सत्य की खोज - सर्वपल्ली राधाकृष्णन Satya ki Khoj - Hindi book by - Sarvpalli Radhakrishnan
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सत्य की खोज

सर्वपल्ली राधाकृष्णन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1416
आईएसबीएन :81-7028-208-x

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‘सत्य की खोज’ डा.राधाकृष्णन् के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त ग्रंथ ‘रिकवरी ऑफ फ़ेथ’ का प्रामाणिक और प्रवाहपूर्ण अनुवाद है। इस रचना में शाश्वत सत्य की खोज परख की गई है।

Satya Ki Khoj

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज के विश्व के लिए किसी सामाजिक- राजनीतिक अथवा आर्थिक पुनर्गठन से भी अधिक गहरी एवं मूलभूत आवश्यकता है आत्मिक पुनर्जागरण की, खोई हुई आस्था को प्राप्त करने की। सभी धर्म घोषित करते हैं कि मानवता के इस ऐक्य की स्वीकृति के लिए हमें अपने मन एवं हृदय को अब भी तैयार करना है। जातियों एवं राष्ट्रों के विभाजन के बीच, राष्ट्रों की प्रतिद्वन्द्विता और धर्मों के संघर्ष के बीच, एक नई एकता का निर्माण करने के लिए एक नये मोड़, एक नवीन स्थापना की जरूरत है। इसके लिए साहसिक प्रयत्न और हमारे दृष्टिकोण में क्रान्तिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है।

प्रकाशकीय

पूर्व राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन् हमारे युग के एक महान् विचारक और दार्शनिक थे। भारतीय विचार-परम्परा के मूर्धन्य व्याख्याता और तत्व-चिन्तक के रूप में संसार के बौधिक क्षेत्रों में उन्हें बड़े सम्मान का स्थान प्राप्त है। उनकी पांडित्यपूर्ण रचनाओं ने आधुनिक विचार-जगत् को गहराई से प्रभावित किया है।

हमारा युग कई अर्थों में मानव इतिहास में एक अद्वितीय युग है। वैज्ञानिक आविष्कारों और मनोवैज्ञानिक खोजों ने जैसे मनुष्य के बाहर और भीतर का सब कुछ बदल डाला है। ऐसी मान्ताएं जिन्हें इतिहास की स्वीकृति प्राप्त थी, आज हमें निरर्थक-सी प्रतीक होती है, जब कि नये मूल हमारी आस्था और हमारे विश्वास को चुनौती दे रहें है। अपूर्व संभावनाओं से भरे इस युग को समझने के लिए एक संतुलित दृष्टि और एक सम्यक, युग-बोध की प्राप्ति में हमारी सबसे बड़ी सहायक हैं। इस दृष्टि से उनकी प्रसिद्ध रचना ‘सत्य की खोज’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। इस प्रेरणाप्रद ग्रन्थ में डॉ. राधाकृष्णन ने एक नई आस्था, एक नये विश्वास की खोज में आधुनिक मानव का पथ-निर्देशन किया है।

मनुष्य विगत और वर्तमान में अब तक जिन मान्यताओं को स्वीकार करता रहा है, उन्हें विवेक और तर्क की कसौटी पर कसते हुए डा. राधाकृष्णन् ने ‘सत्य की खोज’ में प्राचीन उपनिषदों से लेकर आधुनिक दार्शनिकों तक के विचारों का अपनी प्रवाहमयी और ओजस्वी शैली में बड़े सरल ढंग से विश्लेषण और मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि किस प्रकार प्राचीन और नवीन चिन्तन-प्रयासों के बीच से ही एक ऐसी आस्था, एक ऐसे युग-सत्य की उपलब्धि हो सकती है, जो हमारी अपूर्णताओं और अपर्याप्तताओं को दूर करने में सहायक होगी।
‘सत्य की खोज’ डा.राधाकृष्णन् के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त ग्रंथ ‘रिकवरी ऑफ फ़ेथ’ का प्रामाणिक और प्रवाहपूर्ण अनुवाद है।

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विषय-प्रवेश

भावुक और जानकार व्यक्तियों का विश्वास है कि आज के विश्व के लिए किसी सामाजिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक पुनर्गठन से भी अधिक गहरी एवं मूलभूत आवश्यकता है- आत्मिक पुनर्जागरण की, खोई हुई आस्था को पुनः प्राप्त करने की। जब सभ्यता में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है, तब वह विखण्डित होने लगती है। इससे उत्पन्न होने वाली निराशा के मध्य मानवप्रज्ञा वर्तमान समाज-व्यवस्था की अपूर्णता को स्वीकार करने और नये सिरे से उसकी नींव डालने तथा उसके आधार को बदलने की ओर उन्मुख होती है।

यह भावना कि हम अपने इतिहास की एक निर्णायक घड़ी पर आ पहुँचे है और हमें ऐसा चुनाव कर लेना है जो सदियों की घटनाओं की गति एवं दिशा को निश्चित रूप प्रदान करेगा, हमारे युग के लिए कुछ नवीन नहीं है। इतिहास के अनेक युगों में गलत या सही इस प्रकार का विश्वास पहले भी रहा है और, उनमें से प्रत्येक ने ही यह अनुभव किया है कि दूसरे युगों की उपेक्षा उसके लिए ऐसा दावा करने का अधिक औचित्य है। जब रोम का पतन हुआ तो आगस्टाइन ने विलाप करते हुए कहा थाः ‘‘रोम के पतन पर समस्त विश्व रो रहा है।’’

बैतुलहम के अपने मठ से संत जेरोम ने लिखाः ‘‘समस्त मानव-जाति ही इस विनाश के क्रोड़ में आ गई है, मेरी जिह्ना तालू से चिपक गई है और रोदन ने इस चिन्ता में मेरी वाणी को रूद्ध कर दिया है कि आज वह नगर बंदी है जिसने समस्त विश्व को अपना बंदी बना डाला था।’’ इससे पूर्व की सहस्त्राब्दि में थूसाइडाइड्स ने 431 से 404 ईसा पूर्व के पेलोपोनीशियन युद्ध में एथीनियन साम्राज्य के पतन पर शोक-संतप्त उद्गार प्रकट किए थे। 4000 वर्ष से भी अधिक पुरानी एक प्राचीन मिस्री पाण्डुलिपि में निम्नलिखित वाक्य मिलते हैः

चोरों का आधिक्य है... कोई खेत नहीं जोतता। लोग कहते हैं, हम नहीं जानते कि दिन-दिन क्या घटनाएं घटेंगी।’...हर जगह धूल उड़ती है, और किसी के बदन पर स्वच्छ वस्त्र नहीं दिखाई पड़ते।... कुम्हार के चक्र की भांति देश गोलाकार घूम रहा है।...दासियां स्वर्णाभूषणों से अलंकृत दीख पड़ती हैं। किसी की हंसी नहीं सुनाई पड़ती।...बड़े-छोटे सब यही कहते हैं अच्छा होता, ऐसे समय हम न पैदा हुए होते।... समृद्ध लोगों को चक्की पीसनी पड़ रही है...अच्छे घरों की महिलाओं को दासियों का काम करना पड़ रहा है।...लोग इतने क्षुधातुर  हैं कि शूकरों के मुंह से गिरे टुकड़ों पर झपट पड़ते हैं... जिन कार्यालयों में अभिलेख रखे थे उन्हें तोड़कर ध्वस्त कर दिया गया है तथा कागज-पत्र नष्ट कर दिए गए है...कुछ मूर्खों ने देश को राजतन्त्र से वंचित कर दिया है।...

अधिकारियों को इधर-उधर खदेड़ दिया गया है।... कोई भी सार्वजनिक कार्यालय वहाँ नहीं है जहाँ उसे होना चाहिए, और जनता की अवस्था बिना चरवाहे की भेड़ों के समान हो गई है।... कलाकारों ने अपनी कलाओं का सृजन बंद कर दिया है।... थोड़े-से लोग बहुतों का वध कर रहे हैं। कल तक जो नगण्य था, आज धनवान है और पहले के धनवान उसे खुशामद से अभिभूत किए डालते है... धृष्टता का बोलबाला है... काश, मनुष्य का अन्त हो जाता, नारियां न गर्भ धारण करती और न शिशुओं को जन्म देतीं। तभी अन्त में संसार को शान्ति मिलेगी।1

मानव की स्मृति उसे अपनी जाति की आयु से अवगत कराती रहती है इसीलिए दो हजार वर्ष पूर्व की भाँति आज भी वह अनुभव करता है कि वह जमीन की अन्तिम अवधि में रह रहा है। किन्तु पहले जमाने में सभ्यताएं जब एकाधिक महाद्वीपों में नष्ट हो जाती थीं, तब भी दूसरे क्षेत्रों में बनी रहती थीं और अतीत का संचित ज्ञान हमारे बांधवों को जाति के भविष्य की रक्षा की शक्ति प्रदान करता रहता था। मिस्री, यूनानी तथा यूनानी-रोमन सभ्यताएं विश्व के लघु भूखण्डों तक मर्यादित थीं, इन भूखण्डों तक ही समस्त मानव जाति का अन्त नहीं था किन्तु आधुनिक सभ्यता की शक्तियां विश्व-व्यापिनी हैं। फिर यह बात भी ध्यान रखने की है कि जब दूसरी सभ्यताओं का पतन हुआ, तब आक्रमण का स्रोत मुख्यताः बाहरी था। आज संकट अंदर से है।

दुनिया में इतने विराट परिवर्तन हो रहे हैं कि अतीतकालिक परिवर्तनों से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। वर्तमान स्थित महान सम्भावनाओं से, असीम संकटों एवं अतुलनीय पुरस्कारों से पूर्ण है। यह अन्त भी सिद्ध हो सकती है और एक नवीन समारंभ भी। मानव- जाति आत्मविनाश करके समाप्त हो सकती है, या उसकी आध्यात्मिक प्राणवत्ता पुनर्जीवित हो सकती है और एक ऐसे नवीन युग का आविर्भाव हो सकता है जब यह धरती मानवता के वास्तविक गृह का रूप धारण कर ले। आधुनिक मस्तिष्क अस्पष्ट अलौकिक भयों और गंभीर रहस्यात्मक आकांक्षाओं के बीच डावांडोल है।

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1. एमैन की पुस्तक ‘दाइ लितरेत्यूर दे इजिप्तेजन’ (मिस्रियों का साहित्य), 1923, पृष्ठ 130-148 से कार्ल जैस्पर्स द्वारा अपने ग्रन्थ ‘मैन इन दि माडर्न एज’ (1951) पृ.24, भूमिका भाग में उद्धृत।

भविष्य का रूप क्या होगा, इस चिन्ता से हम आज बुरी तरह ग्रस्त हैं। हमारे पास जो भी साधन है, जो भी वरदान हमें प्राप्त हैं, जितनी भी शक्तियां हममें विकसित हो पाई हैं, उन सबके साथ भी हम शान्ति एवं सुरक्षापूर्ण जीवन व्यतीत करने में असमर्थ है। हमारा ज्ञान बढ़ गया है, हमारी जानकारी बढ़ गई है, परन्तु विवेक एवं सद्गुणों में हमारा विकास नहीं हो पाया है, और उसके अभाव में सब वस्तुएं चिरन्तन संघर्ष में विजड़ित हो उठी हैं। कोई केन्द्र ऐसा नहीं जो विश्व को एक में बांधकर रख सके।

अब तक विवेक एवं सद्गुणों के विकास के लिए धर्म अनुशासन का काम देता रहा है, किन्तु आज धर्म-विश्वास से खिसककर हम बहुत दूर चले गए हैं और सुरक्षा का हाशिया आज खतरनाक रूप से छोटा और संकुचित हो गया है। सामाजिक  मनोव्यथा का शोषण करने वाले  असंख्य व्यक्ति विश्व के विभिन्न भागों में पैदा हो गए हैं, जो अपने को नेता कहते हैं और विवेक के नाम पर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते रहते हैं। हम एक साथ अन्न एवं घास-पात दोनों का रोपण कर रहे हैं।

यह सोचने से कोई राहत नहीं मिलती कि अरक्षा या भावी विनाश की भावना सृष्टि के आरम्भ से मानव-पीढ़ियों को ग्रस्त किए रही है और काल के आरम्भ से ही ऐसा होता रहा है। सवाल यह है कि क्या विश्व के अंत तक इसे वैसा ही रहना चाहिए ?1 यह विश्वास कर लेना कि यह प्रकृति का नियम है, यह नियति का अभिलेख है जिससे हम सदा के लिए बंधे हुए हैं, मानव की अन्तरात्मा का खण्डन करना है। यदि ए.एन. व्हाइटहेड के शब्दों में जीवन जगत् की पुनरावर्तिनी यांत्रिकता के प्रति एक अभियान है तो मानव-जीवन पर तो यह बात और भी अधिक चरितार्थ होती है। मानव निष्ठुर भाग्य की दया पर आश्रित नहीं है। संकल्प करने पर वह अपने अतीत इतिवृत में विकास कर सकता है। इतिहास की अनिवार्यता कहीं नहीं है। यह मान लेना कि हम विनाश के अन्तिम गर्त की ओर ले जानेवाली धारा में बहते हुए विवश प्राणी हैं, निराशा के तत्वज्ञान, शून्यवाद का आलिंगन करने के समान है। हम धारा के विरूद्ध तैर सकते है, यहां तक की उसकी गति बदल सकते हैं।

इतिहास की एक अशुद्ध परिकल्पना लोगों के मन को दूषित कर रही है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि यह विकार, यह भ्रष्टाचार पूर्वनिश्चित दैवी नियति के नाम पर होता है या पूर्णता की ओर अनिवार्य प्रगति के नियम के नाम पर या विश्वमेधा (weltgeist) के नाम पर होता है अथवा वर्गहीन समाज की भावना द्वारा द्वन्द्वात्मक रूप से इतिहास को उसकी अन्तिम परिणति की ओर ले जाते हुए होता है या एक ही परिकल्पना के बहुरूपी नाट्य गोलक की

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1. तुलना करें, मेजर-जेनरल ज. एफ. सी. फुलरः ‘‘मानव-इतिहास में युद्ध से सर्वथा मुक्त एक भी युग दिखाई नहीं पड़ता और ऐसी पीढ़ियां भी क्वचित् ही हैं जिन्होंने किसी संघर्ष के दर्शन न किए हों। समुद्र के नियमित ज्वार के समान ही महायुद्धों की तरंग भी उठती-बैठती रहती है।’’-‘जि डिसाइसिव बैटल्स ऑफ दि वैस्टर्न वर्ल्ड’ (1954), भाग 1, पृष्ठ 11 ।

सूत्रधारिणी एक नियति द्वारा। काल्विन के मत में, अतर्क्य एवं अग्रहणीय दैवैच्छा ही अन्तिम सत्य है।1, ईश्वर ही सब कुछ है, मानव कुछ नहीं। यदि ईश्वर की इच्छा न होती कि वह कुछ को विनाश से बचा ले, तो वे कभी उससे उबर न पाते। वही कुछ को जीवन और दूसरों को मृत्यु का न्याय प्रदान करता है। यदि मानवता खंडहर बन जाती है तो केवल इसलिए कि दैवी न्याय वैसा ही चाहता है सब नियतिवादी सम्प्रदायों की भांति काल्विनवाद भी आत्मा को अपनी विवशता का बोझ उठाने को छोड़ देता है। काण्ट के लिए इतिहास मानव का क्रमिक सदाशयीकरण है और ऐसा किसी दैवी नियति के ही कारण होता है। हिगेल के लिए इतिहास परमसत्ता का क्रमिक अनावरण है। जैसे भी हो, मानव जाति समत्व की ओर गति कर रही है और द ताकविले ने अनुभव किया कि समत्व की ओर इस प्रगति में दैवी समादेश के ही गुण वर्तमान हैं, ‘‘यह सार्वदेशिक है, यह स्थायी है, यह समस्त मानवी हस्तक्षेपों के परे निकल जाता है।’’2

जीव-विज्ञान संबंधी विकासवाद के सिद्धान्त और वैज्ञानिक विजयों ने प्रगति में एक उत्फुल्ल विश्वास को जन्म दिया, यद्यपि अपने-आप होने वाली प्रगति के किसी नियम की स्थापना वैज्ञानिक आधार पर नहीं की जा सकी। स्पेंसर ने कहा की प्रत्येक पदार्थ, जिसमें मानवता भी सम्मिलित है, अपने-आप अच्छे से अच्छा होता जा रहा है। मार्क्सवादी एक ऐसे युग की ओर आँखें लगाए हुए हैं जब ‘‘भविष्य के पूर्णतः विकसित साम्यवादी समाज में, आवश्यकता के गर्भ से, मुक्ति का सच्चा राज्य विकसित होगा।’’3 ’’यद्यपि मार्क्स ऐतिहासिक शक्तियों की द्वन्द्वात्मक प्रगति पर ज़ोर देता है, किन्तु वह वैयत्तिक प्रयत्न की आवश्यकता की ओर से आँखें नहीं मूंद लेता।

नीत्शे को विश्वास हो गया था कि यूरोप की संस्कृति का विनाश होकर रहेगा, समस्त परम्परागत मूल्यों को ग्रहण लगने ही वाला है और हम मार्ग या पथ-दर्शन से हीन होकर जंगल में भ्रमित हो रहे हैं। स्पेंगलर कहता है कि नियति के ही आदेश से इतिहास के इस युग में हमारे आध्यात्मिक मूल्य विश्रृंखला एवं त्रस्त हो उठे हैं। हमें मुक्ति के शत्रुओं का साथ देकर परिपूर्ण द्वन्द्ववाद या इतिहास को उसके कार्य में सहायता देना है। हम  उदासीन, बल्कि संत्रस्त- से हो गए हैं और हमने मान लिया है हम अपने किसी भी कार्य द्वारा चतुर्दिक् फैले मिथ्याचार की विजय की गति का अवरोध करने में असमर्थ हैं। इतिहास की नियतिवादी विचारधारा में मानव-स्वातंत्र्य की पर्याप्त धारणा नहीं मिलती। उसकी दृष्टि में गहराई और सम्मान का अभाव है। आवश्यकता

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1. काल्विन ने लिखा थाः ‘‘जब हम ईश्वर के पूर्वज्ञान की बात करते हैं जब हमारा मतलब यह होता है कि सब वस्तुएं सदा सनातन काल से उसकी दृष्टि तले है, यद्यपि उसके ज्ञान में कोई अतीत या भविष्य नहीं हैं, केवल वर्तमान है। यह बात समस्त निसर्ग एवं प्राणियों के सम्बन्ध में लागू है।’’
2. ‘डेमोक्रेसी इन अमेरिका’ हेनरी रीव द्वारा अनूदित (1835), भाग की प्रस्तावना।
3. देखे, मॉरिस जिंसबर्ग कृत ‘दि आइडिया ऑफ प्रोग्रेस’ (1953), पृष्ठ 13।

की छाया तले मनुष्य जो संघर्ष करता है उसका उसे ध्यान नहीं, पर मनुष्य की मुक्ति आत्मा से निष्ठा रखे बिना हम अपने लिए भी वही हो जाएंगे जो प्रकृति एवं इतिहास हमारे लिए हो गए हैं- एक जंगल, एक विश्रृंखलता के समान। कर्म पर मुक्ति द्वारा ही विजय मिल सकती है। आत्मा का मुक्ताचरण ही ऐतिहासिक आवश्यकता पर विजय प्राप्त कर सकता है। ‘‘ईश्वर ने मंदिर के विनाश का निर्णय किया है। ईश्वर के ही नाम पर ईश्वर के क्रोध से मंदिर की रक्षा करो।’’ मानव को उस पथ पर चलना है जो उसकी प्रकृति में निहित निम्नतम से, उसकी पशुता से, ऊपर उठाकर उसे श्रेष्ठतम तक पहुंचा दे। मानव-प्राणी पदार्थों में एक पदार्थ-मात्र नहीं है, वस्तुओं में वस्तु-मात्र नहीं है। वह अपने लिए कुछ अर्थ रखता है वह कोई ऐसी मानसिक प्रक्रिया नहीं है जो पहले से ही पूर्णतः निश्चित हो।

यदि उसे पदार्थसत्तात्मक ही बना दिया जाए और आत्मानुभूति से उसे रहित कर दिया जाए, तो वह बस कर्म या आवश्यकता का शिकार होकर रह जाता है। परन्तु पदार्थमूलक घटनाओं से बचना मनुष्य के लिए सम्भव है। वह आत्मवत् हो सकता है तथा अपने-
आप बन सकता है। मानव-जाति का समस्त इतिहास इसके मुक्त होने का निरवच्छिन्न प्रयत्न-मात्र है।  

मानवाकार में जो महान ज्योतियां पृथ्वी पर अवतीर्ण हुईं-बुद्ध, सुकरात, जरथुस्त्र, ईसा- वे सब मानव प्रकृति की दैवी सम्भावनाएं ही हमारे आगे व्यक्त कर गई हैं और हमें आत्मवर्ती होने का साहस प्रदान करती हैं।
अतीतकाल में प्रगति की कोई निरन्तरता नहीं रही है। कभी एक दिशा में होनेवाला विकास दूसरी दिशा में होनेवाली दुरवस्था का सूचक-मात्र रहा है। भौतिक वातावरण को सुधारने में हमने बड़ी प्रगति की है, किन्तु मानव-सम्बन्धों को सुधारने में वैसा नहीं कर पाए। इतिहास की गति में कोई निश्चित नियम, योजना या आकार हमें नहीं प्राप्त होता।

मानवता मनुष्य के मुक्त आचरण द्वारा की गई उछालों द्वारा ही आगे बढ़ती है जब हम वर्तमान स्थित के प्रति सचेत होते हैं तब उसका अभिप्राय यही होता कि हम उसमें सोद्देश्य आचरण कर सकते हैं। स्थित किसी पूर्वनिश्चित एवं नियति-निर्धारित वस्तु की ओर नहीं ले जाती। विनाश की ओर प्रयाण कुछ अनिवार्य नहीं है। हमारा भविष्य इस पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते और संकल्प करते हैं। स्थित की प्रकृति को समझ लेना, उस पर नियंत्रण प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है। जब हम उसे समझ लेते हैं तब उसी से उसमें सुधार-संस्कार करने का संकल्प उत्पन्न होता है। फिर तो हम उसकी गति चाहे जितनी धीमी या तेज कर सकते हैं। हमारे जीवन में इतनी असंगतियां है कि हम निश्चयपूर्वक भविष्य कथन नहीं कर सकते।

परिवर्तन जीवन का नियम है। मनुष्य को अपने चतुर्दिक् फैली स्थित के अनुसार अपने को ढालना पड़ता है जब वह चारों ओर जल ही जल से घिरा होता है, तब समुद्र द्वारा जो कुछ प्राप्त हो जाता है उसी पर गुजर करने वाला मछुआ बन जाता है, यदि वह पादपबहुल उष्णकटिबंधीय जलवायु में रहता है तो कलसंग्रही बन जाता है। मनुष्य को बाह्य प्रकृति और स्वयं अपने साथ समझौता करना ही पड़ता है। वही उसके जीवित रहने की शर्त है। सभी धर्म घोषित करते है कि मानवता का एकीकरण ही उनका लक्ष्य है। भौतिक अथवा भौगोलिक दृष्टि से यह संपादित भी हो चुका है; किन्तु मानवता के इस ऐक्य की स्वीकृति के लिए हमें अपने मन एवं हृदय को अब भी तैयार करना है। जातियों एवं राष्ट्रों के विभाजन के बीच, राष्ट्रों की प्रतिद्वन्द्विता और धर्मों के संघर्ष के बीच, एक नई एकता का निर्माण करने के लिए एक नये मोड़, एक नवीन स्थापना की जरूरत है। इसके लिए साहसिक प्रयत्न और हमारे दृष्टिकोण में क्रान्तिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है।

इस आशा के बिना कि मानवता सचमुच ही एक उच्चतर नैतिक स्तर तक उठने में असमर्थ है या इस स्वप्न के बिना कि अन्त में वह और उसके साथी मानव एक दूसरे को समझने और एक-दूसरे के निकट आने में समर्थ होगें, मनुष्य जी नहीं सकता, न कोई काम कर सकता है। व्यक्तियों एवं राष्ट्रों के विभाजन के बीच केवल विभाजक दीवारें ही नहीं हैं जोड़ने वाली कड़ियां भी हैं। किन्तु मनुष्य-जाति की  सबसे बड़ी मंजिल और सर्वोच्च नियति है-और अधिक मानवीय, और अधिक आध्यात्मिक बनाना तथा संवेदना-सहानुभूतियुक्त समझदारी के और अधिक योग्य होना। आज-जैसे युगों में, जबकि उलझन और भय का राज्य है, यह आशा मानव हृदय में प्रबल हो ही उठती है।

संसार के महान धर्मशिक्षक, जो कुछ उन्हें विरासत में मिला होता है, उससे कुछ भिन्न बात की ही शिक्षा देते हैं। उपनिषदों के ऋषि, गौतम बुद्ध, जरथुस्त्र, सुकरात, ईसा, मुहम्मद, नानक और कबीर इत्यादि अपने जीवन में ही परम्परागत विचारों को अनिवार्य रूप से तोड़ने को बाध्य हुए। जैसे उपनिषदों के ऋषियों और बुद्ध ने वैदिक कर्मकाण्ड का विरोध किया, जैसे ईसा ने यहूदी धर्मांधता को चुनौती दी, वैसे ही हमें ही धर्म के शाश्ववत तत्वों का रूप, और गठन अथवा बाह्य प्रवृत्तियों से, जो मानव की दुर्बलता एवं काल की विकृतियों से उत्पन्न होती है, रक्षा करनी पड़ेगी। जो धर्म हमारे युग की आवश्यकताओं और मांगों के अनुरूप सृजनात्मक अभिव्यक्ति की शक्ति खो चुका है, उसे छोड़ ही देना चाहिए। कालिदास

 ‘मालविकाग्निमित्र’ में कहते हैं ‘‘हर चीज़ केवल इसलिए अच्छी नहीं है कि वह पुरानी है। कोई भी साहित्य केवल नया होने के कारण नगण्य नहीं समझा जा सकता। महापुरूष उपयुक्त विवेचन-परीक्षण के पश्चात् ही एक या दूसरे को ग्रहण करते हैं। केवल मूर्ख ही दूसरों के विश्वासों द्वारा पथभ्रष्ट होते हैं।1 ’’
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1. पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते
मूढः परप्रत्यनेय बुद्धि ।।1,2।।

इतिहास निरन्तरता और प्रगति है। परम्परागत निरन्तरता केवल यान्त्रिक सृजन नहीं है,वह स्रजनात्मक रूपान्तरण है। हमें धार्मिक यथार्थता को दूसरे युगों की पद्धति एवं विचारसरणी से निकलकर अपने युग एवं संतति की आवश्यकताओं और मांगों के अनुरूप ढालना पड़ेगा और इस प्रकार उसकी रक्षा करनी पड़ेगी। हमें ऐसे सामान्य लक्ष्यों को सृजन करना होगा जो प्रभुता या हीनता की कोई भावना आए बिना जीवित धर्मों को एक कर सकेंगे। काल सम्पूर्ण वस्तुओं को बदल देता है। तब अपनी आन्तरिक आत्मभावना एवं प्रेरणा द्वारा हमें सनातन सत्य तक पहुंचना ही होगा।

विश्वास एवं आचार साथ-साथ चलते हैं। यदि हम रक्त, जाति  और धरती में विश्वास रखते हैं तो हमारी दुनिया प्रतिहिंसा एवं उत्पीड़न की घटनाओं से भर जाएगी और यदि हम जंगली पशुओं जैसा आचरण करेंगे तो हमारा समाज भी एक जंगल जैसा हो जाएगा। यदि हम सार्वदेशिक आध्यात्मिक मूल्यों में विश्वास रखेंगे तो उससे शान्ति एवं सौहार्द का विकास होगा। अच्छा वृक्ष अच्छा फल देता है। आज हम आधारभूत प्रश्नों के बारे में सोच रहे हैं और सत्य को परम श्रेयस्कर एवं पुरस्करणीय रूपों में जानने को उत्सुक हैं।

गेटे कहता हैः ‘‘संसार एवं मानवेतिहास का एक, और केवल एक ही वास्तविक तथा गहन, वर्ण्य विषय है, अन्य सब वर्ण्य विषय उसके आधीन हैं, और वह है विश्वास एवं अविश्वास के बीच संघर्ष। जितने भी युग विश्वास नियंत्रित हुए हैं, फिर चाहे उनका रूप कुछ भी रहा हो, उनका एक अपना आलोक और आनन्द होता है, वे अपने देश-जाति के लिए भी और शाश्वत-सनातन के लिए भी फलदायक होते हैं। जितने भी युग ऐसे हैं जिन पर किसी भी रूप में अविश्वास का राज्य है, वे यदि अपने मिथ्या आलोक से क्षण-भर के लिए चमक भी उठते या डींग मार लेते हैं तो भी सनातन काल-प्रवाह द्वारा उपेक्षा को प्राप्त होते हैं, क्योंकि कोई भी असृजनात्मक या अनुत्पादक वस्तुओं को लेकर अपने जीवन को नष्ट करना नहीं करना चाहता।1

‘‘विभिन्न मानव समाज भी, मनुष्य प्राणियों की भांति ही, निष्ठा एवं विश्वास से जीवित रहते हैं और निष्ठा का लोप होते ही नष्ट हो जाते हैं। यदि हमारा समाज पुनः अपना गया हुआ स्वास्थ्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपनी खोई निष्ठा पुनः प्राप्त करनी ही पड़ेगी। हमारा समाज इतना अस्वस्थ नहीं है कि उसकी रक्षा ही न की जा सके, कठिनाई इतनी ही है कि वह विभक्त निष्ठाओं तथा परस्पर-प्रतिकूल प्रेरणाओं से पीड़ित है। कभी वह उत्साह से विह्वल हो उठता है, कभी निराशा से हिम्मत हार बैठता है। पर यही आत्म-वेदना, यही दर्द हमारी आशा का कारण है। हमें केवल ऐसी निष्ठा की जरूरत है जो वस्तुओं पर अन्तरात्मा की शक्ति स्थापित करे, और इस दुनिया में जहां विज्ञान एवं समाज-गठन ने अपने पारस्परिक सम्बन्ध को परस्परागत मूल्यों में खो दिया है, पुनः महत्व का स्थान प्राप्त करे।

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1. ‘दि डिस-इनहेरिटेड मांइड (1952), पृष्ठ 77, में एरिक हेलर द्वारा उद्धधृत।
       2 विश्वास की कठिनाइयां

आज जिन प्रधान शक्तियों और प्रभावों के कारण अविश्वास या अनास्था की समस्या उठ खड़ी हुई है, उनमें बढ़ता हुआ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रबुद्ध सामाजिक चेतना तथा विश्व-ऐक्य में दिलचस्पी प्रमुख है। यदि कोई धर्म हमारे युग के वैज्ञानिक स्वाभाव को सन्तुष्ट करने, उसकी सामाजिक आकांक्षाओं के साथ सहानुभूति रखने और विश्व-ऐक्य को आगे बढाने में असमर्थ है तो वह जीवित रहने की आशा नहीं कर सकता।


1. धर्म और विज्ञान


वैज्ञानिक स्वभाव अपनी अविश्रान्त बौद्धिक जिज्ञासा, किसी भी चीज़ को केवल विश्वास पर स्वीकार करने में हिचकिचाहट तथा सन्देह करने की शक्ति के कारण ही सम्पूर्ण कृत्यों एवं प्रयोगों को आगे बढ़ाता रहा है। वह किसी विचार को बिना निरीक्षण-परीक्षण एवं आलोचना के स्वीकार नहीं करता। वह प्रश्न करने और मान्यताओं पर संन्देह करने में स्वतन्त्र है। इस प्रेरणा, इस भावना ने हमें अपने भौतिक पर्यावरण पर एक अद्भुत प्रभुत्व प्रदान किया है।

धर्म का जो सामान्य अर्थ लिया जाता है उसमें वह विज्ञान की प्रेरक भावना का विरोधी है। विज्ञान की विधि आनुभविक या अनुभवाश्रित है, जबकि धर्म की पूर्वाग्रही है, विज्ञान किसी सर्वाधिकारवादिता पर आश्रित नहीं है, बल्कि ऐसे दृष्ट प्रमाणों की ओर इंगित करता है जिनका मूल्यांकन कोई भी प्रशिक्षित मस्तिष्क कर सकता है। विज्ञान चिंतन एवं जिज्ञासा की स्वतन्त्रता के बीच किसी भी प्रतिबंध को स्वीकार नहीं करता, वह नवीन ज्ञान एवं नवीन अनुभव का स्वागत करता है। एक सच्चा वैज्ञानिक कभी पूर्वाग्रह यह अंधश्रद्धा का आश्रय नहीं लेता। उसके दृष्टिकोण में नम्रता, आत्मालोचन और दूसरों से सीखने की तत्परता दिखाई पड़ती है। यदि हम जिज्ञासा की स्वतंत्रता को महत्व देते है तो हमें यह समझते देर न लगेगी कि वह धर्म के प्रमुख अंग सर्वसत्तावाद या प्राधिकारवादिता के प्रतिकूल है।

तर्तूलियन ने सम्पूर्ण दर्शनशास्त्र को राक्षसी कहकर उसकी निन्दा की है। वह पूछता हैः ‘‘ईसाई और दार्शनिक के बीच-स्वर्ग के अनुयायी और यूनान के अनुयायी के बीचः एक, जो सत्य को विकृत करता है, और दूसरा, जो उसको पुनः स्थापित करता है और उसकी शिक्षा देता है दोनों के बीच कोई सादृश्य कहां है ?’’ धर्म और विवेक के बीच का यह पारस्परिक विरोध आज भी बिलकुल असामयिक नहीं है। डॉक्टर एच. क्रेमर कहते हैं: धर्मनिष्ठा के लिए बुद्धिग्राह्य तर्क की मांग करना विवेक, अर्थात् मनुष्य को धर्मविषयक बातों में प्रमाण मान लेना है।’’2

विज्ञान के लिए तो समस्त निर्णय अस्थायी और नवीन ज्ञान के प्रकाश में पुनःशोधित होने योग्य होते हैं। यदि स्थापित धर्म एक ऐसी दुनिया में कठोर और सीमित होकर रह जाते हैं जिनकी चहारदीवारी शताब्दियों पूर्व लिखे गए धर्मग्रन्थों द्वारा निश्चित की गई थी तो जिस वैज्ञानिक प्रणाली ने अपना औचित्य न केवल सिद्धान्ततः वरन् अपने आश्चर्यजनक प्रौद्योगिक परिणामों द्वारा व्यावहारिक रूप में सिद्ध कर दिया है, उसकी ओर आकर्षित लोग धर्मवेदिका पर प्रयोगशाला को तरजीह देने को ही प्रवृत्त होंगे।

फिर वैज्ञानिक विचारों में सार्वदेशिता का एक तत्त्व है जो धार्मिक सिद्धान्तों में नहीं पाया जाता। वैज्ञानिक लोग कोई राष्ट्रीय या भौगोलिक सीमा नहीं मानते। वे दूसरे देशों के सहकर्मियों के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। दुराव या गोपनीयता विज्ञान की भावना के विरूद्ध है।

प्रत्येक धर्म का दावा है कि उसका धर्मग्रन्थ असामान्य रूप से ईश्वर की वाणी है और इसलिए निर्भ्रांन्त है। परन्तु धर्मग्रन्थों की भ्रान्तिहीनता विज्ञान की दृष्टि में असंगत है- दोनों में विरोध है।


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