युगपुरुष अंबेडकर - राजेन्द्र मोहन भटनागर Yugpurush Ambedkar - Hindi book by - Rajendra Mohan Bhatnagar
लोगों की राय

जीवन कथाएँ >> युगपुरुष अंबेडकर

युगपुरुष अंबेडकर

राजेन्द्र मोहन भटनागर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :372
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1441
आईएसबीएन :81-7028-151-2

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

363 पाठक हैं

प्रस्तुत है अंबेडकर के जीवन पर आधारित उपन्यास...

Yugpurush Ambedkar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महात्मा बुद्ध के बाद यदि किसी महापुरुष ने धर्म, समाज, राजनीति और अर्थ के धरातल पर सामाजिक क्रांति से साक्षात्कार कराने की सार्थक कोशिश की तो वह थे- डॉ. भीमराव अम्बेडकर। सूर्य-सा उनका तेजस्वी चरित्र, चंद्र-सा सम्मोहक व्यवहार, ऋषियों-सा गहन गम्भीर ज्ञान, संतों-सा उत्सर्ग-बल और शान्त स्वभाव उनके चरित्र के विभिन्न पहलू थे। उन्होंने अपना सारा जीवन समाज के उपेक्षित, दलित, शोषित और निर्बल वर्गों को उन्नत करने में लगा दिया था। सच्ची घटनाओं पर आधारित यह जीवनीपरक उपन्यास वर्तमान पीढ़ी को निराशा और दिशाहीनता की स्थिति से ऊपर ऊठाकर एक जीवंत चेतन धारा से जोड़ने की दिशा में विशेष भूमिका निभाएगा।

‘युगपुरुष अम्बेडकर’ के लेखक राजेन्द्र मोहन भटनागर हिन्दी के सुपरिचित और सुप्रतिष्ठित लेखक हैं। अनेक महान् पुरुषों की जीवनियां प्रस्तुत कर वे जीवनी-विधा को भी समृद्ध करते हैं यह उनकी विशिष्ट नवीन कृति है।

महात्मा बुद्ध के बाद
यदि किसी युगपुरुष ने
धर्म समाज, राजनीति और अर्थ के धरातल पर
 क्रांति से साक्षात्कार कराने की
 सत्य-निष्ठा, सद्विवेक और धर्माचरण से कोशिश की
तो वे थे-डॉ.भीमराव अंबेडकर

सूर्य-सा उनका तेजस्वी चरित्र
 चंद्र-सा सम्मोहक व्यवहार
ऋषियों-सा गहन-गंम्भीर ज्ञान-विज्ञान
संत-सा उत्सर्ग-बल औ; शांत स्वभाव
उनके अपने समय के ऐसे साक्ष्य हैं
जो सदा सर्वदा
उपेक्षित, दलित, शोषित और निर्बल समाज को
सत्प्रेरणा, बल सहसा और प्रकाश देते रहेंगे

वे मूकनायक थे उनके
जो बेआवाज़ थे, साधनहीन और पंगु,
जो निराश्रित थे, दास और बदनसीब
जो पीढ़ियों से ढो रहे थे दूसरों का मलबा
जो यातना-गृह में जन्मते थे
जो यातना-गृह में जीते थे
जो यातना-गृह में आवारा पशु-से मरते थे।

वे नीलकंठी महादेव बनकर
सदा गरल पान कर अमृत उड़ेलते रहे !

दो शब्द


इस उपन्यास में उनके ऐसे अनेक पावक प्रसंग हैं, जिन्होंने जीवनी से बचाकर इसे उपन्यास हो जाने की सुविधा-स्वतंत्रता प्रदान की है। यह उपन्यास न केवल उसके समय की संवेदना-व्यजना से संबद्ध है अपितु आज के जीवन की संचेतना का एक अपरिहार्य अंग भी है।

इस पावक अवसर पर मैं अपने मित्र श्री बाबू खण्डा, उपमंत्री, आयोजना और श्रम का स्मरण कर गौरव का अनुभव कर रहा हूं क्योंकि हम दोंनो ने मिलकर बीकानेर में एक छत के नीचे अनेक आंदोलनात्मक संगठन मुद्राओं को अपने में जिया था और समाज को एक नयी दिशा देने की चेष्ठा की थी। सत्य की यही अनिवार्यता है कि वह अकेला होते हुए भी अकेला नहीं होता, उसमें सदा संभावनाओं की सृजनानुभूतियों सक्रिय बनी रहती हैं।
अंततः मुझे विश्वास है कि यह उपन्यास वर्तमान पीढ़ी को निराशा-छाया और दिशाहीनता की गतिशून्यता से ऊपर उठाकर एक चेतन धारा से जोड़ने की दिशा में विशेष भूमिका निभा जाएगा और-‘सत्यमेव जयते’ से युग-पीढ़ी को जो़ड़ पाएगा। अस्तु।

राजेन्द्र मोहन भटनागर

एक


गहरी रात। नितान्त शान्त। अकेली। किसी थके-हारे सैलानी-सी नयन खोले निःस्वन।
लैम्प के टिमटिमाते पीत प्रकाश में पढ़ते-पढ़ते भीमराव अंबेडकर का मन थक कर अपने-आपको घूरने लगा, किसी पेशेवर जासूस की तरह। अंधेरा कुलबुलाया। अमावस्या का सागर और प्रगाढ़ हो गया, उसने अपने से घबराकर खिड़की खोल दी। हवा का तेज़ झोंका आया। सम्पूर्ण तंदिल तन-मन को जगा गया। एक गहरी सांस ली। ऊपर सितारों-भरा आकाश किसी की प्रतीक्षा करने लगा। सामने लैंपपोस्ट के नीचे एक मरियल-सा कुत्ता बेसुध पड़ा था।

निगाहें फैलीं। राहें गुमनाम पड़ी-कुछ न तलाश पाने की निराशा से क्षुब्ध। सन्नाटा और सन्नाटा बुनता हुआ मलबे के ढेर की शक्ल ले लेता। किसी पुराने रंग उड़े लैंडस्केप-सा लगता अपना आसपास।
धीरे-धीरे वह आसपास आंखे खोलता और बोलने की कोशिश कर नहीं बोल पाता। गूंगा सन्नाटा हाथ  मलता रह जाता।
सड़क के उखड़े पलस्तर का सहारा लेती उसकी आँखें। गड्डे उभरते। गड्ढे में से रिसते व्रण पिघलते। पारदर्शी कांच की सी मरीन लाइन्स की सड़क डांटने लगती। वह चौंक पड़ता। दूर तक टूटकर जाता पुच्छल तारा देखता रह जाता वह। लगता पुच्छल तारा नहीं, वह है। बहरा हो जाता उसका होश। उसकी नसों में जम जाता रक्त। आंखें अंधेरा बन निगल जातीं आग।

ऐसा बुखार क्यों चढ़ता है उसे। क्यों जुनून की गर्म हवाएं आक्रमण करती हैं उसपर ? वह पगला गया है। वहाँ कोई नहीं है सिवाय उसके। फिर किससे मांग रहा है उत्तर ? सिरफिरा !
पतझड़ बरस पड़ता। साँसें तेज़ हो जातीं। खून होने की सम्भावना से आतंकित अकेला आदमी अपनी परछाई और आहट से पुरज़ोर चीख़ पड़ता- ‘‘नहींऽऽ !’’
‘‘नहीं’’ की लगातार उसी तेज़ स्वर में पुनरावृत्ति होती।

कौन हो सकता है वह ? क्यों उसे अकेला बैठा पाकर घेरता है ? उसके सामने खुले पृष्ठ पर से शब्द उठकर उड़ने लगते। वह चारों ओर से शब्दों से घिर जाता। असहाय और घायल हिरन पर टूट पड़ते है पैनी चोंच वाले गिद्ध।
‘‘नहीं, उसके साथ ऐसा नहीं होगा।’’ वह शब्दों को समझाता।
‘‘जो तू है, वह तू नहीं है। जो तू नहीं, वह तुझे  होना है।....तू है तो वही....लेकिन तुझे अपना वह सिद्ध करना है। मनवाना है सबसे कि तू है।’’ वह डोल जाता।

रात करवट बदलती। वह गहरी सांस लेता। क्या करे वह ? कैसे करे ? वह अकेला है उसका कोई साथी नहीं। शत्रु ?...वह भी अज्ञात ! चारों ओर सहारा का चीखता रेगिस्तान। डैने नुचे पक्षी-सा कराहता हुआ अंधड़ का शोर।
वह पसीने-पसीने हो जाता। पुस्तक में जो है, वह ज़िन्दगी में नहीं। फिर वह ज़िन्दगी का तरजुमा कैसे करे ? यह उसकी समझ में नहीं आता।

 कितनी असहनीय पीड़ा से गुज़रना हो जाता। कुछ गमनीय दृश्य बनते-बनते बिखर जाते। शून्य आंखों के सामने ठहर जाता अपरिचित आकाश लिए। सब कुछ अनपहचाना-सा लगता।
‘‘यह सब क्यों ?’’ वह आँखें फाड़कर चारों ओर देखता, वहाँ कोई नहीं होता फिर किससे पूछे वह ?’’
ओह ! त्रासद यातनाओं, क्यों बालू के घरौंदे पर डेरा डाले  हो ? ओ अदृश्य चपल चपलाओ, क्यों पतझड़ी आशियाने पर निगाड़ें गड़ाए कौंधते हुए गर्जन कर रही हो  रहम...रहम ..रहम।
आमीन।

इस बार उसने आंखें खोल दीं। कोई नहीं था। काली बिल्ली म्याऊं-म्याऊं करती सामने से निकल रही थी।
ऐसा कभी-कभी होता है कि पता ही नहीं चलता और कुछ अनहोना घट जाता है। किसी को पता भी नहीं चलता। स्वयं को भी नहीं।

सामने एक तरफ था नीम का पेड़। इस समय उसपर कोई चिड़िया बैठी हुई नहीं थी। किसी ने तने के चारों ओर की छाल को उपाटकर नंगा कर दिया था। इस  कारण वह हरा-भरा नीम का पेड़ सूख चला था और  टहनियों पर बुझी-बुझी-सी पीत पत्तियां गिरने का इन्तज़ार कर रही थीं। चिड़ियाएँ कहां चली गईं ? पत्तियां पीली क्यों पड़ने लगीं ?....यह सब उसके लिए जानना ज़रूरी था।

अब सब ओर से अपना ध्यान हटाकर पुस्तक पर केन्द्रित करने का विचार उसके मन में उठा। शब्द-अक्षर सकपका कर रह गए। वह चाहता कि वे विद्रोह करें, प्रतिसंवाद करें और अपने अस्तित्व को नजरअन्दाज नहीं होने दें।
पुस्तक की खुली आंखों पर धरती-सा तिड़कता आसमान सांस रोककर आ खड़ा हुआ। शुष्क और रंगहीन आकाश। मेघशून्य।  
इस समय उसके स्थान पर उसके पिता सूबेदार मेजर रामजी होते तो वह मोरो पंत, तुकराम, मुक्तेश्वर, कबीर आदि संतों की वाणी ऊँचे पर मधुर स्वर में गा उठते-
चल कबीरा, तेरा भव सागर डेरा।....

वह स्वयं गुनगुना उठा। पल-भर में निर्झर झर उठे। पतझड़ बसन्त बन लहलहा उठा अंधेरी निपट रात ज्योत्स्नामयी हो गई। राहे स्वयं चल पड़ीं।
चमत्कार। मंत्र। वह चकित रह गया।
उसके मन में सब कुछ घटित होता। पढ़ते-पढ़ते शब्द आंधी बनने लग जाते। वह आंधियों के साथ हो लेता। घबराकर आंख खोलता। दुःस्वप्न मिट जाते।
शब्द उसमें आंख खोलते। अपने अस्तित्व की पहचान कराते।

समय तेज़ प्रवाह-सा निकलता जा रहा था। कुछ देर रात भोर तट पहुँचकर खिसक लेगी। सूर्योदय होगा। सूर्य न अस्त होता है और न उदय। फिर भी, सूर्यास्त और सूर्योदय होता है। यह कैसा भ्रम-सम्मोहन है जो न होते हुए भी स्वीकारा जाता है। अस्वीकारने का कभी मन नहीं होता। सूर्य स्थितप्रज्ञ है। शास्वत सत्य है।
रात हो गयी, दिन छिटका रोली-कुंकुम-सा।

भीमराव अंबेडकर के मानों-मस्तिष्क पर भयावह परछाईयों का तांडव जब-तब तेज़ हो जाता और वह तटस्थ द्रष्टा बना गहरे सोच में पड़ जाता। उसके सामने एक दृश्यबंध विलुलित होने लगता।
आदमी चाहे भी तो अपनी परछाइयों के विषदंतों से मुक्ति नहीं पा सकता।

मुक्ति पाना क्या इतना आसान है ? मुक्ति किससे ? अपने से या दुनिया से अथवा दोनों से ? पर क्यों ? मुक्ति के बाद....।’’
भीमराव अंबेडकर किताब बन्द कर देता है और दीपक भी बुझा देता। तभी उस मरियल कुत्ते की भौं-भौं शुरू होकर शीघ्र शान्त हो जाती। अब चारों ओर अंधेरा का समुद्र उछाल भरता नज़र आता।
अचानक रेलवे स्टेशन सामने आ जाता। पादली रेलवे स्टेशन। लैंपपोस्ट के पास खड़ा हुआ बड़ा भाई आनंदराव कुछ चिन्तित। उसके पास खड़ा छोटा भतीजा बेखबर।

थोड़ी देर में प्लेटफार्म खाली हो गया। भीमराव चतुर्दिक निगाहें घुमा रहा था। स्टेशन मास्टर उन तीनों की ओर देखे जा रहा था। वे तीनों सतारा के पादली और पादली से बैलगाड़ी से गोरेगांव जाते। परन्तु स्टेशन पर पिताजी नहीं आए और न उसकी ओर से कोई आदमी आया।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book