ये शहर लगै मोहे बन - जाबिर हुसैन Ye Shahar Lagai Mohe Ban - Hindi book by - Jabir Husain
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ये शहर लगै मोहे बन

जाबिर हुसैन

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 14404
आईएसबीएन :9788126726363

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एक बिलकुल नए फ्रेम में लिखी गई यह कथा-डायरी कुछ लोगों को जिन्दा रूहों की दास्ताँ की तरह लगेगी।

इस किताब के आखिरी सफहे पर यह इबारत दर्ज है- ‘कहते हैं, रूहों की आँखें हमेशा सलामत होती हैं। उनकी याददाश्त कभी फिना नहीं होती। वो सिर्फ गैब से आनेवाली किसी मोतबर आवाज की मुन्तजिर होती हैं।’ अपनी पिछली तमाम तहरीरों से बिलकुल अलग, इस किताब में, जाबिर हुसेन ने अपने पात्रों के नाम नहीं लिए। उस बस्ती का नाम लेने से भी परहेज किया, जिसकी बे-चिराग गलियों में इस लम्बी कथा-डायरी की बुनियाद पड़ी। एक बिलकुल नए फ्रेम में लिखी गई यह कथा-डायरी कुछ लोगों को जिन्दा रूहों की दास्ताँ की तरह लगेगी। लेकिन इस दास्ताँ की जड़ें किसी पथरीली जमीं की गहराइयों में छिपी हैं। जाबिर हुसेन ने इस पथरीली जमीन की गहराइयों में उतरने का खतरा मोल लिया है। जिन जिन्दा रूहों को उन्होंने इस तहरीर में अपना हमसफ़र बनाया है, वो अगर उनसे खू-बहा तलब करें, तो उनके पास टूटे ख्वाबों के सिवा देने को क्या है। जाबिर हुसेन जानते हैं, ये टूटे ख्वाब उनके लिए चाहे जितने कीमती हों, बस्ती की जिन्दा रूहों के सामने उनकी कोई वक्अत नहीं।


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