अनुवादः अवधारणा और विमर्श - श्रीनारायण समीर Anuvad : Avadharna evam vimarsh - Hindi book by - Shrinarayan sameer
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अनुवादः अवधारणा और विमर्श

श्रीनारायण समीर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13043
आईएसबीएन :9788180316944

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अनुवाद को रचना का अनश्वर उद्यम घोषित करना निस्सन्देह इस किताब का मौलिक और सर्वथा नया विमर्श माना जाएगा।

अनुवाद: अवधारणा एवं विमर्श
नवोन्मेष तथा सृजनशीलता को अनुवाद का स्वभाव घोषित करने वाली यह किताब अनुवाद को दो भिन्न समुदायों, राष्ट्रीयताओं और देशों को समझने एवं उनके मत-मतान्तरों को जानने का जरूरी औजार मानती है। फलस्वरूप यह अनुवाद को भाषा-संवाद मानने की प्रचलित मान्यता से आगे बढ़कर उसे सभ्यता-संवाद मानने का तर्क रचती है।
इसमें अनुवाद को आधारभूत पहलुओं से समझने और विवेचित करने का प्रयास है। इस प्रयास में अनुवाद की अवधारणा को विखंडनवादी विमर्श के धरातल पर भी रखकर जाँचा-परखा गया है। विवेचन में इस बात की खास सावधानी बरती गई है कि अत्याधुनिकता की चकाचौंध में अनुवाद का कला-कौशल धूमिल न हो जाए, बल्कि उसमें सृजन की लौ सर्वत्र जलती रहे।
अक्सर अनुवाद को भाषा-कर्म कहा जाता है। मगर यह भाषा-कर्म कोई सामान्य कर्म नहीं है। मनुष्य-समाज की संवेदना, परम्परा, संघर्ष और सम्पूर्ण जीवन-राग भाषा के नियामक तत्त्व होते हैं। स्वाभाविक है कि अनुवाद के चिन्तन और सरोकार भाषा के नियामक तत्त्वों से जुड़कर गहन और व्यापक हो जाते हैं। शायद इसीलिए अनुवाद में मूलवत् होने की आकांक्षा और वास्तविकता के बीच टकराव मिलता है। किन्तु इस तरह के टकराव को यह किताब भाषा, संस्कृति और सभ्यता के विभाजक छोरों के हवाले नहीं करती, किसी किस्म की जिरह से उसका महिमा-मंडन भी नहीं करती; बल्कि अनुवादकर्ता के कौशल और काबिलियत का विमर्श रचती है। अकारण नहीं, यह किताब अनुवाद को सृजन मानती है - किसी भाषा-सृजन का दूसरी भाषा में सृजन - अनुरचना की शक्ल में मूल रचना की परवर्ती रचना। अनुवाद को रचना का अनश्वर उद्यम घोषित करना निस्सन्देह इस किताब का मौलिक और सर्वथा नया विमर्श माना जाएगा।


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