शायरी के नये दौर - भाग 3 - अयोध्याप्रसाद गोयलीय Shayari Ke Naye Daur - 3 - Hindi book by - Ayodhyaprasad Goyaliya
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शायरी के नये दौर - भाग 3

अयोध्याप्रसाद गोयलीय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :226
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1289
आईएसबीएन :81-263-0015-9

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प्रस्तुत है शायरी के नये दौर भाग-3.....

Shairi ke naye daur (3)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


उल्फ़त है मेरी नस्ल, मुहब्बत मेरा मज़हब
अफ़ग़ान हूँ, हिन्दी हूँ, न तुर्की हूँ न शामी

इक आग़ोशे-तमन्ना वा, ज़मीं से आस्माँ तक है
मुहब्बत ही मुहब्बत है मेरा क़ब्ज़ा जहाँ तक है
 
यह भी ज़िन्दाँ, वह भी ज़िन्दाँ
क्या यह मस्जिद, क्या यह शिवाले

बग़ावत जवानों का मज़हब है ‘साग़र’ !
ग़ुलामी है पीरी, बग़ावत जवानी

तुलूए-आज़ादी1


15 अगस्त 1947 ई० में भारत परतन्त्रताके बन्धन काटकर स्वत्रन्त्र हुआ तो ‘साग़र’ के रोम-रोमसे उत्साह-उमंग छलक पड़े। उसी भावावेशमें आपने यह नज़्म कही है। जिसके एक-एक शब्द से आपकी अन्तरात्मा भाव प्रसफुटित हो रहे है-

आजकी सुबह है शबहाए-तमन्नाकी सहर2
यह नये साग़रो-मै, जामो-सुबू लाई है
आजकी सुबह ! मेरे कैफ़का3 अन्दाज़ न कर
दिले वीराँ में4 अजब अंजुमन आराई5 है

आजकी सुबह है शबहाए-तमन्नाकी सहर
आजकी सुबह मेरे कैफ़का अन्दाज़ न कर

रूहे-मुतरिबमें6 नये रागने अँगड़ाई ली
साज़7  महरूम8 था, जिस धुनसे वह धुन जाग उठी
पर्दए-साज़से तूफ़ान-सदा फूट पड़ा
रक़्सकी9 तालमें इक आलमे-नौ10 झूम उठा

हँस पडे नग़्मए-शादाबसे टूटे हुए साज़  
हो गई आबरूए-साज़ शिकस्ते आवाज़

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1. स्वतन्त्रताका सूर्योदय 2. आशा-रजनीका प्रभात, 3. उमंगका, मस्तीका, 4. उजाड़ हृदयमें 5. हमोत्सव, जलसा,  6. संगीतज्ञकी आत्मामें, 7. वाद्य, 8, रिक्त 9. नृत्यकी, 10 नवीन संसार।

जाग उठे ज़हने-मुसव्विरमें1 नये ख़त नये रंग
नये ख़ाके, नये इज़हार, निराले अरज़ंग2
फिके-मेमारमें3 सोये हुए ख़ाके उभरे
दिले-शाइरमें नई हिस4 नये जज़्बे5 उभरे

रूहे-तख़रीबमें6 महराबों-दरो-बाम7 ढले
पर्दए-ख़ाकमें मीना-ओ-मै-ओ-जाम ढले

बर्क़के हाथमें नक़्शा है चमनबन्दीका8
कफ़े-तूफ़ानमें साहिलरसोका मुज़दा9
यह ज़मी खित्तए-फ़रदौसकों10 शर्माने लगी
गुले-अ़फ़सुकर्दासे11 नौख़ेज़ महक12 आने लगी
ख़ुश्क सहराओंसे पैग़ामे-बहार13 आने लगे
खेत मुसकाने लगे, झूम उठे, गाने लगे
रूए-इफ़लासपै14 हँसती हुई सुर्खी दौड़ी
रूख़पै आसूदागियोके15 नई मस्ती दौड़ी
आज सदियों के अँधेरे को मिला ख़िलबते-नूर16
आज किरनोंकी तमन्नाका17  है नौरोज़ ज़हूर17


1. चित्रकारके मस्तिष्में, 2 चित्रकार सम्बन्धी ग्रन्थ, 3, मूर्तिकार के चिन्तनमें, 4. चेतना, 5. भाव, 6. वीरानेमें, 7. महल बने. 8 बिजली जो उद्यानको उजाड़ने में तत्पर रहती थी, आज उसके निर्माण उद्यत है, 9. नदीकी बाढ़ किनारेपर पहुँचानेका विचार रखती है, 10. जन्नत को, 11. मुर्झाये फूलोंसे, 12 ताज़ा सुगन्ध, 13. बहार आनेके संकेत 14. दरिद्रताके मुखपर, 15. खुशहालीके गालोंपर, 16. प्रकाशका परिधान, 17. पुरानी इच्छाओंका, 18 नवीन उदय।


नई किरनें, नई ख़ुशबू, नई ज़ौ लाई1 है
नई धरती, नये आकाश, नये शम्सो-क़मर2
आजकी सुबह है, शबहाए-तमन्नाकी सहर
आजकी सुबह ! मेरे कैफ़का अन्दाज़ न कर

नग्माए-सुबहसे3  सहराओ-जबल4 गूँज उठे
झोंपड़े गूँज उठे, रंगमहल गूँज उठे
बादाकश4 अब तेरे मजबूर कहाँ है साक़ी !
है यह आलम कि जमाँ और मकाँ6 है साक़ी !
ख़ारो-गुल7  शम्सो-क़मर दश्तो-दअ़न हैं साक़ी !
बाग़ों-सहराओं-सबा, सखो-समन हैं साक़ी !
ज़िन्दगी रक़्समें8  है दोशपै मैख़ाना9 लिये
तिश्नगी10 ख़ुद है उछलता हुआ पैमाना लिये
आजकी सुबह है रंगीन मनाजातकी11 रात
आजकी सुबह है मैराजे-ख़राबाकती12 रात

मौजे-बादा13  मेरी टूटी हुई अँगड़ाई है
हर नफ़स14  जाम15 है, हर गाम16 है दौरे-साग़र
एक नया मैकदाए फ़िक्रो-नज़र लाई है
आजकी सुबह मेरे ज़र्फ़का17 अन्दाजा न कर
आजकी सुबह है शबहाए-तमन्ना की बहार

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1. प्रकाश, 2. सूर्य-चन्द्र, 3. प्रातःकालीन संगीत से, 4. जंगल और पर्वत, 5 मद्यप, 6. युग और देशमें नवीन वातावरण, 7. काँटे-फूल, 8. नृत्यमें, 9. कन्धेपर मधुशाला लिये हुए, 10. प्यास 11. प्रार्थना करने की दुआएँ मांगनेकी, शुभकामनाओंकी, 12. उन्नतिकी चरमसीमा, 13 शराबकी लहर, 14. साँस, 15 मद्यपात्र, 16 क़दम, चाल, 17 पात्रताका।

इक जमाने-मै-ओ-मीना-ओ-सुबू1,  है इसमें
जादए-हक़के2 शहदोंका लहू है इसमें
सरफ़रोशीए-मुसलसलके यह जश्नोंकी अमीं3
लाख नौरोज़े-शहादतकी यह तक़बीर हसीं4  
कितने पुरशोर सलासिलकी मुसलसल झंकार ?
कितने हलक़ोंकी सदा6 , कितनी सदाओंका निसार7  ?
कितने रख़शन्दा-ओ-मख़मूर सुहागोंकी8  बहार ?
कितने नग़्मोंका9 लहू कितने सितारोंकी पुकार ?
कितने फूलोंकी महक, कितने रबाबोंकी10 सदा ?
कितने अंजुमनकी11 चमक, कितने चिराग़ोंकी ज़िया12 ?
कितनी रातोंके अँधेरोंने सँवारा है इसे ?
कितने ख़्वाबों तलातुमने13 उभारा है इसे ?

कितने ज़ुल्मतसे14 निकलकर यह किरन आई है ?
कैसे गरदाबसे15 टकराई है यह कश्तीए-ज़र16
चोट हर यादे-गुज़िस्ताकी17 उभर आई है
आजकी सुबह है शबहाए-तमन्नाकी सहर
आज हंगामए-एहसासका18 अन्दाज़ा न कर

  -स्वयं ‘साग़र’ द्वारा प्रेषित


1. मदिरा और मदिरापात्रों का एकीकरण, 2. सत्य-मार्गपर बलिदान होनेवालोंका, 3. सर कटवाते रहने के लगातार प्रयत्नोंकी धरोंहर 4. लाखों बलिदानोंकी सुन्दर कृति, 5. क़ैदियोंके हाथ-पाँवकी बेड़ियों की क्रमबद्ध झंकार, 6. आवाज़, 7. बलिदान, 8 हँसते हुए नशील सुहागोंकी, 9. गीतोंका , 10 वाद्ययंत्रोंकी (एक विशेष वाद्य का नाम) 11. नक्षत्रों की, 12. चमक रोशनी, 13. उलट-फेरने, जोशने, उत्साहोंने, 14. अँधेरेसे, 15. भँवरसे, 16. सोनेकी नाव, 17. भूत कालीनकी, 18. भावनाओंकी तीव्रताका।



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