करवट - अमृतलाल नागर Karwat - Hindi book by - Amritlal Nagar
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उपन्यास >> करवट

करवट

अमृतलाल नागर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :360
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1451
आईएसबीएन :9788170281368

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ब्रिटिश राज के दो सौ वर्षों की ऐतिहासिक भूमिका में भारतीय समाज-जीवन की प्रभावी परिवर्तन कथा...

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अंगरेजों के राज की पृष्ठभूमि में लखनऊ से कलकत्ता दिल्ली और लाहौर तक के विस्तृत फलक पर भारतीय समाज की ऐतिहासिक करवटों का मनोरंजक चित्रण प्रस्तुत किया गया है
प्रसिद्ध लेखक अमृतलाल नागर की कलम से, वर्षों की तैयारी और श्रम से लिखा, यह बृहद राष्ट्रीय उपन्यास प्रस्तुत है- जिसमें ब्रिटिश राज के दो सौ वर्षों की ऐतिहासिक भूमिका में भारतीय समाज-जीवन की प्रभावी परिवर्तन-कथा अंकित है।

जीवन और समाज की यह करवट अपने पीछे क्या कुछ-कुछ छिपाये है, यह सब आज हमारे लिए आश्चर्य की बातें हो सकती हैं, परन्तु यही है वह जिसकी पीठिका पर आज हमारा समाज खड़ा है। नागर जी ने अपने चिर-परिचित और प्रिय, लखनऊ, और उसमें भी अपने ही मुहल्ले चौक को, केन्द्र मानकर व्यापक फलक पर नवाब वाजिद अली शाह उर्फ जानेआलम पिया के समय से कथानक को उठाया है, और नायक तनकुन के माध्यम और विभिन्न धरातलों पर अंग्रेजों के साहचर्य से संपन्न उस समस्त प्रक्रिया को व्यक्त किया है जो क्रमिक परिवर्तन का साधन बनी। वाजिद अली शाह से आरंभ होकर यह कथा उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक चलती है, और इसका फलक अंग्रेजों की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाहौर तक विस्तृत है।

अपने अन्य उपन्यासों की भांति नागर जी के प्रस्तुत उपन्यास की विशेषता यह भी है कि यह वास्तविक घटनाओं पर आधारित है, यद्यपि यह अवश्य है कि वे उसको आवश्यकतानुसार यहां से वहां स्थानान्तरित हो रहे हैं। निश्चय ही वे वर्षों इस उपन्यास को जोड़ते-बुनते रहे और अब उसे लेखनी से उतारकर सामने लाये हैं।

 

निवेदनम्

 

समय का परिवर्तन इतिहास की पूंजी है। गदर के बाद अंग्रेजी शासन और शिक्षा के प्रभाव से हमारे समाज में नई मानसिकता का उदय हुआ था। संघर्ष की प्रक्रियाओं में पुरानी जातीय पंचायतों को नए जातीय ‘असोसिएशनों’ ने करारे धक्के ही नहीं दिए वरन् कालान्तर में उन्हें ध्वस्त ही कर डाला। इन जातीय संघर्षो से ही नई राष्ट्रीयता ने जन्म पाया था।
यह इतिहास की उस उपन्यास में काल्पनिक पात्र-पात्रियों के द्वारा अंकित हुआ है। यह मेरा कथानायक खत्री जाति का है किंतु मैंने यह आवश्यक नहीं समझा कि उसके जीवन में आई हुई सभी घटनाएं भी केवल उसी जाति में घटित हुई हों। उदाहरण के तौर पर, मुकदमेबाजी की घटना किसी और बिरादरी में हुई थी; एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की इज्जत धूल में मिलाने के लिए उनकी सुशील और विवाहित कन्या को दुष्टों के द्वारा उड़वा देने के काम किसी दूसरे नगर में हुआ था।
इस प्रकार इतिहास को कल्पना से जोड़ते हुए मैंने कई उचित परिवर्तन किए हैं। उपन्यास भानमती का कुनबा होता है-कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा। एक अंग्रेजी कहावत के अनुसार ‘इतिहास में तारीखों के अलावा और सब सच।’ पाठक कृपया इसी दृष्टि से इसे देखें।

कथा क्षेत्र के रूप में इस बार भी मैंने अपने चौक-क्षेत्र को ही उठाया है, महल्लों के नाम सही लिखे हैं किंतु उनके जुगराफिए में फेर-बदल कर दिए हैं।
पुस्तक लिखने से पूर्व कई पुस्तकों का अध्ययन किया। काला-कांकर के पद्मश्री कुंवर सुरेश सिंह जी ने कई अलभ्य पुस्तकों का दान दिया। खत्री जाति से संबंधित सामग्री कानपुर के श्री विश्वेशवरनाथ मेहरोत्रा से मिली। कलकत्ते की पुरानी खत्री बिरादरी और सेंसर रिपोर्ट पर बर्दवान के राजा बनविहारी कपूर द्वारा चलाए गए आंदोलन की घटनाएं पंडित विष्णुकांत शास्त्री से ज्ञात हुईं। प्रिय श्री लालजी टंडन तथा ज्ञानचंद्र जैन के सहयोग के लिए यदि धन्यवाद दूं तो वे बुरा मान जाएंगे।

 

-अमृतलाल नागर

 

1

 

 

लक्खी सराय की रसूलबांदी दो घड़ी दिन चढे़ ही घर से निकल गई थी। हैदरीखां जब घर से आए तो अज्जो ने बतलाया कि कल रात शाही महलों से उसके लिए बुलावा आया था।
हैदरीखां घबरा कर झल्ला उठेः ‘‘तो आज ही के दिन सगुन शायद निकली थी कैसरबाग जाने के लिए ? काले कोशों की दौड़। बैठे ठाले फिकर लग गयी साली। गई किसके साथ है ?’’
‘‘मंडियांवु छावनी का हरकारा कल रात आया था ना ? उसी की सांडनी पर गयी हैगी।’’
हैदरीखां की मर्दानगी ताव खा गयी। हाथ बेसाख्ता तंमचे पर जा पड़ा, आँखें निकाल के पूछाः ‘‘जवान था ?’’
अपने कत्थे-रंगे दांत झलकाती आंखें नचाते हुए अज्जो बोलीः ‘‘गबरू।’’ फिर चटखारा लिया जैसे उस गबरू का सवाद आ गया हो।

‘‘चिढा़ मत हरामजादी, वरना बोटी-बोटी तराश दूंगा।’’
‘‘ऐ मैं क्यों चिढ़ाऊँगी मियां। जो पूछा सो बतला दिया। तलैया में ईंटे फेंकिएगा तो छींटे पड़ेंगी ही।’’ कहकर दालान में खड़ी खाट की पीठ पर लादकर गोदाम की ओर चल दी। हैदरीखां भी बड़बड़ाते अस्तबल की ओर चल दिए।
लक्खी सराय और हैदरीखां का अस्तबल बड़ी मशहूर जगहें हैं। रिचर्डसन गोमती पार का बड़ा निलहा साहब था। रसूलबांदी की माँ उसकी रैयत थी। रिचर्डसन ने पचास रुपयों में रसूलबादी को खरीद लिया था। उम्र में पन्द्रह-बीस बरस बड़ा था मगर रसूलन को खूब ऐश कराये। रिचर्डसन को भद्दे मज़ाक बेहद पसन्द थे। वह अलिफलैला के बग़दादी शहज़ादे की तरह ऐश करना चाहता था। तीस-पैंतीस बरस की एक भठियारिन भी घर में डाल रक्खी थी। सराय बनवाने के लिए साहब को पटाया तो था भठियारिन ने मगर जीत रसूलबांदी की ही हुई। रोमन खम्भों के बरामदे और विलायती झिलमिलियादार दरवाजे थे। इमारत दूर से ही शानदार नजर आती थी।

रुपये रोज़ से अशर्फी रोज़ तक के कमरे थे यानी की मालदारों की सराय थी। फारसी हम्माम, खूबरू-हूरो ग़िल्मान, शाही महलों से टक्कर लेने वाले बावर्ची, मालिश करने वाले, किस्सागो, चौरस, शतरंज और मुसाहिबी के माहिर लोग वहां मौजूद रहते थे। निलहे साहब ने विलायती दिमाग से हिन्दुस्तानी सराय को बनवाया था। सण्डीला हरदोई जौनपुर तक के रईसों को अपनी खिदमत और इन्तजाम से खुश किया। रिचर्डसन पांच बरस पहले सब बेचबाच के विलायत चले गए। रसूलबांदी के नाम लक्खी सराय लिख दी थी। उनके अस्तबल के दरोगा हैदरीखां ने जाते समय उनके घोड़े खरीद लिए थे। कीमती घोड़े-घोड़ियों से लेकर टट्टू-टटूइयों तक को किराये पर चलाते थे। शिकरम की दो कम्पनियों से भी करार कर रखा था। सुनते हैं, किराये से हैदरीखां को सौ-सवा-सौ रुपये रोज की आमदनी है। 35-36 बरस से लाल बूँद रोबीले, सिपाही-सूरत जवान हैं। घर में घरवाली तो है ही, तीन बच्चे भी हैं। मगर रसूलन ने रिचर्डसन के बाद हैदरखां के मुँह में ही अपनी लगाम डाल रक्खी है, जिधर चाहती है उधर ही उन्हें मोड़ देती है। यह होते हुए ऐसे मौके आये हैं जब रसूलन हैदरीखां के सामने पत्ते की तरह कांपती और गिड़गिड़ाती देखी गयी है।

आज भी वैसा ही दिन है। हैदरीखां सबेरे-ही-सबेरे अपनी गली में जलेबी वाले की दुकान पर यह सुन आये थे कि वज़ीरेआला नवाब अमीनुद्दौला जब आम दिनों की तरह सबेरे अपनी बग्घी पर बादशाह को सलाम करने चले तो रास्ते में फ़जलअली वगैरह कुल चार बांकों के बीच सड़क पर उनकी बग्घी रोक ली। घोड़े खोल कर भगा दिए। खिदमदगार को गोली मार दी। दो आदमी भीड़ की तरफ बन्दूकें तान कर खड़े हो गए और दो वज़ीरेआला की छाती पर कटार तान कर बैठ गए। कहा कि पच्चीस हज़ार रुपये लाओ और कानपुर गंगा पार इंगलिशों की रियासत में महफूज पहुँचाने का कारार करो तो तुम्हारी जां-बख्शी करें। शर्त यह भी है कि यह तो खुद बादशाह जामिन हों या कम्पनी बहादुर के साहबे आलीशान, जनाब रेजीडेंट बहादुर। पता नहीं कहां क्या हुआ, क्या न हुआ और ऐसे में रसूलबांदी शाही महलों में गयी है। सूरत के कडियल दिखाई पड़ने पर भी हैदरीखां के होश फ़ाख्ता हो रहे थे।

नवाबी लखनऊ, कैसरबाग की तरफ बहुत ही रौनकभरा और शानदार था। हजरतगंज से चीनी बाज़ार और चौलक्खी तक सब एक। सआदतअली खां के फाटक के बाहर बाज़ार था जिसमें तरह-तरह की दूकानें थीं। महल के दूसरे फाटक के दरवाज़े के सामने एक बड़े अहाते में तरह-तरह के बाजे वालों की एक छोटी-सी फौज़ रहा करती थी और लगभग अस्सी किस्सों के बाजे बजा करते थे प्यारी-प्यारी ताने सुनने के लिए शहर के लोगों का मज़मां-सा वहां हर वक्त जुड़ा रहता था। लेकिन सुना है कि आज वहीं दिलफरेब संगीत जंगली शियारों के शोर-सा लग रहा है। उन्हें सुनने वालों की भीड़ आज वजीरेआला अमीनुद्दौला बहादुर की तोंद पर रखी हुई कटार पर ही नज़रें गड़ाये हुए है कि देखें कब वह गोल तरबूज-सी तोंद चाक होती है। बांके, तिरछी रिसाये और अख्तरी, नादिनी पल्टनें इस सारे हादसे पर निकम्मी और खामोश हैं। नए लखनऊ का वह तमाम इलाका अफवाहों और भय की सनसनाहटों से भरा हुआ है। मगर शाही महलों की चहल-पहल और रौनक पर उसका कोई भी असर नहीं।

शाही महलों में रसूलबांदी की सगी फुफेरी बहन हसीना-हस्सो-इस समय जाने आलम नवाब वाजिदअली शाह साहब की दिलचोर नवाब चुलबुली बेगम बनी हुई हैं। रसूल ही उसे गाँव से लायी और तालीम दिलाई थी और गला इतना सुरीला पाया था कि सुनकर हुस्न व इश्क की नाव के खिवैया जानेआलम पिया अपना दिल गंवा बैठे। मुताह की रस्म अदायगी हो गयी, हस्सो को बेगम बना लिया। रसूलबांदी की किस्मत के सितारे सातवें फलक पर चमक उठे। महलों में किसी भी समय आने-जाने के लिए परवाना मिला। गज भर की दूरी बनाये रखने के बावजूद दरोगा बंदे अली का मेंहदी रंगा बुढा़पा यही समझता रहा कि रलूलबांदी उन्हें इश्को हुस्न के मैदान का रुस्तम या सिकन्दर मानकर सौ जान से उन पर निछावर है। शराब पिला-पिला कर हजार बहानों से रसूलन ने उसे काठ का उल्लू बना रखा है।

महलों में नौकर बांदियां आये दिन चोरियां करते हैं। बन्दे अली की बूँढ़ी गोद में बैठकर रसूलन उस ठगी में भी अपना हिस्सा वसूल करती है। हैदरीखां को रसूलन पर भरोसा तो है मगर बन्दे अली से खार खाते हैं लेकिन बेबस हैं, अच्छे घोड़े खरीदे तो जाते हैं शाही अस्तबल के वास्ते और पहुँच जाते हैं अस्तबल हैदरीखां में। घोड़ों की खरीद पर खजाने से जो रकम मिली उसे खजांची से लेकर दरोगा अस्तबल माशूक हुसेन तक खा गए। दरोगा बन्दे अली की दल्लाली भी पक्की हुई। रसूलबांदी ने अपने उल्लू और अकलमन्द दोनों ही आशिकों को फायदा करवा रखा था। हस्सो के दरोगा के जरिये नवाब खास महल के दीवान गुंलशनराय से दोस्ती पटा रहा है बादशाह के एक ससुर मछरेहटा के नवाब अलीनकीखां का भरोसेमन्द और खैरख्वाह गोयन्दा बनने की फिराक में भी है। रसूलबांदी के बहाने से ही हैदरीखां भी इस समय ऊंचे-ऊंचे में अपने दांव पेंच खेल रहा है। कहानी के काले देव की जान जैसे जादुई गुफा में सोने के पिंजरे में रखे तोते में होती है, वैसे ही हैदरीखां की जान रसूलने में है। दंगे के दिन, उच्क्कों राज क्या हो क्या न हो, इसलिए पठान आशिक का दिल माशूक के लिए मुर्गी के चूंजे सा फड़फड़ा रहा था। बारे खुदा-खुदा करके चार सवारों के साथ साही झूल से सजी हथनी पर बेगम की तरह भी रसूलबांदी साहबा की पर्देदार अंबारी आती हुई दिखलाई दी।

हैदरीखां के चेहरे पर फिर से रौनक लौटी। हथिनी अपनी सराय पर न उतरवा कर मेरे फाटक पर लायी है। पर्दें से उतर कर रसूलनबांदी के दालान में तख्त के पीछे हुक्के की कोठरी में घुस गई गोया दिखला रही हो कि जनानखाने में गयी है। सिपाहियों को पानी पिलाने और इनाम बख्शिश मिलने के बाद विदा होने में पाव घड़ी के लगभग लग गयी। बी रसूलने के लिए उस कोठरी में सांस लेना भारी पड़ गया। कौड़े के कण्डे धुंआं रहे थे, महलों के माहौल में रोजमर्रा के जो शब्द अटक कर रह गए थे वह धुएं के बहाने झुझलाकर भटियारिन के मुँह से फुटफुटाये। जब तक बाहर शाही सवार और महावत रहे तब तक दीवार के कोने में अपने बुर्कें को चौपर्ता करके दबे मुँह से खांसती रही। जब गए तो हैदरीखां ने आवाज दी। रसूलन तोप के गोले सी छूटकर बाहर आई और गुस्से में अपना रेशमी बुरका तख्त पर बैठे हुए हैदरीखां के मुँह पर खींच मारा। कहाः ‘‘खांसते-खांसते दम निकल गया मेरा, हां नहीं तो। कितनी बख्शिश ले गए निगोड़े ?’’

‘‘यह सब बेकार की बातें है पहले यह बतलाओ कि शहर में दंगे फसाद की क्या हालत है ?’’
‘‘दंगा फसाद ? किस भडुये ने तुम्हारे भेजे में ये चना फोड़ दिया है ? सब अमन चैन है, रास्ते बाज़ार जैसे आम दिनों जैसे गुलजार हैंगे।’’
‘‘मगर वजीरेआला नवाब अमीनुद्दौला बहादुर ?’’
‘‘अरे वह तो महज एक सड़क की वारदाद है। उसका कोई असर न शहर पर पड़ा और न बादशाह पर। हस्सो की एक खास, बांदी खबर लाई थी। बादशाह ने फरमाया कि मैं क्यों जमानत लूं, जिसकी शतरंज है वही खेले। रजीडन्ड बहादुर के कने जाओ। खबर देने वाले को डांटकर भगा दिया।’’

‘‘मरे नवाब अमीनुद्दौला बहादुर। अल्ला जाने क्या होगा। हां तू अपनी बतला, हस्सो ने तुमको क्यों बुलाया था ?’’
‘‘वह भी बहुत घबरायी हुई है। शहर की हालत बहुत खराब है। रजीडन्ड
बहादुर का कोई खत बादशाह के पास पहुँचा है। उस खत की जबान इतनी सख्त है कि डर लगता है कि कल सल्तनत कम्पनी की हो गयी तो इस इतने बड़े हरम का निभाव कैसे होगा।’’
‘‘हूँ। तब फिर ?’’
‘‘वह कहती है, रुपया कम्पनी सरकार में जमा करा दूंगी।’’
‘‘किसकी मार्फत ?’’

सराय के बरामदे में अज्जो फिर किसी कोठरी में घुसती दिखलायी दी। हैदरीखां के हाथ से हुक्के का नैचा लेकर अज्जो से कहाः ‘‘अरी अज्जो, मेरा पानदान ले आ लपक के और एक कटोरा पानी भी लाना, गला तर कर लूं।’’ कह के हुक्के की कश खींचने लगे। हैदरीखां को जवाब मिला था, इसलिए फिर कहाः ‘‘बतलाया नहीं तुमने ?’’
‘‘आजकल नायब वजीर उसकी जवानी को नूर बख्शते हैं।’’
‘‘नायक वजीर से कहां मिलती है हस्सो ?’’
‘‘मैंने पूछा नहीं वैसे बन्दे अली....’’
‘‘एक बात तुझसे कहूं रसूलने।’’

अज्जो पानी का कटोरा और पानदान ले आई। पानी पीकर कटोरे में बची बूँदे उछालीं। कटोरी अज्जो के हाथ में दी और दोनों टांगें फैलाकर पानदान बीच में रखकर हैदरीखां की तरफ देखते हुए पूछाः ‘‘क्या कहते हो ?’’
‘‘हस्सो से कह देना कि किसी भी खानदानी रईस को मुँह न लगाये। ये हरामजादे जो शरीफ कहलाते हैं।, हम गरीबों को उठते हुए देख नहीं सकते। उनसे बढ़कर चोर बदकार और बेईमान कोई नहीं होता, समझी। नायब साहब कहते होंगे कि मालमता हमें सौंप दो, जौहरियों से दाम लगवा के बेच देंगे, रुपया कम्पनी में जमा....’’
‘‘तुम, तो जैसे मन पढ़ लेते हो। यही कहा था उन्होंने।’’ रीझी नजरों से देखते हुए दो पान हैदरीखां की ओर बढा़ दिए। पान मुंह में रखकर हुक्का अपनी ओर घुमाते हुए हैदरीखां उसी संजीदगी के साथ बात करते रहेः ‘‘नवाबजादे भले ही हों पर हैं तो साले महरियों के जाए। मैं इन खानदानी लोगों की खस्लत पहचानता हूं।’’

‘‘चच्चा सलाम। सलाम चच्ची।’’
‘‘उमर हजारी हो बेटे। चांदको जी जाओगे।’’
‘‘जी हां, कल अमावस है न ?’’
‘‘हां-हां, वो तो तुम्हारा हर महीने का नेम हैगा। और बतलाओ, अमीनुद्दौला बहादुर के हंगामे की कोई खबर सुनी ?’’
‘‘तस्फिया हो गया चच्चा’’
‘‘हो गया ! क्या हुआ, बादशाह सलामत ने जनमत ली या रजीडंट....’’
‘‘अजी न बादशाह न रेजीडेन्ट। उनके नायब आये थे सुना, नायब के घरवालों से पचास हजार दिलवाये और एक हाथी। गोरो के पहरे में कानपुर गए हैं फजलअली वगैरह।’’

‘‘हद हो गई बरखुरदार अच्छे-अच्छे खानदानों के पढ़े लिखे लड़के और यह करतूतें ?’’
‘‘फिर करें क्या चच्चा, आप ही बतलाइये । पढे़ लिखे बेचारे मारे-मारे फिर रहे हैं और सरकारी नौकरियां रिश्वतों पर नाकाबिलों को दी जा रही हैं। यह जो तमाम रंडी, भडुवे और जालसाज एक शरीफ और भोले बादशाह को अपनी खुशामदी बोलियों का निशाना बनाकर महलों से लेकर दरबार सरकार तक में घेरे हुए हैं, वे सबके सब कम्पनी की बिछाई बारूद पर अपने ख्वाबों के महल बना रहे हैं। एक दिन चिथड़े-चिथड़े होकर उड़ जायेगें, उनका नाम निशान तक न बचेगा।’’

बंसीधर उर्फ तनकुन की जोशीली बातों का हैदरीखां पर जादुई असर पड़ा। रसूलबांदी भी घुटने पर हाथ और हाथ पर ठोढ़ी टेके बहुत गौर से सुन रही थी। बात खत्म करते ही तनकुन ने तख्त से उठते हुए कहाः ‘‘और यह तो जिन्दगी है। आप लोग तो बफज्ले खुदा आधी पार कर आए हैं मगर हमें तो अभी पूरी उम्र पापड़ बेलने हैं बच्चा। लाइये, हमारी घोड़ी कसवाइये। वही लाल घोड़ी दीजियेगा।’’
‘‘अरे गफूरवे, ललकौनिया कस दे तनकुन भैया के वास्ते। चनों का तोबड़ा जरूर लटका देना भला।’’
‘‘अच्छा मियां।’’

‘‘और कह दीजिए कि जल्दी लाए। शाम ढलने से पहले जंगल पार कर जाना चाहता हूँ।’’
‘‘हाँ-हाँ ठीक है। गफूरे, जल्दी करना बे। हां.....बैठो, बैठो, तनकुन भैया। (रसूलन से) ये लाला मुसद्दीमल बजाज के साहबजादे हैं। बारह बरस की उम्र में उर्दू, फारसी के आलिम हो गए थे यह। आजकल गोरों की जबान सीख रहे हैं। इन्हें कोरा लड़का न समझ लेना। आलिमों के कान काटता है ये नौजवान। खुदा इसकी उम्र दराज़ करे। अल्लाहताला की रहमत का साया सदा तुम पर रहे बरखुरदार। एक बात बतलाओ कि नवाब अमीनुद्दौला साहब पर आज जो हादसा गुजरा है तो, क्या उनसे वजारत का कलमदान वापस ले लिया जायेगा ?’’
‘‘वह तो समझ लीजिए कि बुरी तकदीर के तबेले में बंध गए, अब देखना यह कि (चारों तरफ देखकर धीरे से) बादशाह का क्या होगा ?’’

‘‘हाय अल्ला, तो भैया क्या जानेआलम को भी हटाया जा सकता है ?’’ रसूलन ने आगे बढ़कर धीरे से पूछा।
‘‘हो सकता है कम्पनी और रियासतों की तरह यहां भी अपनी हुकूमत कायम कर ले।’’ ‘‘सूना रसूलन, हस्सो ठीक कहती थी। तनकुन भैया, एक बात बतलाओ, यहां के जौहरियों में किस पे भरोसा किया जा सकता है ?’’
‘‘महताबराय तो शाही जौहरी...’’

‘‘अरे वह तो है ही, कोई और बतलाओ। तुम्हारे मोहल्ले में भी एक हैंगे। क्या भला-सा नाम हैगा उनका !’’
‘‘लाला इन्दरचन्द रिकबदास। चच्चा, आपको माल खरीदना है या बेचना है ?’’ घोड़ी आ गयी थी।, तनकुन उठ खडा़ हुआ।
‘‘अमां, हम पूछते हैं, उनका मिजाज कैसा है ?’’ तनकुन हंसा, कमरबन्द में खुसा हुआ बटुआ निकाला और अधेला के पैसे गिनकर हैदरीखां के सामने रक्खे, कहाः ‘‘आप इत्मीनान रखिएगा चच्चा, यह ललकौनी अब मेरी भी दोस्त हो गयी है। बख्शी जी के ताल से इसके लिए घास बराबर खरीद लेता हूँ।
‘‘मैं जानता हूं तभी तो इसे तुम्हारे सिवा किसी को हाथ नहीं लगाने देता। मेरे मझंले बेटे वसीम को भी इससे बहुत लगाव हैगा।’’
तनकुन ने ललकौनी को थपथपाया और सवार हो गया। हैदरीखां ने भी अपनी गद्दी से उचक के पूछाः ‘‘अमां तुमने हमारे सवाल का जवाब नहीं दिया ?


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