दलित वीरांगनाएँ एवं मुक्ति की चाह - बद्री नारायण Dalit Veerangnayen Evam Mukti Ki Chah - Hindi book by - Badri Narayan
लोगों की राय

नारी विमर्श >> दलित वीरांगनाएँ एवं मुक्ति की चाह

दलित वीरांगनाएँ एवं मुक्ति की चाह

बद्री नारायण

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13806
आईएसबीएन :9788126726707

Like this Hindi book 0

यह पुस्तक रेखांकित करती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दलितों की भूमिका से सम्बंधित मिथकों और स्मृतियों का उपयोग इधर राजनितिक गोलबंदी के लिए किस तरह किया जा रहा है।

भारत में सांस्कृतिक अभ्युदय की गवेषणा करने वाली यह पुस्तक उत्तर भारत में दलित-राजनीति के प्रस्फुटन का अवलोकन करती है और बताती है कि 1857 की विद्रोही दलित वीरांगनाएँ, उत्तर प्रदेश में दलित-स्वाभिमान की प्रतीक कैसे बनीं और उनका उपयोग बहुजन समाजवादी पार्टी की नेत्री मायावती की छवि निखारने के लिए कैसे किया गया। यह पुस्तक रेखांकित करती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दलितों की भूमिका से सम्बंधित मिथकों और स्मृतियों का उपयोग इधर राजनितिक गोलबंदी के लिए किस तरह किया जा रहा है। इसमें वे कहानियां भी निहित हैं जो दलितों के बीच तृणमूल स्तर पर राजनितिक जागरूकता फ़ैलाने के लिए कही जा रही हैं। व्यपार-शोध और अन्वेषण पर आधारित इस पुस्तक में इस बात का भी उल्लेख है कि किस तरह लोगों के बीच प्रचलित किस्सों को अपने मनमुताबिक मौखिक रूप से या पम्फलेट के रूप में फिर से रखा जा रहा है और किस प्रकार अपने राजनितिक हित-साधन के लिए प्रत्येक जाती के देवताओं, वीरों एवं अन्य सांस्कृतिक उपादानों को दिखाकर प्रतिमाओं, कैलेंडरों, पोस्टरों और स्मारकों के रूप में तब्दील कर दिया गा है। इस पुस्तक में यह भी दर्शाया गया है कि कैसे बी.एस. पी. अपना जनाधार बढाने के लिए ऐतिहासिक सामग्रियों का निर्माण एवं पुनर्निर्माण करती है। यह पुस्तक जमीनी सच्चाइयों एवं परोक्ष जानकारियों पर आधारित है, जिसमें लेखक राजनितिक गोलबंदी के लिए ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों के इस्तेमाल का विरोध करता है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book