निवेदिता - दशरथ ओझा Nivedita - Hindi book by - Dashrath Ojha
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निवेदिता

दशरथ ओझा

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1527
आईएसबीएन :81-7483-377-9

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प्रस्तुत है मौलिक सांस्कृतिक उपन्यास....

Nivedita

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


प्राचीन भारतीय इतिहास के एक विलक्षण नारी चरित्र की अद्भुत कथा-एक समर्पित पत्नी के अभूतपूर्व त्याग का रोमांचक चित्र-प्राचीन कथाओं पर आधारित उपन्यासों के सफल रचयिता दशरथ ओझा की कलम से।
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.दशरश ओझा ने अपने इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास में आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित ‘ब्रह्मसूत्र’ के विद्वान टीकाकार वाचस्पति मिश्र की पत्नी भामती की अद्भुत और चकित कर देने वाली कथा को चित्रित किया है।

डॉ.दशरथ ओझा ने आद्य शंकराचार्य के जीवन पर भी एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा है जिसकी एक विशेषता उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों का विशद चित्रण भी है। इसी प्रकार यह उपन्यास भी नवीं शताब्दी के माहौल का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है जब सीमा पार से आ रहे मुसलमान देश को अपना उपनिवेश बनाने का प्रयत्न कर रहे थे।
इस विलक्षण कथा को केन्द्र में रखकर उन्होंने तत्कालीन समाज के जीवन का अद्भुत ताना-बाना इस उपन्यास में बड़ी कुशलता से बुनकर प्रस्तुत किया है।
यह उपन्यास एक अब तक अछूते विषय का मार्मिक चित्रण है जो आदि से अन्त तक पाठक को बाँधे रखने में सफल है।

डॉ. दशरथ ओझा

हिन्दी नाट्य साहित्य के प्रसिद्ध समीक्षक तथा नाटक और उपन्यासकार डॉ.दशरथ ओझा की गणना अग्रणी साहित्यकारों में की जाती है। मूलतः शिक्षक थे और उन्होंने कम लिखा परन्तु जिन क्षेत्रों में भी उन्होंने लिखा वे सभी न केवल अछूते हैं बल्कि अब वे ही इन विषयों की मानक कृतियाँ बन गई हैं। नाट्य परम्परा का समग्र इतिहास और उसकी समीक्षा पर अपनी कृति हिन्दी नाटक-‘उद्भव और विकास’, ‘प्राचीन भाषा नाटक’, ‘आज का नाटक-प्रगति और प्रभाव’ इत्यादि के माध्यम से उन्होंने इस विषय पर जो अद्भुत कार्य किया, वह आश्चर्य में डालने वाला है। इसी प्रकार आद्य शंकराचार्य पर प्रस्तुत अपने उपन्यास ‘एकता के देवदूत : शंकराचार्य’ में उन्होंने विविध क्षेत्रों से उनके अल्प परिचित जीवन के विषय में विपुल सामग्री एकत्र करने के अतिरिक्त उस काल की राजनीतिक परिस्थिति पर जो विस्तृत प्रकाश डाला है, वह इस विषय को नया आयाम तो देता है, लेखक की गहरी राजनीति, सामाजिक दृष्टि को भी व्यक्त करता है।

डॉ.ओझा विलक्षण सौजन्य और विनम्रता के धनी थे ताड़ वृक्षों से घिरे ताड़ या तारगांव नामक वाराणसी के एक गांव में 18 जनवरी 1909 को उनका जन्म हुआ था। काशी, प्रयाग तथा दिल्ली में उनकी शिक्षा हुई और उन्होंने एम. ए. (हिन्दी) में प्रथम श्रेणी प्राप्त की तथा हिन्दी नाटक विषय पर शोध प्रबंध लिखकर पी-एच.डी. अर्जित की। उनके शिक्षण कार्य का आरम्भ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से जुडे़ हिन्दू हाईस्कूल में अध्यापक के रूप में हुआ। यहाँ वे सुप्रसिद्ध काशी नागरी प्रचारिणी सभा के संस्थापक पं.रामनारायण मिश्र के सहायक भी रहे। साहित्य में उनकी आरंभ से ही रुचि रही और इन दिनों वे प्रायः प्रतिदिन प्रख्यात कवि-नाटककार जयशंकर ‘प्रसाद’ के सम्पर्क में आते थे।

यहां कुछ वर्ष कार्य करने के बाद वे दिल्ली आ गये और राजधानी के सुप्रसिद्ध पब्लिक स्कूल, माडर्न स्कूल में अध्यापन करने लगे। यहाँ वे वाइस प्रिंसिपल के पद तक पहुँचे। इसके बाद 1948 में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में हिन्दी के प्राध्यापक हो गये। यहाँ उन्होंने एक दशक तक कार्य किया और 1959 में विश्वविद्यालय के पोस्ट-ग्रेजुएट ईविनिंग इंस्टीट्यूट में हिन्दी के रीडर पद पर नियुक्त किए गए। 1974 में वे प्रोफेसर पद से रिटायर हुए और फिर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा तीन वर्ष के लिए यू-जी-सी  प्रोफेसर नियुक्त कर दिए गए।

यहां कार्य करने के बाद वे राष्ट्रीय एकता की भावना से भारतवासियों को पिरिचित कराने के लिए कई वर्ष  तक भारत सरकार से जुड़े रहे। इस रूप में उन्होंने  असम, केरल तथा आंध्र प्रदेश के विश्वविद्यालयों का व्यापक रूप से भ्रमण किया। वे इन संस्थानों के अध्यापकों तथा छात्रों से मिलकर उनसे राष्टीयता की भावना को प्रसारित करने पर चर्चा करते तथा भाषण देते थे।

अध्यापन के साथ-साथ उन्होंने नाटक विषय पर शोध कार्य भी आरंभ कर दिया था। उनका शोध प्रबंध ‘हिन्दी नाटक-उद्भव और विकास’ 1954 में प्रकाशित हुआ और इस ग्रंथ से उनकी प्रतिभा सामने आ गई। ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसकी भूमिका लिखी थी। उन्होंने लिखा : ‘‘प्रस्तुत पुस्तक में ओझाजी ने हिन्दी नाटकों की दीर्घकालीन परम्परा और उसकी विशाल पृष्ठभूमि का अध्ययन किया है। हिन्दी के लोकनाट्य की परम्परा का ज्ञान उससे हमें नहीं होता। ओझाजी ने परिश्रम के साथ उन संकेतों को ढूँढा है और प्राकृत, अपभ्रंश आदि पूर्ववर्ती और बंगला, गुजराती आदि पार्श्ववर्ती साहित्यों के प्राचीन नाटकीय परम्परा के छिन्न सूत्रों को खोज निकालने का प्रयास किया है। रासलीला के उद्भव और विकास का उन्होंने नवीन रूप में अध्ययन किया और महत्त्वपूर्ण निष्कर्षों पर पहुंचे हैं।....भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और प्रसादजी आदि नए नाटककारों के सम्बन्ध में भी उन्होंने अनेक नई सूचनाएं दी हैं। इतना कहने में मुझे संकोच नहीं कि प्रथम बार इतनी विशाल पटभूमि पर रखकर हिन्दी के नाटक देखे और जांचे गए हैं। मेरा विश्वास है कि इस पुस्तक से हिन्दी नाटकों के अध्यापन को बहुत बल मिलेगा।’’

इस पुस्तक ने उसकी धाक बैठा दी और इससे उनके भावी कार्य का मार्ग प्रशस्त हो गया। शांतिनिकेतन के सुप्रसिद्ध आचार्य क्षितिमोहन सेन ने कहा कि  ‘‘ऐसा  प्रामाणिक शोध कार्य अभी तक किसी अन्य भारतीय भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जा सका है।’’ दिनकर जी ने इसकी पुष्टि करते हुए लिखा : ‘सम्पूर्ण भारतीय नाट्य साहित्य एवं नाट्य प्रदर्शनों को दृष्टि में रखकर किसी भारतीय भाषा में ऐसा दूसरा प्रमाणिक ग्रंथ अब तक तैयार नहीं हुआ है।’’
माडर्न स्कूल में कार्य करते हुए ओझाजी महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आए।

प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था और वे आजीवन पक्के गाँधीवीदी तथा सेवाभावी बने रहे। अपने गांव में उन्होंने एक औषधालय तथा धर्मशाला भी बनवाई। वे भारतीय संस्कृति समाज के संस्थापकों में से थे और अनेक वर्ष तक इसके मंत्री रहे। 1988 में आदि शंकराचार्य की बारहसौवीं जन्म शताब्दी के आयोजन में उन्होंने बहुत काम किया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था शंकराचार्य के जीवन पर पड़े उपन्यास की रचना जिसका इसी अवसर पर लोकार्पण किया गया। उपन्यास को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

प्रोफेसर ओझा का नागरी प्रचरिणी सभा, काशी से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा। जीवन के अन्त तक वे उसके लिए कार्य करते रहे। उनका व्यक्तित्व भी सबसे अलग और प्रेमपूर्ण था। उनसे एक बार भी मिल लेने के पश्चात व्यक्ति उनको भुला नहीं पाता था। इसलिए वे अपने छात्रों में भी हमेशा अत्यन्त लोकप्रिय रहे। प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक और पत्रकार खुशवन्त सिंह को भी उन्होंने हिन्दी पढ़ाई थी। उन्होंने ओझा जी से एक बार गायत्री मंत्र का अर्थ पूछा था और उनके उत्तर से संतुष्ट भी हुए थे। इस बात का उल्लेख उन्होंने अपनी एक पुस्तक में किया है।

ओझाजी का जीवन तथा रहन-सहन बहुत सादा था। 85 वर्ष की अवस्था में अचानक हृदय गति रुक जाने से 4 अप्रैल 1994 को उनका देहांत हुआ। इससे दो दिन पूर्व ही उन्होंने ‘नटरंग’ द्वारा ‘दिल्ली में नाटक’ विषय पर एक-दिवसीय एक गोष्ठी की अध्यक्षता की थी। वे जीवन के अन्तिम क्षण तक काम करते रहे।
राजपाल परिवार से डॉ.ओझा के घनिष्ठ आत्मीय सबन्ध रहे। वर्षों वे संस्थान के स्वामी श्री विश्वनाथ के पड़ोसी रहे और पारिवारिक आत्मीयता का यह सम्बन्ध उनकी अन्तिम श्वास तक बना रहा। उनका घर दिल्ली आने वाले सभी साहित्यकारों के लिए खुला था। वे उन्हें स्वयं स्टेशन पर लेने तथा विदा देने जाते थे। आतिथ्य में भी कहीं कोई कमी नहीं रहती थी। ऐसे थे डॉ.ओझा जो कभी भुलाए नहीं भूलेंगे।

निवेदिता
1


वाचस्पति मिश्र की सारस्वत-साधना का केन्द्र होने से मिथिला के मिश्रपुरम गाँव की, नवीं शती में बहुत ख्याति थी। वैदिक परम्परा के प्रकाण्ड पण्डित एवं सुप्रसिद्ध दार्शनिक वाचस्पति मिश्र इसी ग्राम में अवतरित हुए थे। वे उच्च कोटि के साधक थे, उनका आश्रम सामगीति एवं यज्ञीय स्वाहा ध्वनि से निरन्तर गुंजरित रहता था। उनकी ज्ञान-साधना भक्ति-भावना एवं लोकसंग्रहमूलक क्रियाकलापों ने इस गाँव की मिट्टी को तपोभूमि बना दिया था। इस ग्राम की मिट्टी से मिथिला के बालकों का अक्षरारम्भ कराने की परम्परा आज भी अक्षुण्ण है। कहतें है कि जिस बालक का अक्षरारम्भ अंधरा ठाढ़ी (मिश्रपुरम का वर्तमान प्रसिद्ध नाम) की मिट्टी से होता है, वह वाचस्पति के समान ही मेधावी और विद्वान् होता है।

वाचस्पति मिश्र की सारस्वत-साधना को लक्ष्यकर कई अनुश्रुतियाँ प्रचलित हैं। एक अनुश्रति यह है कि वाचस्पति गृहस्थ होते हुए भी संन्यासी थे। दार्शनिक चिन्तन और लेखन के कार्य में वे ऐसे संलग्न हुए कि गृहस्थी के सुख को उन्होंने जाना ही नहीं। भामती उनकी पतिव्रता पत्नी थी, किन्तु वाचस्पति ने  स्त्री-सुख की कभी प्रवृत्ति ही नहीं की। भामती वैवाहिक जीवन की सारी कामनाओं-अपेक्षाओं को दबाकर उनकी सारस्वत-साधना में सहायक बनती थी। प्रसिद्ध है कि एक बार किसी दार्शनिक ग्रन्थि को सुलझाने में वे इतने तल्लीन थे कि रात में, देर तक, पुस्तक पढ़ते तथा कुछ लिखते जा रहे थे। दीपक का प्रकाश मन्द होता जा रहा था। जिस तन्मयता से लिखते हुए वे प्रकाश की ओर क्रमशः सरकते जा रहे थे, उससे उनके लिखे कागजों के जल जाने का भय था। अतः समीप खड़ी भामती ने दीपक की बत्ती को उकसा दिया और दीपक की लौ तेज हो गई। प्रकाश के तेज होते ही उन्हें आभाष हुआ कि कोई नारी-मूर्ति उनके पार्श्वभाग में खड़ी है। उसके नयन भीगे हैं। पत्नी को देखकर वाचस्पति ने पूछा कि देवी ! तुम्हारी आँखों में आँसू, क्यों हैं ? उन्हें उत्तर मिला-‘‘नाथ और सब तो ठीक है, किन्तु आप अभी तक निःसन्तान....’’ पत्नी की बात सुनकर वे उसकी मनःस्थिति समझ तो गए, परन्तु गंभीरतापूर्वक बोले, ‘‘भामती ! चिन्ता न करो। सन्तान तो क्षणभंगुर वस्तु है। मैं तुम्हें शाश्वत वस्तु दे रहा हूँ।

 आद्यशंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र भाष्य की जो टीका लिख रहा हूँ, वह तुम्हारे ही नाम से ख्यात होगी। इसको जो-जो पढ़ेंगे, वे सब तुम्हारे पुत्र ही तो होंगे।’’
मिश्रपुरम में वाचस्पति के पूर्वजों द्वारा स्थापित एक संस्कृत विद्यालय था। वहाँ दूर-दूर से छात्र पढ़ने के लिए आते थे। वाचस्पति का अक्षरारम्भ भी इसी विद्यालय में हुआ। बचपन से ही बालक की कुशाग्र-बुद्धि, शिष्टाचार एवं सौम्य स्वभाव ने उसे सबका स्नेह-भाजन बना दिया था। अध्ययन में उसकी निष्ठा, तत्परता एवं ग्रहण-शक्ति शिक्षकों को चकित कर देती थी। उसके सहपाठी उसका बहुत आदर करते थे। पढ़े हुए पाठ का परस्पर बोध करते-कराते हुए वह सबकी  समझ को प्रोन्नत करता था। अध्ययन-मनन के आगे वाचस्पति को किसी अन्य बात की सुधि-बुधि नहीं रहती थी। जो दिया गया पहन लिया, जो परोसा गया खा लिया। पहनने खाने को क्या मिला ? क्या नहीं मिला ? इसको लेकर बालक का रूठना मचलना क्या होता है ? इसे उसके माता-पिता ने कभी जाना ही नहीं।

आज, मिश्रपुरम बहुत उल्लसित है। व्याकरण, न्यायशास्त्र तथा षट्दर्शनों की गुरु परम्परा से, उच्च शिक्षा पाने के लिए, वाचस्पति को काशी के लिए प्रस्थान करना है। महाराजा नृग ने वाचस्पति के लिए काशी में विद्याध्यायन की व्यवस्था कर दी है। महाराजा नृग द्वारा प्रेषित राज-रथ आ गया है। पुत्र को दूर देश काशी जाना है, अतः स्नेहातुर माँ सबेरे से ही पुत्र के लिए पाथेय तैयार करने लगी है। वाचस्पति को विदाई देने आए छात्रों एवं हितैषियों का सत्कार करते पिता गद्गद हो रहे हैं। छात्र-सखा वाचस्पति के साथ बिताए गए दिनों के अनुभवों को व्यक्त करते हुए भाव विभोर हो रहे हैं। प्रखर बुद्धि के छात्र, परस्पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि ‘‘सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै’’ के औपनिषदिक आदेश को वह व्यवहार में बराबर ढालता रहा है। पढ़ने में रुचि न रखने वाले विद्यार्थी मुनमुनाते सुने जाते हैं कि ‘‘वाचस्पति तो बस ग्रंथ-कीट हैं अध्ययन के रस विशेष के अतिरिक्त किसी दूसरे रस को कभी जाना है क्या ? हमारी तरह उच्छृंखल कूदने-फाँदने, हो हल्ला करने की उमंग तो उसमें कभी उठी ही नहीं। बस पढ़ाकू छात्रों में घिरा रहता था। तथापि हमारे प्रति भी उनके प्रेम-व्यवहार में कोई कमी न थी। उसका सौम्य-शांत व्यक्तित्व अतिशय आकर्षणमय है।

गाँव के नर-नारी, बाल-वृद्ध सभी परम प्रसन्न थे। सभी उसे यथायोग्य स्नेहाशीष देने, शुभकामना व्यक्त करने, बलैया लेने, उमड़े चले आ रहे थे। ग्रामीण जनों की रागात्मकता ही कुछ ऐसी होती है। सभी जातियों में कोई उसका ताऊ-चाचा है, कोई भैया है। आत्माता के एक अचिन्त्य सुखद-सूत्र में सभी पिरोए से होते हैं। कोई भी बदनामी का काम करता रहता है, तो गाँव भर बदनामी का दंश महसूस करता है; किसी का सम्मान होता है, तो सारा गाँव इठला उठता है। यह एक ऐसा राग है जिसके कारण किसी के मरने पर सारा गाँव उदास हो जाता है; किसी के घर खुशी के अवसर पर सारा गाँव झूम उठता है।

राज-रथ आ चुका है। वाचस्पति के काशी-प्रयाण का समय हो गया है। माँ ने थाली में सजे अक्षत-कुंकुम से पुत्र का तिलक किया, आरती उतारी। अनायास ढुलक आए प्रेमाश्रुओं को आँचल से पोछते हुए पुत्र को विदा किया। पगडण्डियों पर लुढ़कते-सँभलते चलते हुए लोग राज-मार्ग तक आए जहाँ सुसज्जित राज-रथ खड़ा था। राज-पथ पर दौड़ते हुए रथ को देखने का कुतूहल भी लोगों की आँखों में झलक उठता था। रथ पर सवार होने से पूर्व वाचस्पति ने सभी बन्धु-बान्धवों का अभिवादन किया। गुरुजनों के चरणस्पर्श किए। सहपाठियों के गले मिले। वाचस्पति के पिता वृहस्पति मिश्र ने साथ जाने वाले कुल-पुरोहित को विशेष रूप से, एकान्त में ले जाकर, समझाते हुए कहा कि ‘‘ध्यान रखना, रसोइए से कहकर वाचस्पति के भोजन में नमक की मात्रा कभी कम, कभी ज्यादा करवा दिया करना। जिस दिन यह कहे कि भोजन में नमक तेज या फीका है, समझ लेना उसकी सारस्वत-साधना सम्पूर्ण हो गई। यह रहस्य उसे उसी दिन बतलाना, इससे पूर्व इसे गोपनीय ही रखना।

सबका अभिवादन करने के अनन्तर वाचस्पति राज-रथ पर बैठ गए। देखते-देखते रथ आँखों से ओझल हो गया। लोग विमन लौटने लगे। फिर भी लोगों के अन्तस के किसी कोने में आनन्द भी स्फुरित हो रहा था, गाँव का गौरव जो बढ़ा है। वाचस्पति की माँ देर तक ठगी-सी खड़ी उस दिशा की ओर निहार रही थीं, जिस दिशा में रथ गया था। वृहस्पति मिश्र ने उन्हें चेताया, तब उनकी मोहनिद्रा टूटी और वे घर की ओर लौटीं। सोचने लगीं, रात उतरने वाली है। न जाने कहाँ ? कैसे ? बिताएगा। काशी में वह कैसे रहेगा ? पता नहीं भोजन कैसा मिलता होगा ? मैं बलात् उसको गाय का दूध पिलाया करती थी। अब उसे कौन दूध पिलाता होगा ? बेटे को रोटी कौन खिलाता होगा ?....

गुरुपूर्णिमा के दिन पहले वाचस्पति काशी पहुँचे। वहाँ, उस समय के प्रसिद्ध विद्वान एवं आचार्य मंडन मिश्र के मतानुयायी आचार्य त्रिलोचन के पास उन्होंने शिक्षा ग्रहण करनी आरम्भ की। सोलह वर्षों तक निरन्तर अध्ययन चलता रहा। व्याकरण, श्रुति, स्मृति इतिहास, दर्शन, न्याय, साहित्य सबका गम्भीर अध्ययन करने का अवसर मिला। अध्ययन काल में उन्होंने बौद्धों और वैदिकों के शास्त्रार्थ देखे। उनमें भाग भी लिया। वाचस्पति बड़े ही परिश्रमी और मेधावी छात्र थे। अतः उन पर गुरु की विशेष कृपा थी। गुरुकृपा और परिश्रम के द्वारा वाचस्पति अपने समय में काशी के उद्भट विद्वान माने जाने लगे। उन्होंने कितने ही शास्त्रार्थ किए। वेदान्त के सूत्र और शांकरभाष्य उन्हें कण्ठस्थ था। उनमें वह नित्य नया अर्थ निकाला करते थे। वाचस्पति की तीक्ष्ण बुद्धि देखकर उनके गुरु बड़े प्रसन्न रहते थे।

एक दिन काशी के पाण्डितों में भारतीय दर्शन के विषय पर शास्त्रार्थ हुआ। बौद्ध मीमांसक, सांख्यवादी, नैयायिक, कर्मकांडी सभी उपस्थित थे। काशिराज ने इस शास्त्रार्थ की व्यवस्था यह जानने के लिए की थी इस समय काशी में सबसे मेधावी विद्वान कौन है। वाचस्पति मिश्र के गुरु ने अपने विद्यालय से वाचस्पति को भेजा। शास्त्रार्थ में वाचस्पति ने सबको पराजित कर दिया। उन्हें सर्वश्रेष्ठ विद्वान घोषित कर विद्यावाचस्पति की उपाधि प्रदान की गई। राजा ने उन्हें द्रव्य एवं वस्त्र उपहार में दिए। वाचस्पति ने इन सब उपहारों को गुरुपत्नी के चरणों में अर्पित कर दिया। काशी में इनकी विद्वत्ता की धूम मच गई। गुरु और गुरुपत्नी ने आशीर्वाद देकर कहा, ‘‘वत्स वाचस्पति ! अब तुम पच्चीस वर्ष के हो गए हो। तुम्हारी शिक्षा भी पूर्ण हो चुकी है। हम तुमसे पूर्ण संतुष्ट हैं। तुम घर जाकर विवाह करके सुखी जीवन बिताओ और वैदिक धर्म की उन्नति के लिए कार्य करो’’

रात्रि में लौटकर वाचस्पति भोजन करने बैठे। स्वाद नहीं लग रहा था। पुरोहित जी से बोले, ‘‘आज भोजन अच्छा नहीं बना, लगता है आप दाल में नमक डालना भूल गए।’’
पुरोहित जी ने ऊपर से नमक डाल दिया। भोजन के उपरान्त पुरोहित जी ने सब बिस्तर बाँधकर गठरी-पोटली तैयार कर ली। वाचस्पति की पुस्तकों का भी बड़ा गट्ठर बाँधा। वाचस्पति ने देखा, आश्चर्य से बोले, ‘‘आप यह क्या कर रहे हैं ?
‘‘आपके पिता ने कहा था कि जिस दिन वाचस्पति भोजन की शिकायत करें, उसी दिन उसे गाँव ले आना।’’ कुछ देर चुप रहकर, ‘‘इतने दिनों तक तुम्हारा ध्यान अध्ययन के अतिरिक्त और कही नहीं था, पर आज पदार्थों में रस खोज रहे हो। तुम्हारी रुचि के अनुसार भोजन तो अब तुम्हें घर पर ही तुम्हारी माँ या पत्नी बनाकर देगी। अब घर चलो।’’-वाचस्पति की मुखमुद्रा निहारते हुए पुरोहित ने कहा।

दूसरे दिन गुरुजी से आज्ञा लेकर वाचस्पति अपने सतीर्थ वेदव्रत के साथ पैदल ही घर की ओर चल पड़े। मार्ग में तीर्थों का दर्शन करते हुए वैदिक कर्म-क्रिया की दुर्दशा देखकर दोनों के मन में धर्मरक्षा का उल्लास जागा। दोनों ने धर्म के लिए जीवन बलिदान करने की प्रतिज्ञा की। बौद्धधर्म की ह्रासोन्मुखी दशा देखकर उन्हें निश्चय हो गया है कि अब समाज कदाचार से ऊब गया है। अब समय आ गया है कि  वैदिक धर्म के यज्ञ-अनुष्ठान, साधन, जप-तप द्वारा मानसिक शुद्धि की जाए, जिससे समाज के वर्तमान मानसिक रोग का निवारण हो और वैदिक धर्म के प्रति लोगों में निष्ठा जगे।

ब्रह्मचारियों के मिश्रपुरम लौटने से पूर्व उनकी विद्धत्ता की ख्याति देश की चारों दिशाओं में फैल चुकी थी। माँ उत्कंठा से बेटे के आगमन की राह देख रही थी। वह नित्य कौवों से पूछती, ‘‘काग  देव ! बताओ, मेरा बेटा कब आ रहा है ?’’ काशी आने-जाने वाले साधु-महात्माओं की खोज में वह नित्य रहा करती  और जो भी मिल जाता उससे अपने बेटे का हाल पूछती। बहाना बनाकर प्रतिदिन संध्या समय गाँव की सीमा तक जाती और काशी की ओर से जो भी आता दिखाई देता उसके पास दौड़कर जाती और अनुमान लगाती कि 16 वर्ष में मेरा बेटा कितना बड़ा हो गया होगा।

वैशाखी की पूर्णिमा का दिन था। प्रतिवर्ष इस दिन मिथिला के पण्डितों में व्याकरण-दर्शन-न्याय आदि विषयों पर शास्त्रार्थ होता था। जो पण्डित सबको पराजित करता, समाज उसका सम्मान करता। मिश्रपुरम में चर्चा फैली थी कि काशी में कुछ पण्डित इस शास्त्रार्थ में भाग लेने आ रहे हैं। माँ के मन में उमंग उठी, कदाचित् मेरा बेटा भी शास्त्रार्थ में भाग लेने आए। वह पति के मना करने पर भी गाँव की स्त्रियों और पुरुषों के साथ चल पड़ी। एक वटवृक्ष के नीचे गाँव वालों ने बिस्तर बिछाया। माँ बेटे की खोज में निकल पड़ी। वहाँ उन्हें पता चला कि काशी के दो तेजस्वी मैथली ब्राह्मण शास्त्रार्थ में भाग लेने आए हैं। सोन नदी के तट पर मन्दिर के सामने विशाल पंडाल में समाज एकत्र हुआ था।

निर्णायकों को मंच पर बैठाया गया। समस्त भारत से चुने हुए विद्वान इस शास्त्रार्थ में भाग लेने आए थे। पाल राजाओं के धर्मगुरु बौद्धभिक्षु भी इससे सम्मिलित हुए। जगत् के सत्यासत्य पर शास्त्रार्थ छिड़ा। बौद्धों ने जगत् को असत्य बताकर इससे दूर रहने का अपना पुराना सिद्धान्त रखा। सांख्य-न्याय-वैशेषिक-मीमांसा-कर्मकाण्ड के पण्डितों ने अपने-अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। वाचस्पति मिश्र ने अपनी धाराप्रवाहमयी ओजस्विनी वाणी से शांकरभाष्य के आधार पर ब्रह्म, जीव और माया के विषय में ऐसे अकाट्य तर्क दिए कि सभी पण्डित अवाक् रह गए। निर्णायकों ने मुक्तकंठ से वाचस्पति मिश्र का सत्कार किया। जनता ने वाचस्पति की जय-जयकार की। उनका जलूस निकाला गया। जुलूस में जाते हुए उन्होंने अपनी माँ को देख लिया। रथ से उतरकर माँ के चरणों पर गिर पड़े, माँ अवाक् रह गई। लोगों ने बताया कि तुम्हारा बेटा आज देश का सबसे बड़ा विद्वान घोषित किया गया है। राजा ने वाचस्पति मिश्र और उनकी माँ का बड़ा सम्मान किया और माँ तथा बेटे को रथ पर बिठाकर मिश्रपुरम् भेजा।

2.


एक दिन महाराजा नृग की सभा के धर्मामात्य पण्डित राज अपनी बेटी की जन्मकुण्डली लेकर बृहस्पति मिश्र के घर आए। उन दोनों ने वर-कन्या की कुण्डली बड़े ध्यान से देखी। मिश्रजी ने सोचा कि यदि धार्मामात्य से सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तो वाचस्पति     


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