चोर निकल के भागा - मृणाल पांडे Chor Nikal Ke Bhaga - Hindi book by - Mrinal Pandey
लोगों की राय

नाटक-एकाँकी >> चोर निकल के भागा

चोर निकल के भागा

मृणाल पांडे

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13442
आईएसबीएन :9788183614856

Like this Hindi book 0

समकालीन हिंदी कथा-साहित्य, नाटक और पत्रकारिता को अपनी रचनात्मक उपस्थिति से समृद्ध करनेवाली रचनाकार मृणाल पाण्डे की यह नवीनतम नाट्‌यकृति है

समकालीन हिंदी कथा-साहित्य, नाटक और पत्रकारिता को अपनी रचनात्मक उपस्थिति से समृद्ध करनेवाली रचनाकार मृणाल पाण्डे की यह नवीनतम नाट्‌यकृति है। हिंदी रंगमंच पर भी यह नाटक पिछले दिनों विशेष चर्चित रहा है।
हास्य-व्यंग्य से भरपूर अपने चुटीले भाषा-शिल्प और लोकनाट्‌य की अनेक दृश्य-छवियों को उजागर करता हुआ यह नाटक वस्तुत: हमारी कला-संस्कृति के बाजारीकरण से जुड़े सवालों को उठाता है। कला, सौंदर्य, प्रेम और परम्परा जैसे तमाम मूल्यों का सौदा हो रहा है, और इस सौदे में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितने ही सफेदपोश शामिल हैं।
नाटक की उक्त अंतर्वस्तु को उद्‌घाटित करने के लिए लेखिका ने प्रेम और सौंदर्य के प्रतीक ताजमहल की चोरी की कल्पना की है। वास्तव में यह एक फंतासी भी है, जिसके सहारे लेखिका उन मानव-मूल्यों पर मँडराते खतरों को रेखांकित करती है, जिनकी सफलता मनुष्य जाति की तमाम कलात्मक उपलब्धियों को निरर्थक कर देगी। साथ ही वह कलाओं के उस जनतंत्र को भी लक्षित करती है, जिसे लेकर सत्ता-स्वायत्ता जैसी बहसें अक्सर होती रहती हैं। कहना न होगा कि मृणाल पाण्डे की यह नाट्‌यरचना अपने हास्यावरण में गम्भीर अर्थों तक जाने की क्षमता लिये हुए है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book