आज के प्रसिद्ध शायर - अहमद फ़राज़ - कन्हैयालाल नंदन Aaj Ke Prasiddh Shayar - Ahmad Faraz - Hindi book by - Kanhaiya Lal Nandan
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आज के प्रसिद्ध शायर - अहमद फ़राज़

कन्हैयालाल नंदन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1534
आईएसबीएन :81-7028-387-6

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प्रस्तुत है चुनी हुई गजलें नज्में शेर और जीवन परिचय....

Aaj Ke Prasiddh Shayar - Ahmad Faraz

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रसिद्ध पाकिस्तानी शायर अहमद फ़राज़ की चुनी हुई शायरी जो अपने देश से ज्यादा दूसरे देशों में रहे या रहते हैं और एक जलावतन शायर के रूप में मानों समूचे एशिया की आवाज बनकर खड़े हैं उनकी शायरी में पाकिस्तान की जिन्दगी का जिसमें आग, धुआँ मारकाट, लूटपाट आदि आए दिन होते रहते हैं और हर किसी पर खौफ के साये लहराते रहते हैं, खूबसूरत चित्रण बड़ी बारीकी से मिलता है। साथ ही, हुस्न और इश्क उनकी शायरी का एक नुमाया रंग है जिसे उन्होंने अपने ही अंदाज में रंगा है।

अहमद फ़राज़ : एशिया की एक ख़्वाबपरस्त आवाज़

जब बात उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की हो रही होती है तो हमें मीर तक़ी मीर, ग़ालिब, मोमिन, दाग़, हसरत, यागाना, फ़ानी, जिगर, असग़र और नासिर काज़मी आदि की चर्चा जरूर करनी होती है। मगर बीसवीं शताब्दी में ग़ज़ल की चर्चा हो और विशेष रूप से 1947 के बाद की उर्दू ग़ज़ल का ज़िक्र हो तो उसके गेसू सँवारने वालों में जो नाम लिए जाएँगे उनमें अहमद फ़राज़ का नाम कई पहलुओं से महत्त्वपूर्ण है।
अहमद ‘फ़राज़’ ग़ज़ल के ऐसे शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को जनता में लोकप्रिय बनाने का क़ाबिले-तारीफ़ काम किया। ग़ज़ल यों तो अपने कई सौ सालों के इतिहास में अधिकतर जनता में रुचि का माध्यम बनी रही है, मगर अहमद फ़राज़ तक आते-आते उर्दू ग़ज़ल ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे और जब फ़राज़ ने अपने कलाम के साथ सामने आए, तो लोगों को उनसे उम्मीदें बढ़ीं। ख़ुशी यह कि ‘फ़राज़’ ने मायूस नहीं किया। अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साँचे में ढाल कर जो ग़ज़ल उन्होंने पेश की वह जनता की धड़कन बन गई और ज़माने का हाल बताने के लिए आईना बन गई। मुशायरों ने अपने कलाम और अपने संग्रहों के माध्यम से अहमद फ़राज़ ने कम समय में वह ख्याति अर्जित कर ली जो बहुत कम शायरों को नसीब होती है। बल्कि अगर मैं ये कहूँ तो गलत न होगा कि इक़बाल के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फ़ैज और फ़िराक का नाम आता है जिन्हें शोहरत की बुलन्दियाँ नसीब रहीं, बाकी कोई शायर अहमद फ़राज़ जैसी शोहरत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया। उसकी शायरी जितनी ख़ूबसूरत है, उनके व्यक्तित्व का रखरखाव उससे कम ख़ूबसूरत नहीं रहा।

अहमद फ़राज़ का जन्म पाकिस्तान के सरहदी इलाके में हुआ। उनके वालिद (पिता) एक मामूली शिक्षक थे। वे अहमद फ़राज़ को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि उनकी हर जिद वे पूरी कर पाते। बचपन का वाक़या है कि एक बार अहमद फ़राज़ के पिता कुछ कपड़े लाए। कपड़े अहमद फ़राज़ को पसन्द नहीं आए। उन्होंने ख़ूब शोर मचाया कि ‘हम कम्बल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे’। बात यहाँ तक बढ़ी कि ‘फ़राज़’ घर छोड़कर फ़रार हो गए। वह फ़रारी तबियत में जज़्ब हो गई। आज तक अहमद फ़राज़ फ़रारी जी रहे हैं। कभी लन्दन, कभी न्यूयार्क, कभी रियाद तो कभी मुम्बई और हैदराबाद।

मेरी उनसे पहली यादगार मुलाकात ऐसी ही एक फ़रारी के दरमियान बग़दाद में हुई थी। पश्चिम एशिया के अरबी बोलने वाले मुल्कों में एक काव्योत्सव (जश्ने शायराँ) बहुत मशहूर है—अल मरबिद पोयट्री फेस्टिवल। उसमें तमाम मुल्कों से अलग-अलग ज़बानों के मशहूर शायर भाग लेने के लिए आमन्त्रित किए जाते हैं। उसी महोत्सव में भाग लेने के लिए पाकिस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने आए थे जनाब अहमद फ़राज़। फरारी का आलम यह था कि यहाँ आने के वक़्त भी पाकिस्तान से नहीं आए थे, लन्दन से सीधे बग़दाद तशरीफ़ लाए थे। हिन्दुस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने के लिए भेजे गए थे जनाब रिफ़त सरोश और हिन्दी के कवि के रूप में मैं था, सो बग़दाद पहुँचा। यह वह समय था जब इराक़ की लड़ाई ईरान से चल रही थी और ख़ूब घमासान चल रही थी। लेकिन इराक़ की राजधानी बग़दाद की ज़िन्दगी का कोई भी कोना यह बताने को तैयार नहीं था कि बग़दाद पर ईरान के साथ चल रहे युद्ध का कोई दबाव है। ज़िन्दगी अपने जोर से बग़दाद में धड़क रही थी। यह पोयट्री फेस्टिवल उसका जीता-जागता उदाहरण था। तमाम मुल्कों के शायर बग़दाद में मौजूद थे।
इराक़ी हुकूमत को लगा कि यह बढ़िया अवसर है दुनिया भर के कवियों और शायरों को ‘ईरान के द्वारा की गई विध्वंसात्मक ज़्यादतियों के दिखाने का। सो उन्होंने काव्योत्सव के उद्घाटन के एक दिन पहले युद्ध के मोर्चे पर ले जाने के लिए एक बस का इन्तज़ाम किया और सभी को एक-एक यूनिफॉर्म पकड़ाना शुरू कर दिया। सबब यह बताया गया कि युद्ध के मोर्चे पर जा रहे हैं तो युद्ध की पोशाक ही होनी चाहिए। सुरक्षा की दृष्टि से यह ज़रूरी है। तमाम मुल्कों के शायर पोशाक की पुलिन्दा लेकर बस में जा बैठे। जब मेरा नम्बर आया तो मैं अड़ गया। एक इंचार्ज इराक़ी कमाण्डर मुझे समझाने आया तो मैंने उसे समझाना शुरू कर दिया और बताया कि मैं बसरा से एक बार उस इलाक़े को देखने एक पत्रकार के रूप में सादे लिबास में जा चुका हूँ। दुबारा अगर आप उस इलाक़े में ले ही जाना चाहते हैं तो मैं जैसा हूँ, भारतीय, वैसा ही चलूँगा। आपकी सैनिक वर्दी पहनकर हर्गिज़ नहीं जाऊँगा। कभी अगर सैनिक वर्दी पहनने का अवसर आया भी तो अपने देश के लिए पहनूँगा, इराक़ या ईरान के लिए नहीं।
अफसर ज़रा तन्नाया लेकिन कर कुछ न पाया। उसने तुरुप चाल चली कि अगर मोर्चे पर आपको कुछ हो गया, गोली ही लग गई तो ?

‘तो मैं, ज़ाहिर है कि मर जाऊँगा। लेकिन मरूँगा तो भारतीय। आपकी सैनिक वर्दी में अगर मरा तो मेरी पहचान भी सही न हो सकेगी,’ मैंने कहा।
मेरे साथ रिफ़त सरोश साहब भी अड़ गए। और लोग भी मेरी इस दलील में शामिल न हो जाएँ, इस डर से वर्दी न लेने वाले लोगों को साथ न ले जाना मुनासिब पाया गया और मैं वापस रिफ़त साहब के साथ होटल लौट आया। लॉबी में देखता हूँ कि फ़राज़ साहब पहले से ही कुछ चाहने वालों के साथ बैठे हैं। उन्होंने ही टोका : ‘तो आप लोग भी नहीं गए ?’
‘जी नहीं ! हमें उनकी वर्दी पहनना गवारा नहीं था।’ मैंने कहा।
‘निहायत अहमक़ाना ज़िद थी। मैं भी इसी कारण वापस आ गया।’ फ़राज़ साहब ने कहा।
मैंने उसी सुर में सुर मिलाकर कहा कि इतने लम्बे-तगड़े पठानी बदन पर कोई इराक़ी वर्दी फिट भी तो नहीं आ सकती थी, फ़राज़ साहब। इतने ख़ूबसूरत बदन के सामने वर्दी को खुदकुशी करनी पड़ती। और फिर मैंने फ़राज़ साहब की ही ग़ज़ल का एक शेर उन्हें नजर किया :
जिसको देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है।
शहर का शहर हुआ दाखिले-ज़िन्दा जानाँ !

फ़राज़ साहब अपने पठान बदन से पठानी हँसी हम पर फेंक अपने साथ बैठे चाहने वालों में खो गए और हम अपने कमरों की तरफ बढ़ गए।
फिर पूरे फेस्टिवल में फ़राज़ साहब की कुरबत (नज़दीक़ी) हमें हासिल रही।

उसके बाद अगली मुलाक़ात हुई हैदराबाद के एक मुशायरे में। मुशायरे से पहले एक छोटा-सा समारोह बाहर से आए शायरों और कवियों के सम्मान में रखा गया था, जहाँ एक हैदराबादी गायक ने फ़राज़ की शान में उन्हीं की ग़ज़ल ‘रंजिश ही सही’ बहुत ही ख़ूबसूरत तरीक़े से उनके सामने पेश की। शाम को मुशायरे में फ़राज़ साहब मेहमाने-ख़सूसी थे। हिन्दी के कवियों में श्री गोपालदास ‘नीरज’ और मैं, सिर्फ़ दो लोग थे। मेरी कविता ‘घोषणापत्र’ फ़राज़ साहब ने इतने गौर से सुनी कि उनके इसरार पर मुझे उसके कुछ महत्त्वपूर्ण अंश दुबारा पढ़ने पड़े।
इसके बाद फ़राज़ साहब जब भी दिल्ली आए, मैं कहीं-न-कहीं उनसे मिलने ज़रूर गया। उनकी कुछ ग़ज़लों पर कत्थक की मशहूर नर्तकी सुश्री पुष्पा डोगरा ने अपने नृत्य से भावों की ऐसी ख़ूबसूरत अदायगी की थी कि स्वयं फ़राज़ साहब नृत्य और शायरी के संगम पर बाग-बाग हो गए थे। दुर्भाग्य से वह हसीन नर्तकी अपने युवाकाल में ही जन्नतनशीं हो गई, लेकिन उसकी यादें फ़राज़ साहब को भुलाए न भूलेंगी।

पिछले साल सार्क सम्मेलन में उसकी कार्यकारिणी के सदस्य के नाते फ़राज़ साहब के साथ कुछ अच्छा वक़्त गुज़रा, जहाँ उनके ताज़ा कलाम को सुनने का भी अवसर मिला। अहमद फ़राज़ अच्छी शक्ल-सूरत वाले एक सजे-धजे व्यक्तित्व के मालिक तो हैं ही, उनकी शायरी उनके ख़यालात की बुलन्दी से व्यक्तित्व के साथ जुड़कर और ख़ूबसूरत लगने लगती है। यह अलग बात है कि अहमद फ़राज़ की शायरी पर बहुत से आलोचक कई दूसरे शायरों के प्रभाव खोजने लगते हैं और यह कहते हैं कि फ़राज़ का शेर पढ़ने और लिखने का अन्दाज़ विख्यात प्रगतिशील शायर फ़ैज अहमद ‘फ़ैज’ जैसा है। सच यह है कि शायरी की सोच और शायरी में रंगीनी के सवाल पर हमें अहमद फ़राज़ के यहाँ ‘दाग़ देहलवी’ और अब्दुल हमीद ‘अदम’ का रंग मिलता है। लेकिन फ़राज़ ने इन कवियों की रिवायत को बीसवीं सदी में ज़िन्दा करने का काम भी किया है। उस रंग में उन्होंने न केवल रचनाएँ रचीं, बल्कि अपने हसीन और सीधे-सादे अन्दाज़ से अपने पाठकों एवं श्रोताओं को, खासकर नौजवानों को ख़ूब प्रभावित किया।

अहमद फ़राज़ की शायरी के आलोचकों का यह भी मानना है कि अहमद फ़राज़ की शायरी की शोहरत आम होने की वजह उनकी शायरी की बाहरी सजावट और अहमद फ़राज़ का अपना सजीला व्यक्तित्व है। लेकिन मेरे जैसे पाठक को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उनकी शोहरत में उनके व्यक्तित्व का कितना हाथ है, क्योंकि मैं मानता हूँ कि शायरी की दुनिया में बाहरी चमक-दमक अधिक समय तक नहीं टिकती, जबकि अहमद फ़राज़ की शायरी दशकों बाद आज भी अपनी महत्ता बरक़रार रखे हुए है। यह सही हो सकता है कि अहमद फ़राज़ को ख्याति मुशायरों से मिली, पर मुशायरों पर छाए रहने वाले कितनी ही शायर अपनी लहक और चमक खोने के बाद अतीत का हिस्सा बन गए हैं, जबकि अहमद फ़राज़ का पहले से ज़्यादा आज मौजूद होना उनकी शायरी के दमख़म का पता देता है।

अहमद फ़राज़ की शोहरत ने अब अपने गिर्द एक ऐसा प्रभामण्डल पैदा कर लिया है जिसमें उनकी साम्राज्यवाद और वाज़ीवाद से जूझने वाले एक क्रान्तिकारी रुमानी शायर की छवि चस्पाँ है। फ़राज़ का अपना निजी जीवन भी इस प्रभामण्डल के बनाने में एक कारण रहा है, उन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से बाहर गुज़ारा है और वे एक जिलावतन (देशनिकाला) शायर के रूप में पहचाने और सराहे गए हैं। इसके अक्स उनकी शायरी में जगह-जगह हैं। उसमें देश से दूर रहने, देश के लिए तड़पने का एहसास, हिजरत की पीड़ा और हिजरत करने वालों का दर्द जगह-जगह मिलता है। बखूबी हम इसे फ़राज़ की शायरी के विभिन्न रंगों का एक ख़ास रंग कह सकते हैं।

हिजरत यानी देश से दूर रहने की पीड़ा और अपने देश की यादें अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साथ उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :
वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।

ये अशआर इस दौर से गु़जरने वाले इन्सान के दिल के चारों को झिंझोड़ते हैं। यही नहीं, कुछ और अशआर क़ाबिले ग़ौर हैं :
एक मुद्दत हुई लैला-ए-वतन से बिछड़े
अब भी रिसते हैं मगर जख़्म पुराने मेरे

जब से सर सर मेरे गुलशन में चली है तब से
बर्गे आवारा की मानिन्द ठिकाने मेरे

मिल जाए जो गुर्बत में फ़राज़ अब वही हमदम
हो जाए जहाँ शाम, वहीं रैन बसेरा।

अकेलेपन की अज़ीयत का अब गिला कैसा
फ़राज़ खुद ही तो अपनों से हो गए थे अलग

और तेरे शहर से जब रख़्ते सफ़र बाँध लिया
दरो-दीवार पै हसरत की नज़र क्या करते
चाँद कजलाई हुई शाम की दहलीज पे था
उस घड़ी भी तेरे मजबूरे-सफर क्या करते
... ... ... ... ... ... ... ... ...
 दिल ठहर जाने को कहता था मगर क्या करते।

वतन से दूरी में अपनों की मुहब्बत और उनसे बिछड़ जाने का ग़म अहमद फ़राज़ का पसन्दीदा विषय है।
उनकी मशहूर ग़ज़ल ‘रंजिश ही सही’, जिसका ज़िक्र मैं सुश्री पुष्पा डोगरा के हवाले से ऊपर कर चुका हूँ, उसी ग़म को आवाज़ देने वाली ग़ज़ल है जिसे कुछ लोग इश्क के रुमानी पहलू से जोड़ कर देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन बक़ौल फ़राज़ यह ग़ज़ल पाकिस्तान से बार-बार रूठ कर चली जाने वाली जम्हूरियत को मुख़ातिब मानकर कही गई है। शेर देखें :

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है तो जमाने के लिए आ।
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ।
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ।

और इस तरह डेमोक्रैसी की तड़प को फ़राज़ ने महबूब की जुदाई की तड़प में तब्दील कर दिया।
अहमद फ़राज़ की शायरी पर मशहूर शायर कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ की टिप्पणी यहाँ देना मैं मुनासिब मानता हूँ। वह टिप्पणी फ़राज़ को समझने में मददगार हो सकती है। उनका कहना है :
‘‘फ़राज़ की शायरी ग़में दौराँ और ग़में जानाँ का एक हसीन संगम है। उनकी ग़ज़लें उस तमाम पीड़ा की प्रतीक हैं जिससे एक हस्सास (सोचने वाला) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है। उनकी नज़्में ग़में दौराँ की भरपूर तर्जुमानी करती हैं और उनकी कही हुई बात, जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है।’’
बेदी साहब के कहे के मुताबिक़, ग़ौर करें तो फ़राज़ के यहाँ महबूब और ज़माने के ग़म एक साथ उभरते हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो वो अपने निजी ग़म को भी सार्वजनिक बना देते हैं। और यही उनका कमाल है। उदाहरण के तौर पर ग़ौर करें :
कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़न्दगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा।

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा।

झेले हैं जो दुख तूने फ़राज़ अपनी जगह हैं
पर तुम पे जो गु़जरी है वो औरों से तो कम है।

हिज़रत, ग़में दौराँ और ग़में जानाँ के अतिरिक्त अगर फ़राज़ ने केवल इश्क़ पर भी शेर कहे हैं तो भी फ़राज़ ने उनमें रिवायती हुस्नो-इश्क़ से दूर, जीती-जागती दुनिया के लोगों के इश्क़, उनकी जुदाई, उनके मिलन आदि को कुछ इतने ख़ूबसूरत अन्दाज़ में ढाला है कि सुनने वाला उसमें अपने आपको ढूँढ़ने लगता है। कभी-कभी तो लगता है, महबूब को सामने बिठाकर बात की जा रही है। उनकी तमाम ग़ज़लें और उनके अशआर इसकी ताईद करते नजर आएँगे :

वो ठहरता क्या कि गुज़रा तक नहीं जिसके लिए
घर तो घर हर रास्ता आरास्ता मैंने किया।

. ये दिल जो तुझको ब ज़ाहिर भुला चुका भी है
कभी-कभी तेरे बारे में सोचता भी है।

. सुना है बोलें तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं

. ये कौन है सरे साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं

. उसकी वो जाने उसे पासे-वफ़ा था कि न था
तुम फ़राज़ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते।

. होते रहे दिल लम्हा-ब-लम्हा तहो-बाला
वो ज़ीना-ब-जीना बड़े आराम से उतरे

फ़राज़ की शायरी पर हिन्दुस्तान अनेक समकालीन रचनाकारों ने अपनी राय ज़ाहिर की है। मजरूह सुल्तानपुरी ने एक बार लिखा कि :
‘‘फ़राज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं। उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं। बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं। उनका कलाम न केवल ऊँचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है।’’

दिल से ज़बान तक लपकता हुआ यह शोला कभी-कभी उनके आलोचकों को नाक-भौं सिकोड़ने का बहाना दे देता है और वे उनकी शायरी में हुस्नो-इश्क़ को घिसा-पिटा घोषित करते पाए जाते हैं। ऐसी आलोचनाओं का जवाब देते हुए पाकिस्तान के विख्यात शायर और कथाकार श्री अहमद नदीम क़ासिमी ने एक बार लिखा कि :
‘‘यदि हुस्नो-जमाल और इश्क़ो-मुहब्बत की उम्दा शायरी घटिया होती तो मीर और ग़ालिब ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के महान् शायरों के यहाँ घटिया शायरी के अंबारों के सिवा क्या होता। फडराज़ की शायरी में प्रयोग होने वाला हुस्नो-इश्क़ ऐसा विषय है जो इन्सानी ज़िन्दगी में से निकल जाए तो इन्सान के बातिन (अन्दर) सहराओं में बदल जाएँ। अहमद फ़राज़ तो भरी-पूरी ज़िन्दगी का शायर है।’’
अगर बारीक़ी से नज़र डालें तो अहमद फ़राज़ की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी नाजुकी और ख़ूबसूरती है, जिसे इन चन्द अशआर में देखें :
ऐसा गुम हूँ तेरी यादों के बयाबानों में
दिल न धड़के तो सुनाई नहीं देता कुछ भी

. बज़ाहिर एक ही शब है फिराक़े यार, मगर
कोई गुज़ारने बैठे तो उम्र सारी लगे।

. अब तो हमें भी तर्के मरासिम का दुख नहीं
पर दिल ये चाहता है कि आगाज़ तू करे

. अहमद फ़राज़ का मैदान वैसे तो ग़ज़ल है, पर फ़राज़ ने नज़्में भी लिखी हैं जो अपने अन्दर कई पहलू लिए हुए हैं। फ़राज़ यहाँ भी अपने प्यारे विषय ‘देश-प्रेम’ और ‘हिजरत’ से दामन छुड़ा नहीं पाए हैं। यों उनमें सारी मानवता की पीड़ा समाई मिल जाएगी :
ये दुख आसाँ न थे जानाँ
पुरानी दास्तानों में तो होता था
कि कोई शाहज़ादी या कोई नीलम परी
देवों या आसेबों की क़ैदी
अपने आदम ज़ाद दीवाने की रह तकते

दरबदरी की तस्वीर में वे शब्दों का रंग यूँ भरते हैं :
किसी शहर बे अमाँ में
मैं वतन बदर अकेला
कभी मौत का सफर था
कभी ज़िन्दगी से खेला

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