कला के सामाजिक उद्गम - गिऑर्गी प्लेखानोव Kala Ke Samajik Udgam - Hindi book by - Georgi Plekhanov
लोगों की राय

कला-संगीत >> कला के सामाजिक उद्गम

कला के सामाजिक उद्गम

गिऑर्गी प्लेखानोव

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 13956
आईएसबीएन :9788126723041

Like this Hindi book 0

कला और साहित्य पर प्लेखानोव की ज्यादातर कृतियों का मुख्य उद्देश्य कला और इसकी सामाजिक भूमिका को भौतिकवादी दृष्टि से प्रमाणित करना था।

कला-साहित्य-संस्कृति के प्रश्नों पर प्लेखानोव की कृतियों में सर्वोपरि और सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं ‘असम्बोधित पत्र’ और ‘कला और सामाजिक जीवन’। कला और साहित्य पर प्लेखानोव की ज्यादातर कृतियों का मुख्य उद्देश्य कला और इसकी सामाजिक भूमिका को भौतिकवादी दृष्टि से प्रमाणित करना था। इन कृतियों में ‘बेलिस्की की साहित्यिक दृष्टि’ (1897), ‘चेर्निशेव्स्की का सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त’ (1897), ‘असम्बोधित पत्र’ (1890-1900), ‘अठारहवीं सदी के फ्रेंच नाटक और चित्राकला पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक नजर’ (1905) तथा ‘कला और सामाजिक जीवन’ (1912) प्रमुख हैं। कलात्मक सृजन को वस्तुगत जगत से स्वतंत्र माननेवाले और कला को मानवात्मा की अन्तर्भूत अभिव्यक्ति बताने वाले प्रत्ययवादी सौन्दर्यशास्त्रियों के विपरीत प्लेखानोव ने दर्शाया कि कला की जड़ें वास्तविक जीवन में होती हैं और यह सामाजिक जीवन से ही निःसृत होती है। कला और साहित्य की एक वैज्ञानिक, मार्क्सवादी समझ विकसित करने का प्रयास उनकी सभी कृतियों की विशिष्टता है। ‘कला, कला के लिए’ के विचार की प्लेखानोव ने तीखी आलोचना की। उन्होंने दर्शाया कि यह विचार उन्हीं दौरों में उभरकर आता है जब लेखक और कलाकार अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक दशाओं से कट जाते हैं। यह विचार हमेशा ही प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों की सेवा करता है लेकिन जब समाज में वर्ग-संघर्ष तीखा होता है तो शासक वर्ग और उसके विचारक खुद ही इस विचार को छोड़ देते हैं और कला को अपने बचाव के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगते हैं।

लोगों की राय

No reviews for this book