आदर्श बालक - प्राणनाथ वानप्रस्थी Aadarsh Balak - Hindi book by - Pran Nath Vanprasthi
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आदर्श बालक

प्राणनाथ वानप्रस्थी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1501
आईएसबीएन :81-7483-050-2

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प्रस्तुत है आदर्श बालक....

Aadarsh Balak a hindi book by Pran Nath Vanprasthi - आदर्श बालक - प्राणनाथ वानप्रस्थी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

संसार में ऊँचा उठने के लिए महान पुरुषों के चरित्र बहुत अधिक पथ-प्रदर्शन करते हैं; शायद ही कोई दूसरा साधन इतना उपयोगी हो। आज के बालक कल के राष्ट्र-निर्माता होंगे। यह तो बिल्कुल ठीक है कि बालक के भावी जीवन को उज्जवल बनाने में जितना उसकी माता के त्याग और तपोमय जीवन का प्रभाव होता है, उतना किसी भी दूसरे साधन का नहीं। अब, दूसरा स्थान है शिक्षा का। जिस प्रकार की पुस्तक बालक पढ़ेंगे तथा जैसा उनके अध्यापकों का चरित्र होगा, वही उनके भावी जीवन में झलकेगा। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह संग्रह आपकी सेवा में प्रस्तुत है; इसमें माता-पिता की सेवा, गुरु की सेवा, भाईयों का प्रेम, धर्म के लिए बलिदान की भावना, सत्य बोलना, क्रोध न करना, निर्भय और साहसी होना, अन्याय को कभी न सहना और परमात्मदेव को पाने के लिए कठोर से कठोर विपत्ति भी हँसते हुए सहना, इस प्रकार के आदर्श भक्त बालकों के चरित्र का संग्रह किया गया है, जिसे पढ़कर जिन्दगी की नींव अधिक से अधिक सुदढ़ हो।

यदि इस संग्रह का स्वागत हुआ, तो इस प्रकार के और भी संग्रह आपकी सेवा में प्रस्तुत किए जाएंगे।

लेखक

माता-पिता का सच्चा भक्त

श्रवणकुमार

बहुत पुराने समय की बात है। इस भारत भूमि में सरयू नदी के तट पर अयोध्यापुरी में दशरथ नाम के राजा राज्य करते थे। राजा दशरथ प्रजा-पालन करते हुए गुरु वरिष्ठ जैसे महात्मा की देख-रेख में राज्य करते थे। वे साधु-महात्माओं और दीन-दुखियों की सेवा में रत रहते थे।

इनके शासन-काल में ही श्रवणकुमार हुए, जिनकी माता-पिता की सेवा की कथा छाप भारत के बच्चे बच्चे के दिल पर है। इनके माता-पिता बूढ़े और अन्धे थे। इनकी धर्मपत्नी बड़ी चालाक थी और वह बड़ी सावधानी से अपने पति को तो बढ़िया-बढ़िया भोजन और सास-ससुर को सादा, भोजन देती थी। इसका श्रवणकुमार को पता नहीं चलता था। एक दिन भोजन करते समय श्रवणकुमार ने अपना भोजन पिता से बदल लिया। वह भोजन पाकर पिता बहुत तृप्त हुए और बोले-ऐसा बढ़िया भोजन हमें आज तक नहीं मिला। श्रवणकुमार को अपनी पत्नी की चालाकी पर बहुत दुःख हुआ और उस दिन से माता-पिता की सेवा अपने हाथों से करने लगे। अब उनका यह नियम हो गया कि प्रतिदिन अपने हाथों से वृद्ध माता-पिता को नहलाते, भोजन बनाकर खिलाते, कपड़े धोते और उनकी सेवा करते। माता-पिता की सेवा अपने-आप करने लगे। और पत्नी का बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते।

इस प्रकार कई वर्ष बीत गए। माता-पिता ने पुत्र से कहा-बेटा ! हमारी इच्छा भारत भूमि के सभी तीर्थों की यात्रा करने की है। पुत्र ने माता-पिता की आज्ञा के आगे सिर झुकाया और एक बहंगी बनाई। एक पलड़े पर माता और दूसरे पलड़े पर पिता को बिठाया। उस समय यात्रा करना बड़ा कठिन होता था, न जहाज़ थे और न मोटरे ही थी, इसलिए बड़े-बड़े जंगल होते थे, जिनमें जंगली जानवरों की भरमार थी। रास्ता चलना खतरे से खाली न था।

श्रवणकुमार ने माता-पिता की बहंगी को कंधों पर उठाया और तीर्थयात्रा के लिए चल पड़ा। दिन में चलता। सायंकाल होता तो ठहर जाता। माता-पिता की सेवा के बाद संध्या करता और प्रभु से प्रर्थना करता कि-‘हे जगत् के पालन-पोषण करने वाले भगवान, मुझे बल दो जिससे मैं माता-पिता की और अधिक सेवा कर सकूं और अपने जीवन को सफल बना सकूं।’ इस प्रकार वर्षों बीत गए, पर उनकी सेवा का नियम उसी प्रकार बना रहा, उसमें उसने कोई ढील नहीं दी।
एक बार श्रवणकुमार अपने माता-पिता की बहंगी उठाए जंगल में जा रहा था कि उन्हें प्यास लगी। उसने बहंगी को रख दिया और पानी लेने चला। नदी कुछ दूर थी। जब वह नदी के किनारे पहुंचा और अपना घड़ा पानी से भरने लगा, उसी समय राजा दशरथ जंगल में शिकार के लिए आए थे और शब्दबेधी बाण चलाने का अभ्यास कर रहे थे। पानी भरने की आवाज सुनकर उन्होंने ऐसा समझा कि कोई जंगली जानवर नदी में पानी पी रहा है। उन्होंने जो बाण छोड़ा तो श्रवणकुमार के हृदय में ही लगा। उन्होंने ज्योंही किसी मनुष्य की कराहने की आवाज़ सुनी, तो घबरा गए और भागकर उस स्थान पर पहुंचे। देखा कि एक वनयुवक भूमि पर पड़ा कराह रहा है और खून से लथपथ है। यह देख-कर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उसके हृदय से बाण निकाल दिया और उसका पता पूछा।

आदर्श मातृ-पितृभक्त श्रवणकुमार ने अपनी सारी कहानी सुनाई और कहा कि मेरे अन्धे और वृद्ध माता-पिता पेड़ के नीचे बहंगी में बैठे हैं वे प्यासे हैं। आप कृपा करके उन्हें पानी पिला दें। इतना कहकर श्रवण कुमार ने प्राण त्याग दिए।
राजा दशरथ ने घड़े को कंधे पर उठाया और बताए हुए स्थान की ओर चल पड़े। वहां जाकर उन्होंने देखा कि सचमुच ही वे दोनों बड़े प्यासे हैं और अंधे होने के कारण बड़े दुःखी हैं। राजा ने वहाँ घड़ा रख दिया और चुपचाप उन्हें पिलाने लगा। इस पर बूढ़े पिता ने कहा कि बेटा, आज तुम्हें इतनी देर क्यों हो गई और फिर बोलते क्यों नहीं, हम पानी नहीं पिएंगे। तब राजा ने उन्हें श्रवणकुमार की मृत्यु का सारा समाचार सुनाया। यह सुनते ही वे दोनों दुःख से व्याकुल होकर बेहोश हो गए। होश में आते ही उन्होंने राजा से कहा कि हमारे लिए चिता बनाओ। चिता में बैठकर उन्होंने पुत्र के शव को गोद में ले लिया और जीवित ही जल गए। मरने से पहले वृद्ध अन्धे पिता ने दुःख से पीड़ित होकर राजा दशरथ को शाप दिया कि जिस तरह हम आज पुत्र के वियोग में मर रहे हैं, उसी तरह तुम भी पुत्र के वियोग में तड़प-तड़पकर मरोगे।

सचमुच हुआ भी ऐसा ही। जब राजा दशरथ बूढ़े हुए तो उन्होंने अपने बड़े पुत्र श्री रामचन्द्रजी को युवराज बनाना तय किया। इसपर उनकी मंझली रानी कैकेयी ने राजा से दो वर मांगे-एक से अपने पुत्र भरत को राजतिलक और दूसरे से राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास। यह सुनते ही राजा पछाड़ खाकर गिर पड़े और बेहोश हो गए। उसी समय रामचन्द्रजी को सूचना दी गई। वे दौड़े-दौड़े आए और सारा हाल जानकर पिता के व्रत की रक्षा करने के लिए वन चले गए। उनके साथ-साथ छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी वन गईं। भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल गए हुए थे। इस प्रकार राजा दशरथ ने अपने पुत्र के वियोग में तड़प-तड़पकर प्राण दिए और श्रवणकुमार के पिता का शाप पूरा हुआ।
बालको ! आओ हम भी आज से व्रत करें कि श्रवणकुमार की तरह माता-पिता की हर आज्ञा का पालन करेंगे और उनकी सेवा तन-मन धन से करेंगे।

गुरुभक्त भीलकुमार

एकलव्य

कई हज़ार वर्ष पहले इस पवित्र भारत-भूमि पर राजा धृतराष्ट्र राज्य करते थे। वे अन्धे थे। उनके एक सौ एक पुत्र थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र के स्वर्गवासी भाई राजा पांडु के भी पांच पुत्र थे। ये सब राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा लेते थे, जो अपने समय के सबसे बड़े शस्त्रविद्या जानने वाले थे।

एकलव्य भी उसी समय हुआ। उसके पिता का नाम था हिरण्यधनुष। वह भीलों का राजा था। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रसिद्धि सुनी। वह भी उनसे अस्त्र-शस्त्र विद्या सीखना चाहता था। माता-पिता की आज्ञा के बिना एकलव्य कोई काम नहीं करता था, इसलिए उसने माता-पिता से आज्ञा मांगी। पिता ने पुत्र से कहा कि हम लोग भील जाति के हैं। शायद वे तुम्हें शस्त्र-विद्या सिखाना न चाहें। तुम यह विचार छोड़ दो। परन्तु एकलव्य धुन का पक्का था। उसने पिताजी को हाथ जोड़कर नम्रता से कहा कि आप मुझे आज्ञा दे दें। उन्हें तो मैं किसी न किसी प्रकार मना ही लूंगा। पिता ने पुत्र की लगन को देखकर उसे अनुमति दे दी। इसपर एकलव्य प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से चल दिया।

वह हस्तिनापुर में गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा और बड़ी मधुर वाणी से अपनी इच्छा बताई। गुरू द्रोणाचार्य उसके भाव को देखकर सोचने लगे। अन्त में उन्होंने उससे कहा कि बेटा ! मैं यहाँ केवल क्षत्रिकुमारों को ही विद्या सिखाता हूं, लेकिन मैं तुम्हें भी निराश नहीं कर सकता। तुम एकांत में बैठकर अपने-आप अभ्यास करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हें सफलता मिलेगी। पर मैं स्वयं तुम्हें नहीं सिखा सकता। इसपर एकलव्य घर वापस नहीं गया और जंगल में चला गया। उसने गुरु द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उसे सामने रखकर अकेला ही जंगल में अभ्यास करने लगा। होनहार बालक तब तक चैन से नहीं बैठते, जब तक कि उनका मनोरथ पूरा नहीं हो जाता। इसलिए भील-राजकुमार एकलव्य भी निर्भर होकर जंगल में खूब लगन के साथ अभ्यास करने लगा।

एक बार सब राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य से पूछ-कर शिकार खेलने गए। वे भी उसी जंगल में जा निकले, जहाँ एकलव्य अभ्यास करता था। उनके साथ एक कुत्ता भी था। कुत्ता उनसे बिछुड़ गया और जहां एकलव्य अभ्यास कर रहा था; उसी स्थान पर पहुँच गया। कुत्ता उसे देखकर भौंकने लगा। एकलव्य ने सोचा की अध्यास की परीक्षा का समय आ गया। उसने कुत्ते के मुंह को बाणों से इस प्रकार भर दिया मानो मुंह सुई-धागे से सी दिया हो। लेकिन इतनी सफाई से कि उसे कोई चोट नहीं लगी। केवल भौंक नहीं सकता था। कुत्ता भागकर राजकुमारों के पास गया। राजकुमारों ने उसकी दशा देखी तो हैरान रह गए। वे सोचने लगे कि इस ‘जंगल में ऐसा कौन है जो शस्त्र-विद्या का इतना जानकार है। वे खोजते-खोजते उसी स्थान पर पहुँचे, यहां एकलव्य अभ्यास कर रहा था। उन्होंने उससे उसके गुरु का नाम पूछा। जब उसने अपने-आपको गुरु द्रोणाचार्य का ही शिष्य बताया, तो वे सोच में पड़ गए। वे लौट आए और गुरुजी को सब समाचार बता दिया। गुरुजी विचारने लगे कि अब क्या किया जाए।

अगले दिन गुरु द्रोणाचार्य ने राजकुमारों से कहा कि मुझे वहीं ले चलो जहां भील बालक अभ्यास कर रहा है। जब वे वहां पहुंचे तो गुरुजी को देखकर एकलव्य खिल उठा। उसने भागकर गुरुजी के चरण पकड़ लिए और अपने स्थान पर ही गुरुजी को आया देखकर फूला न समाया। गुरुजी ने उसे उठा लिया और कहा कि यदि तुम अपने आपको मेरा शिष्य कहते हो तो मुझे दक्षिणा दो। इसपर एकलव्य ने वचन दिया कि मैं आपकी हर आज्ञा को प्राण देकर भी पूर करूँगा। तब गुरु द्रोणाचार्य ने कहा कि मुझे अपना दाहिना अंगूठा काटकर दे दो। सबके देखते-देखते एकलव्य ने अपना दायां अंगूठा काटकर गुरुजी को भेंट कर दिया। उसके हाथ से खून की धारा बह निकली पर उसके मुंह पर प्रसन्नता झलक रही थी। यह देखकर गुरुजी की आंखों में आंसू आ गए और वे आशीर्वाद देकर अपने स्थान पर चले गए। अंगूठा कट जाने के बाद एकलव्य ने अपनी अंगुलियों से ही बाण चलाने का अभ्यास किया, परन्तु अंगूठे के बिना वह पहले जैसा निपुण नहीं बन सका।
इस प्रकार आदर्श शिष्य एकलव्य ने अपना अंगूठा देकर हम सब के लिए एक अनूठी गुरुभक्ति का उदाहरण रखा, ताकि हम सब उसका अनुकरण कर अपने गुरुदेव के संकेत पर अपने-आपको न्योछावर कर संसार में यशोलाभ कर सकें।



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