Eighth lecture of Manas Pravachan Mala
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आचार्य श्रीराम किंकर जी >> मानस प्रवचन भाग-8

मानस प्रवचन भाग-8

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :174
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15251
आईएसबीएन :0

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प्रस्तुत है मानस प्रवचन माला का आठवाँ पुष्प - जिन्हके श्रवन समुद्र समाना....

॥श्रीरामः शरणं मम॥

प्रथम

सुनहु राम अब कहउँ निकेता।
जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना।
कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे ।
तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रे।।
लोचन चातक जिन्ह करि राखे।
रहहिं दरस जलधर अभिलाखे ।।
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी।
रूप बिंदू जल होहिं सुखारी।।
तिन्हके हृदय सदन सुखदायक।
बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकुताहल गुन गन चुनइ, राम बसहु हियँ तासु ।।२/१२८

भगवान् श्रीरामभद्र की महती अनुकम्पा से इस वर्ष पुनः यह सुअवसर मिला है कि बिरला अकादमी आफ आर्ट एण्ड कल्चर में, भगवान् श्री लक्ष्मीनारायण के पवित्र सान्निध्य में एकत्र होकर हमलोग श्रीरामचरितमानस की कुछ चर्चा कर सकें। कई वर्षों से अनवरत यह जो क्रम चलता आ रहा है, यह प्रभु की ही कृपा है। इस आयोजन के पीछे बिरला दम्पति श्री बसन्त कुमार जी बिरला तथा सौजन्यमयी श्रीमती सरलाजी बिरला की श्रद्धा-भावना है, जो निरंतर वर्धनशील है। अब आइये! इस नव दिवसीय प्रवचनों के समय का हम अधिक से अधिक सदुपयोग करें।
पिछले वर्ष का प्रसंग आपको याद होगा कि भगवान् श्रीराम अयोध्या से प्रस्थान करके तीर्थराज प्रयाग स्थिति महर्षि भरद्वाज के आश्रम में जाते हैं। प्रातःकाल त्रिवेणी-स्नान करने के बाद वे महर्षि से जिज्ञासा करते हैं कि आप कृपा कर यह बताइये कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? इस प्रकार जीवन-पथ के संदर्भ में जिज्ञासा का प्रसंग आपके समक्ष रखा गया था। पर उस यात्रा का लक्ष्य क्या है? इस रहस्य का उद्घाटन महर्षि वाल्मीकि तथा भगवान् श्रीराम के संवाद के रूप में वर्णित प्रस्तुत पंक्तियों में किया गया है।
तीर्थराज प्रयाग से यात्रा प्रारम्भ करके प्रभु महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आते हैं। प्रभु ने महर्षि के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और महर्षि वाल्मीकि ने भी प्रभु का बड़ा सम्मान किया तथा भगवान् श्रीराम को कुटिया में ले आकर आसन पर बैठाया। उसके पश्चात् उन्होंने प्रभु के समक्ष कन्द-मूल-फल अर्पित किया। प्रभु ने रस लेकर उन फलों का आस्वादन किया, तथा इसके पश्चात् महर्षि से भगवान् श्रीराम ने यह पूछा कि आप मेरे रहने के लिये कोई ऐसा स्थान बताइये, जहाँ मैं भी आनन्दपूर्वक रह सकें और मेरे रहने से किसी को उद्वेग भी न हो। भगवान राम के इस प्रश्न को सुनकर प्रारम्भ में वे मुस्कराते हैं। जिस तरह महर्षि भरद्वाज जी ने भगवान राम के प्रश्न के उत्तर में बड़ी मीठी भाषा में यह कहा था कि -
सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं। २/१०८/२
उसी प्रकार विनोद-युक्त वाणी में आज महर्षि वाल्मीकि ने भी उत्तर दिया।
जब महर्षि वाल्मीकि से प्रभु ने पूछा कि आप बताइये कि मैं कहाँ रहूँ? तो महर्षि ने भी प्रश्न के उत्तर में भगवान् राम से प्रश्न ही कर दिया। प्रश्न के उत्तर में प्रश्न करना यद्यपि उपयुक्त तो नहीं है, क्योंकि शास्त्रार्थ की जो पुरानी परम्परा थी उसमें इस पद्धति का आश्रय लिया जाता था। शास्त्रार्थ की परम्परा में मुख्य उद्देश्य सामने वाले को हराना होता था, तत्त्वज्ञान प्राप्त करना नहीं। इसीलिये सामने वाले विद्वान् ने अगर कोई प्रश्न किया, तो यद्यपि उपयुक्त तो यह है कि उसके प्रश्न का उत्तर दिया जाय। लेकिन शास्त्रार्थ की यह एक अनोखी परिपाटी थी कि जिसमें प्रतिद्वन्द्वी के प्रश्न को ही काटकर उससे कहा जाता था कि तुम्हारा प्रश्न ही गलत है। पहले तुम सिद्ध करो कि तुम्हारा प्रश्न ठीक है, तब मैं उत्तर दूंगा। और तब उत्तर की बात तो दूर हो जाती थी, ‘प्रश्न में क्या त्रुटि है' बस, इसी पर पांडित्यपूर्ण विवाद दोनों विद्वानों में होता था। महर्षि वाल्मीकि का तात्पर्य था कि आपके प्रश्न के उत्तर में मैं भी प्रश्न करूँ; यह तो शास्त्रार्थ में प्रतिद्वन्द्वी को हराने वाली परम्परा का परिचायक है। लेकिन महाराज ! मेरे सामने सचमुच कठिनाई है। मैं आपको चुप कराने के उद्देश्य से प्रश्न नही कर रहा हूँ वरन् आपने सचमुच इतना कठिन प्रश्न कर दिया है कि बिना प्रतिप्रश्न किये उसका उत्तर ही नहीं मिलेगा। इसलिये आप मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दीजिये, बाद में मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे दूंगा। प्रभु ने जानना चाहा कि आपका क्या प्रश्न है? और तब वाल्मीकि जी ने कहा कि यद्यपि मुझे बड़ा संकोच तो लग रहा है, पर,
पूछेहु मोहि कर रहीं कहूँ मैं पूछत सकुचाउँ ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।
‘‘प्रभु ! पहले आप मुझे यह बता दीजिये कि आप कहाँ नहीं रहते? बाद में मैं बता दूंगा कि आप वहाँ जाइए।' पर इतना कहकर ही महर्षि वाल्मीकि चुप नहीं रह गये। यद्यपि भगवान् श्रीराघवेन्द्र तो यह सुनकर मौन हो गये, उन्होंने महर्षि के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, किन्तु महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् श्रीराम से प्रश्न का उत्तर प्राप्त किये बिना ही यह कहना प्रारम्भ किया कि -

सुनहु राम अब कहहुँ निकेता ।२/१२६/३
‘‘राम ! अब मैं तुम्हारे रहने के लिये निवास स्थान बताता हूँ।''
और तब उन्होंने चौदह प्रकार के भक्तों का हृदय बताते हुए कहा कि आपके निवास के लिये यही स्थान उपयुक्त हैं। और सबसे अंत में उन्होंने कहा कि आप चित्रकूट पर्वत पर जाकर निवास कीजिए। भगवान् राम के साथ महर्षि वाल्मीकि का यह जो संवाद है वह परस्पर विरोधाभासी प्रतीत हो रहा है। क्योंकि जब उन्होंने कहा कि आप तो सर्वत्र हैं, और अगर आप सर्वव्यापी हैं तो फिर मैं कैसे कहूँ कि आप यहाँ रहिये, तब उचित तो यह था कि ऐसा कहने के बाद महर्षि को चुप हो जाना चाहिये था। लेकिन लगता है कि जैसे महर्षि ने अपनी ही बात को काट दिया हो। क्योंकि वे पुनः कहने लगे कि मैं आपके लिये निवासस्थान बताता हूँ और भक्तों के हृदय में रहने के लिये प्रेरित करने के बाद वे भगवान् श्रीराम से अनुरोध करते कि आप चित्रकूट में निवास कीजिए। इस प्रकार मानो महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् श्रीराम के प्रश्न का उत्तर तीन भिन्न-भिन्न पद्धतियों से दिया। उन तीनों पद्धतियों में बहिरंग दृष्टि से देखने पर परस्पर विरोध प्रतीत होता है, पर परस्पर भिन्नता दिखने के बाद भी इन तीनों में जो तारतम्य है, उस पर अगर गहराई से दृष्टि डालें तो इसमें हमें साधना का एक अनोखा क्रम प्राप्त होगा।
उपर्युक्त प्रसंग में आपका ध्यान मैं इस विलक्षण बात की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा कि महर्षि वाल्मीकि और भगवान् श्रीराम का यह संवाद रामचरितमानस में तो बड़े विस्तार से है, पर वाल्मीकि रामायण में केवल एक श्लोक मात्र में हैं। इसलिये अधिक उपयुक्त तो यही होता कि जब महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की तो वे अपने ग्रन्थ में यह लिखते कि श्रीराम जब मुझसे प्रश्न पूछे तब मैंने उन्हें यह उत्तर दिया, पर ऐसा उन्होंने नहीं किया। बहुधा लोग जब इन ग्रन्थों को पढ़ते हैं, तो उनके मन में स्वाभाविक रूप से यह द्विविधा आ जाती है, कि जो संवाद वे पढ़ रहे हैं, वह ऐतिहासिक सत्य है। या नहीं ? क्योंकि अगर यह ऐतिहासिक सत्य है तो फिर इसे महर्षि वाल्मीकि के ग्रन्थ में भी उसी रूप में होना चाहिये था, जिस रूप में रामचरिमानस में है। इस द्विविधा का समाधान देने के पूर्व मैं एक सूत्र की ओर संकेत करूंगा, और आप भी उस सूत्र को उसी रूप में ग्रहण कीजिये जिस रूप में मैं कह रहा हूँ। आप इसे इतिहास के खण्डन की दृष्टि से नहीं समझ लेंगे वरन् जिस शुद्ध भाव-भूमि में रामचरितमानस की रचना की गयी तथा उसके पीछे जो निहित उद्देश्य हैं, उस सूत्र के माध्यम से आप उनकी गहराई तक जाने की चेष्टा करेंगे। और मैं तो यह कहूँगा कि इसी सूत्र में भक्ति-शास्त्र का समग्र सर्वस्व छिपा हुआ है।

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