अधूरे मनुष्य - डी.जयकान्तन Adhure Manushya - Hindi book by - D. Jayakantan
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अधूरे मनुष्य

डी.जयकान्तन

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1991
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1335
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है तमिल कहानी संग्रह....

Adhure Manushya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

किसी घटना, स्थिति या परिस्थिति से जन्मी अनुभूति की भावातिरेक अभिव्यक्ति ही कहानी का मर्म है। तमिल कहानी में इस अभिव्यक्ति की सार्थक प्रखरता जयकान्तन की सृजनात्मकता में भलीभाँति देखी जा सकती है। जनमानस,विशेषकर समाज के तिरस्कृत, अपमानित और उपेक्षित लोगों के दुखदर्द से संपृक्त एवं संवेदनशील अंतस् के गहन और गम्भीर स्वर से निर्मित ये कहानियाँ किसी भी पाठक के अन्तर्मन को उद्वेलित किये बिना नहीं छोड़ती।

ताश का खेल

कपड़े टाँगने की रस्सी पर टँगी वायल की धोती को झाड़कर पहनने के बाद जानकी दीवार पर लटके आइने के सामने जा खड़ी हुई। उसने अपने सँवरे हुए बालों को तनिक ठीक किया। माथे पर लगी कुंकुम की बिंदी पसीने से कुछ फैल गयी थी। उँगली पर धोती का किनारा लपेट कर उसने बिंदी को चारों तरफ से ठीक किया। बिंदी का आकार कुछ छोटा हो गया। उसे मन ही मन इस बात का संतोष था कि बिंदी भी उसके माथे पर अच्छी लग रही है। इसके बाद उसने चूड़ियों के डिब्बे में मोड़कर रखा हुआ दो रुपये का नोट निकाला और उसे धोती के पल्ले में बाँध लिया। पीछे मुड़ते ही उसे अपना डेढ़ साल का लड़का रवि दिखाई दिया। अपने अति नाजुक पैरों को घसीटते हुए किसी तरह उसके पास पहुँच गया और उसने उछलकर अपने दोनों हाथ उसकी ओर फैला दिये।

उसने बच्चे को खिड़की के पास बैठा दिया और उसे धोकर रस्सी पर सुखाई गयी कमीज पहनायी। उसके बालों को हाथों से सुलझाया और थोड़ा सा तेल लगाकर उन पर कंघी फेरी। मुख पर पाउडर लगाया। गालों को चूमकर उस पर काला टीका लगाकर नजर उतारी। बच्चे को गोद में उठाकर उसने घर में पड़े पुराने टाइम पीस की तरफ देखा तब दो बज रहे थे।
सरस्वती अम्माल ने उससे पूछा, ‘‘इस कड़कती धूप में बच्चे को लेकर सिनेमा जा रही है?’’ प्रश्न सुनकर कहीं उसे गुस्सा न आ जाय इस डर से वह मुस्कराने लगी।

‘‘हाँ, जा रही हूँ। इससे क्या!’’
‘‘तू खुशी से जा ! मैंने सोचा धूप है इसलिए कह रही थी। तू व्यर्थ ही गुस्सा हो रही है कि मैं सास की जगह खड़ी होकर तुझे डाँट रही हूँ...’’
‘‘आप सास की पदवी सँभाले रहिए...कौन मना कर रहा है? पहले अपने लड़के को पति की तरह रहना तो सिखा दीजिए।’’ जानकी के मुख से हमेशा इसी तरह के कटु शब्द निकलते थे। सरस्वती अम्माल यह सोचकर चुप हो जाती थी कि उसका इस तरह बोलना उचित ही तो है।
‘‘मैं क्या करूँ? मैं अपने को कोस रही हूँ...अपने दुर्भाग्य पर रो सकती हूँ...’’ कहकर सरस्वती अम्माल सिर पीटने लगी। सरस्वती अम्माल ने एक बार पूछा था, ‘‘उसमें क्या कमी थी ? तूने उसके साथ जीवन बिताते हुए एक पुत्र को भी पा लिया है। अब तू उसकी उपेक्षा क्यों करती है?’’इसके बाद उसकी क्या दुर्दशा हुई, इसे वही जानती है। हे ईश्वर ! शब्द क्या थे, विष-बुझे बाण थे।
‘‘वह आपका पुत्र है इसलिए आपका दुखी होना उचित है। आपने उसका विवाह करके एक लड़की की जिंदगी को बिगाड़ने का पाप अपने सिर पर ले लिया है। इसके लिए आप जी भर कर रोइये ! आ बेटा, हम चलते हैं!’’ कहकर जानकी ने बच्चे को उठाया और चल पड़ी।

सरस्वती अम्माल ने कुछ कहना चाहा, ‘‘कुछ भी हो पति से एक बार...’’परंतु वह कुछ न कह सकी। शायद जानकी को इस बात का ध्यान आ गया था। वह मन ही मन बुड़बुड़ाई, ‘‘बड़ा आया महापुरुष कहीं का!’’ और चुपचाप गली की ओर बढ़ गयी।
सरस्वती अम्माल द्वार पर खड़ी हुई उसे जाते हुए देख रही थी।
मई की कड़कडाती धूप में, आग के समान धधकती हुयी तारकोल की सड़क पर, बच्चे को गोद में लिए हुए वह नंगे ही पैर चली जा रही है। क्या उसमें सिनेमा देखने की इच्छा इतनी बलवती है?

कभी-कभी उस पर इस तरह का पागलपन सवार हो जाता था। उसकी दशा किसी अंगहीन, अभावग्रस्त या बीमार व्यक्ति के समान हो जाया करती थी। अपने मनोभावों को किसी न किसी रूप में व्यक्त करके ही वह शान्त होती थी। जानकी के जीवन में एक बहुत बड़ा अभाव था।
वह आभाव क्या था?
जानकी के दृष्टि से ओझल होने तक सरस्वती अम्माल द्वार पर खड़ी रही। एक दीर्घ निःश्वास लेकर जैसे ही वह अपने कमरे में प्रविष्ट हुई, उसकी दृष्टि दीवार पर टँगी जानकी और अपने पुत्र शिवसामी की विवाह के समय ली गयी तस्वीर पर पड़ी।
शिवसामी उसका अपना लड़का था परंतु विवाह के समय ली गयी उसकी इस तस्वीर को देखकर वह विशेष प्रसन्न नहीं हुई।

सौन्दर्य की प्रतिमा जानकी की बगल में खडा नाटे कद का, ऊँचाई में कठिनाई से ही जानकी के कन्धे तक पहुँचने वाला, आँखें जैसे बाहर को निकली हुई, दाँत मुँह के बाहर झाँकते हुए, पागलों के समान मुस्कराता हुआ वह व्यक्ति कितना कुरूप था।
बेचारी जानकी !
विवाह से पहले उसने कैसे-कैसे सपने सँजोए होंगे? भीतर-ही भीतर बनकर नष्ट हुए कितने मनो राज्यों के खंडहरों का भार ढोती हुई वह उसकी बगल में खड़ी हुई होगी?
‘‘मैं पापिन हूँ। महापापिन हूँ ! मैंने अपने बेटे के लिए इस सुंदर बच्ची के जीवन को नष्ट कर दिया, ‘‘यह सोचकर सरस्वती अम्माल ने आँचल में अपने आँसू पोंछ लिए।

शिवसामी की पत्नी को देख नगर के सभी लोग चकित थे। नगर के छोटे-छोटे बच्चे भी शिवसामी को मात्र उसका नाम लेकर नहीं पुकारते थे। वह उस मूर्ख शिवसामी, पागल शिवसामी, काना शिवसामी, जापानी शिवसामी आदि नामों से पुकारते थे। इसे सुनकर सरस्वती अम्माल का मात्र ह्रदय पीड़ा से छटपटा उठता था।
इतने कुरूप शिवसामी का अत्यन्त किन्तु निर्धन कन्या जानकी से विवाह कराकर सरस्वती अम्माल पहले तो बहुत खुश हुई कि उसने नगर में सभी लोगों से बदला ले लिया है परन्तु वह शीघ्र ही जान गई कि उससे भयंकर भूल हो गई है। वह अपने अपराध के विषय में निरन्तर सोचती हुई आँसू बहाने लगी।

शिवसामी कुरूप और मूर्ख ही नहीं अपितु अत्यन्त क्रोधी और उद्दण्ड स्वभाव का है—अपने अनुभव के बल पर इस बात को अच्छी तरह जान लेने के बाद जानकी को अपना जीवन नरकवत् लगने लगा। उसने कई बार आत्महत्या करने का विचार भी किया। ऐसे अवसर पर सरस्वती अम्माल के प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण शब्दों ने ही उसे जीवित रहने की प्रेरणा दी थी।
उसके गर्भ से उत्पन्न रवि ने भी उसे निरन्तर जीवित रहने की प्रेरणा दी। पुत्र के जन्म के बाद जानकी के स्वभाव में अहंकार और जिद्दीपन का समावेश हो गया। उसे लगता था कि उसने अपने सूने जीवन के अंधकार को दूर करने के लिए स्वंय ही एक दीपक खोज लिया है।

उसके जीवन में जो आभाव थे, जिनका उसने मन ही मन अनुभव किया था और जिसे दूसरे व्यक्ति भी अनुभव के द्वारा ही जान सकते थे, बदला लेने के लिए उसने सबकी उपेक्षा करना आरंभ किया, पति की भी। उसने इसकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया था। अतः उसके उपेक्षापूर्ण व्यवहार का परिचय उसे कहाँ मिल सकता था? वह सोचता था कि कभी-कभी पत्नी पर अधिकार जमाना ही पुरुष का लक्षण है। ऐसे अवसर पर जानकी बिना थके हुए उस पर कटु शब्दों की वर्षा करती थी। शिवसामी उसके अंतर्मन से निकलते हुए शब्दों को सुना-अनसुना कर देता था। उसे बराबर यही लगता था कि वह उसका विरोध कर रही है अतः क्रोध में आकर उसे पीटने लगता था।
और तब जानकी सरस्वती अम्माल को देख चिल्ला उठती थी, ‘‘यही सब कुछ देखने के लिए ही तो आपने अपने प्यारे बेटे का ब्याह रचाया था...देखिये...जी भर कर देखिये...’’
सरस्वती अम्माल मन ही मन कह उठती थी, ‘‘इसका कहना ठीक है...इसका कहना ठीक है।’’ इनकी लड़ाई के खत्म हो जाने तक वह घर के किसी कोने में जा बैठती थी।
घर में लड़ाई झगड़े की यह नौबत कभी कभार ही आती थी। प्रायः शिवसामी पागलों के समान बकता रहता था और घर के लोग उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देते थे।

शिवसामी के दफ्तर लौटते ही उसके घर के बरामदे में ताश खेलने वालों की मंडली जम जाती थी। शिवसामी के सभी मित्र दूसरी गलियों में रहते थे। उनमें से एक था रामभद्रन। वह शिवसामी के दफ्तर में काम करता था। उसका घर तांबुरम में था। वह जब भी आता था बेसुध होकर ताश खेलता था। आखिर इलेक्ट्रिक ट्रेन के छूटने में दस मिनट बाकी हैं—इस तरह की सूचना पाकर ही वह उठता था और ताश के खेल की सभा समाप्त होती थी।
आठ बजते ही जानकी बिना किसी की प्रतीक्षा किये खाना खाकर बच्चे को अपने से चिपटाकर सो जाती थी। सरस्वती अम्माल अपने बच्चे की प्रतीक्षा में, देहरी पर सिर रखकर अर्द्धनिद्रा में पड़ी रहती थी। ‘‘शिवसामी, पौने ग्यारह बज गये।’’ माँ के इन शब्दों को सुनकर ही वह उठकर जाता था। अपने दोस्तों को विदा कर जब वह खाना खाने बैठता था, तब भी वह इसी प्रकार बुड़बुड़ाता रहता था, ‘‘माँ ! मैंने तुरुप से उसके पान के नहले को काटकर बड़ी गलती की। परंतु मैं क्या करता? मेरे पास पान को छोड़कर बाकी रंग के ही पत्ते थे। हुकुम के छोटे पत्ते थे अतः हुकुम की बारी आने पर भी ‘सर’ मुझे नहीं मिलता। तुरुप भी एक था—नहीं काटता तो क्या करता? मुझे कहाँ पता था कि वह गुलाम फेकेगा? इसी से मैं बाजी हार गया।’’

‘‘अम्मा !...फोटो को इतने ध्यान से क्यों देख रही हो? क्या तुम सोच रही हो कि तुम्हारा बेटा फिर एक बार बारात सजाकर जायेगा? मैं भी यही चाहता हूँ...खैर, इस समय कॉफी ला दोगी? चार कप कॉफी चाहिए !’’ शब्दों को सुनते ही सरस्वती अम्माल ने पीछे मुड़कर देखा। बरामदे में ताश मंडली जमी हुई थी।
उसने पुत्र की विनोदपूर्ण बातों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वह एकाएक बोल उठी, ‘‘ओ हो ! तो आज शनिवार है? अभी कॉफी लाती हूँ। दूध वाला अभी तक नहीं आया...बस आता ही होगा, ’’ऐसा कहकर मुँह बनाते हुए सरस्वती अम्माल रसोई घर की तरफ चल पड़ी।
‘‘जानकी कहाँ है?’’
‘‘सिनेमा देखने गयी है।’’
‘‘किससे पूछ कर गयी है?’’
‘‘किससे पूछ कर जाती? मुझसे पूछ कर गयी है।’’
‘‘देख रहा हूँ कि उसकी उद्दण्डता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। इतनी कड़कती धूप में उस लूले लड़के को लेकर गयी है। हूँ...। आने दे उसे आज...’’ शिवसामी मन ही मन गुर्राने लगा।
‘‘क्यों भाई! इसमें ग़लती क्या है? घर में तो हवा भी नहीं है। इस घोर दुपहरी में घर में पड़े सड़ने से अच्छा यही है कि तू बाहर घूम आ, यह कहकर मैंने ही उसे बाहर भेजा है।’’
‘‘अच्छा-अच्छा... वह कहीं जाकर मरे, मुझे क्या?’’ कहकर शिवसामी ताश की गड्डी और दो चटाइयाँ लेकर बरामदे की ओर चला गया।

बरामदे की ओर से एक आवाज़ आयी, ‘‘क्यों रे, रामभद्रन को क्या हुआ? वह आज यहाँ क्यों नहीं आया?’’
‘‘खेलने के लिए हम चार लोग काफी हैं। जो यहाँ नहीं आया है उसकी चिन्ता क्यों करें? तू पत्ते बाँट।’’
शिवसामी ने ताश के पत्ते बाँट दिए और खेल शुरू हो गया।
क्या सिनेमा में ही जोड़ी ठीक बैठती है? वे दोनों कितने खुशी से नाचते-गाते जा रहे थे...क्या यह सब सिनेमा में ही संभव है? बच्चे को गोद में लिए चलती जानकी को स्पर्श करती हुई एक रेशमी साड़ी आगे बढ़ गयी। जानकी ने सिर उठाकर देखा।
सामने एक युवा जोड़ा दिखायी पड़ा। लोगों की उस भीड़ में भी वह सूट धारी युवक अपनी बाँहों से युवती की कमर को घेरे हुए चल रहा था। वह रेशमी साड़ी अपने गालों से उसकी भुजाओं का—चमकीले रेशमी बुश-शर्ट का स्पर्श करती हुई आगे बढ़ रही थी।

‘‘वह कितनी सुखी है सिनेमा की नायिका की तरह ...जीवन में भी बहुत से लोग सुखी होते हैं। मैं ही दुर्भाग्यशाली हूँ...मुझे जीवन ने इस बात पर विश्नास करने का अवसर भी नहीं दिया कि संसार में बहुत से लोग सुखी जीवन बिताते हैं,’’ सोच कर उसका मन रो उठा। सिनेमा हाल में बैठे हुए उन प्रेमपूर्ण दृश्यों को देखकर, जिनको देख सभी लोग प्रसन्न हो रहे थे और आगे की सींटों पर बैठे हुए लोग सीटी बजा-बजाकर अपनी प्रसन्नता प्रयक्त कर रहे थे, जानकी का ह्रदय ईर्ष्या, दुःख और शोक की भावना से भर उठा। एकाध बार दुःख के सीमातीत हो जाने पर वह रो पड़ी। हाँ...यही तो उसके जीवन का बहुत बड़ा आभाव था। दूसरों को देख ईर्ष्या करने, स्वंय दुखी होने या आँसू बहाने से उसे एक अजीब तरह का सुख मिलता था। इसी से उसे सिनेमा देखने का भूत सवार हो गया था।
थियेटर से बाहर निकलकर वह सामने के होटल की ओर चल पड़ी।
होटल के भीतर जा कर वह एक कोने की मेज के पास बैठ गई और उसने मिठाई का आर्डर दिया।
उसने थोड़ा-थोड़ा करके बच्चे को पूरी इमरती खिलाई। जब वह कॉफी को ठंडा कर रही थी तब उसे लगा कि कोई बहुत देर से उसकी तरफ एकटक देख रहा है। उसने मन-ही मन सोचा,‘‘कहीं वे तो नहीं आए?’’ दृष्टि उठाते ही उसे सामने राभद्रन बैठा दिखाई दिया।

‘‘इसकी सूरत जो जानी पहचानी लगती है,’’ यह सोच उसने उसे गौर से देखा। कुछ देर बाद उसे याद आया कि वह उसके पति के साथ ताश खेलने वालों में से है।
रामभद्रन उसे देख मुस्कराया।
जानकी भी मुस्करा दी।
उसने आज पहली बार रामभद्रन को गौर से देखा था। वह कितना सुंदर है, सभ्य है। जानकी के सौन्दर्य और बुद्धिमानी की प्रशंसा रामभद्रन बहुत दिनों से करता आ रहा था।
होथ धोने के लिए उठते ही वह उसकी मेज के पास आ गया और अत्यन्त परिचित व्यक्ति के समान पूछने लगा, ‘‘क्या सिनेमा देखने जा रही हो?’’
‘‘नहीं...देख कर लौट रही हूँ।’’
‘‘क्यों भई !...सिनेमा देखा?’’ इस तरह बच्चे को सम्बोधित करते हुए उसने बच्चे को मेज पर खड़ा किया। बच्चे के दोनो पैर मुड़ गये।
‘‘यह खड़ा क्यों नहीं होता?’’
‘‘पता नहीं क्यों...डेढ़ साल का हो गया है...अब भी खड़ा नहीं हो पाता है।
उसे दवाई, टानिक आदि बराबर दे रहे हैं...शरीर में शायद किसी चीज की कमी है। इसके पिता तो इसे ‘लूला’ कहकर पुकारतें हैं।’’
‘‘ आप घबराइये नहीं, छः महीने में ही यह चलने लगेगा। इसका शरीर कमजोर है। वह मूर्ख इसे लूला कहता है? भैया, अब यदि तेरे पिता ही तुझे लूला कहें तो तू कहना कि मैं तेरे समान लूला नहीं हूँ। क्यों ठीक है न ?’’ बच्चे को इस तरह समझाकर रामभद्रन जानकी की ओर देख कर हँसने लगा।

जानकी के ह्रदय में कोई बात चुभ सी गयी परंतु हँसकर उसे टाल दिया।
बैरे ने बिल लाकर मेज पर रख दिया। जानकी ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। तभी ‘‘मैं पैसे दिये देता हूँ’’ कहकर राभद्रन ने बिल की ओर हाथ बढ़ा दिया। अचानक ही दोनों के हाथ एक-दूसरे से टकरा गये। बड़ी तेजी से दोनों ने अपने हाथों को पीछे कर लिया। इस बीच मेज पर पड़ा बिल उड़ कर नीचे गिर पड़ा। रामभद्रन ने उसे उठा लिया।
क्षण भर के लिए जानकी का मुख लज्जा से लाल हो गया। इतनी जल्दी वे दोनो एक दूसरे के इतने निकट कैसे आ गये—इस बात पर चकित होते हुए और उसकी ओर देख मुस्कराते हुए बच्चे को गोदी में उठा लिया।
होटल से बाहर आने तक उसके मुख की लालिमा मिटी नहीं थी। पीछे से रामभद्रन की आवाज सुनाई दी, ‘‘आप चिन्ता क्यों करती हैं? आप प्रतिदिन समुद्र के किनारे जाकर कमर तक गहरे रेत के गढढ़े में बच्चे को सिर्फ एक घण्टे के लिए खड़ा करके देखिये...एक महीने में ही वह चलने लगेगा।’’
‘‘ऐसी बात है?’’
‘‘हाँ ! आप चाहें तो ऐसा करके देखिये। क्या आप इस समय घर जा रहीं हैं? अभी जाकर...क्यों बेटा, समुद्र के किनारे चलेगा? बच्चे को पुचकारते हुए रामभद्रन ने जानकी की ओर देखा।
पहले उसने सोचा कि मना कर दूँ। उसकी बातों, उसकी आवाज में, उसकी मुस्कान में एक आकर्षण था—सुख देने की शक्ति थी।
‘‘बेटा आओ, समुद्र तट पर चलें !’’ कहकर उसके साथ चल दी।

छः बज चुके थे। अभी धूप कम नहीं हुई थी। एक नौका की छाँह में कमर तक गहरे रेत के गढ्ढे में रवि को खड़ा करके जानकी और रामभद्रन एक दूसरे के सामने मौन बैठे हुए थे।
जानकी को रह-रहकर रोना आ रहा था। पर पुरुष। के सामने वह रो भी नहीं सकती थी। रामभद्रन भी कुछ सोचता हुआ शून्य दृष्टि से आकाश की ओर देख रहा था। वह बीच-बीच में लंबी साँसे छोड़ रहा था तथा माथा खुजला ऱहा था।
‘‘अरे हाँ ! आज तो शनिवार है। आपको दफ्तर से सीधे घर जाने की इच्छा नहीं हुई?’’ जानकी ने पूछा।
‘‘दो दिन से परेशान हूँ...न तो घर गया और न ही दफ्तर गया...’’
‘‘हाय !...ऐसा क्यों? क्या पत्नी घर पर नहीं है?’’ कहकर जानकी हँस पड़ी।
‘‘कहीं जाकर मर जाती तो चैन से रहता...वह दुष्टा जीवित रहकर मेरी जान खा रही है।
‘‘उसे गाली क्यों दे रहे हैं?...उसे एक दिन हमारे घर लेकर आइये न !’’
‘‘हे ईश्वर ! तू मेरी परीक्षा क्यों ले रहा है?’’ कहकर उसने अपना सिर पीट लिया।
‘‘क्या हम आपकी पत्नी के दर्शन नहीं कर सकते? क्या आपको डर है कति हम उसे आपकी ताश की बाजियों के बारे में बता देगें? आप घबराइये मत। हम उसे कुछ भी नहीं बताएँगे...कहकर जानकी हँस पड़ी।
‘‘यदि आप उसे अवश्य देखना चाहती हैं तो एक काम कीजिए...अपने पति शिवसामी को साड़ी पहना कर देख लीजिए...साक्षात् मेरी श्रीमती जी का रूप दिखाई देगा। हाय रे मेरे दुर्भाग्य ! हाय रे मेरे दुर्भाग्य !’’
जानकी एक क्षण जड़वत् खड़ी रही।

‘‘आपने उससे शादी क्यों की?’’
‘‘यह सब नियति का खेल है। उसके पिता ने ही मुझे पढ़ाया- लिखाया था। उसके पास अपार संपत्ति थी...यह लड़की उसकी एक मात्र उत्तराधिकारीणी थी...’’
‘‘कोई बात नहीं...आपको किसी तरह का संतोष, तो है !’’ वह और भी कुछ कहना चाहती थी परंतु दाँतों से जीभ दबाकर चुप हो गई।
‘‘कहिए ! जो कुछ कहना चाहती हैं, मैं बुरा नहीं मानूँगा। ’’
‘‘नहीं, कुछ नहीं।’’
‘‘आप अवश्य ही अपनी बात छिपा रहीं हैं। आप जो चाहें कह सकती हैं। आप शायद कहना चाहती हैं कि हम-दोनों की स्थिति बिल्कुल एक सी है। पहली बार आपके घर आया था तब आपको देखते ही मेरा मन रो उठा था। मुझे लगा कि आपकी स्थिति मेरे समान ही है। यही तो शायद आप भी कहना चाहती थीं?’’
‘‘हाँ...नहीं मेरी स्थिति तो आप से भी बदतर है। आप पुरुष हैं और मैं स्त्री !...आपने तो उपकार का बदला चुकाने के लिए, भविष्य में मिलने वाले धन का ध्यान करके यह काम किया...परंतु मुझे क्या मिला ! मैं इस तरह का कष्ट क्यों झेल रही हूँ?’’ जानकी की जबान लड़खड़ा रही थी उसका एक शब्द सुनाई पड़ता था तो दूसरा भावों के भार से दब जाता था।
इसके बाद दोनों रेत पर रेखाएँ खींचते हुए मौन बैठे रहे।
दोनों ही मन ही-मन अपने-अपने जीवन-चित्र में अपने पास खड़ी आकृति को मिटाकर उसके स्थान पर बैठी आकृति को फिट करके देख रहे थे...

जानकी ने पिक्चर में नायक-नायिका की जो जोड़ी देखी थी, उससे कहीं अधिक सुंदर और भव्य जोड़ी उसे दिखाई दी।
रामभद्रन ने उससे पूछा, ‘‘आपकी आयु क्या है? ’’
‘‘चौबीस...आपकी?’’
‘‘सत्ताइस,‘‘कहकर रामभद्रन ने गहरी साँस ली। जानकी भीतर ही भीतर गहरी साँसे ले रही थी। दोनो बहुत देर तक मौन बैठे हुए रेत में लकीरें खींचते हुए जैसे मन में चल रहें भावनाओं के संघर्ष को व्यक्त कर रहे थे।
सहसा जानकी खिलखिलाकर हँस पड़ी। क्षण भर के लिए रामभद्रन भय से काँप उठा। हँसते हुए जानकी बोली, ‘‘देखिये...हमारा जीवन कितने अनोखे ढंग से बदल गया है !...आप जो तास का खेल खेलते हैं...बिलकुल उसी खेल की तरह तरह !’’
‘‘वह कैसे?’’
‘‘यदि आपके पास वे सभी पत्तें हों जिनकी आपको जरूरत है और मेरे पास वे सभी पत्ते हों जिनकी मुझे जरूरत हो तो खेल कैसा चलेगा?’’
‘‘जानकी !...तुम कितने सुंदर ढंग से बातें कर रही हो।...
‘‘यदि वे ऐसा कहते तो? ’’ यह सोच जानकी मन ही मन प्रसन्न हुई।

‘‘जानकी...!’’ पुकारते हुए वह उसके पास आ गया। आँखों में आँसू बहाते हुए भर्राए स्वर में वह बोला, ‘‘हम दोनों ताश के पत्ते हैं ! खेलने वाले शिवसामी और लक्ष्मी हैं। परस्पर एक दूसरे से ताश के पत्तों को बदल लेना ही तो खेल है। जानकी ! तू बुद्धिमती है। मेरे शब्दों का अर्थ समझ रही है न?’’
जानकी के नेत्र मुँद से गये थे। वह उस काल्पनिक सुख में मग्न हो अपने को लगभग भुला चुकी थी। तभी उसके बेटे रवि ने रामभद्रन का कोट पकड़कर तोतली वाणी में कहा, ‘‘अप्पा !’’
जानकी ने आँखे खोलकर बच्चे को, अपने-आपको और चारों तरफ के वातावरण को ध्यान से देखा।
‘‘वह तेरे अप्पा नहीं है बेटा, मामा जी हैं। अप्पा घर में तेरा इन्तजार करते होंगे। आ, घर चलें’’,! कहकर उसने रेत के गढ्ढे में खड़े अपने बच्चे को उठाकर छाती से लगा लिया।

‘‘आपकी बात मुझे बिलकुल ठीक लग रही है। यदि मैं एक महीने तक बच्चे को रेत के गढ्ढे में खड़ा करूँगी तो यह अवश्य चलने लगेगा। कल से मैं उन्हें भी यहाँ ले आऊँगी। आजकल ताश के पीछे पागल हो रहे हैं, ‘‘कहकर जानकी उठ खड़ी हुई।
रामभद्रन की समझ में कुछ नहीं आया। वह चुपचाप उसके पीछे चलने लगा और उसके पास जाकर धीरे से पूछा,‘‘क्या आप मुझसे नाराज हैं?’’
‘‘आपसे नाराज होने का मुझे अधिकार कहाँ है? अरे हाँ, मैंने आपको ताश के खेल के बारे में पूरी बात नहीं बताई। आपने कहा था कि खेलने वाले मेरे पति और आपकी पत्नी हैं। वस्तुतः आपकी यह बात गलत है। वे भी हमारी तरह ताश के पत्ते हैं। हाँ..आप कह सकते हैं कि उनका कोई ‘पाइंट’ नहीं है। खेलने वाला मनुष्य नहीं, ईश्वर है। वह गलत खेल रहा है, ऐसा कहने का हमें अधिकार कहाँ है?’’

रामभद्रन ने चकित हो कर पूछा, ‘‘आप क्या कह रही हैं?’’
‘‘कल इतवार है न? आप लक्ष्मी को लेकर आइये। हम खूब बातें करेगें। उसे भी मैं बोलना सिखा दूँगी। बेटा ! मामा जी को नमस्ते कर। अच्छा हम चलते हैं, ‘‘कहते हुए जानकी तेजी से घर की ओर बढ़ गयी।
दिन और रात को मिलाने वाली मदमाती शाम समाप्त हो चुकी थी। समुद्र के किनारे जलती हुई बत्तियों की तेज रोशनी रात्रि के आगमन की स्पष्ट सूचना दे रही थी।
चारों ओर प्रकाश फैला हुआ था। क्या यह प्रकाश बाहर ही फैला हुआ था?

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