विवेकानन्द - राजेन्द्र मोहन भटनागर Vivekanand - Hindi book by - Rajendra Mohan Bhatnagar
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जीवन कथाएँ >> विवेकानन्द

विवेकानन्द

राजेन्द्र मोहन भटनागर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :268
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1504
आईएसबीएन :9788170284284

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विवेकानन्द की जीवनी संस्कृति की दृष्टि में

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘भारत की माटी मेरी स्वर्ग है,  
‘भारत का कल्याण ही मेरा कल्याण है’
फेंक दे यह शंख बजाना,
छोड़ दे प्रशस्ति गान करना
यदि तेरे पास दो वक्त की रोटी न हो’

 

-ये शब्द उस तेजस्वी संन्यासी के हैं जो हमारी सांस्कृतिक तथा राजनीतिक स्वाधीनता के जनक थे
भारतीय नवजागरण के अग्रदूत स्वामी विवेकानन्द के विलक्षण प्रभावी जीवन पर आधारित
सांस्कृतिक उपन्यास  

 

उपन्यास की अन्तर्कथा

 

स्वामी विवेकानन्द पर उपन्यास लिखने की इच्छा पहली बार तब जगी जब मैं नेताजी सुभाष पर ‘दिल्ली चलो’ उपन्यास के लिए अनेक बार कोलकाता आया-गया और इन यात्राओं में दक्षिणेश्वर और बेलूड़ मठ भी गया।
यह उपन्यास लिखने के पीछे प्रेरणा श्रेष्ठि-बन्धु आदरणीय श्री लक्ष्मी निवास झुनझुनवाला की रही। वे स्वामी जी के अनन्य भक्त हैं और देश को उठाने में स्वामी जी की अन्तर्दृष्टि के मौलिक प्रवक्ता। वे स्वामी जी की आधुनिक और भावी संकल्पना की सविस्तार व्याख्या करने में दक्ष हैं। उनको सुनकर मुझे लगा कि स्वामी जी को हृदय की गहराई से पकड़ा जाए और मैं इस कार्य में जुट गया। इसका परिणाम यह हुआ कि उपन्यास छह सौ उन्नीस पृष्ठ का बन गया। मैं स्वयं चाहता था और मेरे प्रकाशक आदरणीय श्री विश्वनाथ भी चाहते थे कि पाठकों को अध्ययन के प्रति रुचि लगातार कम होते जाने के कारण यह उपन्यास पाठकों को अध्ययन के प्रति रुचि लगातार कम होते जाने के कारण यह उपन्यास हिन्दी पाठकों को भी पॉकेट पर भार नहीं बने। फलत: मैंने इसे कम किया और लगभग चार सौ अड़तालीस पृष्ठ पर ले आया।
इस उपन्यास का जो आकार बना, कलेवर उभरा और रसमयता घनीभूत हुई, वह आज की विषम, हताश और त्रासद स्थितियों में आत्मबल, प्रज्ञा और चरित्रानुभूति को गहन करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

श्री झुनझुनवाला ने ‘विश्वधर्म सम्मेलन’ कृति के लिए मुझे अध्ययन भिजवाई थी। श्री गोकुल प्रसाद शर्मा भी स्वामी जी के परम भक्त हैं। उनके पिता श्री झाबरमल शर्मा-कृत ‘राजस्थान में स्वामी विवेकानन्द’ और ‘खेतड़ी नरेश और विवेकानन्द’ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ कृत ‘वेदान्त केशरी स्वामी विवेकानन्द’ अभेदानन्द कृत ‘आमार जीवन कथा’, महेन्द्रनाथ दत्त-कृत ‘स्वामी विवेकानन्द की बाल्यजीवन’, डॉ. बैरोज कृत ‘वर्ल्ड पार्लामेंट ऑफ रेलिजन्स’, रोमाँ रोलाँ, ‘द लाइफ ऑफ विवेकानन्द’, स्वामी ब्रह्मानन्द की डायरी, ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’, शैलेन्द्रनाथ धर कृत ‘ए कॉम्प्रिहैंसिव बायोग्राफी ऑफ स्वामी विवेकानन्द’, भूपेन्द्रनाथ दत्त कृत ‘स्वामी विवेकानन्द पेट्रियाटिक प्रॉफिट’, सत्येन्द्रनाथ मजूमदार कृत ‘विवेकानन्द चरित’, ‘वचनामृत’, ‘श्री रामकृष्ण भक्तिमालिका’, श्री शरतचन्द्र चक्रवर्ती कृत ‘विवेकानन्द जी के संग में’, अनिर्वाण राय कृत ‘स्वामी विवेकानन्द’, मैरिक एल बर्क कृत ‘रेमिनिसेंसेज ऑफ स्वामी विवेकानन्द’ और ‘स्वामी विवेकानन्द इन अमेरिका : न्यू डिस्कवरीज’, सम्पूर्ण विवेकानन्द वाङ्मय, समस्त उपनिषद् आदि के अध्ययन से स्वामीजी की मानसिक संचरना का परिदृश्य तैयार हुआ।

इनमें भी, प्राय: उनकी जीवनियों में, मतान्तर बना हुआ है-यथा पेरिस में उनका भाषण किस भाषा में हुआ था ? अंग्रेजी या फ्रेंच में ? गाजीपुर छोड़कर जाने का समय क्या था, नक्काशीदार राजवुड का हुक्का क्या चन्दन की लकड़ी का था, मैटरहार्न शिखर पर वे पहुँचे थे या नहीं, भामिनी क्रिस्टिन का स्मृति कथा में पांड्स लेक्चर ब्यूरो का उल्लेख, जो अन्यत्र नहीं है, थियोसॉफिस्टों के उनके प्रति षड्यन्त्र, ‘विवेकानन्द’ का नया नामकरण, क्या उनका वर्ण श्यामल था क्योंकि शरच्चन्द्र चक्रवर्ती ने गौर वर्ण बताया है। (विवेकानन्द जी के साथ में, पृ. 300), नवगोपाल बाबू के गृहोत्सव प्रसंग, सेवियर-दम्पत्ति के साथ जगह खोजने का विवरण, अमरनाथ दर्शन, कश्मीर से विदाई का वर्णन, स्वामी ब्रह्मानन्द के डाँट-फटकार वाले स्थल की वास्तविकता संगीत ज्ञान के उस्तादों के नामों में मतभेद आदि प्रसंग।
मुझे इन ग्रन्थों के अध्ययन करने में अत्यन्त आनन्द की अनुभूति हुई। उनका दिव्य और पुनीत जीवन बार-बार पुकारता रहा, उठो, जागो, अमर पुत्रों ! मुझे लगा कि अल्मोड़ा से बीस मील दूर, देवलधार में खड़े स्वामी हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियों को मन्त्रमुग्ध निहारते हुए श्वेताश्वर उपनिषद् का उच्च स्वर में पाठ कर रहे हैं-

 

‘न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु, प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्।’

 

अर्थात् जो योगाग्निमय देह प्राप्त कर लेता है, उसको रोग, बुढ़ापा और मृत्यु नहीं व्यापते।
अन्त में स्वामी ब्रह्मास्थानन्द, रामकृष्ण मठ, धतोली, नागपुर, आचार्य विष्णुदत्त, डॉ. सविता डे, स्वामी शारदानन्द, प्रो. कुमुद बनर्जी, स्वामी दिव्यानन्द, प्रो. आभा आचार्य, योगी, मेधादि भूषण, डॉ. इला जोशी, श्रीदेव गोस्वामी, महन्त विशालानन्द आदि का आभारी हूँ, क्योंकि इन सब चर्चामृत का लाभ मुझे मिला है जिससे यह कृति उपकृति हुई। अस्तु,

 

राजेन्द्र मोहन भटनागर

 

विवेकानन्द

 

तकिया ! तकिये पर श्री रामकृष्ण का चित्र। बिस्तर के पायताने ठाकुर की ताम्रकलश में अस्थियाँ, पादुका चौकी पर !
आरती का स्वर गूँजने लगा दूर-दूर तक। शशी महाराज बने। आरती उनके जिम्मे। वाद्ययंत्रों के बीच आरती होती-धूप धूना से सुगन्धित-पवित्र पूजा गृह। चमर डुलाते-डुलाते जय गुरुदेव....जय गुरुदेव की गूँज। कभी नृत्य हो उठता। तारक, गोपाल, काली और शशी वहाँ स्थायी रूप से रहने लगे और सब भी आते। ध्यान करते। जप करते। भजन गाते।
वह काली रात थी। आकाश तारों से भरा था। सभी ध्यानावस्था में बैंठे हुए थे। नरेन्द्रनाथ, ईसा मसीह के जीवन की अलौकिक कथा को कह उठा। जिनके शिष्यों के त्याग और आस्था-निष्ठा का प्रभावी वर्णन करने लगा। एक नया आलोक मण्डल उन सबके अन्त:करण को जनमगाने लगा।

धूनी की धधकती अग्नि शिखा। उन नवयुवकों में सर्वस्व त्याग की बलवती भावना ने सबको पूर्णतया जागृत कर दिया।
‘‘क्या सोचते हो ?’’ नरेन्द्रनाथ ने सब पर सूक्ष्म दृष्टि डाली।
‘‘जय गुरुदेव-जय गुरुदेव’’ की आवाज गूँज उठी।
नरेन्द्रनाथ को बाबूराम के घर आँटपुर से मिला निमन्त्रण दिव्य दष्टि बना। शशी, तारक, शरद्, गंगाधर, काली, निरंजन आदि सब थे वहाँ। भगवत् चर्चा के मध्य ईसा मसीह के त्यागी शिष्यों की मर्मस्पर्शी गाथा पुन: नरेन्द्रनाथ ने दोहरायी।
धधकती अग्निशिखा सबको आमन्त्रित कर रही थी कि कुछ शेष न रहे, जो है विसर्जन कर डालो। सारे मोह बन्धन यज्ञ के हवाले करो।

कौन कह रहा था उनके हृदय में कि यही उचित समय है। सुप्त पड़ा है संसार। आगे बढ़ो सम्पूर्ण विश्व की सुख-शान्ति के अग्रदूतों ! मानव जर्जरित हो चला है। पिशाचों का तांडव हो रहा है। चहुँ ओर कौरवों का आतंक है !
वे तरुण उस निभृत स्थान पर रात की घनी काली छाया के नीचे, अग्निशिखा के चहुँ ओर समूची दुनिया से बेखबर, संकल्प के लिए तत्पर हुए। कल्पना का यथार्थ मंगल भाव से परिपूर्ण हो उठा। नरेन्द्रनाथ ने कहा, ‘‘गुरु भ्राताओ, कर्म-यज्ञ प्रारम्भ हो रहा है आहुति चाहिए।’’
‘‘हम तैयार हैं।’’
‘‘ठाकुर की यही इच्छा थी।’’ नरेन्द्रनाथ कह रहा था, ‘‘ठाकुर ने यह उत्तरदायित्व मुझे सौंपा था। मठ की स्थापना हुई, सुरेन्द्रनाथ मित्र संस्थापक बने। हम जहाँ तक आ पहुँचे हैं, उसमें सुरेन्द्रनाथ मित्र की अत्यन्त सजीव भूमिका है और अब हम....।’’

‘‘सब पूर्णतया समर्पित हैं।’’ समवेत स्वर था।
‘‘अग्नि को साक्षी मानकर संकल्प लें।’’ गंगाधर ने कहा।
‘‘यही उपयुक्त होगा।’’ निरंजन का गुरु गंभीर स्वर था।
‘‘कदाचित् हम में से कोई नहीं जानता कि आगे क्या है।...हम सब नवयुवक हैं, दिशा तलाश रहे हैं और हृदय में विश्व कल्याण की अक्षय भावना संजोये हुए हैं।....इसके बाद संकट भी उभर सकते हैं। सदैव सत्य को अवरोध घेरते आए हैं। हमारे सामने भी प्रतिकूल स्थितियाँ आएँगी।...ठाकुर के अधिकांश प्रौढ़ अनुयायियों का माथा ठनकेगा। ये प्रश्न खड़े करेंगे। हमारी कोई नहीं सुन रहा होगा। हमें उपेक्षा भी सहनी पड़ सकती है और बदतर से बदतर स्थिति में से भी गुजरना पड़ सकता है।.....धन हमारे पास है नहीं। साधन भी नहीं के बराबर हैं।....किसी को विवश नहीं किया जा रहा है। सब अपने में स्वतन्त्र हैं, जिन्हें बाद में निर्णय लेने का मन हो वे इस यज्ञ के साक्षी बनकर हमारे साथ रह सकते हैं।’’ नरेन्द्रनाथ की भारी संगीतमयी आवाज़ गूँज रही थी।

‘‘हम सब तैयार हैं।’’
‘‘तो गुरुदेव का मन ही मन स्मरण करो। नमन करो। आशीर्वाद लो।....मेरे साथ बोलो-‘हम सब गुरुभाई अग्नि को साक्षी मानकर स्वेच्छा से प्रतिज्ञा करते हैं कि गुरुदेव के कार्यों को पूरा करने में तन-मन-धन लगा देंगे और आजीवन ब्रह्मचारी रहकर मानव हित में अपना जीवन बिताएँगे।’
वह आवाज़ अँधेरे को चीरती हुई ब्रह्मांड में गूँज उठी। समूचा परिवेश तेजोद्दीप्त हो उठा।
संघ बन गया। आँटपुर अमर हो गया। असोचा घट गया। दिग् दिगन्त गा उठा-नव सृजन के गीत !
वराहनगर में गुरुभाईयों की अग्निपरीक्षा हो रही थी। मठ का खर्च चलाने में कई कठिनाइयाँ आ रही थीं हालाँकि सुरेन्द्रनाथ मित्र ने तो तीस रुपये से बढ़ाकर एक सौ रुपया देना शुरु कर दिया था। भिक्षा के लिए वे बाहर भी जाते थे। इसी बीच सुरेन्द्रनाथ मित्र चल बसे। मठ की आर्थिक स्थिति डगमगा उठी।

कभी-कभी भिक्षा में इतना भी नहीं मिलता कि उन सबकों एक वक्त का भोजन मिल सके। कन्दरू का पत्ता उबाला हुआ, भात-नमक से ही महीनों निकाले परन्तु किसी को यह आभास नहीं था कि इतनी जल्दी उनको ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा कि भिक्षा भी नहीं मिलेगी। घुइयाँ के पत्ते पर उबला हुआ कन्दरू का पत्ता और सीमित भात मिलेगा। भात भी नहीं तो लौकी के पत्तों से काम निकालना पड़ेगा।

पहनने के लिए कौपीन और एक गेरुआ वस्त्र। बाहर जाने के लिए एक सफेद धोती और एक सफेद चादर खूँटी पर डँगी रहती थी। सब काम स्वयं करने पड़ते.....झाड़ू लगाना, रसोई तैयार करना, पाखाना साफ करना, पानी लाना, बरतन साफ करना आदि।

जप-जप, सत्संग, संगीत, कीर्तन-भजन, संध्या-आरती आदि सब नियत समय होती। हारी-बीमारी भी होती। उपेक्षा भी मिलती। व्यंग्य भी सुनने पड़ते-ये तरुण संन्यासी राख की राह पर चल पड़े हैं बिना जाने-समझे। ये नए श्रीरामकृष्ण ! धन्य हैं और सब तो ठीक था परन्तु आर्थिक स्थिति को लचर होने से कैसे रोके। कई बार सोचा कि यह सब सधने वाला कार्यक्रम नहीं है। शशी ने कहा, ‘‘ऐसा सोचना ठीक नहीं है। हम हार नहीं मानेंगे।’’
‘‘अपने साथी बीमार हो रहे है, शशी।’’

‘‘जानता हूँ-हमें खाना ढंग का नहीं मिलता। ये परीक्षा की घड़ी है और हमारे धैर्य की भी।’’
‘‘यदि किसी को कुछ हो गया तो ?’’
‘‘तो माँ जगदम्बे की इच्छा का हम लोग आदर करेंगे।’’
नरेन्द्रनाथ कई पक्षों पर विचार करता हुआ ‘आनन्द मठ’ पर ध्यान केन्द्रित कर उठा। कारण, मठ पर सरकार की निगाहें जा ठहरी थीं। अंग्रेज अधीक्षक इस उपन्यास को राजद्रोह के लिए उकसाने वाला मानता था। अंग्रेज सरकार भी उसे खतरनाक मानती थी।

नरेन्द्रनाथ को एक बंगाली पुलिसकर्मी ने अपने यहाँ भोजन पर आमन्त्रित किया था। वहाँ भोजन का तो नाम नहीं था पर पुलिस विभाग के कई व्यक्ति तैनात थे। अंग्रेजी अधीक्षक पूछ रहा था, ‘‘तुम मठ के संचालक हो, नरेन्द्रनाथ ?’’
‘‘मठ में हम गुरुभाई रहते हैं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘अपने गुरुदेव की इच्छा को पूर्ण करने के लिए।’’
‘‘कौन गुरुदेव ?’’
‘‘भगवान रामकृष्ण परमहंस।’’

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