आज के हिन्दी कवि-अज्ञेय - विद्यानिवास मिश्र Aaj Ke Hindi Kavi Agyeya - Hindi book by - Vidyanivas Mishra
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आज के हिन्दी कवि-अज्ञेय

विद्यानिवास मिश्र

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1435
आईएसबीएन :81-7028-401-5

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प्रस्तुत है अज्ञेय की प्रतिनिधि कविताएँ एवं जीवन परिचय....

Aaj Ke Hindi Kavi a hindi book by Vidyanivas Mishra - आज के हिन्दी कवि-अज्ञेय - विद्यानिवास मिश्र

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


आधुनिक हिन्दी कविता पर ‘अज्ञेय’ की अद्वितीय काव्य-प्रतिभा की गहरी छाप है। प्रयोगवाद तथा नई कविता को साहित्-जगत् में प्रतिष्ठित करने का श्रेय ‘अज्ञेय’ को ही है। प्रतिभासम्मपन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित निबन्धाकार, सम्पादक और सफल अध्यापक ‘अज्ञेय’ ने जो कुछ लिखा वह अपने ढंग का अनूठा है। अज्ञेय की रचनाओं समकालीन साहित्य को गहराई से प्रभावित किया। एक महत्त्वपूर्ण साहित्यकार के साथ ही ‘अज्ञेय’ एक अच्छे चित्रकार और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे। उन्होंने अग्र राजनीति में भी भाग लिया और क्रान्तिकारी आन्दोलन में कई बार लम्बी और कष्टमय जेल यात्राएं की हैं। दो बार अमरीका के केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति के अध्यापन का कार्य किया। फिर प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘दिनमान’ का आरंभ और सम्पादन किया। फिर दो वर्ष ‘नवभारत टाइम्स’ के सम्पादक रहे। 1971-72 में जोधपुर विश्वविद्यालय में निदेशक पद पर कार्य किया। फिर ‘एव्रीमैन्स’ साप्ताहिक के संपादक रहे। 1976 में आप हाइटेलबर्ग विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर जर्मनी गए। 1980 में आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। लेकिन मुख्य रूप से अज्ञेय’ कवि ही हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उनकी महत्त्वपूर्ण कविताएं संकलित हैं।
 साथ ही विद्वान संपादक ने, जो कवि के अन्तरंग मित्र रहे, ‘अज्ञेय’ के जीवन और व्यक्तित्व का भी विस्तृत परिचय दिया है।

परिचय


हिन्दी कविता के इतिहास में अज्ञेय का नाम इस प्रकार दुर्निवार बन गया है कि जो लोग इस नाम को निकालना भी चाहते हैं वे भी इसी नाम को भूल नहीं पाते। 1936-37 के आसपास हिन्दी की एक मान्य पत्रिका में यह आदेश दिया गया था कि ‘अज्ञेय’ की कहानी बिना देखे छापो, पर कविता अच्छी भी लगे तो नहीं; और सन् 1965 के अन्त में यह स्थिति है कि रूढ़िवादी आलोचक अज्ञेय के कवित्व को बहुत ननु-नच के साथ स्वीकार करने को तैयार हैं और नया कवि भी अपने को विच्छिन्न मानने में ही गौरव समझता है, पर हकीकत यह है कि यह नाम सबके ऊपर छाया हुआ है; इस नाम में ऐसा कुछ आतंक है, अज्ञेय के व्यक्तित्व और कृतित्व में ऐसा वैविध्य और ऐसी ढलाई है कि उसे वे नकार नहीं पाते। दुर्भाग्यवश  या सौभाग्यवश मैं इस नाम से आतंकित कभी नहीं रहा। मेरे लिए उन का व्यक्तित्व कभी न तो बिजली का-सा धक्का देने वाला रहा है और न गुरूता का भार ही बनने वाला रहा है। मैंने उन्हें जब से जाना है, तब से भाई के रूप में जाना है और ऐसे भाई के रूप में जो भाई का अधिकार बिलकुल न जानता हो।

अज्ञेय के इस आत्मीय (मैं दूसरों की बात नहीं करता) व्यक्तित्व और कृतित्व में वह कौन-सी चीज़ है, जो अभिभूत किए बिना एकदम छूती है, पर बिना मांगे संकुचित हो जाती है ? ‘अन्त:स्मित अन्त:संयत हरी घास की तरह नमना’, ‘खुल खिलना’, ‘सहज मिलना’; एक साथ ‘इतिहास, अपने चेहरे, परम्परा, मुकुट, बालकों के भवितव्य के भोले विश्वास के प्रति उत्तरदायित्व अपने ऊपर ओढ़ लेना’, ‘इयत्ता की तड़प के साथ उछली हुई मछली को सागर के सन्दर्भ में आंकना’, ‘सीमाहीन खुलेपन’ के लिए प्रयत्न करते हुए भी ‘विशाल में बह न सके’ की असमर्थता का ज्ञान, शब्द को ‘नैवेद्य’ मान कर बांटते हुए भी ‘मौन की अभिव्यंजना’ मानना, ‘जीवन की धज्जियां उड़ा कर’ भी जीवन के लिए अपने को निरंतर उत्सर्ग करते रहना, आशा के बिना भी निरातंक रह सकना- ये गुण अज्ञेय में आकस्मिक नहीं हैं। हां, इन विरोधी गुणों के समवाय से कोई ‘टाइप’ न बन कर व्यक्ति बने, यह कुछ अद्भुत जरूर है और यह विस्मय ही अज्ञेय और उन के आलोचक के बीच की खाई है। सामान्य पाठक के लिए यह विस्मय आकर्षण का कारण बन जाता है। और अज्ञेय का यह अठपहलू व्यक्तित्व जहां उन के सहधर्मियों के लिए स्पृहा और अलोचकों के लिए परेशानी की, वहीं वह पाठक के लिए विलोभन की भी बात है।

 मेरे सामने सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि कई किस्तों में जो मुझे अज्ञेय के कवि और व्यक्ति रूप को जानने का मौका मिला है, उससे न तो मैं यह कह सकता हूँ, कि मैं अज्ञेय को जानता ही हूं और न यह ही कि मैं जितना जानता हूं, उसका उपयोग केवल मेरे लिए है। अज्ञेय की लोकप्रियता का राज़ जहां तक मैं जान सका हूं, उनका कवि से अधिक मनुष्य बनने का दावा है। मनुष्य के रूप में जब कभी कोई चुनौती उन्हें मिली है, तो उन्होंने कविता की शरण न ले कर उस चुनौती को व्यक्ति के रूप में स्वीकारा है। चाहे क्रान्तिकारी रूप में , चाहे फ़ासिज़्म विरोधी रूप में या चाहे स्वाधीनता के पक्षधर रूप में, आग में कूदे बिना उन से रहा नहीं गया। जिन लोगों में वे अप्रिय हैं, उन लोगों को भी अज्ञेय से विरोध इस लिए नहीं है कि अज्ञेय उनका विरोध करते हैं, बल्कि इस लिए कि विरोध प्रकट करने के बजाय वे चुप रहते हैं। अज्ञेय के मित्रों को अज्ञेय से शिकायत इस की नहीं कि वे मित्रता का निर्वाह करना नहीं जानते, बल्कि इस की ही है कि वे अपनी शालीनता का बोझ-सा डालते रहते हैं। अज्ञेय की सबसे बड़ी कमज़ोरी है, विनम्रता, व्यवस्था-प्रियता और सुरूचि; और सबसे बड़ी क्षमता है, निरन्तर परिग्रह जोड़ते हुए भी उस से अनासक्ति। आसक्ति को वे जीवन की अभिव्यक्ति मानते ही नहीं।

 मानते हैं वे आनन्द को, पर समझे जाते हैं वे पश्चिम की ओर अभिमुख। लोग जो अज्ञेय में इस माने में अन्तर्विरोध पाते हैं कि रहन-सहन, खान-पान भाषा-व्यवहार में भारतीय होते हुए भी अज्ञेय एकदम अन्तः करण से पाश्चात्य हैं, वे लोग यह भूल जाते हैं कि पश्चिम का प्रभाव अज्ञेय को अधिकाधिक भारतीय बनाने में है और यही उन के जीवन का वास्तविक अन्तर्विरोध है। जब तक वे अपने पंडित पिता की छाया में पलते रहे, तब तक वे बाह्य संस्कार में स्वदेशी थे, भीतर से वे विदेशी सभ्यता के प्रत्याख्यान के लिए विचारों में विदेशी थे; पर जब सचमुच वे विदेशी सैनिकों के साथ द्वितीय महायुद्ध में लडे़, जब उन्होंने तीन-तीन बार विदेश-भ्रमण किया, तब देश की ओर उन का वास्तविक समर्पण हुआ। स्वदेश की वेदी पर अज्ञेय के शरीर की और भौतिक सम्भावना की आहुति जरूर पहले पड़ी, पर इस आहुति का वास्तविक मन्त्र अज्ञेय को तभी अच्छी तरह स्फुरित हुआ, जब उन्होंने स्वदेश को पश्चिम  के आमने सामने एक समानान्तर सत्य के रूप में स्थापित पाया। इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर और बावरा अहेरी में अन्वेषण है। इन्द्रधनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करुणा प्रभामय और आंगन के पार द्वार में उपलब्धि। जो इस अंतर्विरोध की सत्यता जांचना चाहता है, उसके लिए अज्ञेय का जीवन रोचक होगा; पर जो अपने धूमनिष्ठ अनुमान पर आरूढ़ है, उसने अज्ञेय की कुछ अलग प्रतिमा पहले से ही गढ़ ली है।

मैं अज्ञेयपंथी नहीं, अज्ञेय विरोधी भी नहीं, पर अज्ञेय का तटस्थ आलोचक बनूं यह भावहीनता भी अपने में नहीं ला सकता। मैं उनकी जीवन गाथा यहां जो देने जा रहा हूँ उसका एकमात्र उद्देश्य यही है कि उन के व्यक्तित्व के आंगन को पार करके ही उनके कृतित्व के द्वार तक जाया जा सकता है। यहाँ यह ज़रूर कह दूं कि व्यक्तित्व का एक भीतरी आंगन उस द्वार के पार भी है। वहां भले ही सब न जाएं, पर जो जा सकेंगे वे कम से कम उस के बीच हिन्दी का तुलसी-चौरा ही प्रतिष्ठित पाएंगे और उनको इतना विश्वास तो होगा ही कि अज्ञेय भी हिन्दी के अन्यतम कवि हैं—कवि भी ऐसे, जिन्हें देखते ही कवि कहना पड़ता है।

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन कर्तारपुर (जालन्धर) के भड़ोत सारस्वत ब्राह्मण कुल के हैं। इनके पिता डॉ. हीरानन्द शास्त्री भारत के  पुरातत्व-विभाग की सेवा में एक उच्च अधिकारी थे। वे संस्कृत के पुराने  ढंग के पंडित थे पर इसके साथ ही उनमें देश, भाषा और वर्ण का स्वाभिमान बहुत ज्वलन्त था। कठोर अनुशासन में विश्वास करते हुए भी वे प्रतिभा के स्वतन्त्र विस्तार में कभी बाधक नहीं थे। अपने जीवन के दो मन्त्र, निर्भयता और किसी से भी दान न लेने का आग्रह, सच्चिदानन्द को अपने पिता से मिले हैं। उनके मानसिक निर्माण में मातृपक्ष का अंशदान बहुत कम है। मां की अपेक्षा अपनी छोटी बुआ और बड़ी बहन के स्नेह में अधिक पले हैं। अज्ञेय के चरित्र में जो एक सहज पौरुष है और जिसके कारण उन्हें कभी-कभी गलत समझा जाता है, वह पैतृक दाय ही है। एक अद्भुत बात यह है कि जन्म से लेकर अब तक इनकी जीवन-यात्रा का एक ही पर्याय बना रहा इनका अनुशासित और सत्वर आवेग। इस यायावरी वृत्ति ने जहां इन्हें अनाशक्ति दी, वहां स्वावलम्बन और नये परिग्रह जोड़ने का उत्साह भी।

 व्यवस्था की शिक्षा भी इनके बचपन का संस्कार है। यही कारण है कि पैंकिंग से लेकर कमरे की सजावट तक और कलमनबीसी से लेकर शिकार तक हाथ इनके ऐसे मंजे हुए हैं कि जरा भी अव्यवस्था इन्हें सह्य नहीं है और कभी-कभी अत्यन्त निकट के  लोगों के लिए भी इस व्यवस्था का उद्रेक झुंझुलाहट की सामग्री बन जाता है उनके लिए स्वेटर, दास्ताने और मोजे बुनना एक कष्साध्य तपस्या है, क्योंकि उनकी मनचाही डिजाइन ऐसी विकट होती है (और साथ ही ऐसा सरल भी—क्योंकि नक्शा उनके मन में बहुत साफ रहता है) कि बस बुननेवाली बीसियों बार उधेड़ते-बुनते परेशान हो जाते है। उन से मिले एक पत्र में कुछ अंश उनकी इस व्यवस्थाप्रियता का परिचय देंगे : ‘टंकण के बाद एक बार पन्ने उलट कर देख लेने का कष्ट भी आपने नहीं किया कि जो भेज रहे हैं वह पांडुलिपि ही है कि केवल आंख फोड़ने का नुस्खा...न, कोई सफाई आप के पास नहीं है। दो एक दिन रुक जाऊँगा तो यह फटकार इतनी बेलाग न रह पाएगी,..आप भी याद करेंगे कि इस कम बोलने वाले और भरकस अप्रिय न बोलने वाले को क्या हुआ।’’

जन्म फाल्गुन शुक्ल सप्तमी संवत् 1967 तदनुसार 7 मार्च, 1911 को कसया, पुरातत्त्व-खुदाई शिविर में। बचपन 1911 से ’15 तक लखनऊ में। शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत-मौखिक परम्परा से हुआ 1915 से ’19 तक  श्रीनगर और जम्मू में। यहीं पर संस्कृत पंडित से रघुवंश रामायण, हितोपदेश, फारसी मौलवी से शेख सादी और अमेरिकी पादरी से अंग्रेजी की शिक्षा घर पर शुरू हुई। शास्त्री जी को स्कूल शिक्षा में विश्वास नहीं था। बचपन में व्याकरण के पण्डित से मेल नहीं हुआ। घर पर धार्मिक अनुष्ठान स्मार्त ढंग से होते थे। बड़ी बहन जो लगभग आठ की थीं, जितना अधिक स्नेह करती थीं। उतना ही दोनों बड़े भाई (ब्रह्मानन्द और जीवानन्द जो’ 34 में दिवंगत हो गए) प्रतिस्पर्धा रखते थे। छोटे भाई वत्सराज के प्रति सच्चिदानन्द का स्नेह बचपन से ही था, 1919 में पिता के साथ नालन्दा आए, इसके बाद’ 25 तक पिता के ही साथ रहे, पिता जी ने हिन्दी सिखाना शुरू किया। वे सहज और संस्कारी भाषा के पक्ष में थे। हिन्दुस्तानी के सख़्त ख़िलाफ़ थे। नालन्दा से शास्त्री जी पटना आए और वहीं स्व- काशी प्रसाद जायसवाल और स्व. राखालदास वन्द्योपाध्याय से इस परिवार का सम्बन्ध हुआ, पटना में ही अंग्रेजी से विद्रोह का बीज सच्चिदानन्द के मन में अंकुरित हुआ।

शास्त्रीजी के पुराने मित्र रायबहादुर हीरालाल ही उनकी हिन्दी भाषा की लिखाई की जाँच करते। राखालदास के सम्पर्क में आने से बंग्ला की लिखाई की जाँच करते। राखालदास के संपर्क में आने से बंग्ला सीखी और इसी अवधि में इण्डियन प्रेस से छपी बाल रामायण बाल महाभारत, बालभोज इन्दिरा (बकिमचन्द्र) जैसी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं और हरिनारायण आप्टे और राखालदास वन्द्योपाध्याय के ऐतिहासिक उपन्यास इसी अवधि में पढ़े गए। 1921-’25 तक ऊटकमंड में रहे यहां नीलिगिरि की श्यामल उपत्यका ने बहुत अधिक प्रभाव डाला। 1921 में उडिपी के मध्याचार्य के द्वारा इनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इसी मठ के पण्डित ने छः महीने तक संस्कृत और तमिल की शिक्षा दी। इस समय ‘भड़ोत’ से ‘वात्स्यायन’ में परिवर्तन भी हुआ, जो प्राचीनतम संस्कार के नये उत्साह से जीने का एक संकल्प था। पिता ने संकीर्ण प्रदेशिका से ऊपर उठकर गोत्रनाम का प्रचलन कराया। इसी समय पहली बार गीता पढ़ी।

पिताजी के आग्रह से अन्य धर्मों के ग्रन्थ भी पढ़े और घर पर ही पिताजी के पुस्तकालयों का सदुपयोग शुरू किया। वर्ड्सवर्थ, टेनिसन, लांगफेलो और व्हिटमैन की कविताएं इस अवधि में पढ़ीं। शेक्सियर, मारलो, वेब्स्टर के नाटक तथा लिटन, जार्ज एलियट, थैकरे, गोल्डस्मिथ, तोल्स्तोय, तुर्गनेव, गोगोल, विक्टर ह्यूगो तथा मेलविल के उपन्यास भी पढ़े गये। लयबद्ध भाषा के कारण टेनिसन का प्रभाव बड़ा गहरा पड़ा। टेनिसन के अनुकरण में, अंग्रेजी में ढेरों कविताएं भी लिखीं। उपन्यासकारों में ह्यूगो का प्रभाव, विशेषकर उनकी रचना टॉयलर ऑफ़ द सी का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। इसी अवधि में विश्वेश्वर नाथ रेऊ तथा गौरीचन्द हीराचन्द ओझा की हिन्दी में लिखी इतिहास की रचनाएं पढ़ने को मिलीं तथा मीरा, तुलसी के साहित्य का अध्ययन भी इन्होंने किया। साहित्यिक कृतित्व के नाम पर इस अवधि की देन है आनन्द बन्धु जो इस परिवार की निजी पत्रिका थी। इस पत्रिका के समीक्षक थे हीरालाल जी और डॉ.. मौद्गिल। इस अवधि में एक छोटा उपन्यास भी लिखा और इसी अवधि में जब मैट्रिक की तैयारी ये कर रहे थे, मां के साथ इन्होंने जलियावाला बाग-काण्ड की घटना के आसपास पंजाब की यात्रा की थी और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध विद्रोह की भावना ने जन्म लिया था। इनके पिताजी स्वयं अंग्रेजी की अधीनता की चुभन  कभी-कभी व्यक्त करते थे।

 एक घटना भी ब्लैकस्टोन नामक अंग्रेजी अधिकारी के साथ घट चुकी थी। वह शास्त्रीजी और राखालदास के साथ यात्रा कर रहा था। डिब्बे में राखालदास की पत्नी भी थीं। वह स्नानकक्ष से अर्धनग्न डिब्बे के भीतर आया। शास्त्रीजी ने उस से पूछा, ‘‘क्या इस रूप में तुम किसी अंग्रेज महिला के सामने आ सकते थे ?’ उत्तर में वह कुछ बोला नहीं, हंसता रहा। शास्त्रीजी ने उसे उठाकर डिब्बे से बाहर फेंक दिया। उसने आजीवन शत्रुता निभाई, यहां तक कि पिता द्वारा किए गए इस अपमान का बदला पुत्र से चुकाया, जब वे लाहौर किले में नज़रबन्द हुए। दूसरी घटना ऊटी में स्वंय सच्चिदानन्द के साथ घटी थी, जब वे दो-तीन महीने अंग्रेज़ों के साथ स्कूल में पढ़ने गए। वहां अंग्रेज लड़कों की मरम्मत करके ही इन्हें स्कूल में कार्ड मिला, जिसे फेंक कर ये घर चले आए। 1925 में पंजाब से मैट्रिक की प्राइवेट परीक्षा दी और उसी वर्ष इण्टरमीडिएट साइंस पढ़ने मद्रास क्रिश्चियन कालेज में दाखिल हुए। यहाँ उन्होंने गणित, भौतिकशास्त्र और संस्कृत विषय लिए थे। यहां इनके अंग्रेजी प्रोफेसर हेण्डरसन ने (जिन्हें त्रिशंकु समर्पित की गई) साहित्य के अध्ययन की प्रेरणा दी।

ये स्वयं भारत के भक्त थे। इन्हीं के साथ टैगोर अध्ययन-मण्डल की स्थापना की और रस्किन के सौन्दर्यशास्त्र तथा आचरणशास्त्र का अध्ययन किया। कला-क्षेत्रों के बीच घूमते-घूमते  स्थाप्तय और शिल्प दोनों का राग-बोध परिपक्व होता गया। दक्षिण के मन्दिर और नीलगिरि के दृश्य ने उनके व्यक्तित्व में प्रकृति-प्रेम और कलाप्रेम को निखार दिया। मद्रास में सामाजिक विषमता की चेतना जगने लगी थी और जाति के विरुद्ध विद्रोह मन में इसी अवधि में उमड़ना शुरू हुआ। शास्त्रीजी स्वयं जाति में विश्वास न कर के वर्ण में विश्वास करते थे और पुत्रों से आशा करते थे कि ब्राह्मणवर्ण का स्वभाव—त्याग, अभय और सत्य—उन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

बचपन से किशोरावस्था तक की यह अवधि उलझन और आकुलता के बीच कठिन अध्यवसाय की अवधि है। एक ओर परिवार के और बाहर के अनेक प्रकार के प्रिय-अप्रिय प्रभावों ने उनके चित्त को उद्वेलित किया, तो दूसरी ओर पिता के कठिन अनुशासन ने परिश्रम में लगातार लगाए रख कर मन और शरीर को संयम में ढाला। बचपन में इन्हें ‘सच्चा’ के नाम से पुकारा जाता था और जब-जब इनकी सच्चाई पर विश्वास नहीं किया गया, इन्होंने मौन विद्रोह किया। एक बार की घटना ऐसी है कि बड़े भाई और इनमें होड़ लगी कि चौदह रोटी कौन खा सकता है ? बड़े भाई ने कहा कि तुम खाओ तो तुम्हें मैं इनाम दूँगा। ये खाने बैठे, पिता जी को इसकी सूचना मिली, उन्होंने बड़े भाई को डांटा और इनसे कहा कि तुम न खाओ, उठ जा। ये चौदह के आस-पास तक पहुंच रहे थे, अपने मन से उठे नहीं, इसलिए उन्होंने भाई से इनाम मांगा। उन्होंने देने से इन्कार किया तो मौन विरोध में इन्होंने खाना ही कम कर दिया इस प्रकार का आत्मपीड़क क्रोध इनमें बहुत दिनों तक रहा है। और अब भी किसी न किसी रूप में कभी न कभी उभर आता है। इसी क्रोध में आकर इन्होंने अपनी आर्थिक बर्बादी भी कम नहीं की।

1927 में लाहौर फॉरमन कॉलेज में ये बी. एस-सी. में भर्ती हुए। इसी कालेज में नवजवान भारत-सभा के सम्पर्क में आए और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख सदस्य आज़ाद, सुखदेव और भगवतीचरण बोहरा से परिचय हुआ। इस कालेज में बी.एस-सी. तक तो ये सक्रिय रूप से कान्तिकारी आन्दोलन में प्रविष्ट नहीं हुए थे, यद्यपि 1929 में पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का जो अधिवेशन लाहौर में हुआ, उस में ये स्वयं सेवक अफसर के रूप में मौजूद थे। यहीं इन्हीं के स्वयं सेवक दल ने उन लोगों को जबरदस्ती स्वयंसेवक कैम्प में बन्द रखा था, जो गांधीजी के उस प्रस्ताव का अप्रिय रूप में विरोध करने वाले थे, जो उन्होंने इरविन को बधाई देने के लिए रखा था। इसी स्वयंसेवक शिविर में कदाचित पहली बार कांग्रेस के मंच से ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगाया गया था।

1929 में बी.एस-सी. करके अंग्रेजी एम.ए. में दाखिल हुए। इसी साल से ये क्रान्तिकारी दल में भी प्रविष्ट हुए इनके साथ थे देवराज, कमलकृष्ण और वेदप्रकाश नन्दा। कालेज में जिन दो अध्यापकों ने सबसे अधिक इन्हें प्रभावित किया, वे थे, जे.एम. बनेड और डेनियल। जे.एम.बनेड ने तो इनके जेल जाने पर भी अपना स्नेह सम्बन्ध बनाए रखा। बनेड ने ही (यद्यपि वे भौतिकशास्त्र के अध्यापक थे) विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन की प्रेरणा दी।  प्रो. डेनियल ने इन्हें ब्राउनिंग की ओर उन्मुख किया। इनके क्रान्तिकारी जीवन की अवधि 1929 से आरम्भ होकर 1936 तक है। इस अवधि का अधिकांशतः इतिहास देश के इतिहास से सम्बद्ध है। उसमें कहने की इतनी बातें हैं कि यहां उन पर विस्तार से विचार करना अनावश्यक है। घटनाक्रम कुल यह है कि पहला क्रर्यक्रम इन का और इनके साथियों का भगतसिंह को छुड़ाने का हुआ। इस बीच में भगवती चरण वोहरा एक दुर्घटना में शहीद हुए और यह कार्यक्रम स्थगित हो गया।

दूसरा कार्यक्रम दिल्ली-हिमालयन-टॉयलेट्स फैक्ट्री के बहाने बम बनाने का कारखाना कायम करने का था। उस फैक्ट्री में अज्ञेय वैज्ञानिक के रूप में सलाहकार थे। तीसरा कार्यक्रम अमृतसर में पिस्तौल की मरम्मत और कारतूस भरने का कारखाना कायम करने का शुरू हुआ और यहीं देवराज और कमलकृष्ण के साथ 15 नवम्बर, 1930 को गिरफ्तार हुए। गिरफ्तारी के बाद एक महीने लाहौर किले में, फिर अमृतसर की हवालात में। यहीं से यातना शुरू हुई। आर्म्स ऐक्ट वाले मुकदमें में ये छूटे, पर दिल्ली में 1931 में नया मुकदमा शुरू किया गया। यह मुकदमा 1933 तक चलता रहा। दिल्ली जेल में ही काल-कोठरी में बन्द रहे और यहीं रह कर छायावाद से मनोविज्ञान, राजनीति अर्थशास्त्र और कानून—ये सारे विषय पढ़े। यहीं रहकर चिन्ता, विपथगा की अनेक कहानियां और शेखर लिखा; पर यह पूरी अवधि कुल ले-देकर घोर आत्ममन्थन, शारीरिक यातना और स्वप्नभंग की पीड़ा की अवधि रही।

 1934 की फरवरी में छूटे, फिर लाहौर में दूसरे कानून के अन्तर्गत नज़रबन्द किये गये। यहीं रह कर कोठरी की बात और चिन्ता की रचना की और इसी अवधि में कहानियों का छपना शुरू हुआ। 1934 के मध्य में घर के अन्दर नज़रबन्द हो गई और घर आने पर एक साथ छोटे भाई और माता की मृत्यु और पिता जी की नौकरी से निवृत्ति—इन सभी घटनाओं ने रोते चित्त में नये उद्वेलन पैदा किए नज़रबन्दी हटने तक ये डलहौजी़ और लाहौर रहे। सात साल के इस अर्से ने कई छाप छोड़ी हैं। रावी के पुल से छलांग मारने पर घुटने की टोपी उतरी और वह दर्द मौका पाते ही आज भी लौट आता है। क्रान्तिकारी जीवन के साथियों में जो लोग आदर्शच्युत हुए या जो टूटने लगे उनके कारण घोर आत्मपीड़न का भाव जाग गया और एकाकीपन का अभ्यास जो बढ़ा, वह अभी भी नहीं छूटा। अज्ञेय को अत्यधिक सामाजिकता इतनी असह्य है, इसका प्रमाण मैं स्वयं दे सकता हूं। कभी-कभी वे स्वागत-समारोहों के बाद लौटने पर ऐसा अनुभव करते हैं कि किसी यन्त्रणा से गुजर कर आए हैं। पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण छाप इस जीवन की उनकी राग अनुभूति को सघन बनाने में है। इस जीवन में प्रखर शक्ति और ताप जिस स्रोत से मिला था, उसके आकस्मिक निधन की चोट बड़ी गहरी पड़ी है।

यह वियोग उन्हीं के शब्दों में ‘स्थायी वियोग’ है। उस ‘अत्यन्तगता’ की स्मृति एक अमूल्य थाती है। इसी के सहारे हारिल का धर्म निभाना सबसे बड़ा पार्थिव धर्म उन्होंने जाना है। यह उन्होंने जाना और अपनी ‘मांग को स्वंय अपना खंडन’ माना। ‘आहुति बनकर’ ही उन्होंने प्रेम को ‘यज्ञ की ज्वाला’ के रूप में देखा। ‘वंचनाओं के दुर्ग के रुद्ध सिंहद्वार खोल कर मुक्त आकाश’ के लिए जो अदम्य आशा उनके चित्त में हमेशा भरती रहती है अपने को तटस्थ और एकाकी रख सकने का वह लम्बा अभ्यास। यह सही है कि शिल्प की दृष्टि से और भाषा की दृष्टि से इस अवधि की कविताओं पर छायावाद का गहरा प्रभाव है, पर साथ ही यह भी निर्विवाद है कि कथ्य छायावाद की भूमिका से बिलकुल अलग है। उसका आधार अरूप प्रेम नहीं, न मिटने वाली प्यास नहीं, रहस्य-अन्वेषण नहीं, है ऊर्जस्वी और मांसल प्रेम, प्रत्यंचा तोड़ धनुष का सन्धान (शक्ति के परे आत्मोत्सर्ग) और एक दुर्निवार ऊर्ध्वग ज्वाल। इस दृष्टि से इस अवधि को भट्ठी में गलाई की अवधि कहा जा सकता है।

गदहपचीसी पार करके 1936 में जब जीविका के लिए कर्मक्षेत्र में उतरे तो पहले एक आश्रम खोलने की बात सोची। पर पिता की एक डांट ने इस भिखमंगी से इन्हें विरत कर दिया। फिर सैनिक के सम्पादन-मण्डल में आए और वहां साल-भर रहे। इसी समय मेरठ के किसान आन्दोलन में भी काम किया और इस अवधि में रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द्र गुप्त, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे और नेमिचन्द्र जैन से परिचय हुआ। राजनैतिक विचारों में भी उथल-पुथल शुरू हुई। गांधीजी के प्रति जहां श्रद्धा बिलकुल नहीं थी, वहां आदर-भाव जगा, पर कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित न होने के पक्ष में न होते हुए भी, और सुभाष चन्द्र बसु के साथ त्रिपुरी में न्याय नहीं हुआ यह मानते हुए भी, सुभाष बाबू के लिए श्रद्धा न कर सके। जवाहरलाल नेहरू के खतरनाक विचार और खतरनाक जीवन के नारे ने पहले बहुत प्रभावित किया था, बाद में उनकी बौद्धिक सच्चाई की ही छाप मन में अधिक गहरी पड़ी।

1937 के अन्त में बनारसीदास चतुर्वेदी के आग्रह से विशाल भारत में गये। लगभग डेढ़ वर्ष कलकत्ता रहे। यहां सुधीन्द्र दत्त, बुद्धदेव बसु, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बलराज साहनी और पुलिन सेन परिचय की परिधि में आए। कलकत्ता के महानगर का पहला अनुभव बहुत तीखा रहा। इसके विमानवीकृत पहलू ने इनके संवेदनशील चित्त को बहुत व्यथित किया। विशाल भारत को व्यक्तिगत कारणों से इन्होंने छोड़ा और 1939 में पिताजी के पास बड़ौदा गये। पिताजी ने विदेश जाकर अध्ययन पूरा करने के लिए कहा। इतने में ही महायुद्ध छिड़ गया और दिल्ली आल इण्डिया रेडियो में नौकरी करने चले आये। इसी अन्तराल में हिन्दी साहित्य के अनेकानेक आयामों और चक्रों से तो परिचित हुए ही, पत्रकारिता के आदर्श और व्यवहार के वैषम्य का भी साक्षात् अनुभव प्राप्त किया। इन आकाशवृत्तियों के लाभ मुख्यतः दो हुए। एक तो हिन्दी की साहित्यिक परिधि के भीतर पैठ और दूसरा-अपना जीवन-पथ निर्माण करने का एक विश्वास। यह विश्वास कुछ आवश्यकता से अधिक ही हुआ और इसी के कारण 1940 में एक बहुत बड़ी गलती सिविल मैरेज करके इन्होंने की। यह शादी बहुत बड़ी चुभन बनी। इस चुभन के कारण, कुछ अपने फ़ासिस्ट-विरोधी विश्वास के उफान में इन्होंने 1942 के आन्दोलन को उपयोगी न समझा और उसी साल दिल्ली में अखिल भारतीय फ़ासिस्ट-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन के बाद में प्रगतिशील लेखक संघ का एक अलग गुट बन गया।

 पर उससे इनका सम्बन्ध नहीं था। शाहिद और ये एक साथ थे और कृश्नचन्दर, रामविलास और शिवदानसिंह दूसरी ओर। दोनों विचारधाराओं के लोग अलग-अलग उद्देश्यों से फासिस्ट-विरोधी युद्ध में शरीक हो रहे थे। युद्ध को गलत मानते हुए  सुरक्षात्मक युद्ध की अनिवार्यता ये मानते थे। इसीलिए अपने विश्वास को मात्र प्रमाणित करने के लिए युद्ध में 1943 में सम्मिलित हुए। युद्ध के पहले इनका समय अपनी पूर्वपत्नी से अलग मेरठ और दिल्ली में अधिक बीता था। युद्ध में जिस यूनिट में ये सम्मिलित हुए, उसका कार्य प्रतिरोध अभियान (रेजिस्टेंस मूवमेंट) की तैयारी करना था।

               


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