Ek Kavi Ki Note Book - Hindi book by - Rajesh Joshi - एक कवि की नोट बुक - राजेश जोशी
लोगों की राय

आलोचना >> एक कवि की नोट बुक

एक कवि की नोट बुक

राजेश जोशी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :222
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13853
आईएसबीएन :8126708905

Like this Hindi book 0

यह एक कवि की नोटबुक है। इसलिए उसमें व्यवस्था कम, बहक ज्यादा है।

एक कवि की नोट बुक कला या लिखने की सारी तरकीबें कलाकार या रचनाकार की सृजनात्मक क्षमताओं और कौशल से ही हमेशा पैदा नहीं होतीं, कई रचनाकार ऐसे होते हैं जो हमेशा लिखने से बचने की कोशिश करते रहते हैं। रचना जब भी उनकी खोपड़ी पर सवार हो जाती है या लिखने की बाध्यता उनके सामने आ खड़ी होती है, वे इससे बचने के लिए बहाने खोजने लगते हैं। यह एक त्रासदायक स्थिति है। इसमें बचने और लिखने का एक विकट द्वन्द्व चलता रहता है। गद्य लिखना मेहनत का काम है। व्यवस्थित गद्य लिखना तो और भी ज्यादा। उसके लिए जैसा व्यवस्थित अध्ययन और जमकर बैठने की तैयारी एक लेखक की होनी चाहिए, वह मेरी कभी नहीं रही। मैं हमेशा ही एक बैक बेंचर छात्र रहा हर जगह, जो क्लासरूम में बैठने के बजाय कैंटीन में बैठकर गप्पों में अपना समय बिताना पसन्द करता रहा। इसलिए जो भी और जब भी लिखा टुकड़ों-टुकड़ों में लिखा। उन्हें डायरियाँ भी कहना मुनासिब नहीं। डायरियों में एक व्यवस्था होती है। सुविधा के लिए ज्यादा से ज्यादा इन्हें नोट्स कहा जा सकता है। कुछ भी पढ़ते या सोचते हुए छोटी-छोटी पर्चियों पर या कापी के सफ़ों पर बनी, वह भी उसे छोटे-छोटे नोट्स की शक्ल में ही लिखा। इस किताब में कवियों या कविता पर केन्द्रित जो टिप्पणियाँ हैं या कविता की किताबों पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ, सब कुल मिला कर नोट्स ही हैं। यह एक ऐसी तरकीब है जिसे निबंध न लिख पाने की अपनी अक्षमता के चलते मैंने अपनी काहिली और सुविधा के लिए ईजाद किया। इसलिए इसे आलोचना या समीक्षा जैसा काम तो कतई नहीं कहा जा सकता। नोट्स में एक बेतरतीबी है। एक अव्यवस्था है। मुझे लगता है कि रचना के भीतर अर्जित की गयी स्वतंत्रता के अधिक करीब पहुँचने में यह कोशिश ज्यादा कारगर है। हिन्दी कविता के लिए मुझे अक्सर एक रूपक गढ़ने की इच्छा होती है कि इसकी काया मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन के पाँच तत्त्वों से बनी है और इसके प्राणतत्त्व निराला हैं। हर रूपक की तरह लेकिन यह रूपक भी अपर्याप्त है पर इससे हिन्दी कविता के नाक-नक्श कुछ हद तक तो पहचाने ही जा सकते हैं। आठवें दशक की कविता को सामने रखकर अपने से पहले की कविता को टटोलने की कोशिश में नोट्स का यह पुलिन्दा तैयार हो गया है। यह एक कवि की नोटबुक है। इसलिए उसमें व्यवस्था कम, बहक ज्यादा है।

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book