सच पूछो तो - भगवत रावत Sach Poochho To - Hindi book by - Bhagwat Rawat
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सच पूछो तो

भगवत रावत

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :110
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13614
आईएसबीएन :0

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पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कई किस्म की मुठभेड़ें हैं, आत्‍म-स्वीकृतियाँ हैं, यथार्थ से निर्मम मुकाबले हैं लेकिन निराशा या पस्ती कहीं नहीं है

अपनी ईमानदारी और सदाशयता के बावजूद एकरस होती जा रही अधिकांश हिन्दी कविता के बीच भगवत रावत इसलिए अपनी अनायास और अप्रगल्भ पहचान तथा अस्मिता प्राप्त कर लेते हैं कि उनके यहाँ अपने कवि और कविताई को लेकर उतना हिसाब-किताब नहीं है जितनी कि अपनी और औरों की इन्सानियत और दोस्ती को बचा पाने और चरितार्थ कर पाने की चिन्ता। इसलिए अभिव्यक्ति को लेकर उनकी कविता में कई किस्म के 'कलात्मक' संकोच या आत्म-प्रतिबन्ध नहीं हैं। लिखना उनके लिए इसलिए जरूरी नहीं है कि कविता एक प्रतिष्ठा का प्रश्न है या उसे लिखकर कुछ सिद्ध किया जाना है बल्कि आज के भारतीय समय में जो लिख सकते हैं उनके पास लिखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। वे लिखकर अमरत्व प्राप्त नहीं करना चाहते बल्कि यदि कोई विकल्प न हो तो मर-मर कर लिखना चाहते हैं। आदमी को लेकर एक निस्संकोच अपनापन और करुणा भगवत रावत की कविता के केन्द्र में है इसीलिए जब वे याद दिलाते हैं कि इस समय दुनिया को ढेर सारी करुणा चाहिए तो वे भावुक नहीं हो रहे .होते हैं बल्कि निर्वैयक्तिकता, तटस्थता आदि के मूलत: मानव-विरोधी मूल्यों के खिलाफ एक अमोघ नकार दर्ज करते हैं। भारतीय साहित्य की एक महान् परम्परा पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया है और वह है मित्रता के चित्रण की। महाभारत और रामायण की मैत्रियाँ भी भारतीय मानवीयता का एक अनिवार्य तत्त्व हैं और बीसवीं शताब्दी में जिस वैश्विक मानवीय प्रतिबद्धता की बात की जाती है उसके मूल में यही वह स्वाभाविक दोस्ताना है जो इन्सानों में हमेशा मौजूद रहता है। मुक्तिबोध के बाद भगवत रावत आज के पहले हिन्दी कवि हैं जिनके यहाँ दोस्ती का जज्बा, किसी मित्र की प्रतीक्षा, सखा के आने की खुशी, बल्कि किसी भी राह चलते को दोस्त बनाने की चाहत इतनी शिद्दत से मौजूद है। जब हर अपने जैसा इन्सान दोस्त है तो बेशक वसुधा भी कुटुम्‍ब है। यह आकस्मिक नहीं है कि भगवत रावत ने कुछ कविताएँ अपने कवि-कलाकार मित्रों पर भी लिखी हैं। दोस्ती का यह जड़ा उस समय और भी सम्‍पूर्ण तथा सार्थक हो जाता है जब भगवत- रावत उसकी जद में प्रकृति और पर्यावरण को भी ले आते हैं। भगवत रावत की ये कविताएँ भारतीय जीवन के ऐसे कई चित्र हिन्दी कविता में पहली बार लाती हैं जो शायद पहले कभी देखे नहीं गए। यदि .प्रेमचंद ने 'कफन' में दलितों के मर्मांतक यथार्थ का चित्रण किया था तो 'अतिथि कथा' में भगवत रावत उसी बिरादरी का एक ऐसा स्निग्ध दृश्य उपस्थित करते हैं जो आत्मा को जगमगा जाता है। 'यह तो अच्छा हुआ', 'सोच रही है गंगाबाई', 'मानव-संग्रहालय' (जो निराला की 'वह तोड़ती पत्थर' का समसामयिक संस्करण है) आदि में उनकी कविता संसार के सबसे बड़े सर्वहारा वर्ग-स्त्रियों-के सर्वहारा वर्ग की कथाएं खोज लेती है। उनकी 'कचरा बीनने वाली लड़कियाँ' हिन्दी की इस तरह की बेहतरीन समूहपरक कविताओं में भी अपनी निगाह और वात्सल्य के लिए बेमिसाल स्वीकार की जानी चाहिए। यदि भगवत रावत की व्यापक आस्था और पक्षधरता को लेकर किसी भी दुविधा की गुंजाइश नहीं है तो यह भी सच है कि उसमें कोई अतिमानवीय, सुनियोजित, यंत्रचालित आशावाद तथा आत्माभिनंदन भी नहीं है। कई कविताओं में पराजय की अकातर स्वीकृति है, अपनी और अपने जैसों की भूल-गलतियों, खामियों और गुफलतों का इकबाल भी है। लेकिन इनमें आत्मदया और विलाप नहीं है बल्कि उस तरह का मूल्यांकन है जो हर मुकावले के बाद शाम को शिविरों में किया जाता है ताकि अगली सुबह फिर आगे बढ़ा जा सके। 'मेरा चेहरा', 'सच पूछो तो', 'ठहरा हूँ जब-जब छाया के नीचे', 'क्या इसीलिए धारण की थी देह', 'मौत' तथा 'आग पेटी' जैसी अत्यंत निजी कविताओं में अपने एकांत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कई किस्म की मुठभेड़ें हैं, आत्‍म-स्वीकृतियाँ हैं, यथार्थ से निर्मम मुकाबले हैं लेकिन निराशा या पस्ती कहीं नहीं है। भगवत रावत की काव्य-प्रौढ़ता का एक विलक्षण पहलू उनका शिल्प-वैविध्य है। 'संभव नहीं', 'और अंत में' तथा 'हम जो बचे रह गए' सरीखी कविताएँ सिद्ध करती हैं कि छंद पर भी उनका सहज अधिकार है जबकि कुछ लम्बी कविताओं में उन्होंने सिर्फ एक विचार-स्थिति को निबाहा है और कुछ में वे सफल कथा-निर्वाह कर ले गए हैं। छोटी रचनाओं को उन्होंने उक्ति, सुभाषित, शब्द-चित्र या व्यंग्य नहीं बना दिया है बल्कि उनमें जायज कविता मौजूद है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात शायद यह है कि इन कविताओं में अधिकांश में भगवत रावत भाषा की एक ऐसी विरल सादगी हासिल कर पाए हैं जो अपनी संप्रेषणीयता में किसी तंतुवाय से जगाए गए सुदूर लेकिन गहरे संगीत की तरह है। भाषा को शिल्प, और इन दोनों को कथ्य से अलग करके देखना हिमाकत है इसलिए यह माने बिना काम नहीं चलता कि सच पूछो तो भगवत रावत की कविता अपने सारे आयामों में हिन्दी में ऐसी जगह बना चुकी है जिसकी उपेक्षा कविता की अपनी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाकर ही की जा सकती है।


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