कहानी की रचना प्रक्रिया - परमानंद श्रीवास्तव Kahani Ki Rachana Prakriya - Hindi book by - Parmanand Srivastava
लोगों की राय

आलोचना >> कहानी की रचना प्रक्रिया

कहानी की रचना प्रक्रिया

परमानंद श्रीवास्तव

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :320
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13162
आईएसबीएन :9788180316937

Like this Hindi book 0

पुस्तक में साठोत्तर कहानी और आज की कहानी पर कई निबन्ध इस दृष्टि से दिये गये हैं कि आज के पाठक को यह कृति कथा आलोचना के क्षेत्र में सार्थक प्रस्थान दिखे

प्रस्तुत पुस्तक 'कहानी की रचना प्रक्रिया' में पुरानी कहानी और नयी कहानी की रचना- प्रक्रिया के सूक्ष्म भेदों को समझने का प्रयत्न किया गया है और पहली बार रचना की प्रक्रिया से सम्बन्धित समस्याओं को कहानी-साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में उठाया गया है।
कहानी-साहित्य की रचनात्मक प्रक्रिया के अध्ययन-क्रम के आरम्भ में क्रमश: रचना- प्रक्रिया की 'आधारभूमि' रचना-प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक आधार, रचना-प्रक्रिया के साहित्यिक आधार, कहानी के प्राचीन रूप, कहानी के नये रूप, रचनात्मक चेतना का कहानी नामक साहित्यिक विधा में उपयोग, शास्त्रीय समीक्षा द्वारा निर्धारित कहानी-कला के प्रमुख तत्त्वों के रचनात्मक उपयोग की सम्भावना तथा रचना-प्रक्रिया और आधुनिकता के प्रमुख स्तर, रचनाकार, रचना-प्रक्रिया ओर पाठक आदि विषयों पर विचार किया है और प्रतिपादित किया है कि रचना-प्रक्रिया कोई जड़ यन्त्र नहीं है, बल्कि वह रचनाकार की मानसिक संवेदना, सामाजिक परिवेश तथा उसके कलात्मक अनुभवों से सम्बन्धित एक जागरूक प्रक्रिया है जिसमें रचनाकार न केवल रचनात्मक अनुभवों को सम्प्रेषित करता है बल्कि अपने को पाता भी है, उपलब्ध भी करता है।
दूसरे, तीसरे और चौथे अध्यायों में पूर्व प्रेमचन्द, प्रेमचन्द युग के पूर्वार्द्ध की कहानी, उत्तर प्रेमचन्द-युग की हिन्दी कहानी की विशेषताओं और सीमाओं की व्याख्या की गयी है।
पाँचवें अध्याय में, हिन्दी कहानी के विविध युगों की रचना-प्रक्रिया का की चेतना अध्ययन प्रस्तुत करते हुए यथा की चेतना या साक्षात्कार के प्रति विभिन्न युगों के कृतिकारों के दृष्टिकोणों में व्याप्त मौलिक अन्तर की व्याख्या की गयी है।
छठे और अन्तिम अध्याय में जहाँ आज की कहानी की नयी दिशाओं की ओर संकेत किया है, वहीं उसके परिशिष्ट में रचना-प्रक्रिया की चेतना पर समूचे अध्ययन के आधार पर पुनर्विचार की आवश्यकता का अनुभव किया गया है। पुस्तक में साठोत्तर कहानी और आज की कहानी पर कई निबन्ध इस दृष्टि से दिये गये हैं कि आज के पाठक को यह कृति कथा आलोचना के क्षेत्र में सार्थक प्रस्थान दिखे।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book