आदिग्रन्थ में संगृहीत सन्त कवि - महीप सिंह Aadigranth Mein Sangrahit Sant Kavi - Hindi book by - Mahip Singh
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आदिग्रन्थ में संगृहीत सन्त कवि

महीप सिंह

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1362
आईएसबीएन :81-263-0904-0

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प्रस्तुत है आदिग्रन्थ में संगृहीत सन्त कवि....

Aadigranth Mein Sangrahit Saint Kavi a hindi book by आदिग्रन्थ में संगृहीत सन्त कवि - महीप सिंह

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश


आदिग्रन्थ (गुरु ग्रन्थ साहब) का सम्पादन चार सौ वर्ष पूर्व हुआ था। एक धार्मिक परम्परा के किसी गुरुद्वारा में उस समय ऐसे किसी ग्रन्थ की परिकल्पना करना, जिसमें इस विशाल देश के विभिन्न भागों में फैले उन पूर्ववर्ती सन्तों की वाणियों का संकलन हो जिनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और भाषा में बहुत अन्तर हो और उनमें अनेक ऐसे हों जिनकी वाणी की उपलब्धता बहुत दूभर हो, अपने आप में बड़ी अद्भुत बात है। गुरु अर्जुनदेव ने इस ग्रन्थ में बंगाल के जयदेव से लेकर सिंन्ध के सधना तक और मुल्तान के शेख फरीद से लेकर महाराष्ट्र के नामदेव तक फैले 15 सन्तों की वाणियों का चयन किया है और उसे एक पूज्य धर्मग्रन्थ बना दिया।

इस रचना में आदिग्रन्थ के सम्पादन की पृष्ठभूमि के साथ ही ऐसे सन्तों की पहचान, उनकी पृष्ठभूमि तथा उनकी समान अवधारणाओं पर कुछ विचार किया गया है और इस तथ्य को रेखांकित किया गया है। कि सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन और भक्ति आन्दोलन को आदिग्रन्थ कितनी दूर तक प्रतिबिम्बित करता है।

अपनी ओर से


गुरुवाणी के अध्ययन के प्रति मेरी रुचि बचपन से रही है। मेरे पिता नियमित रूप से गुरु ग्रंथ साहब का प्रातः और सायं पाठ किया करते थे। कभी-कभी मैं भी उनके पास बैठकर पाठ सुनता और अपनी बहुत-सी जिज्ञासाएँ उनके सम्मुख रखता रहता।

साहित्य के प्रति मेरी रुचि उसी आयु में ही उत्पन्न हो गयी थी। जब मैं आठवीं कक्षा में था, तभी मैंने अपनी पहली कहानी लिखी थी जो एक ऐतिहासिक प्रसंग पर आधारित थी। कॉलेज में आकर तो मैंने नियमित लिखना आरंभ कर दिया था और पत्र-पत्रिकाओं में भी छपने लगा था। किन्तु गुरुमत साहित्य के अध्ययन के प्रति मेरी रुचि कम नहीं हुई। सम्भवतःयही कारण था कि एम.ए. कक्षा में प्रवेश कर लिया, क्योंकि मैं गुरुगोविंद सिंह की रचनाओं पर शोध कार्य करने का निश्चय कर चुका था। यह कार्य मैंने 1963 पूर्ण करके आगरा विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की थी।
यह बात मुझे उस समय तक भी आकर्षित और अचम्भित करती थी कि गुरु ग्रंथ साहब के सम्पादक गुरु अर्जुन देव ने छः सिख गुरुओं के साथ ही इतने सन्तों तथा भाट कवियों की रचनाओं को इस ग्रन्थ में क्यों सम्मिलित किया ?

जब मुझे इस बात का ज्ञान हुआ कि ये सन्त भारत के विभिन्न प्रदेशों के निवासी थे और उनका समय कुछ शताब्दियों में फैला हुआ था, यह जिज्ञासा भी बलवती हो गयी कि बंगाल से लेकर सिंध तक और महाराष्ट्र से लेकर मुल्तान (पंजाब) तक फैले हुए इन सन्तों/सूफियों की रचनाओं को एकत्रित किस प्रकार किया गया होगा।

इन जिज्ञासाओं की तृप्ति के लिए मैं निरन्तर कुछ न कुछ पढ़ता रहता था यह इच्छा भी होती थी कि इस दृष्टि से मैं कुछ काम करूँ, किन्तु जैसे-जैसे आयु बढ़ती गयी, अनेक प्रकार की व्यस्तताएँ अधिक क्रूर होकर घेरती गयीं।
वह मेरे लिए अत्यंत सन्तोष और तृप्ति की बात बन गयी जब मुझे यह कार्य करने के लिए के.के बिड़ला फाउन्डेशन की ओर से एक वर्ष के लिए शोधवृत्ति मिल गयी। इस अनुग्रह के लिए मैं फाउन्डेशन तथा उसके निदेशक श्री बिशन-टण्डन का हृदय से आभारी हूँ।
अपने शोध कार्य के लिए मैंने ‘आदिग्रन्थ में संग्रहीत सन्त कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय का चुनाव किया था। इस विषय का अध्ययन करते हुए मेरे सम्मुख अनेक नये क्षितिज उभरे और मुझे लगा कि यह कार्य और अधिक व्यापक और गम्भीर अध्ययन की माँगे करता है, क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि की सम्पूर्ण अवधारणा पूरे भक्ति आन्दोलन और भारतीय चिन्तन को प्रभावित करती है।
हिन्दी के अध्ययन क्षेत्र में भक्ति आन्दोलन पर बहुत काम हुआ है। कई दशक पहले पं. परशुराम चतुर्वेदी की पुस्तक -‘उत्तर भारत की सन्त-परम्परा’ और डा.पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल का शोध ग्रंथ--‘हिन्दी साहित्य में निर्गुण संप्रदाय’ प्रकाशित हुए थे। सन्त साहित्य के अध्ययन की दृष्टि से इन ग्रंथों का योगदान अप्रतिम है। डा. जयराम मिश्र ने गुरुनानक देव की सभी रचनाओं का ‘नानक वाणी’ नाम से सटीक संपादन किया था। यह अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य था। डॉ.मिश्र की ही लिखी पुस्तक--‘श्री गुरु ग्रंथ दर्शन’ आदि ग्रंथ के समग्र अध्ययन का एक उल्लेखनीय प्रयास था।

चार सौ वर्ष पूर्व आदिग्रन्थ के सम्पादन की परिकल्पना अपने आप में अद्भुत थी। धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा की सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए गुरु नानक देव ने अपनी यात्राओं में किस प्रकार सन्तों की वाणी का संग्रह किया, किस प्रकार उन हस्तलिखित पोथियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा गया, किस प्रकार पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव ने, लगभग एक शती पश्चात उस सम्पूर्ण परिकल्पना को एक ग्रन्थ के रूप में मूर्त रूप दिया, यह व्यापक अध्ययन और मनन की माँग करता है।

आदिग्रन्थ में 6 गुरुओं, 15 सन्तों तथा भट्टों सहित अन्य कवियों की रचनाएँ संगृहीत हैं। मैंने सन्त कवियों की वाणियों को अपने अध्ययन का केन्द्र बनाया है।
सन् 2004 में इस ग्रन्थ के सम्पादन के चार सौ वर्ष पूरे हो जाएँगे। मैं भारतीय ज्ञानपीठ और उसके निदेशक डॉ.प्रभाकर श्रोत्रिय का पुस्तक रूप में इस कार्य को प्रकाशित करने के लिए आभारी हूँ।

महीप सिंह


अध्ययन की कुछ सामान्य कठिनाइयाँ  


हिन्दी के पाठकों को गुरुवाणी के पठन-पाठन और अध्ययन में कुछ असुविधाएँ होती हैं। गुरुनानक देव ने अपनी रचनाओं को किस लिपि में लिखा था, इसका कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनका कोई हस्तलेख नहीं मिलता। किन्तु जिन प्राचीन पोथियों से गुरु अर्जुन देव ने आदिग्रंथ का संपादन किया था, वे गुरुमुखी लिपि थीं। उन्हीं के निर्देशन में भाई गुरुदास जी ने जब मूल प्रति तैयार की थी, वह भी गुरुमुखी लिपि में थी।

प्राचीन ब्राह्मी लिपि से ही अधिसंख्य भारतीय लिपियों का विकास हुआ। देवनागरी का प्रयोग संस्कृत लिखने के लिए होने लगा। कश्मीर में ब्राह्मी का ही एक रूप शारदा प्रचलित था। कल्हण का ‘राजतरंगिणी’ ग्रंथ इसी लिपि में लिखा था। चम्बा जैसे पहाड़ी प्रदेशों में टाकरी लिपि प्रचलित थी जो शारदा के बहुत निकट थी।
गुरुनानक देव के आगमन के समय पंजाब में कई लिपियाँ थीं। देवानगरी पर ब्राह्मणों का एकाधिकार था। गुरुओं ने अपनी वाणी को लिपिबद्ध करने के लिए शारदा, टाकरी और लण्डे (महाजनी) के सुधरे हुए रूप का प्रयोग किया। द्वितीय गुरु गुरु अंगद देव ने इस लिपि में एक रूपता लाने का विशेष प्रयास किया। आम लोगों में इस लिपि की मान्यता गुरुओं के माध्यम से हुई, इसलिए लोग इसे गुरुमुखी कहने लगे।

गुरुवाणी में कुछ शब्दों को लिखने के लिए विशेष वर्तनी अपना ली गयी। अनेक विद्वानों ने गुरुमुखी लिपि में प्रयुक्त वर्तनी और शब्द संयोजन का गहन अध्ययन करके इसका व्याकरण निश्चित किया है।
गुरुमुखी लिपि से गुरुवाणी को जब देवनागरी में लिप्यन्तरित किया जाता है तो हिन्दी पाठकों को उसके उच्चारण में कुछ कठिनाई होती हैं। उदाहरण के लिए माया, दया, पाया, भया, ध्यान, नारायण आदि शब्द गुरुमुखी में माइया, दइया, पाइया, धिआन, नाराइण लिखा जाता है। किन्तु, इन शब्दों का उच्चारण सामान्यतः उसी प्रकार किया जाता है। जिस प्रकार हिन्दी देवनागरी में।
भारत के विभिन्न प्रदेशों से जिन सन्तों की रचनाएँ आदिग्रन्थ में संग्रहीत हैं, मूल रूप से उसी प्रदेश की लिपि में होंगी, जहाँ के वे रहने वाले थे। गुरु नानक देव और उनके परवर्ती गुरुओं ने उन्हें उस लिपि की वर्तनी में लिखी होगा, जिसका वे स्वयं प्रयोग करते थे। बहुत-सी रचनाओं को उन्होंने मौखिक परम्परा से लिया होगा। इसलिए नामदेव, कबीर, रविदास आदि सन्तों की रचनाएँ जिस रूप में देवनागरी में प्राप्त हैं, आदिग्रन्थ में उनसे कुछ भिन्नता दिखेगी। किन्तु यह भिन्नता ऐसी नहीं है जिससे उसके अर्थ में कोई अन्तर आता हो।
सन्तों की वाणी में ‘सबद’ या ‘शबद’ का प्रयोग बार-बार हुआ है। यह शब्द का ही अपभ्रंश है। किन्तु सन्तों ने इसे एक पूरे पद के अर्थ में प्रयोग किया है, मात्र ‘शब्द’ के अर्थ में नहीं।


आदिग्रन्थ के सम्पादन की पृष्ठभूमि


आदिग्रन्थ अथवा गुरुग्रंथ साहब, आज सिखों का परम-पूज्य धर्मग्रन्थ उसी प्रकार स्वीकार किया जाता है जैसे विभिन्न धर्म समुदायों द्वारा वेद, गीता, बाइबिल और कुरआन को स्वीकार किया जाता है। इस ग्रंथ का सम्पादन पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव ने किया था। उस समय इसका प्रचलित नाम ‘पोथी’ था, जिसे श्रद्धावश ‘पोथी साहब’ कहा जाता था। धीरे-धीरे इसके लिए ग्रंथ शब्द प्रचलित हुआ। सिख परंपरा में इसकी ग्रन्थित प्रति को ‘बीड़’ कहने का चलन है।

इस ग्रन्थ का सम्पादन कार्य सन् 1604 ई. में पूरा हुआ था। इसे लिपिबद्ध करने के कार्य में भाई गुरुदास ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। भाई गुरुदास तीसरे गुरु, गुरु अमरदास के भतीजे थे और उन्हें चार गुरुओं—गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुनदेव और गुरु हरिगोविंद—का सानिध्य प्राप्त हुआ था। उनका जन्म सन् 1551 और देहावासन सन् 1636 को हुआ माना जाता है। भाई सूरदास सिख धर्म के पहले व्याख्याकार थे। उन्होंने कुछ समय काशी में रहकर संस्कृत तथा धर्म शास्त्रों का अध्ययन किया था।
आदिग्रंथ को संकलित किये जाने का अपना इतिहास है। गुरुवाणी की रचना का कार्य प्रथम गुरु, गुरुनानक के समय (सन् 1469 से सन् 1539) से प्रारंभ हो गया था। गुरुनानक ने विधिवत शिक्षा प्राप्त की थी, इसके प्रमाण उनकी रचना में से प्राप्त होते हैं। उनकी राग आसा में लिखी पट्टी से स्पष्ट होता है कि गुरुनानक अपने समय में उस भाग में प्रचलित वर्णमाला, जिसे तदनन्तर गुरुमुखी नाम प्राप्त हुआ है, में अपनी रचनाओं को लिखते थे। पट्टी में उन्होंने सभी अक्षरों को आध्यात्मिक अर्थ दिया है। किन्तु दुर्भाग्य से आज उनकी अपनी हस्तलिपि प्राप्त नहीं है।
गुरुनानक देव की वाणी को लिखने एवं एकत्र करने में कुछ श्रद्धालुओं ने अपना योगदान किया था। कुछ पुरातन जन्म साखियों में यह संकेत मिलते हैं कि उनकी यात्राओं के समय जो व्यक्ति उनके साथ रहते थे, वे उनके द्वारा उच्चरित वाणी को साथ-साथ लिखते जाते थे। एक जन्म साखी में यह उल्लेख है कि दक्षिण भारत की यात्रा के समय सैदो और सीहा नाम के दो शिष्य उनके साथ थे। सैदो वाणी लिखने का कार्य करता था।


‘तदहु सैदो घोहे संपूरन पढ़नी। बाणी सैदो जट्ट जात घोहे लिखी।’


सैदो के अतिरिक्त अन्य शिष्यों का भी इस संबंध में जन्म साखियों में उल्लेख मिलता है।


‘ततु बाणी हसू लोहार अत सीहै छींवे लिखी।’


एक साखी में मनसुख नाम के बनिये का उल्लेख है। उसने गुरुनानक के निकट तीन वर्ष रहकर अनेक वाणियों को लिपिबद्ध किया था—


‘तीन बरस बाबे कोल रहिआ, फिर बाबे विदिआ कीता।
गुरु बाबे की बाणी बहुत लिखआसु, पोथीओं लिख लाती आसु।’

(पुरातन जनम साखी)   

भाई गुरुदास ने अपनी एक रचना (वार) में यह लिखा है कि गुरुनानक की मक्का यात्रा के समय उनके पास उनकी वाणी की एक पोथी थी—


‘आसा हथ किताब कछ पूजा बाँग मुसलाधारी।’


पुरातन जनम साखी में यह भी लिखा है कि अपने देहावसान के पूर्व अंगद को गुरु—गद्दी देते समय उन्होंने अपनी वाणी की पोथी भी उन्हें दी थी—

‘सो पोथि जुबानि गुरु अंगद जोग मिली।’

आदिग्रंथ में संग्रहीत विभिन्न भक्तों-सन्तों की रचनाओं को एकत्र करके प्रथम गुरु, गुरुनानक देव के समय से प्रारंभ हो गया था। वे स्वरचित रचनाओं को अपने साथ रखते थे। 22 वर्षों तक भारत के लगभग सभी भागों तथा सिंहल द्वीप (श्रीलंका), मक्का, मदीना और बगदाद तक की गयी यात्राओं में वे अपने से पूर्व  और अपने समकालीन सन्तों सूफियों की रचनाओं का संग्रह भी करते रहे। उन्होंने जीवन के अन्तिम कुछ वर्ष रावी नदी के किनारे बसाये नगर करतारपुर में व्यतीत किये थे। इन वर्षों में उन्होंने अपनी तथा अपने द्वारा एकत्र की गयी विभिन्न संतों की रचनाओं को व्यवस्थित किया होगा। इसी स्थान पर उन्होंने अपने प्रिय शिष्य भाई लहणा को अंगद बनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो ‘गुरु अंगद देव’ के नाम से दूसरे गुरु के रूप में जाने गये।

पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव ने इन पोथियों को तीसरे गुरु, गुरु अमर दास के पुत्र बाबा मोहन से प्राप्त किया।
आदि ग्रंथ में गुरुनानक देव द्वारा रचित 974 ‘शबद’ हैं, जिनमें पद, सलोक, पौड़ी आदि अनेक काव्य-रूप हैं। उन्होंने उत्तराधिकारी के रूप में स्वरचित तथा अन्य संतों की रचनाओं को गुरु अंगद देव को सौंप दिया था। गुरु अंगद देव ने 62 सलाकों की रचना की और यह थाती तीसरे गुरु, गुरु अमरदास को सौंप दी। गुरु अमरदास की रचनाओं की गिनती 907 है, जो अनेक काव्य रूपों में है। इन सभी सैंचियाँ अथवा पोथियों का विधिवत् लेखन कार्य संवत् 1627 (सन् 1570) में प्रारंभ हुआ था और लगभग दो वर्ष में यह कार्य सम्पन्न हुआ था। इन पोथियों के संबंध में तीन नाम प्राप्त होते हैं—एक, सहंसर राम वाली पोथियाँ। गुरु अमरदास ने अपने पौत्र संहसर राम को यह कार्य सौंपा था। दो-गोइन्दवाल वाली पोथियाँ। इस नाम से इन्हें पुकारा गया, क्योंकि इनका लेखन कार्य गोइन्दवाल नामक स्थान पर हुआ था, जहाँ गुरु अमरदास रहते थे। तीन-बाबा मोहन वाली पोथियाँ, क्योंकि काफी समय तक ये पोथियाँ गुरु अमरदास के पुत्र मोहन के अधिकार में रहीं थी। इन पोथियों में प्रथम तीन गुरुओं के अतिरिक्त जयदेव, रामानंद, नामदेव, सैण, त्रिलोचन, रविदास, कबीर और भीखण की रचनाएँ भी शामिल थीं, जिन्हें गुरुनानक देव ने स्वयं एकत्र किया था।

गुरु अमरदास ने गुरु पद के लिए अपने जामाता भाई जेठा का चुनाव किया था जो गुरु रामदास के नाम से चौथे गुरु के रूप में गुरु-गद्दी पर बैठे। यह बात गुरु अमरदास के दोनों पुत्रों-मोहन और मोहरी-को रुचिकर नहीं लगी थी। सम्भवतः इसीलिए मोहन ने इन पोथियों को गुरु रामदास को न सौंपकर अपने ही अधिकार में रखा था।
गुरु रामदास का सिख परंपरा में विशेष योगदान है। वे बहुत बड़े कवि, संगीतकार और भविष्य दृष्टा थे। अमृतसर नगर को भी उन्होंने ही बसाया था, जिसे प्रारंभ में चक गुरु रामदास अथवा गुरु का चक कहा जाता था
आदि ग्रंथ में गुरु रामदास के 679 पद संगृहीत हैं।

गुरु-गद्दी के उत्तराधिकारी को लेकर कुछ विवाद गुरु-परिवारों में उभर आये थे। गुरुनानक ने अपने दोनों पुत्रों-श्रीचन्द्र और लखीमचन्द्र को उत्तराधिकारी के योग्य न समझते हुए अपने एक शिष्य भाई लहणा को ‘गुरु-पद’ का भार सौंप दिया था। इसी प्रकार द्वितीय गुरु, गुरु अंगद देव ने अपने दोनों पुत्रों-दातू और दासू-को अपना उत्तराधिकारी न बनाकर अपने से बड़ी आयु के अपने शिष्य अमरदास को गुरु-गद्दी सौंपकर उन्हें तीसरा गुरु बनाया था।
यह बात गुरु अंगद के पुत्रों को रुचिकर नहीं लगी थी। उन्होंने गुरु अमरदास का भी अपमान किया था। किन्तु यह पारिवारिक तनाव गुरु रामदास के समय अधिक गंभीर होकर उभर आया। गुरु अमरदास ने भी अपने दोनों पुत्रों-मोहन और मोहारी-को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया था।

गुरु रामदास जी के तीन पुत्र थे-पृथ्वीचन्द्र, महादेव और अर्जुन देव। गुरुओं ने सदा ही उत्तराधिकारी के प्रश्न को योग्यता के आधार पर परखा था। इस आधार में सर्वोच्च स्थान सेवा का था और उसी के साथ गुरुनानक के आदर्शों को सही समझ, विनम्रता, सहनशीलता, सहिष्णुता, उदारता और व्यापक मानवीय दृष्टि जैसे गुणों को भी विशेष महत्व दिया गया। गुरु रामदास के समय गुरु-पद वंशगत अवश्य हो गया किन्तु उत्तराधिकारी के आधारभूत गुणों में किसी प्रकार का समझौता नहीं किया गया।

गुरु रामदास ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में अपने कनिष्ठ पुत्र अर्जुन देव का चयन किया था। उनके इस निर्णय से दोनों बड़े भाई, पृथ्वीचन्द्र और महादेव केवल रुष्ट ही नहीं हुए थे, वे अपने छोटे भाई से वैर भाव को पालने लगे थे। सभी चार गुरुओं ने अपनी वाणी में रचनाकार के रूप में ‘नानक’ नाम का प्रयोग किया था। पृथ्वीचन्द्र के पुत्र मेहरबान तथा अन्य कुछ लोग भी नानक नाम से वाणी की रचना करने लगे थे। आम सिख जनता के लिए पहचान कर पाना कठिन होता है जा रहा था कि कौन सी रचना प्रामाणिक है और कौन सी अप्रामाणिक।
इसीलिए उस समय ‘सच्ची वाणी’ और ‘कच्ची वाणी’ के रूप में दो शब्दों का प्रचलन हुआ। गुरुओं द्वारा रचित वाणी को लोग साची (सच्ची) वाणी कहते थे और उनके नाम से स्वार्थी लोगों द्वारा लिखित और प्रचारित रचनाओं को ‘कच्ची वाणी’ कहा जाता था।

इन स्थितियों में, गुरुपद का गुरु स्तर भार सँभालते ही गुरु अर्जुन देव को यह बहुत आवश्यक लगा कि ऐसी पोथी या ग्रंथ तैयार किया जाय जिसमें प्रामाणिक वाणी का ही संग्रह हो, जिससे सर्वसाधारण श्रद्धालु यह निर्णय कर सकें कि जो रचना इस ग्रंथ में नहीं है, नानक नाम से लिखे जाने के बावजूद, वह प्रामाणिक नहीं है, वह कच्ची है।
पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव ने जब संपादन का कार्य आरम्भ किया तो उन्होंने अपने कुछ प्रमुख सिखों को बाबा मोहन के पास से इन पोथियों को ले आने के लिए भेजा। किन्तु वे अपने कार्य में सफल नहीं हुए। जब गुरु अर्जुन देव ने इस कार्य के लिए स्वयं गोइन्दवाल गये।
सिख ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार गुरु अर्जुन देव ने अपने मामा मोहन के चौबारे के नीचे खड़े होकर इस पद द्वारा अपनी अभ्यर्थना की—


मोहन तेरे ऊँचे मन्दर महल अपारा।
मोहन तेरे सोहनि दुआर जीउ संत धरमसाला।
धरमसाल अपार दैआर ठाकुर सदा कीरतन गावहे।
जह साध-सन्त इकत्र होवहि तहा तुझहि धिआवहि।
करि दइआ मइआ दइयाल सुआमी होहु दीन क्रिपारा।
बिनवन्ति नानक दरस पिआसे मिलि दरसन सुखु सारा।


हे मोहन, तुम्हारे ऊँचे मन्दिर हैं, अपार महल हैं। तुम्हारे द्वार पर सन्त जन वास करते हैं। ये सन्त जन एकत्र होकर तुम्हारा स्मरण करते हैं। नानक की यह विनती है कि अपने दर्शन देकर मुझे सुख प्रदान करिये।
कुछ विद्वानों ने इस पद का ईश्वर परक अर्थ किया है। किन्तु परंपरा द्वारा यह स्वीकृत है कि यह पद सुनकर बाबा मोहन पसीज गये और उन्होंने पोथियाँ गुरु अर्जुन देव को दे दीं, जिनकी प्रतिलिपि करवाकर पंचम गुरु ने उन्हें वापस लौटा दीं। ये प्राचीन प्रतियाँ बाबा मोहन के वंशजों के पास आज भी सुरक्षित हैं।

गुरु अर्जुन देव ने बाबा मोहन वाली पोथियों के साथ अपने पिता, गुरु रामदास की वाणी संकलित की। बहुत सी वाणी अनेक श्रद्धालुओं के पास लिखित और कन्ठस्थ रूप में सुरक्षित थीं, उसे भी उन्होंने बड़े श्रम से एकत्र किया। फिर सारी उपलब्ध सामग्री का पुनरावलोकन किया गया। इसके पश्चात अन्तिम रूप देने का कार्य भाई गुरुदास को सौंपा गया, जिसे उन्होंने सन् 1604 में पूर्ण किया। इस मूल प्रति को हरि मन्दिर (अमृतसर) में प्रस्थापित किया गया। इस प्रति को करतारपुरवाली बीड़ कहा जाता है, जो इस समय करतारपुर में सोढी वंश के उत्ताधिकारीयों के पास है।
आदि ग्रंथ को अन्तिम रूप देने का कार्य, लगभग सौ वर्ष बाद, दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने किया। छठे, सातवें और आठवें गुरुओं ने वाणी की रचना नहीं की थी। गुरु गोविंद सिंह ने अपने पिता, गुरु तेग बहादुर की वाणी (59 पद और 57 सलोक) को आदि ग्रंथ में सम्मिलित किया। नान्देड़ (महाराष्ट्र) में अपनी ज्योति को परम ज्योति में विलीन करने से पूर्व उन्होंने देहधारी गुरु-प्रथा को समाप्त कर दिया और आदि ग्रंथ को गुरु-पद पर आसीन करने का आदेश दे दिया। उस समय से आदिग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहब कहा जाने लगा।

आदि ग्रंथ के मुद्रित संस्करण में कुल पृष्ठ 1430 हैं। ग्रंथ के अंत में इसके संपादक गुरु अर्जुन देव ने उपसंहार के रूप में एक पद मुंदावणी शीर्षक से लिखा है

थाल विचि तिंनि वसतू पइओ सत सन्तोखु वीचारो। ।
अमृत नाम ठाकरू का पइओ जिसका सभस अधारो।।
जे को खावै जे को भुंचे तिस का होई उधारो।।
एक वसतु तजी नह जाई नित नित कर उरि धारो।।
तम संसार चरन लगि तरीऐ सभु नानक ब्रह्मा पसारो।।

इस पद का भावार्थ है-
 इस ग्रंथ रूपी थाल में सत्य, संतोष और प्रभु नाम का अमृत रखा गया है, जो सभी का आधार है। जो कोई भी इसका सेवन करेगा और उसके विचारों को आत्मसात करेगा, उसका उद्धार होगा। इस ग्रंथ में जो वस्तु (विचार) है, उसे छोड़ा नहीं जा सकता। इसलिए इसे सदा अपने हृदय में धारण करना ही उचित है। इस ग्रंथ में दिये गये उपदेश को चरणों से लगकर अँधेरे से मुक्ति पायी जा सकती है। इसका मूल उपदेश यह है कि परमात्मा की व्याप्ति सभी ओर है।

अनेक पक्षों से यह ग्रंथ अनुपम एवं अद्वितीय है। इसमें बारहवीं शती के शेख फरीद और जयदेव से लेकर सत्रहवीं शती के गुरु तेगबहादुर तक पाँच शक्तियों में अवतरित गुरुओं, सूफियों, संतों और भाट कवियों की भक्तिपूर्ण रचनाएँ संगृहीत हैं। इस दृष्टि से इस ग्रंथ को पाँच शताब्दियों की, भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक थाती का एक प्रतिनिधि ग्रंथ स्वीकार किया जा सकता है।



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