जो सोफा खाली है, कहाँ न बैठूँ। यह अजीब स्थिति थी। कुछ-कुछ अपमानजनक भी। आक्रोश जैसी कोई चीज पैदा हुई। गुस्सा भी आया। अपनी विवशता पर चिढ़ भी पैदा हुई। सिर्फ एक रेस्तराँ था, वरना क्यों कोई यहाँ किसी जगह के खाली होने का इन्तजार करता ?

लेकिन मन में खयाल आया-गुस्से के बजाय मैं यहाँ की स्थिति को इन्ज्वाय क्यों न करूँ ? थोड़ी देर खड़े रहने से मैं मर जाऊँगा। और लोग भी तो खड़े हैं। किसी को जल्दी नहीं। पहाड़ी लोगों की यही तो खासियत होती है, कोई जल्दी में नहीं होता। मुझे किस बात की जल्दी है ? रोटी ही तो खानी है, कुछ देर बाद सही।
 
मैं पिलर से सटकर खड़ा हो गया था। कुछ इस तरह कि वेटरों को मेरे कारण असुविधा न हो। कुछ इस तरह कि मैं वहाँ खड़े होकर पूरे रेस्तराँ का नहीं तो कम से कम स्त्री के आसपास के वातावरण का जायज़ा ले सकूँ। स्त्री .....चालीस की होगी। शायद कम की हो। उसके बालों की एक लट सफेद थी। बाकी सिर के बाल, जिसमें सफेद भी थे, चमकीले भी थे, चमकीले रूखे और किसी अच्छे शैम्पू से धुले प्रतीत होते थे। उसने जूड़ा नहीं बांधा था बल्कि बालों को इकट्ठा करके बाँध रखा था। बेशक कुछ एक लटें खुल गयी थीं। उसका रंग साफ था। नाक पतली, लम्बी जो उसके गोलाकार चेहरे पर आकर्षण पैदा करती थी। आकर्षण उसकी आँखों में भी था।

 आँखों पर गोल्डन फ्रेम की एक ऐनक थी जिसे वह कभी उतारती, कभी चढ़ा लेती। वह सिल्क की साड़ी में थी, जो शायद टसर शिल्क था, गले में मोतियों की माला के अतिरिक्त रुद्राक्ष की भी माला थी। उसकी दो उगलियों में हीरे की अंगूठियां थी। टाप्स भी शायद हीरे के हों।.....वह युवती नहीं थी इसके बावजूद भी वह अपनी उम्र को पछाड़ती हुई, आकर्षण पैदा कर रही थी। वह जब ठण्डे पड़े चुके मशरूम के सूप को आधा चम्मच पीती तो लगता कि वह सूप पर या फिर इस रेस्तराँ के मालिक पर अहसान कर रही है। वह आँखें उठाकर जब बाहर का दृश्य देखने लगती तो उसकी आँखें कुछ तलाश करती प्रतीत होतीं। वह फिर सूप की ओर लौट जाती जो ठण्डा हो चुका था। वहाँ न सिर्फ सूप बल्कि उस टेबल के इर्द-गिर्द सारा मंजर सर्द और बेसिक जान पड़ता था।

वह जहाँ बैठी थी, उस सोफे पर उसका पर्स था, साफ्ट लेटर का कीमती पर्स। उसने पर्स खोला। डनहिल की सिगरेट का पैकेट, लाइटर निकाला। लाइटर से सिगरेट को जलाकर उसने कश लिया। फिर बाहर देखने लगी। सिगरेट पीते हुए अजीब-अजीब लगने लगी थी। वह कश लेती धुआँ छोड़ती। बाहर देखती। किसी-किसी वक्त मशऱूम का सूप पीने लगती। मैं उसे देखते सोचता रहा कि यह स्त्री शायद उम्र-भर इसी तरह बैठे-बैठे मशरूम का सूप पीती रहेगी।


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