धूमाभ दिगन्त - मनोज दास Dhoomabh Digant - Hindi book by - Manoj Das
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धूमाभ दिगन्त

मनोज दास

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1991
पृष्ठ :148
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1281
आईएसबीएन: 00000

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प्रस्तुत है उडिया मूल का हिन्दी रूपान्तर....

Dhoomabh Digant

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


इसमें जहाँ एक ओर देहात के रीजि-रिवाज दारिद्रय और दयनीयता से उडिया का ग्राम्य जीवन मुखर हुआ है वहीं उनकी अनेकों कहानियों के पात्र कल्पना के परीलोक से अवतरित होते लगते हैं पर संवेदना उनकी भी इसी मिट्टी से जुड़ी हुई मनुष्य जैसी है।

दूसरे संस्करण के अवसर पर

‘‘आपकी पुस्तक ‘धूमाभ दिगन्त’ का पहला संस्करण फरवरी-मार्च, 1990 में प्रकाशित हुआ था, हम शीघ्र ही इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित करना चाहते हैं’’ भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक बिशन टंडन का इस आशय का पत्र मिला।
पत्र पर 18 जनवरी, 1991 की तारीख पड़ी थी। इसका मतलब था कि पुस्तक का पहला संस्करण एक वर्ष के भीतर ही समाप्त हो गया था।
तो क्या हिन्दी के प्रबुद्ध पाठकवर्ग ने इन कहानियों को इतना पसन्द किया ? यह तो अब स्पष्ट ही है। इसके लिए मैं स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ। ऐसे विवेकशील पाठक समुदाय को मैं नमन करता हूँ।
पर हिन्दी के पाठकों तक पहुँचने के कई साल पहले ये कहानियाँ लिखी जा चुकी थीं। पर इस विराट पाठक समुदाय तक इन्हें पहुँचाने के लिए किसी को पहल करनी थी। यह कार्य किया बिशन टंडन ने जिनकी सक्रियता तथा कल्पना-शीलता मेरे तथा कई अन्य लेखकों के लिए एक आश्चर्य जनक वरदान सिद्ध हुई। मैं उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।
मैं जगन्नाथ प्रसाद दास का भी हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी। इस प्रस्तावना में एक रचनाकार की सहानुभूति तथा एक आलोचक की विश्लेषणात्मक दृष्टि का अद्भुत संगम है।

एक योग्य अनुवादक जब किसी लेखक की रचना को एक महान भाषा में अनुवाद करता है तो वह लेखक कितना गद्गद् होता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। राजेन्द्र प्रसाद मिश्र ने इन कहानियों का केवल अनुवाद ही नहीं किया, बल्कि इसके चुनाव में भी सक्रिय भूमिका निभायी है। भारतीय परिदृश्य बहुत विराट और विविधतापूर्ण है। इसकी विराटता और विविधता आकाश में फैले एक इन्द्रधनुष की तरह है। मैं आशा करता हूँ कि हिन्दी के पाठकों को मेरी कहानियों में इन्द्रधनुष के रंग या उसकी एक झलक तो अवश्य दिखेगी।

प्रस्तुति

भारतीय ज्ञानपीठ ने सदा भारतीय साहित्य में एक सेतु की सक्रिय भूमिका निभायी है। ज्ञानपीठ पुरस्कार की असाधारण सफलता का मुख्य कारण यही है। भारतीय भाषाओं में से चुने हुए किसी भी शीर्षस्थ साहित्य को प्रतिवर्ष दिये जाने वाले पुरस्कार का अनूठापन इसमें है कि यह भारतीय साहित्य के मापदण्ड स्थापित करता है। ज्ञानपीठ इन चुने हुए साहित्यकारों की कालजयी कृतियों का हिन्दी (और कभी-कभी अन्य भाषाओं में भी) अनुवाद पुरस्कार की स्थापना के समय से ही साहित्यानुरागियों को समर्पित करता आ रहा है। इसके अतिरिक्त विभिन्न भाषाओं के अन्य साहित्य मनीषियों का हिन्दी अनुवाद के माध्यम से उनकी भाषायी सीमाओं के बाहर परिचय कराके ज्ञानपीठ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय उत्तरदायित्व निभा रहा है। इस साहित्यिक अनुष्ठान को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए ज्ञानपीठ ने अब विभिन्न साहित्यिक विधाओं की उत्कृष्ट कृतियों की श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रकाशित करने का कार्यक्रम सुनियोजित किया है। प्रत्येक विधा के सभी अग्रणी लेखकों की कृतियाँ व संकलन इस योजना में सम्मिलित करने का विचार है। हमारा अनुभव है कि किसी भी साहित्यिक (या अन्य भी) रचना का हिन्दी में अनुवाद हो जाने पर उसका अन्य भाषाओं में अनुवाद सुविधा जनक हो जाता है। कविता और कहानी की इन श्रृंखलाओं के बाद शीघ्र ही अन्य श्रृंखलाएँ साहित्य-जगत् को प्रस्तुत करने के लिए हम प्रयत्न-शील हैं। इन श्रृंखलाओं की उपयोगिता को दृष्टि में रखते हुए कुछ पूर्व-प्रकाशित पुस्तकों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है और आगे भी ऐसा विचार है। इनके अतिरिक्त विभिन्न भाषाओं के नये और नवोदित लेखकों को उनकी भाषा-परिधि के बाहर लाने में भी हम सक्रिय हैं। देश के सभी भागों के साहित्यकारों ने हमारे प्रयत्नों का जिस प्रकार स्वागत किया है और सहयोग का आश्वासन दिया है उससे हम अभिभूत हैं। हमारा विश्वास है कि यह सब प्रयत्न आधुनिक भारतीय साहित्य की मूल संवेदना उजागर करने में सार्थक होंगे।

इस कार्य में ज्ञानपीठ के सभी अधिकारियों से समय-समय पर मुझे जो परामर्श और सहयोग मिलता रहता है उसके लिए बिना आभार व्यक्त किये नहीं रह सकता। समय-बद्ध प्रकाशन की व्यवस्था, भागदौड़ व अन्य काम-काज का भार उठाया है नेमिचन्द्र जैन, चक्रेश जैन, दिनेश कुमार भटनागर व सुधा पाण्डेय ने। अपने इन सहयोगियों का मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। उनके अकथ परिश्रम के बिना यह कार्य कब पूरा होता, यह कहना कठिन है।
इस पुस्तक की इतनी सुरूचिपूर्ण साज-सज्जा के लिए हम कलाकार पुष्पकणा मुखर्जी के आभारी हैं।

प्राक्कथन

ओड़िया की पहली आधुनिक कहानी फ़क़ीर मोहन सेनापति (1843-1918) की ‘रेवती’ सन् 1898 में प्रकाशित हुई थी। ओड़िया साहित्य की शुरुआत काव्य से हुई थी और कई शताब्दियों तक काव्य-कविता का ही प्रमुख स्थान रहा। ओड़िया की प्रथम उल्लेखनीय गद्य-रचना अठारहवीं शताब्दी में प्रकाशित बृजनाथ बड़जेना का ‘चतुरविनोद’ है। इस पुस्तक में कई कहानियाँ शामिल की गयी थीं और ओड़िया गद्य-साहित्य के इतिहास में इसका प्रमुख स्थान है।

ओड़िशा में अंग्रेज-शासन का प्रारम्भ हुआ सन् 1803 में और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरा्र्द्ध में कई पाश्चात्य कहानियों के अनुवाद भी प्रकाशित हुए। इसमें सम्भवतः ओड़िया में मौलिक कहानी लिखने की प्रेरणा मिली होगी। लेकिन यह कहना गलत होगा कि हमारे देश में कहानी की सृष्टि पाश्चात्य साहित्य के अनुशरण से हुई है। भारतवर्ष में कहानी की प्राचीन तथा विशाल परम्परा रही है। पंचतन्त्र, हितोपदेश विराट कथा मंजरी, बत्तीस सिंहासन, शुक्र सप्तति, बैताल पंचविंशति, दशकुमार चरित और बौद्ध जातक आदि सारे देश में प्रचलित थे। इस बारे में आधुनिक ओड़िया गद्य के जनक फ़क़ीर मोहन की निम्नलिखित अभिव्यक्ति प्रासंगिक है:

‘‘कुछ लोग मन-ही-मन सोचते हैं, अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से हमने उपन्यास का नाम जाना, किन्तु निश्चित रूप से कथा, उपन्यास, नाटक, दर्शनशास्त्र का उत्पत्ति स्थान भारतवर्ष ही है। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि सौकड़ों साल पहले रचित वेद में उल्लिखित नचिकेता उपाख्यान अथवा इन्द्र-वरूण संवाद वैदिक उपन्यास हैं।

फ़क़ीर मोहन व उनके कई समसामयिक बीसवीं सदी के शुरू में ही कहानी को ओड़िया साहित्य में एक स्वतंत्र स्थान दे चुके थे। सन् 1917 में फ़क़ीर मोहन का कहानी-संग्रह ‘गल्प-स्वल्प’ प्रकाशित हुआ। हालाँकि फ़क़ीर मोहन ने 21 कहानियाँ ही लिखी थीं पर उनकी प्रसिद्ध एक उपन्यासकार के रूप में ज्यादा थी। उनकी कहानियाँ अपना विशेष महत्त्व रखती हैं। इन कहानियों में ओड़िशा के ग्राम्य-समाज का विस्तृत चित्रण है तथा जनसाधारण के सुख-दुःख, कुसंस्कार, अन्धविश्वास, ईर्ष्या-द्वेष एवं श्रद्धा-सद्भाव इन कहानियों में प्रतिबिम्बित हुए हैं। इनकी पहली कहानी ‘रेवती’ एक युगान्तकारी कहानी थी क्योंकि ओड़िशा के तत्कालीन रूढ़िवादी समाज में फ़क़ीर मोहन ने अपनी कहानियों में स्त्री-शिक्षा का संदेश दिया था। फ़क़ीर मोहन की अधिकांश कथा कहानी-धर्मी तथा कई अन्य कहानियाँ वर्णनात्मक निबन्ध-सी हैं। पर ‘रेवती’ ‘रांड़िपुओ अनन्ता’ आदि कहानियों की तुलना किसी भी उच्चकोटि की कहानी से की जा सकती है।

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में कई ओड़िया साहित्यिक पत्रिकाएँ कहानी के विकास में विशेष रूप से सहायक हुई थीं। वे पत्रिकाएँ थीं उत्कल साहित्य (1897), मुकुर (1905) एवं सहकार (1919)। उस दौरान फ़क़ीर मोहन के बाद के जो लेखक ओड़िया कहानी रचना से प्रेरित हुए थे वे हैं दिव्यसिंह पाणिग्राही, बांकनिधी, पटनायक, लक्ष्मीकान्त महापात्र, चिन्तामणि महान्ति, गोदीवरीश मिश्र, दयानिधि मिश्र, गोपाल चन्द्र प्रहराज, सेवा राय आदि। इसी समय नर्मदा कर ने टॉलस्टॉय की कहानियों का अनुवाद भारतीय परिवेश में तथा स्थानीय नामकरण से किया था।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उस समय की आधुनिक कहानियों के प्रकाशन के साथ-साथ पुराने ढंग की परम्परागत कहानियाँ भी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं। कहानी ओड़िया साहित्य के लिए एक नवीन विधा थी। यह इस बात से स्पष्ट है कि उस समय की एक नयी पत्रिका ‘सत्यवादी’ (1914) में कहानी प्रकाशित नहीं होती थी। कुछ भी हो, कहानी ओड़िया साहित्य का एक अभिन्न अंग हो चुकी थी, यह प्रमाणित हुआ था बीसवीं सदी के पहले दशक में, उत्कल साहित्य में प्रकाशित दो निबन्धों में: कहानीकार चन्द्रशेखर नन्द का लेख ‘साहित्य में कहानी’ और फ़क़ीर मोहन का ‘ओड़िया कहानी का धर्म और धारा’।
ओड़िया साहित्य में एक नवीन धारा की सृष्टि हुई इस सदी के चौथे दशक में ‘सबुज साहित्य समिति’ संस्था के लेखकों के माध्यम से। यह युग ‘सबुज युग’ के नाम से जाना जाता है और इस युग के लेखकों का मुखपत्र था ‘युगवीणा’ (1933)। उस समय कहानी लिखकर जिन लेखकों ने ओड़िया साहित्य को समृद्ध किया था, उनमें भगवती चरण पाणिग्राही, कालिन्दी चरण पाणिग्राही, गोदावरीश महापात्र हरीशचन्द्र बड़ाल, अन्नत प्रसाद पण्डा, सरला देवी, अनंत पटनायक आदि प्रमुख हैं। ये लेखक रूसी-क्रांति तथा गांधीवादी आन्दोलन से प्रभावित थे। एक ओर भगवती पाणिग्राही की कहानियों में वामपन्थी चेतना थी, तो दूसरी ओर गोदावरीश महापात्र और अनन्त प्रसाद पण्डा की कहानियों में आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का चित्रण। इस समय के लेखकों की कहानियों में प्रेरणा थी ओड़िशा के गाँवों के दीन-दरिद्रों के जीवन तथा समाज की विषमताओं और अर्थनैतिक शोषण की। गोदावरीश महापात्र की एक कहानी में एक ब्राह्मण शिक्षिका का एक धोबी से विवाह तथा उसमें उपजी समस्याएँ हैं। भगवती पाणिग्राही की ‘शिकार’ कहानी में एक आदिवासी अपने शोषक जमींदार की हत्या करके उसका सिर लेकर थाने पहुँचता है। स्वतन्त्रता के बाद के समय में जो कहानीकार ओड़िया साहित्य के क्षेत्र में आये, वे हैं कान्हुचरण महान्ति, गोपीनाथ महान्ति, सच्चिदानन्द राउतराय, नित्यानन्द महापात्र, सुरेन्द्र महान्ति, प्राणबन्धु कर, राजकिशोर पटनायक, राजकिशोर राय आदि। ये सभी गाँधी व मार्क्स की विचारधारा से प्रभावित थे और अपने लेखन में मानवतावाद, समाजवाद, ग्राम्यजीवन साधारण मनुष्य का चित्रण करते थे। इसके अलावा इनके चरित्रों में मनस्तात्त्विक तथा प्रेम और यौन-सम्बन्धी अनुभव भी थे। गोपीनाथ महान्ति की ‘पिंपूडि’ (चींटी) कहानी में सिविल सप्लाई अधिकारी जब चोरी रोकने के लिए निकलता है तब अभाव और भूखमरी का चित्र देखता है, वह वहाँ कोई अन्याय देख नहीं पाया है। और उसके मन में कानून की वास्तविकता के बारे में सवाल उठे हैं। सच्चिदानन्द राउतराय की ‘अंधारुआ’ कहानी का गँवार आदमी अपने गौहत्या के पाप का प्रायश्चित करने जाकर एक कुसंस्कारग्रस्त समाज में अन्ततः अपना जीवन गवाँ देता है।

उपरोक्त लेखकों में से कुछ अब भी सक्रिय हैं और अपने लेखन से ओड़िया साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। इनके बाद के समय में जो लोग ओड़िया कहानी के क्षेत्र में आये हैं, उनमें किशोरी चरण दास, अखिल मोहन पटनायक, महापात्र नीलमणि साहू, कृष्णप्रसाद मिश्र, शान्तनु कुमार आचार्य और विभूति पटनायक के अलावा और भी कई कहानीकार हैं,। इस समय के कहानीकारों में मनोज दास उल्लेखनीय हैं।
मनोज दास (जन्म 1934) ओड़िया साहित्य के बीसवीं सताब्दी के उत्तरार्द्ध के प्रमुख कहानीकार हैं। उनकी पहली कहानी ‘समुद्रर क्षुधा’ 1947 में प्रकाशित हुई थी। हालाँकि शुरू के दिनों में उन्होंने कविता, भ्रमण कहानी तथा रम्यरचना लिखा है पर उनकी साहित्य-साधना की प्रधान विधा है कहानी और कहानीकार के रूप में ही वे विशेष रूप से परिचित हैं। सन् 1971 में प्रकाशित ‘मनोज दासंक कथा ओ. कहानी’ में उनकी तब तक लिखी कहानियाँ थीं और मनोज दास को ओड़िसा के एक अग्रणी कथाकार के रूप में स्वीकृति मिल चुकी थी। इसके बाद भी उनके कई अन्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं: ‘लक्ष्मीर अभिसार’, ‘आबू पुरुष’, ‘धूमाभ दिगन्त’, आदि।

मनोज दास के बारे में विचार करते समय हमें एक बात ध्यान में रखनी होगी कि वह ओड़िया तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं के कहानीकार हैं। एक अंग्रेजी लेखक के रूप में भी वे अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकृत हैं और उनकी अंग्रेजी कहानियाँ काफ़ी प्रशंसित हुई हैं। प्रख्यात लेखक ग्राहम ग्रीन ने उन्हें आर. के. नारायण के साथ रखकर देखा है। किसी अन्य ने के. हार्डी, साकी तथा ओ. हेनरी के साथ उनकी तुलना की है। उनके अपने विचार में वे कुछ कहानी पहले ओड़िया में लिखते हैं और कुछ पहले अंग्रेजी में। बाद में वे उस कहानी को फिर दूसरी भाषा में लिखते हैं। किस भाषा में वे सोचते हैं, इस प्रश्न पर मनोज दास का जवाब है कि वह सोचते हैं नीरव की भाषा में।

मनोज दास अंग्रेजी में लिखते हुए भी (और स्वयं अंग्रेजी के प्राध्यापक होने के बावजूद) उनके साहित्य सृजन का मूल स्त्रोत अंग्रेज़ी या विदेशी साहित्य नहीं है। उनकी कहानी में जिस परम्परा का विकास देखने को मिलता है, वह है संस्कृत तथा ओड़िया की लोककथा, वेद, उपनिषद की भारतीय सांस्कृतिक धारा और आधुनिक ओड़िया गद्य साहित्य के प्रवर्तक फ़क़ीर मोहन सेनापति। मनोज दास ने खुद भी अपने लेखन पर फ़क़ीर मोहन, सोमदेव, विष्णु शर्मा आदि का प्रभाव स्वीकार किया है।
साहित्य के क्षेत्र में मनोज दास को काफ़ी सफलता भी मिली। उन्हें साहित्य के क्षेत्र में प्राप्त सम्मानों में से ओड़िशा साहित्य अकादमी पुरस्कार (1965) केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार (1972), सारला सम्मान (1981) तथा विषुव सम्मान (1987) हैं। इनके साथ ही इन्हें प्राप्त हुआ है अनगिनत पाठकों का अकुण्ठित समर्थन। जिन गुणों के कारण उनकी कहानियाँ आलोचकों और पाठकों दोनों को प्रिय हैं, वे हैं सशक्त कथानक, मोहक तथा धाराप्रवाह वर्णन शैली रहस्यमय किंवदन्तीय वातावरण और अन्त में एक अव्यक्त मन्तव्य और नैतिक अर्थ। मनोजदास की प्रारम्भिक कहानियों से लेकर अब तक लिखी जाने वाली कहानियों में ये सारे गुण निश्चित रूप से देखे जा सकते हैं। और इन्ही सब कारणों से उनकी कहानी एक बार पढ़ने पर उसे भूल पाना सम्भव नहीं होता।

उनकी कहानी का एक सशक्त आकर्षण है उसकी बौद्धिकता व भावुकता अथवा हृदय और मन का सन्तुलन। हालाँकि उनकी सारी कहानियाँ निर्मम बौद्धिकता में सराबोर हैं, पर वे बौद्धिकता, भावुकता और आवेग को दबाती नहीं। कहानी के अन्त में नीति-शिक्षा का समाधान कहानी के पात्रों को उनकी प्रकृतिगत रोजमर्रा की दिनचर्या के बाहर नहीं खीच सकता। इसलिए ये सारे पात्र जीवन्त व सांसारिक हैं, साधारण सुख-दुःख के भागीदार हैं। केवल कथा कहने के ढँग के प्रधान होने के कारण नहीं, उनकी आभासधर्मी कहानियों में भी यह देखा जा सकता है इन पात्रों को रूप देने के लिए मनोज दास ने जिस तरह की शैली अपनायी है, वह भी उनकी निजी है। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘धूमाभ दिगन्त’ की शुरुआत इस तरह होती है:
आँधी में तितलियाँ क्या करती हैं-अक्सर मैं इस सवाल को लेकर चिन्तित रहता हूँ ।

कभी-कभी दूर हवा में आसमान में पक्षियों को किलबिलाते देख बेहद उदास हो जाता हूँ। उनकी उस समय की गति की उस छन्दहीनता में अहसास होता है किसी आधुनिक राष्ट्रीय कविता को पढ़ते समय का असहायबोध। और जब अचानक बवण्डर में कुछ सूखे पत्ते ऊपर की ओर उड़कर अदृश्य हो जाते हैं, तब ऐसा लगता-मैं भी कहीं खो गया हूँ।
लेकिन वैसी आँधी, पक्षियों या सूखे पत्तों का खयाल काफ़ी अरसे बाद आज एक परी-कथा पढ़ते समय क्यों आया, मैं समझ नहीं सका।
‘‘दिगन्त के पर्वत पर था एक छिपकर रहने वाला दानव’’, पूरी-कथा में लिखा था।
कहानी के प्रारम्भ में एक रहस्यमय प्रश्न है, आकाश, पक्षी तथा आँधी की सूचना और फिर एक परीकथा का उल्लेख। मानो यह किसी परीकथा में एक और परीकथा हो।
परन्तु यह कहानी परीकथा की भूल-भूलैया में खो नहीं गयी है। कहानी के सभी पात्र रक्त-माँस के है और मानवीय कमजोरियों तथा असहायता पर आश्रित हैं। कहानी का वक्ता स्वयं भी एक पात्र है। कहानी का विषय है हटू, नवीन एवं स्वयं वक्ता। काफ़ी साल पहले अपने बचपन की एक किशोरी बन्धु लिलि को पहाड़ पर करुण परिस्थितियों में खो बैठे थे। और उसी की याद अब तक उन्हें घेरे हुए है। कहानी का अन्त इस तरह होता है-
हटू सम्भवत: अपने तरीक़े से (पहाड़ की तलहटी में मन्दिर-बनवाकर) प्रायश्चित कर रहा है। लेखक नवीन ने लिलि को श्रद्धांजलि दी है परी-कहानी की बालिका के रूप में उसका चित्रण करके।
‘‘लेकिन मैं ?’’ इतना कह कर रोने लगा।

‘‘तू ? काश, तेरी तरह मैं रो पाता ! सत्तर साल की उम्र में आँसू निकलना आसान नहीं, जानता है !’’ नवीन ने कहा।
इस कहानी की तरह कई अन्य कहानियों में कहने वाला खु़द भी कहानी का एक पात्र है। इस शैली से लेखक कहानी को पाठक तक सीधा पहुँचाने में समर्थ है। इसके अलावा कई कहानियों में मनोज दास पाठकों को सीधे सम्बोधित भी करते हैं। इससे लेखक और पाठक के बीच एक संवेदनशील सम्बन्ध बन जाता है तथा कहानी के पात्र पाठक के और भी निकट आ जाते हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में एक और बात भी दिखाई देती है, वह यह है कि इन कहानियों के पात्र अद्भुत होते हैं। एक दृष्टि से देखा जाए तो ये सभी अवास्तविक व अपार्थिव हैं-मानो ये किसी परी-लोक के निवासी हों। परन्तु फिर गम्भीरता से विचार पर करने पर लगता है कि ये बिलकुल मिट्टी के ही मनुष्य हैं, जो हमारे खू़ब क़रीब आते हैं। राजकुमार, राजकुमारियाँ संन्यासी यहाँ तक कि मनुष्येत्तर पात्र भी बेहद जीवन्त लगते हैं।

इन सब पात्रों को रहस्यमय तथा अलौकिक रूप देने के लिए मनोज दास जिस कौशल का सहारा लेते हैं, वह है पात्रों और स्थानों का नामकरण। उनके कई पात्रों के नाम हैं-पुण्डरीक, हिडिम्ब, शंखनाद, हयग्रीव। लुभुर्भा पर्वत उनकी एकाधिक कहानियों में वर्णित है। ये नाम केवल हास्यरस के संचार के लिए नहीं, देश, काल तथा पात्रों को रहस्यमय बनाने के लिए भी प्रयुक्त हुए हैं।
मनोज दास की भाषा व शब्द-चयन भी उस दिशा में सहायक हैं। उनकी कहानियों में हमें मिलता है, ‘‘झलक-झलक शुभ्र विस्मय’’, ‘‘मृत्यु हिम स्तब्धता का आवरण’’, ‘‘तिमिर व क्रन्दन से बिषर्ण्ण पृथ्वी’’, ‘‘भालू-भालू अँधेरा’’, ‘‘अधमरा चाँद’’, ‘‘झोंका-झोंका ठण्ठी हवा’’ इत्यादि। शब्द-विन्यास पाठकों के आगे एक अपार्थिव परिवेश सृष्टि करते हैं।

मनोज दास की कहानियों में रहस्य की सूचना कहनी के प्रारम्भ में ही मिल जाती है। कहानी का पहला वाक्य ही पाठक के मन में पैदा कर देता है एक रहस्य तथा रोमांच जिसके मूल तत्त्व को हमें ढूँढ़ ही निकालना होता है कहानी शुरू से अन्त तक पढ़कर। यह उनकी कुछ कहानियों के निम्नलिखित प्रथम वाक्य से ही स्पष्ट है-
‘‘उम्र चार साल से कम होने पर भी पलटू कई जटिल बातें समझ लेता था और उस दिन कोई एक विशेष तरह की घटना घटित होने वाली है और वह पुलकप्रद है, यह न समझने की कोई वजह ही नहीं थी।’’
‘‘शुभेन्दु ने पाँचवीं बार गिना। पाँच वर्षों की गाढ़ी बचत है। पाँच की यह गिनती उसे सिहरित कर रही थी। वह जा रहा था पाँच पीढ़ियों के महार्घ सम्पत्ति लौटाने ।’’

‘‘चाँद निकलने तक रात काफ़ी रात बीत चुकी थी। फिर भी हम हत्यारे का इन्तजार कर रहे थे।’’
‘‘खा़सकर चाँदनी रातों में निर्जन उदास कोठी का आकर्षण होता था अप्रतिरोध्य। नदी के बाँध पर से हम चुपचाप काफ़ी देर तक उस ओर देखते रहते।’’
मनोज दास की कहानियों में परी-कथा व लोक-कथा के प्रयोग के बारे में पहले ही कहा जा चुका है। इसे रूप देने में उनका शब्द-चयन तथा वर्णन शैली सम्पूर्ण सहायक होते हैं। कहानियों में शब्द योजना छन्दमय तथा बिम्ब भरपूर होते हैं। असम्पूर्ण वाक्यों का प्रयोग कई बार वर्णन को कविता की ऊष्मा देता है। उनकी उपमाएँ कवितामय काव्यमय होती हैं। इस तरह के लेखन के कुछ उदाहरण हैं-‘‘नक्षत्र दिख रहे थे मृत मछलियों की आँखों की तरह’’, सूर्य नवविवाहित तरुण ऑफ़िसर-सा चार बजते ही विदाई लेता था’’, ‘‘तिमि की तरह वपुमान मन्त्री, काले-काले रेखामय मेघों का ऊनी स्वेटर पहने चाँद’’ आदि। उनके उपमा-बिम्ब प्रयोग का एक प्रतिनिधि वर्णन उनकी ‘धूमाभ दिगन्त’ कहानी के निम्नोक्त पंक्तियों से पता चल सकता है-

‘‘शुरू में उसके संगीत शिक्षक थे कुछ भौंरे। वे उसे गुनगुनाना सिखा देने के बाद कोयल ने आगे की जिम्मेदारी ली। ऐसा नहीं था कि कोयल सिर्फ़ अपनी-अपनी कूक से ही अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रही थीं, वे उस लड़की को बुला ले जाती थीं, जंगल के एक ऐसे घने इलाके में, जहाँ किसी गुफा के अन्दर हवा तरह-तरह की ध्वनियाँ उत्पन्न करती थी, जो उसे बुला ले जाती थीं मृदु-मृदु वीणा-वादन करते झरने के किनारे भी।
उसे अक्षर सिखाया था ताराओं ने, प्यार करना सिखाया था इन्द्रधनुष ने; मुस्कराना सिखाया था सूर्योदय ने, और सूर्यास्त ने सिखाया था विषाद।’’

ये पंक्तियाँ शुद्ध कविता हैं और इसकी भाषा मनोज दास के प्रारम्भिक जीवन के कविता लेखन की सूचना देती है।
इस भाषा में एक बात यह भी देखना है कि भाषा कई जगह गम्भीर व शास्त्रीय है तो कहीं अति सरल व प्रवाहपूर्ण भी। भाषा प्रयोग में होता है जटिल संस्कृत शब्दों के साथ सरल ग्राम्य शब्दों के प्रयोग का समन्वय।

मनोज दास की कहानी भूमिका में जो दिशा हमारे सामने पहले दृष्टि गोचर होती है वह है इसका व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण। कहानी राजनीतिक पृष्ठभूमि की हो या सामाजिक समस्या को लेकर, पात्र राजा, जमीदार या साधारण मनुष्य हों, सभी व्यंग्य के पात्र हैं। अधिकांश कहानियों में परिस्थितियाँ भी व्यंग्यात्मक हैं। जैसे कि मन्त्री की टोपी को बन्दर ले जाता है, डॉक्टर निरोग आदमी में रोग का पता लगाते हैं। सूखे के दौरान प्रजाओं के लिए चावल बचाने हेतु जमींदार साहब केवल गोश्त खाते हैं। जमींदार की मूँछ साफ होगी, इसीलिए नायक साहब हेडमास्टर, तहसीलदार सभी चिन्तित हैं। पति-पत्नी में समझौता होता है कि दोनों में से किसी एक की पहले मृत्यु हो जाये तो उसका प्रेत दूसरे को प्रेतलोक से सन्देश भेजेगा। हेडमास्टर पति अपनी पत्नी को किसी दोष के लिए बेंच पर खड़ा होने की सजा देता है। इस सब हास्यकर परिस्थितियों में सहायक होते हैं अद्भुत नामवाले पात्र जैसे: प्रोफे़सर ध्रुपद, मिसेज़ हाइफे़न, बन्दर झाण्डु, उग्रचरण, मिस्टर तिंतुली, चाकोरी कुतुरी आदि।

इस बात से यह सिद्ध करना उचित नहीं कि मनोज दास की कहानियाँ केवल हास्य-रस प्रधान हैं। हालाँकि वर्णन तथा दृष्टिकोण में व्यंग्य का प्रभाव है, पर कहानियाँ भिन्न-भिन्न परिस्थितियों, समस्याओं व पात्रों को लेकर लिखी गयी हैं। कई कहानियों में राजनीतिक नेता उनकी विद्रूपता के शिकार बने हैं। परन्तु इन सब कहानियों में वे प्रत्यक्ष या प्रचार-धर्मी नहीं हैं। मानों एक विशेष दूरी पर रहकर ही वे राजनीतिक स्वरूप का विश्लेषण करते हैं। कुछ और कहानियाँ स्वतन्त्रता के पूर्व स्वतन्त्रता आन्दोलन की पृष्ठ-भूमि पर आधारित हैं। इन कहानियों में हम पाते हैं जमींदार, रायसाहब, राजा, अंग्रेज ऑफ़िसर आदि को। ओड़िशा की ग्राम्य जीवन की तसवीर भी उनकी कई कहानियों में उभरी है। इन कहानियों में गाँव-देहात की जीवनचर्या के अलावा वहाँ के रीति-रिवाज, दरिद्रता तथा दयनीयता भी सामने आती है। फिर कई कहानियाँ पूरी तरह भौतिक तथा रहस्यमय विषय वस्तु पर आधारित हैं। कहानी की विषयवस्तु या पृष्ठभूमि जो भी कुछ क्यों न हो, प्रत्येक कहानी का पात्र सफल तथा सम्पूर्ण है, एवं पूरी कहानी एक सहज सिद्धान्त की अधिकारी है।
इसके अलावा उनकी कई कहानियाँ सीधे-सादे फे़बल या परीकथा है। नीति कथा पर आधारित मनोज दास की एक लम्बी कहानी ‘आबू पुरूष’ इस तरह की कहानी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है-

किसी भारतीय मि. शर्मा के सिर का आबू (ट्यूमर) क्रमशः उसके व्यवसाय में आर्थिक सिद्धि व राजनीतिक विजय का एक विकृत साधन बन गया है।
टी. वी. कम्पनी, खेल पत्रिका के सम्पादक, राष्ट्रपति चुनाव में राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वी मि. हायना, गिद्ध टोप कम्पनी आदि सभी ने इस सीधे-सादे भारतीय के बृहत् आबू से लाभ उठाया है। मि. शर्मा ने क्रमशः अनुभव किया है कि आबू ,सौभाग्य का प्रतीक है, इसलिए उसे न कटवाकर वह अपने देश लौट आया। यहाँ कम्पनी मालिक के साथ चुनाव में मि. शर्मा प्रतिद्वन्द्वी बनते हैं और जीते भी हैं। तृष्णा ज़्यादा-से-ज़्यादा बढ़ती जाती है। मन्त्री होने की आशा पनपती है। यही मानों उनका आखिरी स्वप्न तथा जीवन की सर्वश्रेष्ठ परिपूर्णता है। लेकिन अध्यात्म विश्वासी माँ उसके मन में सद्बुद्धि जगाती है। गुरु की कृपा से आबू ठीक हो जाता है। यह भारतीय विश्वास की एक वास्तविकता है। इस अति भौतिक प्रक्रिया को चुनाव के मैदान में प्रयोग करके जीतने का स्वप्न में मि. शर्मा झूम उठते हैं। परन्तु सरल विश्वासी माँ उसे उपदेश देती है-‘‘बेटे, फिर कभी ऐसी गलती मत करना। गुरु का आशीर्वाद तुझे आबू-मुक्त करने के लिए है। यह मुक्ति की बात प्रचार करके, बेचकर फायदा उठाने के लिए नहीं है।’’

इस कहानी का नीति-वाक्य अन्त में माँ के मुँह से कहलवाया गया है-‘‘तेरे इस आबू-मुक्ति के दौरान मैंने सपना देखा है कि सारी दुनिया शायद कभी आबू-तान्त्रिक राजनीति तथा व्यवसाय से एक दिन मुक्त हो जायेगी।’’
मनोज दास की कहानियों की एक और विशेषता यह है कि चूँकि कहानी का पात्र व पृष्ठ भूमि किसी एक देश व काल का (जैसे कि ओड़िशा के गाँव, स्वतन्त्रता के पूर्व का समय आदि) है, परन्तु पूरी कहानी और उसका सार तत्त्व समय तथा स्थान से परे हैं। ये कहानियाँ किसी देश या समय की हो सकती हैं। क्योंकि मनुष्य की हँसी-रुलाई आदिम प्रवृत्तियाँ, ईर्ष्या-द्वेष प्रेम-सद्भाव, किसी एक देश या काल के नहीं होते।

यह पहले ही कहा जा चुका है कि मनोज दास की कहानियों की शुरूआत एक नाटकीय चमत्कारिता से होती है। ठीक उसी तरह उनकी कहानियों के अन्त में भी होती है एक अजीब आकस्मिकता। और शुरुआत तथा अन्त के बीच में होती है एक योजनाबद्ध कथा-वस्तु। इसीलिए उनके बारे में कहा गया है: ‘‘उन्हें कहानी-लेखक की बजाय कहानी कथक कहना ज्यादा उचित होगा। उसकी कथन शैली की विदग्ध भंगिमा में होता है लघुधर्मी चपलता, फिर घटना की सृष्टि में विश्वास के अयोग्य एक प्रत्यय पाठक के मन में उत्पन्न करते हुए कथाकार ओ. हेनरी जैसा अन्त करना मनोज दास की कहानियों की विशेषता है।’’
मनोज दास के बारे में अन्त में इतना ही कहा जा सकता है कि चालीस साल पहले कहानी लेखन प्रारम्भ करके अब तक वे लेखन में सक्रिय हैं। उनका साहित्यिक योगदान बहुत बहुमूल्य है और ओड़िया साहित्य उनसे और भी अनेक कृतियों की आपेक्षा रखता है।
अपने लेखन के बारे में मनोज दास ने कई साक्षात्कारों में काफ़ी कुछ कहा है। साक्षात्कारों के अंश इस संग्रह के अन्त में दिये गये हैं। इससे मनोजदास के स्रष्टा मन का कुछ आभास मिल सकता है।

चाँदनी रात का सेतु

अशोक के बरामदे से कभी-कभी चाँद इतना क़रीब दिखाई देता है जैसे कि दो चार छलाँग में उसे जाकर छुआ जा सकता है !
पूर्णिमा और उसके आस-पास की रातों में आराम-कुर्सी पर बैठ चाँद से बतियाना अशोक को अच्छा लगता है। उदाहरण के तौर पर आज शाम को उन्होंने चाँद से पूछा था, ‘‘मेरी उम्र अठासी हो गई। तुम्हारी ?’’
कभी-कभी उन्हें लगता दिगन्त के कोहरे से ढकी वन-लता का शीर्ष और तैरते हल्के बादल में जो चाँदनी का प्लावन है, उसमें बहुसंख्यक परियाँ लुकाछिपी खेल रही हैं। उन्हें यह बहुत अच्छा लगता। देखते-देखते दो-तीन मिनट तक नींद में सो जाते। हालाँकि कब सोते हुए और कब जागते हुए परियों को देखते हैं, उतना भी आजकल उन्हें याद नहीं रहता। इस तरह यह याद न रहने का सिलसिला अब नानादि स्थूल घटनाओं में भी संक्रमित होने लगा है। आज शाम को उन्हें जो चाय दी गई थी, उसे उन्होंने अपने निकट के सटूल पर सिर्फ़ रखी हुई देखी थी। उसके बाद धीरे-धीरे सो गए और मन-ही-मन पूरी चाय पी ली थी। जब उनसे चाय ठण्ठी होने के बारे में कहा गया, तब उन्हें जानकर आश्चर्य हुआ कि मन-ही-मन पी हुई चाय की तृप्ति स्थूल चायपान की तृप्ति से क़तई कम नहीं है।

इतनी उम्र के बावजूद उनकी आँखें कोई ख़ास ख़बर नहीं हुई जानकर उन्हें खुद पर फ़ख़्र हुआ था। माँ-बाप की अन्तिम सन्तान के रूप में पूरे पाँच वर्षों तक माँ का दूध पीना इसका रहस्य होने के बारे में वे असंख्य बार घोषणा कर चुके थे, लेकिन आज शाम उन्हें इस बारे में कुछ सन्देह था। क्योंकि घर के पास वाला सेतु, जहाँ बैठकर वे और उनके मित्र अपनी शामें गुज़ारा करते हैं, आज अब दिखाई नहीं दे रहा है। हर बार नींद उचट जाने पर सेतु की याद करके वे उस ओर देखते; सेतु दिखाई नहीं देता। चाँदनी आज मुरझाई हुई होगी सोच, चाँद की ओर दाँत पीसते हुए देखते। पिछले कई वर्षों से ताजमहल का सिलुएट बनाए दिगन्त के एक वृक्ष-पुंज की ओर देखते हैं। किन्तु वह खू़ब साफ दिखाई देता है।
उसके बाद वे ऊँघने लगते हैं।

सीढ़ियों से ऊपर की ओर घिसटते हुए आ रहे पैरों की आहट ही उनकी ऊँघ तोड़ने के लिए पर्याप्त थी। वह आहट उनके अंतरंग मित्र सुधीर की थी। उनसे दस साल छोटे होने पर भी सीढ़ियाँ चढ़ते समय हाँफने लगते। हाँफने की बात तो दूर, सीढ़ियाँ चढ़ते समय अशोक को इन दिनों विचित्र अनुभूतियाँ होतीं। पिछली बार वे सान्ध्य-भ्रमण के बाद कार से उतरकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। चढ़ते समय बीच में उन्हें समय का ध्यान नहीं रहा और पलभर में ऊँघ की चपेट में आ गये थे। बरामदे में पहुँचने के बाद वे फिर कार ढूँढ़ने लगे थे। अर्थात् कभी-कभी सीढ़ियाँ चढ़ते समय उन्हें यह महसूस होता कि उतर रहे हैं और उतरते समय लगता कि चढ़ रहे हैं।
‘‘चलो सुधीर, टहलने चलें। ’’ अशोक ने सीधी तरह बैठते हुए कहा।
‘‘अब कहाँ जाएँगे। पुराना सेतु ही एक मात्र ठौर था। बाकी जगहों पर तो लोग बिलबिला रहे हैं।’’
‘‘मैं उसी सेतु पर जाने को कह रहा था।’’ अशोक बोले।
‘‘लो, तुम फिर भूल गये। सेतु तो तोड़ा जा चुका है। तभी तो हम महीने भर से वहाँ नहीं गये हैं ?
‘‘ओ हो ! तो ये बात है। मैं भी सोचता था सेतु मुझें दिखाई क्यों नहीं देता ! मुझे कभी-कभी बात याद नहीं रहती। तुम्हारी ब


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