रतिमञ्जरी एवं रतिकलाविमर्श - विद्याभूषण द्विवेदी Rati Manjari and Ratikala Vimarsh - Hindi book by - Vidya Bhushan Dwivedi
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रतिमञ्जरी एवं रतिकलाविमर्श

विद्याभूषण द्विवेदी

प्रकाशक : चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2019
पृष्ठ :52
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15248
आईएसबीएन :

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60 श्लोकों की छोटी परंतु रतिकला के विषय में अत्यंत उपयोगी पुस्तक

प्राक्कथन

कवि जयदेव परिचय १. संस्कृत साहित्य में जयदेव नाम के तीन कवि प्राप्त होते हैं। गीतगोविन्द नामक अति प्रसिद्ध गीतिकाव्य के रचनाकार जयदेव कवि बंगाल में वीरभूमि के समीप केदुली नामक ग्राम के निवासी थे। कुछ इतिहासकार इन्हें उत्कल के केन्दुबिल्व ग्राम का निवासी बताते हैं। इनकी माता का नाम वामादेवी और पिता का नाम भोजदेव था। संस्कृत भाषा के कृष्णभक्त ग्रन्थकारों में जयदेव की अच्छी स्थिति है। ये बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन की सभा में रहे हैं। अतएव इनका समय १२वीं शताब्दी ही सिद्ध होता है। वस्तुतः इनका गीतगोविन्द भगवती संस्कृत भारती के सौन्दर्य तथा माधुर्य की पराकाष्ठा है। राधा के दोनों नयनों से आँसुओं की धारा झर रही है। जान पड़ता है विकट राहु के दाँतों के गड़ जाने से चन्द्रमा से अमृत की धारा बह रही हो

वहति च वलित-विलोचनजलभरमाननकमलमुदारम् ।
विधुमिव विकटविधुन्तुददन्तदलन-गलितामृतधारम् ।।

गीतगोविन्द काव्य में १२ सर्ग हैं।

२. यह जयदेव प्रसन्नराघव नामक नाटक के रचनाकार हैं। इनका कौण्डिन्य गोत्र था। इनकी माता का नाम सुमित्रा तथा पिता का नाम महादेव था। मिथिला इनका निवासस्थान था। कुछ लोग इन्हें मध्य और दक्षिण में बसे प्राचीन नगर कुण्डिनपुर का निवासी बताते हैं। इन्होंने न्यायशास्त्र में आलोक नाम्नी टीका भी लिखी है। किन्तु गीतगोविन्दकार जयदेव से ये भिन्न हैं। इनका समय सातवीं शताब्दी मानते हैं। कुछ लोग १३वीं शताब्दी मानने के पक्ष में हैं; क्योंकि विश्वनाथ ने प्रसन्नराघव का एक पद ‘कदली-कदली’ को अपने ग्रन्थ साहित्यदर्पण में उद्धृत किया है।

ये कवि तथा तार्किक (नैयायिक) दोनों एक साथ थे—इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति उठायी, तब उसका समाधान उक्तिवैचित्र्य से किया है--

येषां कोमलकान्तकौशलकला लीलावती भारती
तेषां कर्कशतर्कवक्रवचनोद्गारेऽपि किं हीयते ।
यै:कान्ताकुचमण्डले कररुहाः सानन्दमारोपिताः
तै:किं मतकरीन्द्रकुम्भशिखरे नारोपणीयाः शराः ।।

प्रस्तुत श्लोक के तृतीय चरण से स्पष्ट होता है इस कवि की गति काम (रति) (८ ) शास्त्र में भी रही होगी। इसलिए प्रतीत होता है कि रतिमञ्जरी के रचनाकार यही जयदेव कवि हैं। इसके अनन्तर भी यह विषय अभी शोधसापेक्ष ही है।

३. जयदेव पीयूषवर्ष ने अलङ्कार सम्प्रदाय का उत्तम ग्रन्थ ‘चन्द्रालोक' लिखा है। इसी के व्याख्यान के रूप में अघय दीक्षित ने ‘कुवलयानन्द' लिखा है। इन जयदेव का समय बारहवीं, तेरहवीं शती का है। इन्होंने अपने चन्द्रालोक ग्रन्थ में काव्य का सर्वस्व अलङ्कार को स्वीकार किया है।

अङ्गीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलङ्कृती।
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलङ्कृती ।।(चन्द्रालोक १/८)

रतिमञ्जरी।

रतिमञ्जरी ६० श्लोकों में निबद्ध एक लघुकाय रचना है। परन्तु ज्ञानदर्शन की दृष्टि से इस रचना में रचनाकार जयदेव ने कामशास्त्र के अत्यावश्यक तत्त्वों का उत्तम विवेचन करने की चेष्टा की है।

। १. पद्मिन्यादिनायिकालक्षणप्रकरणम्। २. कामकलावर्णनप्रकरणम्। ३. सम्भोगसामान्यप्रकरणवर्णनम्। ४. नायिकारतिविशेषवर्णनप्रकरणम्। ५. भगलिङ्गगुणदोषवर्णनप्रकरणम्। ६. नायकलक्षणप्रकरणम्। ७. षोडशबन्धनिरूपणप्रकरणम्-इन सात प्रकरणों के माध्यम से मानों समूचे रतिशास्त्र को सङ्गुफित कर दिया हो। काम से सन्दर्भित शरीराङ्गों का ज्ञान कराते हुए किस नायक के लिए कैसी नायिका उपयुक्त होती है तथा किस नायिका के लिए कौन-सा नायक उपयुक्त होता है का अच्छा विश्लेषण इस कृति में उपलब्ध है। कामशास्त्र के विशद ज्ञान के लिए वात्स्यायन का कामसूत्र, वीरभद्र का कन्दर्पचूड़ामणि आदि ग्रन्थ पढ़ना चाहिए। कामशास्त्र के क्रियात्मक ज्ञान हेतु डॉ. विद्याभूषण द्विवेदी की—१. वात्स्यायन कामसूत्र व्याख्या, २. रतिरहस्य, ३. रतिमञ्जरी, रतिकलाविमर्श (चौखम्बा सुरभारती से प्रकाशित) पुस्तकें पढ़नी चाहिये। यह कामशास्त्र प्राणिमात्र के साथ जुड़ा हुआ है, युगों-युगों से चला आ रहा है, अत: विशाल है। यह सृष्टि का मूल है। इसके प्रवर्तक श्रीब्रह्मदेव ही हैं। कालान्तर में इस शास्त्र का विस्तार होता चला गया। उसी परम्परा में श्वेतकेतु, वाभ्रव्य, दत्तक, गोनय, घोटकमुख, चारायण, सुवर्णनाभ, कुचुमार, गोणिकापुत्र आदि ने कामशास्त्र के विभिन्न अंगों-उपांगों की रचना की। ईशा के चतुर्थशतक अर्थात् गुप्त राजाओं के स्वर्णयुग में वात्स्यायन ने सूत्रों में सर्वतोमुखी ग्रन्थ की रचनाकर मानव समाज का बहूपकार किया है। उनकी परम्परा में भी बहुत ग्रन्थों की रचना हुई, उसी का एक निदर्शन कवि जयदेव की रतिमञ्जरी भी है। आशा की जाती है कि रतिमञ्जरी की प्रस्तुत सुधी टीका से और प्रियदर्शिनी टिप्पणी से नायक-नायिका का मनोरञ्जन और हित-चिन्तन भी हो सकेगा। रतिमञ्जरी के साथ ही ‘रतिकलाविमर्श' भी संयुक्त है, अत: उसे भी अवश्य पढ़ें, जिससे कामी जीवन की बहुमूल्य विधा प्राप्त हो सकेगी।से नायक-नायिका का मनोरञ्जन और हित-चिन्तन भी हो सकेगा। रतिमञ्जरी के साथ ही ‘रतिकलाविमर्श' भी संयुक्त है, अत: उसे भी अवश्य पढ़ें, जिससे कामी जीवन की बहुमूल्य विधा प्राप्त हो सकेगी। यहीं यह बताना भी अनिवार्य है कि यशस्वी प्रकाशन चौखम्बा सुरभारती के युवक प्रकाशक चिरञ्जीट नवीन गुप्त के सुप्रयास से ‘श्रीसत्यनारायणव्रतकथारहस्य' एवं ‘रतिकलाविमर्श' सहित ‘रतिमञ्जरी' की सुधी टीका और प्रियदर्शिनी टिप्पणी का प्रकाशन हो रहा है भवानीजानि भूतभावन से उनके उज्ज्वल सुखी-मङ्गलमय भविष्य की कामना करते हैं। यहीं यह बताना भी अनिवार्य है कि यशस्वी प्रकाशन चौखम्बा सुरभारती के युवक प्रकाशक चिरञ्जीट नवीन गुप्त के सुप्रयास से ‘श्रीसत्यनारायणव्रतकथारहस्य' एवं ‘रतिकलाविमर्श' सहित ‘रतिमञ्जरी' की सुधी टीका और प्रियदर्शिनी टिप्पणी का प्रकाशन हो रहा है भवानीजानि भूतभावन से उनके उज्ज्वल सुखी-मङ्गलमय भविष्य की कामना करते हैं।

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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