पहर ये बेपहर का - तुषार धवल Pahar Yeh Bephar Ka - Hindi book by - Tushar Dhawal
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पहर ये बेपहर का

तुषार धवल

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 14117
आईएसबीएन: 9788126716838

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पहर यह बेपहर का की कविताएँ बताती हैं कि यह नया कवि वास्तव में कितना सिद्धहस्त है।

तुषार धवल की कविताओं का भूगोल काफी विस्तृत है और बीहड़ भी। समकालीन समाज अनेक रूपों, अनेक छवियों में अपनी तमाम जटिलताओं के साथ उनकी कविताओं में मौजूद दिखाई देता है। उनकी कविता तेज़ी से बदल रहे परिवेश से उलझती-झगड़ती कविता है। आज के दौर में पूँजी और तकनीक के मेल से मानव जीवन, स्वभाव और समाज बुनियादी बदलाव के दूरगामी प्रभावों के सामने अकबकाया खड़ा है। जिस गति से ये बदलाव आज हो रहे हैं इतिहास में पहले कभी नहीं हुए। कवि अपनी परख, संवेदना और समझ से इसी तेज़ी से बदल रहे अपने विश्व को समझना चाह रहा है। सरोकार का यह बदलता सन्दर्भ उनकी कविताओं को पिछले दशकों के कवियों से यहीं अलग कर देता है। धूप में/सूखती अँतड़ियों के बीच/चल रहा हूँ/अपनी जमीन के लिए/हाथ में उठाए/ तुम्हारी जूठन का प्रसाद उनकी कविताओं में विस्थापन का दंश है, संघर्ष का वैभव है, रिश्तों में बढ़ती अजनबियत है, शहरों का बदलता परिदृश्य है, उदारीकरण के बाद नया बनता समाज है। अकारण नहीं है कि उनकी कविताओं में कभी मोबाइल खो जाता है तो कभी एसएमएस करती लड़की दिखाई दे जाती है। तो कभी दबाब में जी रहे आज के मनुष्य की मानसिक स्थिति नींद में चलता/सपने में बड़बड़ाता/मैं आदमी हूँ नई सदी का जैसी पंक्तियों से प्रकट होती है। वैसे तो पहर यह बेपहर का तुषार का पहला ही कविता संग्रह है मगर उनका काव्य-मुहावरा प्रचलित समकालीन काव्य-मुहावरों से नितान्त भिन्न है। आज हिन्दी कविता में जिस तरह की चीख-पुकार, जिस तरह का हाहाकार व्याप्त है उसमें समकालीन कवियों की अपनी विशिष्टता कम ही लक्षित हो पाती है। इसके विपरीत तुषार धवल की कविताओं में मितकथन की शैली अपनाई गई है। सादाबयानी और मितकथन के मेल से उनकी कविताओं का मुहावरा तैयार होता है। उनकी कविताओं में केवल बौद्धिकता नहीं है सहज रागात्मकता भी है। रागात्मकता जीवन-जगत के प्रति, निजी रिश्तों के प्रति। चालीस साल कंधों पर/कारखाना उठाए/अब सो रहे हैं पिता/ उनके सपने में आए हैं हाल पूछने/उनके पिता - केवल सम्बन्धों की परम्परा ही नहीं उनकी कविताओं में हिन्दी की कविता-परम्परा की अनुगूँजें भी साफ सुनाई देती हैं। तुषार की कविताओं में अकविता का आवेश है तो नई कविता सी प्रश्नाकुलता भी है। पहर यह बेपहर का की कविताएँ बताती हैं कि यह नया कवि वास्तव में कितना सिद्धहस्त है।

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