परम्परा और परिवर्तन - श्यामाचरण दुबे Parampara aur Parivartan - Hindi book by - Shyama Charan Dubey
लोगों की राय

लेख-निबंध >> परम्परा और परिवर्तन

परम्परा और परिवर्तन

श्यामाचरण दुबे

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1322
आईएसबीएन :81-263-0859-1

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

184 पाठक हैं

प्रस्तुत है वैचारिक निबन्ध परम्परा और परिवर्तन...

Parampara aur Parivartan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय समाज संस्कृति और परम्परा से सम्बन्धित इस पुस्तक के निबन्धों में एक ऐसी विश्लेषणात्मक चेतना क्रियाशील है जो अपने समय और समाज की समस्याओं के बारें में हमें निरन्तर सतर्क बनाये रखने की कोशिश करती है।

निवेदन

यह संकलन प्रो. दुबे के निधन के काफ़ी समय बाद प्रकाशित हो रहा है। इसका एक इतिहास है ।
1993 में प्रो. दुबे को उनके ‘परम्परा, इतिहास-बोध और संस्कृति’ पुस्तक के लिए भारतीय ज्ञानपीठ ने मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया। उसी समय उन्होंने श्री पद्मधर त्रिपाठी के सुझाव पर ‘परम्परा और परिवर्तन’ की योजना बनायी। लिखी हुई सामग्री का चयन प्रारम्भ हुआ, नये आलेखों के लिए चिन्तन चलता रहा। साथ ही बहुत सारे लिखने तथा बोलने के अवसरों का उपयोग वे परम्परा के भिन्न-भिन्न आयामों एवं सम्बन्धित विषयों पर अपने विचारों को मूर्त रूप देने में करने लगे। कुछ समय बाद दुर्भाग्यवश वे चले गये और संकलन का कार्य अधूरा रह गया।

मैंने अपनी क्षमतानुसार बिखराव को समेटकर इस संकलन के निबन्धों को क्रमबद्ध रूप देने का प्रयत्न किया है। कुछ तथ्य, तर्क तथा मौलिक विचार एक से अधिक जगहों पर आये होंगे, परन्तु इसके कारण मैंने कोई काट-छाँट नहीं की, मैं चाहती थी कि प्रत्येक निबन्ध अपने आप में पूर्ण हो औ स्वतन्त्र रूप से भी पढ़ा जा सके।
एक बात और। इस उपमहाद्वीप के पुरातन काल के सन्दर्भ में कुछ तथाकथित तथ्यों पर प्रश्नचिह्न लग गये हैं। आर्य कौन थे ? वे बाहर से आये थे या भारत के ही थे ? सिन्धु घाटी सभ्यता किनकी देन है ? इन समस्याओं के लिए मैं प्रो. दुबे के हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग में दिये भाषण से कुछ वाक्य यहाँ उद्धृत कर रही हूँ, जिनका उपयोग आवश्यकतानुसार संकलन में कुछ जगहों पर संशोधन के लिए किया जा सके:

‘‘भारतीय संस्कृति की बुनावट और सामाजिक संरचना की समझ के प्रयत्न उनके आग्रहों और दुराग्रहों से ग्रस्त रहे हैं। आज भी उनमें वैज्ञानिक तटस्थता और ऐतिहासिक विवेक की कमी है। ‘आर्यवाद’ ने अनेक मिथकों को जन्म दिया। यह माना जाने लगा कि शुद्ध-रक्त आर्य भारत में ज्ञान और सभ्यता का प्रकाश लाए और उन्होंने अनार्यों-दास, निषाद, अनास, दस्यु-को परास्त कर एक उच्च संस्कृति का विकास किया। किसी बड़े आर्य आक्रमण और विजय की बात आज ऐतिहासिक रूप से सन्दिग्ध मानी जाने लगी है। अब दावा किया जा रहा है कि आर्य समूह भारतीय मूल के ही थे...सिन्धु घाटी सभ्यता के उजागर होने से आर्यवाद को गहरा धक्का लगा। नागर सभ्यता का यह गौरवशाली अध्याय द्रविड़ों की देन माना गया। भौतिक सभ्यता की यह उच्च उपलब्धि थी। तथाकथित आर्य इस दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे। नये अनुसन्धान... यह संकेत देते हैं कि सिन्धु घाटी सभ्यता के निर्माण में आर्य और आर्येतर समुदायों का मिला-जुला योगदान था। यदि यह अवधारणा सच है तो भी वह आर्यों की सर्वोच्चता के सिद्धान्त को चुनौती देती है।’’

1994 में के.के. बिड़ला फाउण्डेशन की व्याख्यान-श्रृंखला में प्रो. दुबे ने ‘परम्परा की प्रासंगिकता’ पर तीन व्याख्यान दिये थे, जिन्हें वे अपने तैयार हो रहे संकलन में सम्मिलित करना चाहते थे। उनके न रहने पर 1997 में फाउण्डेशन के निदेशक श्री बिशन टण्डन ने इन व्याख्यानों को एक पुस्तिका के रूप में छपवा लिया। दुबे जी के निबन्धों की मूल प्रति का इस पुस्तक में समावेश किया गया है। दुबे जी की इच्छा की रक्षा के लिए मैं बिशन जी की आभारी हूँ।
इस संकलन के लिए आवश्यक कुछ अनूदित हिस्सों को तैयार करने में श्री श्यामदत्त पालीवाल का सहयोग उल्लेखनीय है। पुस्तक में प्रयुक्त सामग्री के समालोचन, संशोधन, रूपान्तर एवं सरलीकरण में मेरी मित्र श्रीमती सावित्री दुबे ने निश्छल सहयोग दिया। इसके लिए मैं इनकी अनुगृहीत हूँ।
दुबे जी के जाने के पश्चात् ‘परम्परा और परिवर्तन’ को परिणति तक पहुँचाने में पद्मधर जी के आग्रह तथा सहयोग का बहुत बडा योगदान रहा है। मैं उनकी ऋणी हूँ।

आमुख

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मानवीय परिदृश्य में अनेक नाटकीय मोड़ आये। बीते हुए कल का साम्राज्यवादी ढाँचा चरमराकर बिखरने लगा और एक के बाद एक पुराने उपनिवेशों के स्थान पर नये स्वाधीन राज्यों का उदय हुआ। इन नव-स्वाधीन राज्यों में नयी सांस्कृतिक चेतना जागी; वे अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति सजग और सचेत हुए। उन्होंने सांस्कृतिक पहचान के कुछ प्रतिष्ठा-चिह्न अपनाये-राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय भाषा और राष्ट्रीय वेश-भूषा। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ये ज़रूरी थे। पर काफ़ी नहीं। अभाव की संस्कृति दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में विघटनकारी सिद्ध हो सकती है; दमित और अवरुद्ध सांस्कृतिक आकांक्षाएँ क्षेत्रीय लघु और सूक्ष्म सांस्कृतिक आन्दोलनों का रूप ले सकती हैं जिनका सम्मिलित प्रभाव देश के समूचे ढाँचे को डगमगा सकता है। वैसे भी स्वाधीनता को अर्थ देने के लिए यह आवश्यक भी था कि भूखों को भोजन मिले, जनता निरक्षरता के अन्धकार से बाहर निकले, बेघरों के लिए आवास की व्यवस्था हो, रोगियों की चिकित्सा का प्रबन्ध हो। यह किसी भी स्वाधीन देश के लिए न्यूनतम कार्यसूची थी, पर इसके लिए भी संसाधनों का सुनियोजन और निवेश आवश्यक था। नवस्वाधीन देशों ने नियोजित आर्थिक विकास का रास्ता अपनाया। सम्पन्न देशों ने उनका उत्साह बढ़ाया और उन्हें आर्थिक और तकनीकी सहायता देने का आश्वासन भी दिया। बाद में यह सहायता आयी भी, पर वह न पर्याप्त थी और न समय पर ही आयी। उसके साथ कुछ शर्तें भी थीं; जिनके परिणाम बाद में स्पष्ट हुए।

आर्थिक विकास के कार्यक्रम के आरम्भिक काल में उसकी परम्पराओं और संस्कृति से सीधी टकराहट नहीं हुई। इस बीच विकास विशेषज्ञों की अच्छी-ख़ासी फौज मैदान में उतर आयी और माँगे-बिन माँगे अपनी सलाह विकासशील देशों को देने लगी। विदेशी ऋण और सहायता पाने के लिए उनकी सलाह माँगना और उस पर चलना ज़रूरी था। इन तथाकथित विशेषज्ञों ने भी पहले यही सुझाव दिया कि विकास कार्यकर्ता सांस्कृतिक मान्यताओं के प्रति संवेदनशील रहें और स्थापित परम्पराओं से न टकराएँ। योजनाओं से जब आपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए तब असफलता के कारणों का विश्लेषण किया गया। दोषी पाया गया परम्पराओं को। नयी माँग थी सांस्थानिक ढाँचे, अभिवृत्तियों और मूल्यों को बदलने की। अल्पज्ञ विशेषज्ञ, जो विकास के क्षेत्र में सर्वज्ञ बने घूम रहे थे, ऐसा कोई मन्त्र नहीं दे सके जिससे यह तत्काल सम्भव हो सके। परम्परा की सृजनात्मक ऊर्जा से भी वे अपरिचित थे। उन्हें ये भी अहसास नहीं था कि परम्परा की अवरोधात्मक प्रतिक्रिया विकास के समूचे एजेण्डा को अस्त-व्यस्त कर सकती है। नियोजन, प्रबन्धन, संचार नीति के दोष आदि भी विकास असफलता के उत्तरदायी हो सकते हैं, परन्तु इनकी ओर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। संस्कृति और परम्पराएँ कठघरे में रहीं, चारों ओर से उन पर हमले हुए और होते रहे। सब सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों तथा अभिवृत्तियों को बदल देना चाहते थे, पर ऐसा कर सकने की कोई कारगर सामाजिक प्रविधि उपलब्ध नहीं थी।

आधुनिकीकरण का आकर्षण, आर्थिक विकास के अतिरिक्त जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अभिव्यक्ति पा रहा था। एक छोटा-सा वर्ग, जो सम्पन्न था और विकासक्रम के लाभों से जिसकी स्थिति और भी सुदृढ़ हो गयी थी, आधुनिकता का प्रतिरूप बना। उसकी जीवन शैली बदली, विचार शैली नहीं। यह छद्म आधुनिकता थी जो अहम् के साथ अनेक वहम भी पाल रही थी। यह अभिजात्य और सम्पन्नता की झीनी परत पश्चिमीकरण को ही आधुनिकीकरण मान बैठी थी। उसने विवेक के तर्क, परानुभूति, भूमिकाओं की सचलता और सक्रियता आदि गुण, जो आधुनिकता के आधार लक्षण हैं, नहीं अपनाये, भोगवादी और प्रदर्शनवादी जीवन-शैली ज़रूर अपना ली। बौद्धिक क्षेत्र में आये परिवर्तन और भी आश्चर्यजनक तथा साथ ही चिन्ताजनक भी थे। अकादमिक क्षेत्र में देशज चिन्तन पीछे छूटता गया और पश्चिमी विचार प्रणालियाँ विचार-जगत् पर छा गयीं। यह थी बौद्धिक उपनिवेशवाद की स्वीकृति, जिसके लिए कुछ प्रलोभन तो थे पर विशेष दबाव या आग्रह नहीं। साहित्य और कला पर भी पश्चिमी प्रभाव स्पष्ट थे। अपनी जडों से कटा यह बौद्धिक वर्ग अनुकरण का उत्सवीकरण कर रहा था। आत्म-रति में लीन यह वर्ग अपने व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति उदासीन था। कभी-कभी उसकी चेतना जागती थी किन्तु उसकी प्रतीकात्मक सक्रियता झूठा आत्म-सन्तोष भले ही दे, समाज को दिशा दे सकने में समर्थ नहीं थी।

इस पृष्ठभूमि में प्रताड़ित परम्परा ने अपना आक्रोश अभिव्यक्त किया-धार्मिक कट्टरवाद और जातीय भावना (एथनिसिटी) के विस्फोट के रूप में। साथ ही प्रजातीय, भाषायी, धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिताएँ आक्रामिक रूप में उभरीं। विकासवादी हतप्रभ थे-आर्थिक विकास का तिलिस्म टूट रहा था, आधुनिकीकरण का सम्मोहन निष्प्रभाव हो रहा था। सांस्कृतिक स्वायत्तता की माँग सशक्त हो गयी थी। सोवियत संघ का विघटन हुआ, यूरोप में नये राज्य बने, आत्म-निर्णय की छटपटाहट अन्यत्र भी है। विश्व-परिदृश्य में अनिश्चय और अस्थिरता है। पहचान का संकट राजनीति को नये मोड़ दे रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर विकास और परम्परा के अन्तःसम्बन्धों पर नयी बहस शुरू हुई है। मार्क्सवादी भी नये सन्दर्भ में आस्था और परम्परा का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं।

आस्था और विश्वास, लक्ष्य और मूल्य, साधन और क्रिया में अतीत से वर्तमान तक चली आयी निरन्तरता की धाराओं को हम परम्परा कहते हैं। ये धाराएँ समय द्वारा परीक्षित होती हैं, उपयोगी और उपादेय भी। इनमें समय के साथ एक रहस्यमयता आ जाती है जो उनकी सर्व-स्वीकृति को सशक्त करती है और उन्हें एक प्रकार की सम्प्रभुता और अनिवार्यता प्रदान करती है। परम्परा से समाज की पहचान बनती है; उसके माध्यम से समुदाय विचार और व्यवहार का एक स्थिर आधार पाते हैं। समाज का एक बड़ा भाग परम्पराओं को सहज भाव से स्वीकार करता है क्योंकि उनके कोई विकल्प उसके सामने नहीं हैं। लीक से हटने का मतलब सामाजिक आलोचना से लेकर सामाजिक बहिष्कार तक हो सकता है। प्रबुद्ध विचारक और वैज्ञानिक अपने विरोधी तर्कों के बावजूद, विशेष स्थितियों में परम्पराओं की स्वीकृति के लिए बाध्य होते हैं। व्यापक परिवर्तन सामान्य जन से सामाजिक आस्था का आधार छीन लेते हैं और विचार और व्यवहार के क्षेत्र में एक अराजक शून्य उत्पन्न कर देते हैं। यह स्थिति अनपेक्षित प्रतिक्रियाओं को जन्म देती है जिनका पूर्वानुमान कठिन होता है। क्रान्तिकारी तेवर अन्ततः अप्रभावी और विघातक सिद्ध होते हैं। विकास की असफलताएँ और आधुनिकीकरण की विकृतियाँ परम्परा की ओर वापसी की प्रबल प्रेरणाएँ बनती हैं।

परम्पराओं की प्रासंगिकता और उनका महत्त्व असन्दिग्ध है। पर उन्हें एक सीमा से अधिक महिमा मण्डित करना भी उचित नहीं है। उनकी भी अपनी सीमाएँ होती हैं। अस्पृश्यता एक बड़े वर्ग की संरचनात्मक दास-स्थिति, स्त्री का उत्पीड़न (विशेषकर सती और देवदासी प्रथाएँ स्त्री-भ्रूण-हत्या) आदि प्रथाओं को परम्परा के नाम पर भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन पर धार्मिक और दार्शनिक मुलम्मा भी उनके अन्तर्निहित अन्याय को झुठला नहीं सकता। न्यस्त स्वार्थ परम्परा के समर्थक बन जाते हैं। तीसरा ख़तरा परम्पराओं के राजनीतिकरण का है जो सच्चे इतिहास-बोध और दूरदर्शी भविष्य-बोध के बिना समाज को लक्ष्य-भ्रष्ट करता है। परम्परा के व्याख्याकार कौन हैं ? उसका निर्वचन कौन करते हैं ? कैसे और क्यों ? क्या इनके द्वारा संस्कृति की किसी एक धारा का वर्चस्व स्थापित किया जाता है ? परम्परा के सह-अस्तित्व के लिए क्या कोई कल्पनाशील प्रयत्न किये जाते हैं ? असहमति, विरोध और सुधार की परम्पराओं का मूल्यांकन किस तरह किया जाता है ? इन प्रश्नों के समाधान-कारक उत्तरों पर मानव की नियति आकार लेती है।
विकास और आधुनिकता आवश्यक हैं पर वे विसंगतियाँ और विकृतियाँ भी उत्पन्न करते हैं। इन प्रक्रियाओं से तीन प्रवृत्तियाँ बल पाती हैं-व्यक्ति केन्द्रिकता, लोकतन्त्रीकरण और धर्मनिरपेक्षीकरण। व्यक्ति केन्द्रिकता से भोगवाद बढ़ता है, सामाजिक सरोकार घटता है। लोकतन्त्रीकरण अनुशासन के ढाँचे को ढीला कर अराजकता की स्थिति उत्पन्न करता है। धर्मनिरपेक्षता प्रायः धर्म-विमुखता बन जाती है। तीनों प्रवृत्तियों के लक्ष्य सही हैं पर अनियन्त्रित रूप से उनका आना अनेक जटिल समस्याओं को जन्म देता है। पश्चिमी समाज भी इन प्रवृत्तियों से त्रस्त है और बुनियादी ढाँचे की ओर लौटने पर गम्भीर रूप से विचार कर रहा है।

कालिदास ने कहा था कि पुराना सब अच्छा नहीं होता, नया सब बुरा नहीं होता। दोनों का समन्वय ज़रूरी है। मनुष्य का विवेक सर्वोपरि है। और उसी के आधार पर यह समन्वय सम्भव होगा। परम्परा साधन है, साध्य नहीं। बुद्ध का उपदेश इस सन्दर्भ में बहुत सार्थक है-नाव नदी पार करने के लिए होती है। उसका उपयोग करो, पर कृतज्ञ भाव से उसका बोझ जीवन भर ढोते मत फिरो। अचेतन नाव तुम्हारी भावना की नहीं समझेगी पर उसके भार से तुम्हारी कमर अवश्य झुक जाएगी।

विकास का सांस्कृतिक आधार

जब हम एशिया में हुए पिछले पचास वर्षों के विकास-प्रयासों पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं कि विकास के तीन मुख्य मॉडल अपनाये गये और तीनों अलग-अलग विचारधाराओं पर आधारित थे। अपनायी गयी विचारधारा ने विकास प्रक्रिया को प्रभावित तथा प्रोत्साहित किया और विकास को नये मोड़ दिये। अनेक देशों ने स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए आधुनिकीकरण के पश्चिमी मॉडल को अपनाया। यह विकास का पूँजीवादी मॉडल था। कुछ ने राष्ट्र-निर्माण का क्रान्तिकारी रास्ता चुना। उनके सामने सोवियत समाजवादी पुनर्रचना का मॉडल था। बाद में चीन के जनवादी गणतन्त्र तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने समाजवादी देशों से भी उन्होंने प्रेरणा ली। इन समाजवादी प्रयोगों का वैचारिक आधार तो एक ही था, परन्तु कार्यक्रमों का क्रियान्वयन राष्ट्रीय सन्दर्भों तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार किया गया। शेष देशों ने अपने-अपने स्वयं के मॉडल बनाये। कहीं नियन्त्रित लोकतन्त्र की बात कही, कहीं बुनियादी लोकतन्त्र का नाम लिया और इसी तरह के अन्य रूपों को अपनाया गया। अधिकतर इन प्रयासों के माध्यम से तत्कालीन सत्ता के ढाँचे को सही सिद्ध करने की कोशिश की गयी। इन देशों में अपनी स्वतन्त्र राह अपनाने की बात कही गयी थी, परन्तु उनके इस दावे में विश्वसनीयता नहीं थी। मुख्य मॉडल दो ही थे। स्वतन्त्र राह की बात करने वाले कभी पश्चिमी पूँजीवादी व्यवस्था की ओर झुकते थे और कभी समाजवादी व्यवस्था की ओर। इन देशों में से अधिकांश ने पश्चिमी व्यवस्था को अपनाया। लक्ष्य निर्धारण के प्रेरणा-स्त्रोतों को समझने के लिए आवश्यक है कि विकास के इन तीनों रूपों की गम्भीरता से विवेचना की जाए।

पहले पश्चिमी मॉडल पर विचार करें। 1940 के दशक के अन्तिम तथा 1950 के आरम्भ के वर्षों में तीसरी दुनिया में उत्साह का वातावरण था। उपनिवेश तथा आश्रित देश राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर रहे थे और अपने-अपने राष्ट्रीय विकास की महत्वकांक्षी रूपरेखाएँ बना रहे थे। उन्हें आशा थी कि योजनाएँ बनाकर तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहायता एवं तकनीकी पथ-प्रदर्शन का सहारा लेकर वे अपनी बीमार अर्थ-व्यवस्थाओं को बदल डालेंगे और इसी के साथ सम्पन्नता और समृद्धि के युग का प्रारम्भ हो जाएगा। वे मात्र दो दशकों में औद्योगिक विकास के उस स्तर को प्राप्त करने की आशा लगाये थे जिसको प्राप्त करने में पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमरीका को दो सौ साल लगे थे। धनी और औद्योगिक क्षेत्र के अधिक विकसित देशों में विकास विशेषज्ञों की रातों- रात पैदा होने वाली फ़ौज ने विकास के आकर्षक और अपरीक्षित नुस्ख़े प्रस्तुत किये जिनसे इन अप्रत्याशित आशाओं को बढ़ावा मिला।

बीस साल बाद तीसरी दुनिया के सोच का ढंग अधिक यथार्थवादी बना। उन्हें यह अहसास हुआ कि आज़ादी के उल्लास में तीसरी दुनिया के देशों ने अपनी क्षमताओं और सम्भावनाओं का आकलन बहुत बढ़-चढ़कर किया था। तथाकथित अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने अपनी सीमित विशेषज्ञता को अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किया था। उनका यह ज्ञान अज्ञानियों को गर्वोक्ति सिद्ध हुआ। उनके द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रगति का प्रतिरूप असफल हुआ और वह चमत्कार नहीं हुआ जिसकी आशा विकासशील विश्व को थी।

विकास की इस प्रारम्भिक अवधारणा की कमियाँ अब स्पष्ट थीं, तीसरी दुनिया की समझ में आ गया था कि विकास की प्रक्रिया में अनेक उलझाव हैं और इसमें एक-दूसरे से जुड़े अनेक ऐसे तत्व हैं जो देश और काल के अनुसार परिवर्तनशील हैं। विकास ऐसी सीधी और सरल प्रक्रिया नहीं है जिसमें हिसाब लगाकर निवेश किया जाए और तदनुरूप उत्पाद पा लिया जाए। प्रौद्योगिकी के स्थानान्तरण में भी अनेक कठिनाइयाँ होती हैं। कभी –कभी यह सुझाव भी दिया गया कि विदेशी संस्थाओं को भी अपनाया जाए, परन्तु संस्थाओं का स्थानान्तरण असम्भव पाया गया। नयी प्रौद्योगिकी को अपनाने में समय लगता है और इसके लिए धीरज और सतत नवाचार की आवश्यकता होती है। उसकी उपयुक्तता का पता प्रयासों की सफलता और असफलता से ही लगता है। विकास के अनुरूप संस्थात्मक तथा प्रेरणात्मक ढाँचा बनाते समय अनेक विरोधाभासों और जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ता है। असफलता के अनेक बहाने खोजे जाते हैं, परन्तु इनसे एक झूठा सन्तोष ही मिलता है और उनसे निश्चित समय में प्राप्त की जानेवाली प्रगति का कारगर रास्ता नज़र नहीं आता। आवश्यक है कि हम पिछले अनुभव की पृष्ठभूमि में विचार करें कि विकास का पश्चिमी प्रतिरूप असफल क्यों हुआ और इस आधार पर विकल्पों को निर्धारित करने का प्रयत्न करें। इसका अर्थ है कि हमें विकास की अपनी अवधारणा तथा तत्सम्बन्धी कार्यप्रणाली पर गम्भीरता से पुनर्विचार करना चाहिए

यह आश्चर्य की बात है कि विकास के अभिप्राय की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गयी। विकास के सूचक-विकास दर, सकल राष्ट्रीय उत्पाद और प्रति-व्यक्ति औसत आय-पूरी तरह आर्थिक मापदंड ही माने गये, सामाजिक और सांस्कृतिक सूचकों की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। यह मान लिया गया था कि इन आर्थिक सूचकों के आधार पर प्राप्त किये गये राष्ट्रीय लाभ किसी-न-किसी तरह नीचे पूरी जनता तक पहुँच जाएँगे। वास्तव में हुआ यह कि विकास के लाभों का बड़ा भाग समाज के उच्च वर्ग को मिला, जिसके हाथ में उत्पादन के साधन थे। इस तरह एक नया शोषक वर्ग विकसित हुआ। इस आर्थिक क्रिया-कलाप को दिशा देने वाले प्रमुख समूह ने विशेष लाभ प्राप्त कर लिये, समाज का गरीब वर्ग इन लाभों से प्रायः अछूता रहा। आम गरीब जनता को ऐसे विकास का नाम-मात्र का लाभ मिला, और यह लाभ भी राज्य के द्वारा दी जाने वाली सामाजिक सेवाओं के रूप में था। गरीबी और अमीरी के बीच की दूरी बढ़ी। समाज में अल्पसुविधा प्राप्त गरीबों का अनुपात बढ़ा। गरीबी की रेखा से नीचे की जनता से त्याग और सेवा की अपीलें अर्थहीन थीं, वे बलिदान और सेवा करने के लिए अपने जीवन के अविश्वसनीय रूप से नीचे स्तर से और अधिक नीचे जा ही नहीं सकते थे। विकास–योजनाओं में इन वर्गों के प्रति थोड़ा दिखावटी प्रेम प्रदर्शित किया गया, ‘समाजवाद’ और ‘वितरणात्मक न्याय’ के आकर्षक नारे दिये गये। ये दीर्घकालीन उद्देश्य थे जो कभी सूदुर भविष्य में ही प्राप्त होने थे। इन उद्देश्यों की बात तो कही गयी परन्तु उनको प्राप्त करने का कोई समयबद्ध कार्यक्रम नहीं बनाया गया। जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की ओर समुचित ध्यान भी नहीं दिया गया। तथ्य यह है कि पूरा मॉडल अन्ततः उपभोक्तावादी समाज का था और उपभोक्तावाद ही उसका मुख्य दर्शन था। उच्च वर्ग को दोनों प्रकार के लाभ थे, एक ओर उन्होंने विकसित दुनिया की नयी आवश्यकताओं, उपभोक्तावादी संरचना और यन्त्रवाद को अपनाया, और दूसरी ओर तीसरी दुनिया की सामन्तवादी विलासिता और औपनिवेशिक दृष्टिकोण को क़ायम रखा। अधिकांश जनता को कम मज़दूरी पर काम करना पड़ा या बेरोज़गारी का सामना करना पड़ा। इस प्रकार सामान्यजन के ग़रीबी और दुख भरे जीवन के बीच एक छोटा-सा समूह समृद्धि के असाधारण रूप से ऊँचे स्तर का उपभोग कर रहा था। इस दुखद स्थित का विकल्प खोजने का प्रयास ही नहीं किया गया-एक ऐसा विकल्प जिससे इस दुखावस्था में रहने वाले ग़रीबों को ऐसा जीवन स्तर प्राप्त हो सके जो मानवीय दृष्टि से पर्याप्त और सम्मानजनक हो। अधिकांश सत्ताधारी जनता के सामने क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत किये थे, परन्तु अपने व्यक्तिगत जीवन में वे उपभोक्तावादी दर्शन का अनुसरण करते थे। अनियन्त्रित स्वार्थ और असीम लिप्सा के कारण इस विशिष्ट वर्ग के सामान्य जनता का विश्वास खो दिया। आखिरकार वे जनता को क्या दे सकते थे ? केवल वायदे, और उन वायदों का पूरा होना निकट भविष्य में सम्भव नहीं दिखायी देता था।

आर्थिक विकास को एक रास्ते पर चलना था और उसे कुछ अवश्यम्भावी अवस्थाओं से गुज़रना था। जो प्रौद्योगिकी अपनायी गयी वह पश्चिम में विकसित हुई थी और इसलिए वह पश्चिमी सामाजिक वातावरण के अनुरूप थी। पश्चिमी प्रौद्योगिकी अधिकांशतः सघन पूँजी निवेश पर आधारित थी, इसलिए वह उन देशों के लिए उयुक्त नहीं थी जहां पूँजी की कमी थी और श्रम बहुतायत से उपलब्ध था। ऐसी प्रौद्योगिकी को अपनाने से रोज़गार के अवसर बहुत कम बढ़े और बढ़ती हुई बेरोज़गारी के संकट को कम करने में अधिक सहायता नहीं मिली। अल्प विकसित देशों में बेरोज़गारी की बढ़ती हुई संख्या एक कष्टदायक तस्वीर प्रस्तुत करती है। इस प्रौद्योगिकी के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता थी, और यह ऊर्जा या तो आन्तरिक स्रोतों से प्राप्त होनी थी-ऐसे आन्तरिक स्रोत जिनका पुनर्भरण नहीं हो सकता था, या फिर बाह्य स्रोतों से; और जिनके पास ये बाह्य स्रोत उपलब्ध थे उन्हें इन पर लगभग एकाधिकार प्राप्त था और इसलिए वे उनकी मनमानी कीमत वसूल कर सकते थे। जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही थी, उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बड़ी मात्रा में उपयोग हुआ। इससे निकट भविष्य में संसाधन-समाप्ति का संकट उपस्थित हो गया। औद्योगिक उत्पादन का एक बड़ा भाग केवल विशिष्ट वर्ग के उपभोग से जुड़ा था और सामान्य जन की व्यक्तिगत तथा सामुदायिक आवश्यकताओं से इसका बहुत कम सम्बन्ध था।

यह विकास भी निर्भरता के ढाँचे के अन्तर्गत होना था। विदेशी तकनीकी ज्ञान ऊँची कीमत पर खरीदा गया। काफ़ी हानि हो जाने के बाद तीसरी दुनिया को पता चला कि अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सहायता और ऋण सदैव सदाशयता के कारण नहीं दिये गये थे। इन सहायताओं और ऋणों से अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष शर्तें जुड़ी हुई थीं। आज अनेक देशों को लगभग उतना ही धन वापस करना पड़ता है जितना वे ऋण के रूप में लेते हैं। ऋण भुगतान का चक्र एक संवेदनशील विषय है और इससे ग़रीब राष्ट्रों और अमीर राष्ट्रों के सम्बन्ध प्रभावित होते हैं। इसमें ग़रीब देश हानि में रहते हैं। विदेशी सहायता के बारे में सोचा गया था कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है, परन्तु अब वह एक स्थायी आवश्यकता बनती जा रही है, और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह सहायता, उन देशों के हाथ में शक्ति का स्रोत बन गयी है जो उसे देते हैं। सहायता देने वाले प्रभावशाली देश सहायता पाने वाले देशों पर खुला राजनीतिक प्रभाव डालते हैं कि वे ऐसी नीतियों को अपनाएँ जिनसे सहायता देनेवाले देशों का हित हो। परोक्ष रूप से उन्होंने अनेक प्रकार के दबाव डाले हैं, जिनमें से कुछ का अर्थ है सहायता प्राप्त करनेवाले देशों की स्वतन्त्रता और सम्प्रभुता का परिसीमन। सहायता और ऋण समझौतों में निरापद दिखाई देनेवाली शर्तों से भी सहायता देनेवाले देशों के हितों की रक्षा हुई, सहायता प्राप्त करनेवाले देशों को अनेक सेवाएँ तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय दरों की तुलना में अधिक मूल्य पर ख़रीदनी पड़ीं। सहायता देने वाले देशों को यह पसन्द नहीं था कि विकासशील देश अपनी मर्ज़ी की स्वतन्त्र नीति पर चलें। आत्मनिर्भरता के उनके प्रयासों के ग़लत समझा गया। स्वतन्त्र मार्ग पर चलने का प्रयास करनेवाले देशों को सहायता बन्द करने की प्रत्यक्ष और परोक्ष धमकियाँ दी गयीं। विदेशी सहायता विकासशील देशों में नव-उपनिवेशवाद का आधार तैयार करने और उसे क़ायम रखने का साधन बनी। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को आश्रित व्यवस्था की भूमिका निभानी पड़ी।

तीसरी दुनिया जानती है कि समकालीन विश्व अर्थव्यवस्था अन्तर्निहित अन्याय पर आधारित है, इसलिए यह आवश्यक है कि इसका ढाँचा बदले ताकि विकासशील देशों को अपने संसाधनों के उपयोग और मानव जाति की उत्पादन-प्रक्रिया में सार्थक हिस्सेदारी मिल सके। उन्होंने समझ लिया है कि ‘प्रगति की सीमाओं’ का निहित अर्थ विकसित देशों की अपेक्षा अविकसित देशों पर अधिक रोक लगाना है। उनको सलाह दी जाती है कि वे पृथ्वी के प्रदूषण को और न बढ़ाएँ, इस उपदेश का उद्देश्य सराहनीय प्रतीत होता है परन्तु इसका पालन सम्भव नहीं है, इसलिए विकासशील देशों को यह उपदेश सुनकर उलझन होती है। तीसरी दुनिया ने ‘जीवन नौका सिद्धान्त’ के बारे में भी सुना है, जिसका आशय है कि तीसरी दुनिया के उन जीवन-क्षम देशों को ही सहायता दी जाए जिनमें कुछ ऊर्जा शेष है और जो ऐसी सहायता का उपयोग करने में सक्षम हैं। शेष की चिन्ता व्यर्थ है। क्या विकासशील देशों के निवासी हम सर्वनाश की आखिरी मंजिल पर पहुँच गये हैं ?
विकासशील देशों ने अब उन मानवीय क़ीमतों का अनुमान लगाना शुरू किया है, जो नयी टेक्नॉलोजी के मार्ग पर चलने में उन्हें चुकानी पड़ती हैं। पश्चिमी मॉडल पर आधारित विकास की सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं और सामाजिक संरचना के परिवर्तनों ने उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता और पहचान के लिए संकट खड़ा कर दिया है। चाहे जो भी कारण हो, विकास के जैसे परिणामों का वायदा था, वे सामने नहीं आये। प्रश्न है, क्या हम इन वायदों के लाभों के लिए अपने सांस्कृतिक व्यक्तित्व को हास्यास्पद हो जाने दें ? इस दौरान उद्योग के क्षेत्र में प्रगत पश्चिम में भी तनाव के चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं; तीव्र गति से होने वाले औद्योगीकरण से उत्पन्न सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का मुक़ाबला करने में वह अपने-आपको अक्षम पा रहा है। अब तक ग़रीब देश भयमिश्रित आदर से पश्चिम के विशेषज्ञों की राय और आलोचना को सुनते थे; अब उन्हें मालूम हो गया है कि तथाकथित सर्वज्ञान सम्पन्न विशेषज्ञों ने उनके साथ छल किया है। जिनको उन्होंने देवता समझा था, वे मिट्टी के माधो निकले। जिस विकास और उन्नति के स्तर का वायदा था, वह नहीं मिला। इसलिए स्वाभाविक है कि आज तीसरी दुनिया के देश अपनी आवाज सुनना चाहते हैं और एक वैकल्पिक मार्ग अपनाना चाहते हैं जिससे वे अपने भविष्य का निर्माण कर सकें।

कुछ देशों ने विकास का दूसरा रास्ता चुना, यह क्रान्ति का मार्ग था। मार्क्स और लेनिन के मूल-भूत सिद्धान्तों पर चलते हुए, इन देशों ने सत्ता के वर्ग आधार को ढहा देने का प्रयास किया और सामाजवादी आधार पर अपने समाज की पुनर्रचना करने का प्रयत्न किया। सोवियत संघ में यह किया जा चुका था और वही इसकी प्रेरणा थी। इन देशों को कुछ अंश में राजनीतिक समर्थन, आर्थिक सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उन देशों से प्राप्त होता रहा जिनसे उनकी वैचारिक समरूपता थी। अधिकांश देशों ने क्रान्ति के मार्ग और क्रान्तिकारी समाज-संरचना की दिशा में विभिन्न विकल्पों का निर्माण किया। ये विकल्प क्रान्तिकारी राष्ट्रनिर्माण की मूल मुख्यधारा से भिन्न थे। क्रान्तिकारी धारा में शामिल होने वाले देशों ने अपने अलग-अलग रास्ते चुने और साथ ही इस धारा के पहले के सफल अनुभवों का लाभ भी लिया। इन देशों में किसी ने भी अपनी परम्परा को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया, परन्तु परम्परा के उन तत्त्वों को अवश्य तोड़ा जो उनकी दृष्टि में प्रगति के मार्ग में रुकावट उत्पन्न करते थे। एशिया में एक बड़े देश-चीन-ने सतत क्रान्ति की राह को चुना, जिसका अर्थ था कि चल रही प्रगति धारा का लगातार आकलन होता रहे और साथ ही गतिरोधकों की पहचान भी होती रहे। यह प्रयास केवल नया समाज ही नहीं, नया मानव बनाने का था।

तीसरा रास्ता है ऐसा संस्थात्मक ढाँचा बनाने का जो देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यथार्थ के अनुरूप हो। इन देशों ने सोचा कि पूर्ण और खुला लोकतन्त्र उनकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता, इसलिए आवश्यक था कि राजनीतिक संस्थाओं के ढाँचे में परिवर्तन किया जाए। उन्होंने या तो नियन्त्रित लोकतन्त्र के रूप को चुना या सैनिक तानाशाही को अपनाया। इन देशों में नये राजनीतिक समीकरणों को मान्यता दिलाने या सही सिद्ध करने का प्रयास हुआ। उनका औपचारिक रूप कोई भी रहा हो, उनकी नीतियों में एक विचारात्मक झुकाव था। कुछ ने क्रान्तिकारी और मूलभूत सुधारवाद का प्रतिरूप प्रस्तुत किया और समतावादी लक्ष्यों की घोषणा की, परन्तु उनका विकास का अन्तर्निहित दर्शन भी पश्चिमी मॉडल से प्रभावित था। प्रयास किया गया कि जातीय़ तथा क्षेत्रीय राष्ट्रीयताएँ समाप्त हों और समग्र राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हो। परम्परा, विशेष रूप से धर्म से जुड़ी भावनाओं का उपयोग लोगों को जोड़ने के लिए किया गया। परम्परा के किसी भी रूप-धर्म, सामाजिक संरचना तथा जीवन-मूल्य को तोड़ने का प्रयास नहीं किया गया। यह आशा की गयी कि आर्थिक विकास से लोगों के दृष्टिकोणों और जीवन-मूल्यों में परिवर्तन हो जाएगा। इन देशों में विकास प्रक्रिया पर समाज के विशिष्ट प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व रहा। क्रान्तिकारी घोषणाओं के बावजूद विकास का अधिकांश लाभ समाज के विशिष्ट अल्प वर्ग को मिलता रहा। इसका प्रमाण नहीं मिलता कि उन्होंने अपने अनुकूल प्रौद्योगिकी अपनाने का या उपलब्ध प्रौद्योगिकी को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का प्रयास किया हो। जीवन के स्वरूप तथा सामाजिक सम्बन्धों के गठन, दोनों के बारे में भविष्य की योजना के खाकों के रंग धुँधले रहे।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book