तुलसी - सं. उदयभानु सिंह Tulsi - Hindi book by - Uday Bhanu Singh
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तुलसी

सं. उदयभानु सिंह

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13651
आईएसबीएन :9788183616379

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साहित्य मनीषी पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि ''तुलसीदास के काव्य में उनका निरीह भक्त-रूप बहुत स्पष्ट हुआ है, पर वे समाज-सुधारक, लोकनायक, कवि, पंडित और भविष्य-दृष्टा भी थे।

साहित्य मनीषी पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि ''तुलसीदास के काव्य में उनका निरीह भक्त-रूप बहुत स्पष्ट हुआ है, पर वे समाज-सुधारक, लोकनायक, कवि, पंडित और भविष्य-दृष्टा भी थे। यह निर्णय करना कठिन है कि इनमें से उनका कौन-सा रूप अधिक आकर्षक और प्रभावशाली था। इन सब गुणों ने तुलसीदास में एक अपूर्व समता ला दी। इसी सन्तुलित प्रतिभा ने उत्तर-भारत को वह महान साहित्य दिया जो दुनिया के इतिहास में अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं जानता।’’ ऐसी महान प्रतिभा के समग्र व्यक्तित्व व कृतित्व का वस्तुगत विश्लेषण इस पुस्तक के निबन्धों में हुआ है। इन निबन्धों में तुलसीदास के जीवन-दर्शन और उनकी काव्यात्मक उपलब्धियों के विविध आयामों पर लेखकों ने सर्वथा नए ढंग से विचार किया है। तुलसी-साहित्य में रुचि रखनेवाले पाठकों और छात्रों के लिए सर्वथा संग्रहणीय पुस्तक! हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास हिन्दी के मूर्द्धन्य आलोचक, चिन्तक डॉ. बच्चन सिंह की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। उन्होंने भूमिका में लिखा है : ''न तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के 'हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को लेकर दूसरा नया इतिहास लिखा जा सकता है और न उसे छोड़कर। नए इतिहास के लिए शुक्लजी का इतिहास एक चुनौती है...’’ किन्तु उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारते हुए आगे लिखा : ''रचनात्मक साहित्य पुराने पैटर्न को तोड़कर नया बनता है, तो साहित्य के इतिहास पर वह क्यों न लागू हो?’’ हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास साहित्येतिहास के लेखन के परिप्रेक्ष्य में यही नया पैटर्न ईजाद करने का साहसिक प्रयास है। लेखक ने पुस्तक के पहले संस्करण की भूमिका में इस नए पैटर्न की ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए लिखा : ''शुक्लजी के इतिहास का संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण सन् 1940 में छपा था। उसके प्रकाशन के बाद 50 वर्ष से अधिक का समय निकल गया। इस अवधि में अनेकानेक शोध-ग्रन्थ छपे, नई पांडुलिपियाँ उपलब्ध हुईं, ढेर-सा साहित्य लिखा गया। नया इतिहास लिखने के लिए यह सामग्री कम पर्याप्त और कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यह भी ध्यातव्य है कि शुक्लजी का इतिहास औपनिवेशिक भारत में लिखा गया। अब देश स्वतंत्र है। उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की अपनी समस्याएँ हैं। सांस्कृतिक-सामाजिक संघर्ष हैं, इन्हें देखने-समझने का बदला हुआ नजरिया है। इस नए सन्दर्भ में यदि पिष्टपेषण नहीं करना है, तो नया इतिहास ही लिखा जाएगा।’’ यह 'दूसरा इतिहास’ इसी अर्थ में कुछ दूसरे ढंग से लिखा हुआ इतिहास है। शुक्लजी के बाद के इतिहासों में अद्यतन। लेखक ने आदिकाल को अपभ्रंश काल कहा है और काव्य के साथ गद्य पर भी बेबाकी से विचार किया है। हिन्दी के भक्तिकाल का विवेचन अखिल भारतीय भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में किया गया है। भक्ति के उदय के कारणों पर भी नई दृष्टि से विचार किया गया है। इतिहास का सबसे मौलिक अंश रीतिकाल का विवेचन है जिसमें हिन्दी के रीतिकाव्य के साथ ही उर्दू के रीतिकाव्य का भी समावेश कर लिया गया है। इसके अलावा रीतिकाव्य के विभाजन-विवेचन में भी इतिहासकार के नए सोच के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। आधुनिक काल का आरम्भ 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम से मानते हुए लेखक ने इस काल का उपविभाजन 'नवजागरण-युग’, 'स्वच्छन्दतावाद-युग’ तथा 'उत्तर-स्वच्छन्दतावाद-युग’ के नाम से किया है। उत्तर-स्वच्छन्दतावाद-युग के अन्तर्गत प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता अैर उत्तर-आधुनिकतावाद का विवेचन मिलता है। गद्य साहित्य का विवेचन करते समय लेखक ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल से ही गद्य की विकास-परम्परा को रेखांकित किया है। यह ग्रन्थ इतिहास की धारावाहिक निरन्तरता के साथ ही हिन्दी के प्रमुख साहित्यकारों और साहित्यिक कृतियों का मौलिक दृष्टि से मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही डॉ. बच्चन सिंह ने अपने निजी दृष्टिकोण तथा साहित्यिक समझ के आधार पर इसमें बहुत कुछ नया जोड़ा है जो इस कृति को सच्चे अर्थों में हिन्दी साहित्य का विशिष्ट इतिहास प्रमाणित करता है।


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