दायरे आस्थाओं के - भैरप्पा Dayare Aasthaon ke - Hindi book by - Bhairappa
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दायरे आस्थाओं के

भैरप्पा

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :198
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1284
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है कन्नड से अनूदित उपन्यास....

Dayare Aasthaon ke

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


यह उपन्यास का कथानक ही वास्तव में कुछ ऐसा है जो पाठकों को बरबस बाँध लेता है। कोई समाज और कोई घर ऐसा नहीं जहाँ आस्थाओं से जीवन और सुखी-सम्बन्धों को प्राणदायिनी ऊर्जा न मिलती हो। पर जब यही आस्थाएँ एक-दूसरे से टकराती है तो दायरे का रूपले लेती है।

एक


ऐसी बात यदि छोटी उम्र के बच्चे कहें तो कोई भी हँसकर चुप हो जाएगा। लेकिन यह देखकर कि अठारह साल की उम्र में भी, दो साल की उम्र से ही जब से वह बोलने लगा था, उनका बेटा उसी बात को दोहरा रहा है, जोइसजी को गुस्सा आ जाना स्वाभाविक था। उनका छोटा बेटा क्षेत्रपाल बचपन से ही कहता आया था कि मेरा ब्याह हुआ है, मेरी पत्नी का नाम वेंकम्मा है और मेरा एक बेटा भी है। बच्चे की बात सुनकर तिरूमल जोइसजी पहले तो कुछ दिन हँसकर टालते रहे, मगर पाँच-छह साल बाद भी जब क्षेत्रपाल उसी बात को दोहराता रहा तब उन्होंने उसे बहुत समझाया कि वह ऐसा न कहा करे। मगर क्षेत्रपाल पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ।

चार साल का होने पर क्षेत्रपाल कूलिमठ जाने लगा। वहाँ भी कोई पूछता तो वह यही कहता कि मेरा ब्याह हुआ है, मेरी पत्नी का नाम वेंकम्मा है और मेरा एक बेटा भी है। मठ के सारे लड़के सुनते तो ठठाकर हँसने लगते। धीरे-धीरे बात एचय्याजी के कानों में भी पड़ी। उन्होंने ‘‘खबरदार जो ऐसा बोला’’ कहते हुए उसे चार बेंत लगाये। लेकिन क्षेत्रपाल जैसा का तैसा रहा। हारकर उन्होंने जोइसजी से कहा, ‘‘जोइसजी आपके बेटे को चुप कराने में मेरा बेंत भी असमर्थ रहा। मैंने कान उमेठे, हाथ-पैर भी बाँधकर देखा, लेकिन सब बेकार। जान पड़ता है उसे हवा लग गयी है या किसी प्रेत-पिशाच ने आ घेरा है।’’

क्षेत्रपाल का स्वभाव अजीब-सा था। अपने से कभी किसी से न बोलता। कुछ पूछता कोई तो संक्षिप्त-सा उत्तर दे देता। पढ़ने-लिखने में होशियार था। एचय्याजी श्यामपट पर जो अक्षर बनाते उसे वह देखकर एक बार में ही ठीक-ठीक लिख देता । गुणा-भाग और बाराखड़ी भी एक बार सिखाने पर ही समझ गया। विवाह की बात को छोड़ उसे किसी बात पर एचय्याजी से कभी सजा नहीं मिली। उनका गाँव गंगापुर सौ से अधिक परिवारों का गाँव था। ब्राह्मणों के दस घर थे। सारा गाँव क्षेत्रपाल की बात जानता था। वह स्वयं यह बात किसी से नहीं कहता था, लेकिन लोग जान-बूझकर मजाक में पूछते, ‘‘क्यों क्षेत्रपाल, ब्याह करोगे न ?’’ और वह बड़ी सरल गम्भीरता से हर बार उत्तर में कहता, ‘‘नहीं, मेरा ब्याह तो हो चुका है।’’ कोई पत्नी का नाम पूछता तो वह बता देता : वेंकम्मा।

गाँव के बड़े-बूढों ने जोइसजी से कहा, ‘‘लगता है किसी भूत-पिशाच का प्रकोप है। केरेगल्ली के ओझा को बुलाकर उतरवाइए।’’ जोइसजी उत्तर देते, ‘‘ब्राह्मण होते हुए मैं भूत-पिशाचों से डरकर जादू-टोना नहीं कराऊँगा। आठ बरस का होते ही मैं इसका जनेऊ-संस्कार कराऊँगा। फिर तो जहाँ गायत्री-मन्त्र का जाप कराया कि कैसा भी भूत-पिशाच हो, ठहर ही न सकेगा।’’

‘‘हाँ, इस चाण्डाल के लिए तो अब बस एक जनेऊ की कमी रह गयी है ! और जो कहीं जनेऊ निकालकर इसने कुत्ते के ही गले में डाल दी तो हमारी तो सारी धर्म-प्रतिष्ठा पर पानी फिर जाएगा ! नहीं, इसे जनेऊ-वनेऊ नहीं चाहिए।’’ जोइसजी के तीनों बड़े बेटे कहा करते।
आचारवान् जोइसजी ने घर में कभी कुत्ता नहीं पाला। मगर क्षेत्रपाल ने बचपन में ही एक आवारा-सी कुतिया को हिला लिया था। सब कोई कहते, वह कुतिया उस गाँव की नहीं है। लेकिन किस गाँव की है, कब किसके साथ यहाँ आयी,-यह कोई नहीं जानता । शुरू-शुरू में इस गाँव के कुत्ते उससे लड़ते, उसे काटते और गाँव से भगाने का प्रयत्न करते रहे; लेकिन वह नहीं गयी। बरस-भर के क्षेत्रपाल का प्यार ही शायद उसके लिए काफी था। ‘‘दुष्टा कहीं की ! भूखी पड़ी है। कहीं मर गयी तो पाप सिर चढ़ेगा। कुछ डाल ही दो !’’ जोइसजी अपनी बहुओं से कहते। और जो डाला जाता, वह उसके लिए बहुत होता। सात बरस का हो गया क्षेत्रपाल तो भी उसके गले से लिपटा रहता। उसके पिल्लों को अपनी गोद में खिलाता। घरवाले रोज उसके सिर पर एक-एक घड़ा पानी डालकर फिर भीतर आने देते और खाना परोसते। वैसे तो जनमते ही जिसने माँ को खा लिया हो, उसे भाई-भाभी शायद ही खाना देते, लेकिन पिता के रहते हुए दो जून अन्न उसे मिल ही जाता था।

पर खाना न भी मिले, माघ की ठिठुराती ठण्ड में चाहे ठण्डा पानी उस पर उँड़ेला जाए, भाई-भाभी भले ही तिरस्कार की दृष्टि से देखें, और एचय्याजी कितना भी मिर्चों का धुआँ दिलाएँ-क्षेत्रपाल चुप-चाप सब सहता रहता। वह स्वयं किसी से बात तक नहीं करता। बिलकुल संन्यासी-सा निरासक्त बना रहता। उसकी आँखों से हरदम एक अजीब-सी विशिष्ट प्रकार की निरासक्ति, उपेक्षापूर्ण, एवं अलौकिक दृष्टि प्रस्फुटित होती। कितने ही लोगों ने जोइसजी को समझाया कि भूत-ग्रस्त व्यक्ति ऐसे ही रहा करते हैं।

गंगापुर के पास एक बड़ा-सा तालाब है। तालाब के उस पार किनारे पर बड़े-बड़े पत्थर हैं। उनकी चिकनी पीठ पर भेड़ें चरानेवाले लड़कों ने पत्थरों से घिसकर ‘फिसलन’ बना दिया है। क्षेत्रपाल अपनी उस कुतिया के साथ वहाँ जाया करता। कभी-कभी तो सुबह से दोपहर तक इस चिकने पत्थर पर चढ़-चढ़कर फिसलता रहता। फिसलते समय कुतिया और उसके पिल्लों को उठाकर पकड़ लेता। न उसे खाने की चिन्ता रहती और न समय की ही। बस, वह अपने में और अपनी कुतिया में ही मगन रहता। फिसलने के कारण उसकी पहनी हुई धोती ही नहीं, भीतर का लँगोट तक फट जाता। यह देखकर भाई-भाभी उसे गालियाँ देते, पिता भी कितने दिन दण्ड देते। घर में दान-रूप में कई अँगोछे आते थे, लेकिन उन्हें उपयोग में लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी, अतः जोइसजी चुप रह जाते थे ।

क्षेत्रपाल का आठवें साल में जनेऊ-संस्कार हुआ। उसे गायत्री-मन्त्र का उपदेश भी कराया। आदेशानुसार वह प्रतिदिन त्रिकाल-सन्ध्या करने लगा। फिर भी जब उससे कोई पूछता तो वह यही कहता, ‘‘मेरा ब्याह हुआ है-मेरी पत्नी का नाम वेंकम्मा है।’’ पिता दुःखी होकर बेटे को समझाते, ‘‘बेटे, ऐसा नहीं कहना चाहिए। सारा गाँव हँसता है। तेरे ऐसा कहने से गाँव में मेरी प्रतिष्ठा धूल में मिली जा रही है।’’
वह पूछता, ‘‘पिताजी, तो मैं झूठ बोलूँ ?’’
‘‘खैर, बता, तेरा ब्याह कब हुआ ? कहाँ हुआ ?’’

‘‘जब मैं अठारह साल का था, मेरे मामा के घर में।’’
‘‘बेटे, अब तू दस साल का है। तेरे अठारह साल की उम्र की बात सुनकर क्या कोई हँसेगा नहीं ? भविष्य में ऐसी बात न करना।’’ फिर जोइसजी चुप हो जाते।
जनेऊ-संस्कार के बाद नियमित रूप से क्षेत्रपाल सन्ध्या किया करता। लेकिन अपनी कुतिया से स्पर्श किये बिना नहीं रहता। जब उसे मालूम हुआ कि इससे पिता को दुःख होता है, तो उनके सामने वह कुतिया को नहीं छूता। अकेला ‘फिसलन’ पत्थर के पास जाता और कुतिया के साथ खूब खेलता। पर भेड़ चरानेवाले लड़कों द्वारा जोइसजी के घर सारी खबर पहुँच ही जाया करती।
जोइसजी के तीनों बड़े बेटे क्षेत्रपाल की इन हरकतों के सम्बन्ध में अलग-अलग कारण बताते। ज्येष्ठ पुत्र तम्माजोइस के मतानुसार यह किसी भूत-पिशाच का प्रकोप था और केरेगल्ली के ओझा को बुलाये बिना उससे मुक्त कराना सम्भव नहीं था ।

केवल गायत्री-मन्त्र से उसकी मुक्ति की आशा नहीं की जा सकती थी। द्वितीय पुत्र रंगाजोइस कहता, ‘‘किसी और घर में जन्म लेनेवाली आत्मा भूल से हमारे यहाँ पैदा हुई है। जब तक इसकी अपने आप मौत नहीं होती, कोई कुछ नहीं कर सकता।’’ तृतीय पुत्र नागाजोइस कहता, ‘‘यह करिगेरे पटेल के घर की तेल-भरी कड़ाही है। लौकी से उत्पन्न बच्चा है। अन्यथा इस अकाल में माँ गर्भवती होकर इसे क्यों जन्म देती और क्यों मर जाती ? इस कर्म के पूर्ण हुए बिना, इससे मुक्ति नहीं मिलेगी। उस कर्म का फल ही बच्चे के रूप में प्रस्तुत हुआ है और उस कर्म को समाप्त करने पर ही, इस बच्चे के मरने पर, उसका अन्त हो सकता है। अपने आप नहीं होगा। लेकिन अपने हाथों उसे मारकर हम क्यों नर-हत्या के भागी बनें ? जब तक जिये, जीने दो। निर्लिप्त रहकर एक कौर अन्न देते रहें। मरने दो।’’ इस विचार से सारा घर सहमत था।

तम्माजोइस की बात के लिए एक आधार था। क्षेत्रपाल के जन्म से एक साल पहले करिगेरे के पटेल तोपे गौड़ गुजर गये थे। उनके श्राद्ध के दिन पास-पड़ोस के गाँव के दस हजार व्यक्तियों को भोज दिया गया था। लगभग सौ ब्राह्मण भी आये थे। तोपे गौड़ के पुत्र केंचे गौड़ ने ब्राह्मणों को दान देने के लिए वस्त्र, चटाई, बिस्तर, बरतन, गाय, नवग्रह धान्य आदि मँगवाये थे। इन वस्तुओं को बाट देने के बाद, केंचे गौड़ भीतर गया। उसने तिल के तेल से भरी लोहे की एक कड़ाही और बड़ा कद्दू लाकर ब्राह्मण-सभा के सामने रख दिया। यह मालूम न था कि करिगेरे के पुरोहित तिरूमल जोइसजी के लिए ही वह ऐसा कर रहा है। इस कड़ाही एवं कद्दू को अलग-अलग या सामूहिक रूप से स्वीकारने के लिए कोई भी ब्राह्मण तैयार नहीं हुआ। ‘‘इसे स्वीकार कर, पचाने की शक्ति मुझमें नहीं है।’’ सभी ने यह कहकर हाथ खींच लिये। केंचे गौड़ के यह कहने पर कि साथ में चाँदी के सौ सिक्के भी दक्षिणा में दूँगा, कोई आगे नहीं आया। केंचे गौड़ ने जब कहा, ‘‘इसे पचाने की शक्ति क्या आप किसी में नहीं है ?’’ क्या यही है आप लोगों की क्षमता ?’’ तो सभी ब्राह्मणों ने सिर झुका लिया। पुरोहित तिरूमल जोइसजी बोले, ‘‘केंचे गौड़, ऐसा न कहें। यह दान देने का हठ क्यों ? उसे अन्दर रख दो।’’ लेकिन वह उसे लेकर खड़ा ही रहा। ब्राह्मणत्व को ललकारा गया था, अतः तिरूमल जोइसजी ने अपने हाथ आगे बढ़ाकर कहा, ‘‘यहाँ लाओ। माँ गायत्री की कृपा रही तो पचा लूँगा।’’ पास ही बैठे तम्माजोइस ने विरोध किया। लेकिन उन्होंने स्वीकार कर ही लिया।

उस दिन से वे प्रतिदिन एक हजार आठ गायत्री-मन्त्र जपने लगे। नवग्रहादि दान करने लगे। कौन जाने दुर्भाग्य किस रूप में आता है ! दो महीने पश्चात तिरूमल जोइसजी की पत्नी लक्ष्मीदेवम्मा गर्भवती हुई। जोइसजी पचपन के थे तब। उनके दो बड़े बेटों की शादी हो चुकी थी और उनके बच्चे भी थे। छोटे बेटे नागाजोइस का भी ब्याह हो गया था; लेकिन उसकी पत्नी अभी सयानी नहीं हुई थी। अठारह वर्ष पश्चात् इस उम्र में गर्भ-धारण से लक्ष्मीदेवम्मा के मन में संकोच पैदा होना स्वाभाविक ही था। जोइसजी भी सन्तुष्ट नहीं थे। गर्भवती लक्ष्मीदेवम्मा स्वस्थ थी। प्रसव हुआ, लेकिन माँ अचानक ही विकृत हो चीख उठी और फिर बेहोश हो गयी। फिर होश नहीं आया तो नहीं आया। जोइसजी की बड़ी बहू ने उसे थोड़ा गाय का दूध पिलाया पर लक्ष्मीदेवम्मा चल बसी। बच्चा जीवित रहा और फिर बढ़ने लगा।

तिरूमल जोइसजी गंगापुर के आस-पास के साठ गाँवों के पुरोहित थे। उम्र के कारण अब हाथ-पैर थक चुके थे। तो भी, बीस-बीस गाँव के हिसाब से अपने तीनों बेटों में बाँट दिया और स्थानीय पुरोहितगिरी अपने अधीन रखी। अब चौथा बेटा जन्मा है। उसे भी समान हिस्सा दिया जाए तो हर एक को अब पन्द्रह-पन्द्रह गाँव ही मिलेंगे। भाइयों के मन में क्षेत्रपाल के प्रति प्यार नहीं था। जन्म के साथ माँ को ग्रस चुका था लेकिन पिता होने के नाते जोइसजी इतने निर्मम नहीं बन सके। बाप और बेटे, एक साथ रहते थे, लेकिन प्रतिदिन खर्च करने के पश्चात् जो बचता, उसे हर बहू अलग-अलग अपनी-अपनी गाँठ में बाँध लिया करती।

‘‘क्षेत्रपाल केंचे गौड़ से तेल-भरी कड़ाही और कद्दू का दान स्वीकारने के कारण ही जन्मा है ? इसीलिए पत्नी का देहान्त भी हुआ ?’’ जोइसजी के मन में ऐसा विश्वास पूर्णरूप से घर कर गया हो, ऐसी बात नहीं थी। फिर भी इस शंका का पूर्णतः निराकरण करने में वे असमर्थ थे। स्वर्गीय पटेल तोपे गौड़ का निम्न जाति की यंगटी नामक एक वेश्या से सम्पर्क था। उनके मरते समय वह अठारह-बीस साल की थी। उसका एक बच्चा भी था। यह सबको मालूम था। तो क्या गौड़ का प्रेत क्षेत्रपाल में समा गया है ? क्षेत्रपाल भी अपनी पत्नी का नाम वेंकम्मा बताता है और कहता है कि मेरे एक बच्चा भी है। लेकिन कौन जाने वह यंगटी अब है कहाँ ? अब किसकी रखैल बन गयी है ? जोइसजी एक दिन करिगेरे जाकर केंचे गौड़ से पूछताछ करने पर भी कुछ पता न लगा पाये।
एक दिन जोइसजी ने क्षेत्रपाल से पूछा, ‘‘बेटे, तेरी पत्नी वेंकम्मा किस जाति की है ?’’

‘‘ब्राह्मण, और किस जाति की है !’’
‘‘अच्छा, उसका रूप कैसा है, बता सकता है तू ?’’
‘‘उसका रूप !’’ कुछ सोचकर उसने बताया, ‘‘पतली, लम्बी। बड़ी भाभी की दूसरी बहन है न-बिल्कुल वैसी। कानों में सफेद हीरे की बालियाँ पहनती है। हाथ में विष्णुचक्र-सा गुदवाया हुआ है। गोरी है।’’
उस रूप में और यंगटी के रूप में कोई साम्य नहीं था। जोइसजी ने यंगटी को अच्छी तरह से देखा था ! वह मोटी थी और काली। उसे ठिगनी कहना ही ठीक होगा। मेले में बेची जानेवाली काँच की मणियों को अपने बाहुओं में पहना करती थी। हाथ, पैर, छाती पर गुदने गुदवाये थे। जोइसजी निरुपाय-से चुप हो गये।

क्षेत्रपाल सोलह साल का हो गया। लेकिन उसके व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ। अब भी कोई पूछे तो वही उत्तर ! ऐसा कहते समय उसके चेहरे पर या आवाज में किसी तरह का विकार नहीं होता था। दस-बीस वर्ष का विवाहित जीवन बिताया हुआ एक व्यक्ति जिस सहजता से अपनी पत्नी-बच्चों की बात करता है, उतनी सहजता से ही क्षेत्रपाल भी बोलता था। जोइसजी अब अधिक दिनो तक सोचते नहीं रह सकते थे। उन्हें सत्तरवाँ साल लग चुका था–बुढ़ापा था। शारीरिक शक्ति घट गयी थी। उनके सिखाये पौरोहित्य सम्बन्धी मन्त्रों को क्षेत्रपाल सीख चुका था। लेकिन इस कार्य के लिए किसी गाँव में वह नहीं गया था। सन्ध्या-वन्दना अवश्य करता था। और अपनी कुतिया के साथ तालाब के पास ‘फिसलन’ पत्थर पर छोटे बच्चों-सा फिसला करता था। दो साल में उसका विवाह हो जाना चाहिए था, क्योंकि जोइसजी ने अपने तीनों बेटों का विवाह चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र में ही कर दिया था। लेकिन क्षेत्रपाल को अपनी लड़की देने के लिए उस गाँव की तो बात दूर, पास-पड़ोस के गाँवों का भी कोई व्यक्ति तैयार न था इसके बारे में सभी जानते थे। भूत-प्रेत से मुक्त हुए बिना उसका विवाह हो ही नहीं सकता था। जोइसजी सोचते, अब उसके भविष्य का क्या होगा !

एक दिन घर पर किसी कन्या के पिता आये। कहने लगे, ‘‘मैं आठ कोस दूर सोसलेगेरे से आया हूँ।’’ कौन जाने, वह गांव कहाँ है। लेकिन आनेवाले व्यक्ति दीखने में कर्मठ ब्राह्मण लगते थे। मेलुकोटे धोती (अँगोछा) पहने थे और साल ओढ़ रखी थी। कुण्डली उत्तम थी। लड़की आठ साल की थी। कुण्डली के आधार पर ही जोइसजी ने कन्या के रूप-लक्षणों का वर्णन किया। इतने में क्षेत्रपाल आ गया। भीतर पहुँचते ही बड़े भाई की लड़की ने कहा, ‘‘काका, आपको लड़की देने के लिए आये हैं। दादा ने आपका विवाह करने का निश्चय कर लिया है। क्या आप अपनी पहली पत्नी को छोड़ देंगे ?’’ वहाँ उपस्थित सब बच्चे जोर से हँस पड़े। क्षेत्रपाल बाहर आँगन में आकर अपने पिता से पूछने लगा, ‘‘पिताजी, ये क्यों आये हैं ?’’
‘‘तुझे कन्या देने, बेटे ! मैंने कुण्डली देखी है, बहुत सुन्दर है।’’

‘‘क्या आप मेरी पहली सादी की बात नहीं जानते ?’’
आगन्तुक सकपका गये। जोइसजी ने क्रोधपूर्वक कहा, ‘‘बकवास मत करो। चुपचाप अन्दर चले जाओ।’’
‘‘आप कुछ भी कहें, एक पत्नी के रहते मैं दूसरा विवाह कैसे कर लूँ ?’’ कहकर क्षेत्रपाल भीतर चला गया।
जोइसजी सिर झुकाकर बैठे गये। कन्या के पिता उठकर बाहर चले गये। गाँव में जाकर शायद चार-छह घरों में पूछताछ की होगी ! पाँच-छह घण्टे के बाद लौटकर जोइसजी से बोले,‘‘महोदय, हम दूर प्रदेश के हैं। इस विषय से अनभिज्ञ थे। आप जैसे प्रतिष्ठित एवं अनुभवी व्यक्ति इस प्रकार झूठ बोलें-यह क्या अच्छा है ? इस प्रेत-ग्रस्त लड़के से अपनी बेटी का सम्बन्ध कैसे जोड़ूँ ?’’ इतना कहकर वे चले गये।

जोइसजी आग-बबूला हो उठे। भीतर जाकर चाबुक से क्षेत्रपाल को पीटने लगे। इतने में तम्माजोइस दान की गाँठ ढोये घर आया। बात समझी तो बोला, ‘‘पिताजी, उसे मारने से क्या होगा ! उसे व्यर्थ ही कष्ट क्यों देते हैं। केरेगल्ली भास्कराचारी के हाथों ही मार पड़नी चाहिए। पर मेरी बात आप कहाँ मानते हैं।’’
जोइसजी का क्रोध उतर गया। मन शान्त हुआ। ‘चोट लगी होगी’ कहकर बेटे की पीठ से उन्होंने कपड़ा हटाया तो पीठ पर काले निशान उभर आये थे। लेकिन क्षेत्रपाल रोया तक नहीं था। वह ऐसे देख रहा था मानो उसे मार लगी ही न हो और जैसे पिता एवं घरवालों के व्यवहार विचित्र हों।

केरेगल्ली भास्कराचारी ने केरल में जादू-टोना सीखा था। घर में चण्डी की उपासना करता था, इसीलिए वह जादू-टोने में सफल रहा था। किसी तरह की चोरी हो, तो उससे मन्त्र फुँकवाकर चण्डी के आँचल में एक तोला सोना चढ़ा दो और बस, तीन दिन में चोर अपने-आप सामान लौटा देगा, नहीं तो घातक रोग से मर जाएगा।

केरेगल्ली तिरूमल जोइसजी के पौरोहित्य के गाँवों में-से एक है। गंगापुर और केरेगल्ली में केवल तीन-साढ़े तीन कोस की दूरी है। तम्माजोइस जब दक्षिणा के लिए उस ओर गया था तब उससे बात की थी और आने के लिए उसे राजी कर लिया था। भास्कराचारी ने अगली अमावस्या के दिन आने का वादा किया और उन सब चीजों की सूची दी थी जिनकी आवश्यकता पड़ती।

बेटे ने आकर सामान की सूची दिखायी तो जोइसजी को उसमें से एक चीज पसन्द नहीं आयी। भभूती की पुड़िया, नींबू, कच्चा धागा, नया चूरा, हल्दी कुंकुम, नीम के पत्ते, नयी धोती, साड़ी, पुरानी चप्पल आदि वस्तुओं की जानकारी उन्हें थी, लेकिन अन्त में ‘दो मुर्गे’ लिखा देखकर वे बेचैन हो गये। बेटे ने जब कहा कि पिताजी, यह तो श्मशान में होनेवाला कार्य है, घर में थोड़े ही होगा, चण्डी को यह चढ़ाये बिना कार्य-सिद्ध नहीं होगी, तो जोइसजी चुप रह गये। तम्माजोइस की पद्धति के अनुसार बाजार से सारा सामान लाकर एक कोली ने अपने घर में रखा और अमावस्या की रात में सीधे श्मशान पहुँचा दिया।

उस रात को ग्यारह बजे तक क्षेत्रपाल को इसकी सूचना नहीं दी। तम्माजोइस, कोली के साथ पहले ही श्मशान पहुँच चुका था। क्षेत्रपाल को ग्यारह बजे जगाया गया और तालाब तक साथ चलने को कहकर, जोइसजी उसे अपने साथ ले गये। क्षेत्रपाल बिना अधर खोले, आँखें मलता हुआ साथ चल दिया। उस दिन सुबह से उसे खाना नहीं दिया गया था। उसने पूछा भी नहीं था। जोइसजी जनेऊ की ब्रह्मगाँठ को हाथ में लेकर गायत्री-मन्त्र जपते हुए अमावस्या के अन्धकार में सँभल-सँभलकर पग बढ़ा रहे थे। क्षेत्रपाल चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल रहा था। श्मशान और गाँव के बीच में कोई पौन मील का फासला होगा। गाँव के ब्राह्मण एवं वैश्यों के शव वहीं जलाए जाते थे। दूसरे लोग अपने-अपने खेतों में शव दफनाकर उस पर एक छोटा पौधा रोप देते थे। श्मशान में कपास के बड़े-बड़े पौधे थे और तीन-चार इमली के पेड़ भी।

 उसके बगल में एक जीर्ण मण्डप और थोड़ी ही दूर एक कुआँ था। शव जलाने के बाद लोग यहाँ स्नान किया करते, अन्यथा इसके पानी को कोई छूता तक नहीं था। जोइसजी और क्षेत्रपाल वहाँ पहुँचे। सारी तैयारी हो चुकी थी। भास्कराचारी चण्डी का आवाहन करने के लिए आँखें मूँदे बैठा था। मिट्टी की दो गज ऊँची चण्डी की मूर्ति बनाकर उसे एक ऊँचे स्थान पर स्थापित किया गया था। वीरासन में अपनी चारों बाँहें फैलाये हुए चण्डी का मुख इस प्रकार खुला हुआ था कि उसके बड़े-बड़े दाँत दिखाई दे रहे थे। जीभ बाहर निकली हुई थी। कुंकुम से सारा शरीर रक्त-रंजित-सा लग रहा था। चारों ओर आठ खूँटी गाड़कर और कच्चे धागे से बाँधकर दिशा-बन्धन किया गया था। हर खूँटी के पास तीन-तीन नीम काटकर रखे गये थे। चण्डी के दोनों ओर दो मसाल जल रहे थे। तेल समाप्त होने पर कोली मशाल में तेल डाल रहा था। एक बड़े कद्दू के दो भागों में काटकर चण्डी के दोनों ओर रख दिया गया था। पैर बँधे हुए दो मुर्गे, पास ही बन्द टोकरी में जमीन से चोंच लगाये पड़े थे।

तम्माजोइस ने जोइसजी और क्षेत्रपाल को चुप खड़े हो जाने का संकेत किया। ठीक मध्य रात्रि तक भास्कराचारी आँखें मूदें ध्यानमग्न रहा। तत्पश्चात् एकाएक आँखें खोलीं और एक लम्बा छुरा निकालकर जमीन में निशान बना, पुल्ली की ओर मुड़कर कहा, ‘‘मुर्गा ?’’ पुल्ली ने टोकरी से मुर्गा निकालकर ओझा को सौंप दिये। कोली ने जमीन में गड़े छुरे को खींचा और एक ही झटके में मुर्गों की गरदनें काटकर चण्डी के चरणों में भेंट चढ़ा दीं। मरते समय मुर्गे चीख पड़े थे। यह दृश्य जोइसजी देख न सके। उन्होंने दूसरी ओर मुँह फेर लिया। भास्कराचारी ने तम्माजोइस से पूछा, ‘‘वह आया है ?’’

‘हूँ’ कहकर तम्माजोइस ने क्षेत्रपाल की बाँह पकड़ी और उसके सामने खड़ा कर दिया।
भास्कराचारी लगभग साठ का था। शरीर लम्बा और ललाट विशाल। पूरे चेहरे पर लटकती उसकी लम्बी सफेद दाढ़ी किसी के भी मन में भय पैदा करने में समर्थ थी। उसकी आवाज तो मानों युद्ध-भूमि के नगाड़े की भाँति भयोत्पादक थी। काँच की भाँति चमकती आँखों से क्षेत्रपाल को घूरकर वह गरजा, ‘‘अरे, तू कौन है ? यहाँ क्यों आया है ? तुझे क्या चाहिए ? मुँह खोल !’’

क्षेत्रपाल रंचमात्र भी बिना विचलित हुए, कुछ भ्रमित-सा चुपचाप खड़ा रहा। ओझा पुनः गरजा, ‘‘यहाँ क्यों आया है ?’’
सुनकर क्षेत्रपाल ने पिता की ओर मुड़कर प्रश्न किया, ‘‘पिताजी, आप मुझे यहाँ क्यों लाये हैं ?’’
दाँत पीसकर भास्कराचारी ने कहा, ‘‘अबे, यह सब मुझसे नहीं चलेगा ! बोल, क्यों आया है ?’’ कहकर अपने एक थैले में हाथ डालकर उसने एक लम्बा चाबुक निकाला। उस चाबुक के एक तरफ चमड़ा, वेणी की तरह गुँथा था। भास्कराचारी उठा और उसने क्षेत्रपाल के कपड़े उतार देने का संकेत किया। तम्माजोइस ने क्षेत्रपाल की पहनी एवं ओढ़ी हुई धोतियाँ उतार दीं। केवल कन्धे पर लटका जनेऊ, कटि की मेखला और कौपीन ही शरीर पर रह गये। ओझा ने चाबुक हवा में घुमाकर क्षेत्रपाल पर प्रहार किया। साँय-साँय करते हुए चाबुक बरसे और पीठ पर घाव की लकीरें बनती गयीं। क्षेत्रपाल पीड़ा से शरीर को इधर-उधर हिला रहा था, लेकिन मुँह से उसने एक शब्द भी नहीं निकाला।
‘‘अब भी सच-सच बताएगा या नहीं ?’’ कहकर भास्कराचारी पुनः गरजा। उसे पुनः चाबुक उठाते देख क्षेत्रपाल ने अपने पिता की ओर अभिमुख हो शान्त स्वर में पूछा, ‘‘आप मुझे यहाँ क्यों ले आये पिता जी ?’’

‘‘अरे, यह सब मेरे सामने नहीं चलेगा। तू कौन है ? कौन है तेरी पत्नी ? बोल !’’ भास्कराचारी ने हुंकारा ही था कि क्षेत्रपाल का दबा क्रोध उबल पड़ा। अधरों को काटते हुए उसने पूछा, ‘‘तू पूछनेवाला कौन होता है ?’’
‘‘चाबुक से काम नहीं चलेगा-अच्छा !’’ कहकर उसने थैले से एक लोहे की छड़ी निकाली और आग में गरम करने लगा।
छड़ी लाल होने के बाद, क्षेत्रपाल के पास आकर उसने पूछा, ‘‘अब बोलेगा या नहीं ?’’
क्षेत्रपाल डर गया। वह अँधेरे में ही भागने लगा। भास्कराचारी चिल्लाया, ‘‘हाँ, वह अब डरा है ! जय चण्डी ! उसे पकड़ो !’’
तम्माजोइस ने दौड़कर उसे पकड़ लिया। घसीटते हुए चण्ड़ी के पास लाकर पुल्ली की सहायता से क्षेत्रपाल के हाथ-पैर बाँध दिये। भास्कराचारी ने उसके दाहिने घुटने पर तपती छड़ी रख दी। चमड़ी जलने लगी और धुआँ उठने लगा। ‘हाय माँ !’-क्षेत्रपाल पीड़ा से चीखता चिल्लाता रहा। मरती मेंढकी की तरह विकल क्षेत्रपाल बँधे हाथ-पैरों में ही जमीन पर छटपटाने लगा। अब जोइसजी के लिए यह दृश्य असह्य हो उठा।

‘‘भास्कराचारी, अब बस करो ! लड़के को मरवा डालने का पाप मेरे सिर न लगाओ ! बन्द करो ! मैं नहीं सह सकता। कुछ भी हो, आखिर मैं उसका बाप हूँ।’’ फिर आगे बढ़कर उन्होंने क्षेत्रपाल के पैर की रस्सी को हाथ लगाया।
‘‘यह सब नाटक है, महाशय, आप दूर रहिए। अब जो चीख आप सुन रहे हैं, वह आपके बेटे की नहीं, पिशाच की है। ऐसे-ऐसे हजारों को मैं देख चुका हूँ। अब रास्ते पर आ रहा है। अगर आप रुकावट डालेंगे तो पिशाच इसे मरते दम तक नहीं छोड़ेगा ।’’ भास्कराचारी की बात सुनकर, ‘‘मैं यह देख नहीं सकता’’ कहते हुए जोसइजी अपने आँसू पोंछने लगे। तम्माजोइस आगे बढ़ा और बोला, ‘‘पिताजी, आप घर जाइए। उसे कुछ नहीं होगा। जो कुछ होगा, पिशाच को होगा।’’ कहकर उसने उनका हाथ पकड़ा, फिर कुछ दूर तक साथ जाकर उन्हें घर भेज दिया। छटपटाते हुए, वेदना सहते हुए, जनेऊ की ब्रह्मगाँठ हाथ में ले गायत्री-मन्त्र रटते हुए, जोइसजी घर की ओर चल दिये।

वे मन ही मन सोच रहे थे कि क्या क्षेत्रपाल सचमुच पिशाच-ग्रस्त है ? पिशाच होता तो इतना कुछ करने पर छोड़ नहीं जाता ? और अगर वह नहीं भी छोड़ता तो हानि क्या है ? क्षेत्रपाल किसी को मारता पीटता तो नहीं। अपने में मग्न ही रहता है-‘मेरा ब्याह हुआ है, एक बच्चा है’- अगर ऐसा ही कहता है तो कहने दो। हम उसका विवाह ही नहीं करेंगे। जब तक मैं जिन्दा हूँ, दो जून खाना उसे मिलेगा ही। मेरे मरने के बाद भाई-भाभी खाना न दें, तो भीख माँगकर खा लेगा। ब्राह्मण होने के नाते भिक्षा माँगने का अधिकार उसे है ही। मुझे तो लगता है और कुछ नहीं, बस उसकी बुद्धि ठीक नहीं है। मठ में पढ़ने, घर में तन्त्र-मन्त्र सीखने में बड़ा ही कुशल है। केवल इसी एक विषय में ऐसा हुआ है। उसे इस तरह जीते रहने दिया जाए।

यही सब सोचते-सोचते वे घर पहुँचे। सारी रात उन्हें नींद नहीं आयी। प्रतीक्षा में बैठे दोनों बड़े बेटों और बहुओं को सारी बातें बताकर जोइसजी ओटे पर बैठे रहे। सुबह शुक्र-नक्षत्र दिखाई दिया तो उन्होंने देखा कि श्मशान की ओर से दो आदमी कुछ ढोकर ला रहे हैं। तम्माजोइस और पुल्ली क्षेत्रपाल को ढोकर ला रहे थे। घर लाकर उसे चारपाई पर लिटाया। रो-रोकर उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। अब वह रो नहीं रहा था। उसकी आँखों में पूर्ववत् उपेक्षा थी। दोनों घुटने गरम छड़ी के स्पर्श से जले हुए थे। घाव में लगाने के लिए भास्कराचारी ने मक्खन और भस्म दी थी। यह सामग्री तम्माजोइस अपने साथ ले आये थे। भास्कराचारी श्मशान से ही अपने घर लौट गया था। पिशाच छुड़ाने के बाद सीधे घर जाना उसका नियम-सा था।
क्षेत्रपाल के घाव ठीक होने में छह महीने लग गये। लेकिन दोनों घुटनों पर उसका काला निशान अमिट रहा । एक दिन जोइसजी ने पूछा, ‘‘बेटे, सचमुच तेरा ब्याह हो गया है ?’’
उसने शान्त एवं उपेक्षा से कहा, ‘‘पिताजी, बार-बार मुझसे आप वही बात क्यों पूछते हैं ? चाबुक की मार से या लोहे की गरम छड़ी के डर से क्या मैं झूठ बोलूँ ? अगर आप कहते हैं कि मैं झूठ बोलूँ, तो वैसा ही करूँगा।’’
जोइसजी चुप हो गये।

एक दिन क्षेत्रपाल की वह बूढ़ी कुतिया मर गयी। लेकिन उसके तीन साल के पिल्ले से उसका लगाव बढ़ गया था। अब उसका सारा प्यार उसी पिल्ले में सीमित हो गया। वह अपना आधा खाना उस पिल्ले को देता।
किसी के घर कुछ कार्य करने के लिए भास्कराचारी गंगापुर आया हुआ था। जोइसजी उससे मिलने गये। बोले, ‘‘भास्कराचारी, हमारे लड़के को तुम्हारे जादू-मन्तर से भी तिल-भर लाभ नहीं हुआ ।’’

भास्कराचारी बोला, ‘‘जोइसजी मैं आप से झूठ नहीं कहूँगा। यहाँ उपस्थित लोग भी सुन लें। अब तक किसी का भूत-पिशाच छुड़ाने में मैं असफल नहीं हुआ। है न ?’’- समर्थन के लिए वह लोगों की ओर देखने लगा। लोगों के ‘हाँ’ कहने पर वह जोइसजी से पुनः बोला, ‘‘मैं अपनी विद्या को समझता हूँ। किसी भी तरह का पिशाच हो-किसानों का, अछूतों का, मुसलमानों का, गर्भवती का, आत्महत्या किये हुए या और किसी तरह का-मेरी चण्डी से डरकर जैसे मैं कहूँ, वह सुनता है। लेकिन जटा-मुनि और ब्रह्मपिशाच इन दोनों को वश में करने की शक्ति मेरी चण्डी में नहीं है। मैं सच कह रहा हूँ। आपके बेटे के मुँह से बुरी बात नहीं निकलेगी। वह किसी को गाली नहीं देगा। आपने ही कहा है कि वह रोज सन्ध्या-वन्दना करता है अतः वह ब्रह्मपिशाच ही होगा। आपको अब तो होम-हवन कराकर ब्रह्मकार्य से ही उसे भगाना चाहिए। आप चाहें तो आप से जो मैंने पैसे लिये हैं, वह वापस दे दूँ ।’’
‘‘पैसे के लिए मैंने नहीं कहा, भास्कराचारी।’’ जोइसजी घर लौट आये।


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