काल बाँका तिरछा - लीलाधर मंडलोई Kala Banka Tirchha - Hindi book by - Leeladhar Mandloi
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काल बाँका तिरछा

लीलाधर मंडलोई

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13955
आईएसबीएन :8126708433

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लीलाधर मंडलोई की विशिष्टता उस दुर्लभ अनुभव संसार की है जो हिन्दी के मध्यवर्गीय काव्य-परिदृश्य के लिए अभी तक अछूता और अदृश्य रहा है।

लीलाधर मंडलोई की कविताओं ने समुद्री हवाओं में उड़ते नमक, निविड़ वनों की निस्तब्धता और लुप्त होती जनजातियों के संगीत से अपनी पहचान बनाई थी। इन कविताओं में हमारी कामभावना के दमित ऐन्द्रिक स्पेस का प्रकृति के अनन्त में विलयन का क्षण हो या तेन्दुलकर की मुस्कान का बाज़ार के हित में स्थानान्तरित हो जाने का हादसा, यह देखना सुखद है कि निरन्तर विकसित होते उनके सरोकार सौन्दर्य और संवेदना को बचाए रखने की मुहिम के साथ ही उन ताक़तों और प्रक्रियाओं को भी बेनक़ाब करते चल रहे हैं जिन्होंने हमारी मनुष्यता के स्रोतों को ही निगलना शुरू कर दिया है। बेटियाँ हों या अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करती अनाम मजदूरिनें, स्त्रियों के प्रति उनकी काव्य-दृष्टि न सिर्फ़ गहरी ममता से भरी है बल्कि वह उनकी अपराजेयता का मंगलगान भी गाती है। लीलाधर मंडलोई की विशिष्टता उस दुर्लभ अनुभव संसार की है जो हिन्दी के मध्यवर्गीय काव्य-परिदृश्य के लिए अभी तक अछूता और अदृश्य रहा है। घृणा से भरे इस माहौल में, जबकि एक कवि दूसरे का नाम तक लेने से कतराता है, मित्र कवियों के लिए उनके स्नेह का अतिरेक न सिर्फ़ सुखद प्रतीति देता है बल्कि उनकी कविता के शिल्प और सौन्दर्य के नए द्वार भी खोलता है। मंगलेश डबराल के लिए वह कहते हैं- ‘वह जो दुःख में डूबा गाता जब / बादलों से उतरते सुनहले कण / करते अभिषेक अंगारों की शैया पर लेटे शब्दों का / जिनमें अनन्त सृष्टि तक लड़ने की ऊर्जा।’ (नील जल) लीलाधर मंडलोई की कविता ‘धरती की ही नहीं आकाश की दरारों के बारे में भी सोचती है’ और अपनी आस्था के उस आयाम को उद्घाटित करती है ‘जहाँ एक चींटी भी अपदस्थ कर सकती है ईश्वर को’ क्योंकि ‘ईश्वर के भरोसे कवि छोड़ नहीं सकता यह दुनिया।’ (पराजयों के बीच)। अनायास नहीं है कि शोषितों के प्रति उसकी गहरी प्रतिबद्धता क्रान्ति को एक सहज और अनिवार्य परिणति के रूप में देखती है। यहाँ पर्वत के पीछे सूर्य डूबता नहीं बल्कि पर्वत पर आरूढ़ होता है ठीक उसी क्षण एक नर चीता एक मादा चीता पर। यह सृष्टि-क्रम, रात और दिन का संधिकाल, एक लुप्त होती प्रजाति का मिथुन युगल और ‘पर्वत पर आरूढ़’ सूर्य की सुनहली आभा के बिम्बों को एक साथ देखना (स्पेस की सम्पूर्णता में समाहित होता एक निजी स्पेस) न सिर्फ़ हमारे सौन्दर्यबोध को एक नया संस्कार देता है बल्कि अपने आप में रोमांचकारी और अभूतपूर्व है- ‘रोशनी के उतरते झरने में / मैंने उस रोज़ अपना अन्धकार देखा।’ (मनुहार) ‘आपको क्यों नहीं दीखता डॉ. कुरियन’ में अप्राकृतिक बल्कि अमानुषिक क्रूरता के साथ गायों की जननेन्द्रिय में गर्भाशय तक फूंकन प्रवेश कराकर अधिक दूध निकालने से सूजे हुए थनोंवाली, और लंगड़ाती हुई गायें हैं जिन्हें देखकर दूध से और मक्खन खाते कृष्ण तक से सहज ही विरक्ति हो जाती है। लीलाधर मंडलोई की कविताएँ न सिर्फ़ अनेक दुर्लभ प्रसंगों और अछूती स्थितियों के लोक में हमें ले जाती हैं बल्कि वे पूर्व परिचित इलाक़ों में भी ऐसे गोपनीय दृश्यों को बेनक़ाब करती चलती हैं जहाँ यथार्थ की भयावहता बिना किसी कौशल के हमें स्तब्ध कर देती है। निरी गद्यात्मकता का जोखिम उठाकर भी कवि का आवेग हमें उन स्थलों तक ले जाना चाहता है, जहाँ यह साफ़ हो सके कि मुद्दे की तात्कालिकता रूप को नहीं वस्तु को बदलने की है। यहाँ काव्यभाषा का विस्थापन और विस्तार एक साथ ऐसे अनगढ़ और अव्यवहृत और इसीलिए ऐसे ताज़े और टटके शब्दों के माध्यम से हुआ है जो भाषा को नए सिरे से समृद्ध करते हैं। पक्षीजल और अभिनय मुस्तैद अफसर से लेेकर, झटाझूम, लमलेट, मरगुल्ला, बरहमेस, बरकाना, सगामन और पन्हइयाँ जैसे शब्दों की एक लम्बी सूची बनाई जा सकती है। ‘चिड़िया नहीं वह नीले पंखोंवाली सुन्दरी जिसकी चोंच का स्पर्श पाते ही गूलर मुँह खोलकर हँसने लगता है’ याद करें बीजों की असंख्य प्रजातियाँ जो चिड़ियों के उदर की ऊष्मा से गुज़रकर ही अंकुरित होने की क्षमता प्राप्त करती हैं। परस्पर निर्भरता के इस अनोखे रिश्ते और प्रेम में ही है दोनों के अस्तित्व की अमरता। इसी क्रम की दूसरी कविता में गूलर की छाल की औषधि ज़ख़्म पर लगा और तने से पीठ टिकाकर कृतज्ञ कवि-दृष्टि वृक्ष को पिता के रूप में देखती है। (याद आए पिता) हम गुनहगार हैं बेटियों / पहली फुर्सत में छोड़ जाना हमें / कि हमें छोड़ जाना ही मुक्ति के रास्ते पहला क़दम’। (बेटियों से क्षमायाचना) जिस समाज में न बेटियों का ब्याहा जाना संभव है, न उन्हें सुरक्षा दे पाना और जहाँ लाखों की तादाद में प्रति वर्ष वे सल्फ़ास खाकर या फंदे से लटककर विदा हो जाती हैं, उस समाज के करोड़ों पिताओं की ओर से क्षमा माँगती ये पंक्तियाँ समकालीन काव्य-परिदृश्य की ऐसी विरल पंक्तियाँ हैं जो न सिर्फ़ अपनी सामूहिक निरुपायता और निष्क्रियता के सहज स्वीकार से हमें भीतर तक हिला देती हैं बल्कि हमारी जड़ चेतना पर एक सख़्त प्रश्नचिद्द भी लगाती हैं। कारुणिक स्थितियों के ऐसे बिन्दु एक सहज तार्किकता और संवेदनशीलता की अनिवार्य निष्पत्तियों के रूप में उभरते हैं। कोयला खदान से लेकर बीहड़ वनों तक और बेटियों से लेकर जूता पालिश करते बच्चों तक एक अदृश्य अनुभव संसार को उद्घाटित करती ये कविताएँ सर्वथा नए और अछूते प्रसंगों और चरित्रों की आमद से हमारी बहुत सी जड़ताओं की मुक्ति के द्वार भी खोलती हैं।


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