तुलसी के रचना सामर्थ्य की विवेचना - योगेन्द्र प्रताप सिंह Tulsi Ke Rachna Samarthya Ka Vivechan - Hindi book by - Yogendra Pratap Singh
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तुलसी के रचना सामर्थ्य की विवेचना

योगेन्द्र प्रताप सिंह

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1994
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13343
आईएसबीएन :0

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तुलसी की कृतियों में उनके आत्मानुभव एवं रचना दृष्टि के विकास का एक मानवीय सूत्र निश्चित रूप से परिलक्षित होता है

कोई भी कृति किसी कवि की आकस्मिक अभिव्यक्ति नहीं होती और न ही कोई कवि आकस्मिक रूप से क्लैसिक हो जाता है। कृति के क्लैसिक होने के पीछे रचनाकार की सतत साधना, जीवन मूल्य की समझ का विकास, परम्परित मूल्यों का गम्भीर मंथन, उसकी अपनी प्रज्ञा तथा विवेकशक्ति, सतत अध्यवसाय आदि-आदि कितने ज्ञात तथा अज्ञात तत्त्व हैं, जिनको निर्दिष्ट करना सम्भव नहीं प्रतीत होता। गोस्वामी तुलसीदास जी के सन्दर्भ में यही प्रश्न है। रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना सामर्थ्य को यदि धुरी मान ली जाए तो वहाँ तक पहुंचने में उन्हें कितना अध्यवसाय करना पड़ा होगा, आज इसका आकलन करना इतना सरल नहीं है, लेकिन उनकी कृतियों के काल-क्रम के सापेक्ष्य में उनकी संवेदना एवं रचनाशक्ति के सामर्थ्य के क्रमिक विकास बिन्दुओं के ज्ञात पक्षों को अवश्य लक्षित किया जा सकता है। उनकी कृतियों में उनके आत्मानुभव एवं रचना दृष्टि के विकास का एक मानवीय सूत्र निश्चित रूप से परिलक्षित होता है। और इस तरह यह एक सामान्य कवि से विकसित होकर कालजयी कवि के रूप में उनके जीवन की विकास-यात्रा का वृत्त प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास है।

श्रीरामचरितमानस एक कालजयी कृति है और प्रत्येक कालजयी कृतियों की भाँति यह सम्पूर्ण रचना गम्भीर रहस्यमयता से संयुक्त है। मानस के विषय में यह प्रचलित अवधारणा है कि यह कृति जितनी समझ में आती है, उससे कहीं अधिक अबूझ है। उद्देश्य की दृष्टि से, रचनातंत्र की दृष्टि से, भाव व्यापार की दृष्टि से, कथाविधान की दृष्टि से, सैद्धान्तिक चिन्तन की दृष्टि से मानस को जितना सरल समझ लिया जाता है, दूसरी ओर समझने के लिए उससे अधिक बचा भी रहता है। संपूर्णत: अबूझ, रहस्यमय एवं बहुआयामी मानस के विधान का एक महत्त्वपूर्ण आधार अभिव्यंजना शिल्प है, और इस अभिव्यंजना शिल्प का कोई निश्चित विधायक सूत्र यहाँ उपलब्ध नहीं है। मानस के शिल्प विश्लेषण के प्रकाश में इससे संबंधित कतिपय बिन्दुओं का निर्देश किया जा सकता है, किन्तु ये निर्देश बिनु निश्चित रूप से इस विज्ञान महाकाव्य के अभिव्यंजना शिल्प के कोई इदमित्वं निष्कर्ष नहीं हैं अर्थात् उसके बाद भी उस पर कहने के लिए पर्याप्त अवकाश की स्थिति बनी रहती है।


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