काम-रहस्य - इन्द्र मोहन झा Kam-Rahasya - Hindi book by - Indra Mohan Jha
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काम-रहस्य

इन्द्र मोहन झा

प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15349
आईएसबीएन :8170844105

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काम शास्त्र का अद्भुत ग्रंथ

काम (सेक्स) क्या है?

कुछ-थोड़े से शब्दों में ही यह कहा जा सकता है कि “सृजनात्मक (Constructive) समाधान के लिए स्त्री-पुरुषों का निर्दोष अथवा स्वाभाविक यौन (Sexual) संभोग आचरण'। इसे आम बोलचाल की भाषा में सहवास की इच्छा कहा गया है।

इसी अपरिमेय शक्ति काम से प्रेरित स्त्री-पुरुष के सृजनार्थ सदाचरण को ‘मैथुन' कहते हैं। यही सृष्टि का अस्तित्व (Existance) है। वैदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों से स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में वंश-वृद्धि ही स्त्री-समागम का प्रमुख उदेश्य रहा है (द्रष्टव्य-ऋग्० 7/34/20; अथर्ववेद 14/2/14,37,39; पारस्करगृह्यसूत्र-क्षेपक-कण्डिका 1/10; रामायण 1/36/21; महाभारत-शान्तिपर्व 110/23, विष्णुधर्मोत्तरपुराण 2/122/24; वराहपुराण 142/33-4; भागवतमहापुराण 11/5/13)। महाभारत (उद्योगपर्व 39-76) में केवल वासना की शान्ति के लिए मैथुन को शोचनीय तथा कर्मपुराण (उ०19/18) में ऐसा करने वाले के जीवन को निष्फल बताया गया है।

श्रीमद्भागवतपुराण (10/22/26) के अनुसार ईश्वरार्पण बुद्धि से काम का सेवन करने से मनुष्य भवबन्धन में नहीं पड़ता। इस तरह काम का सेवन मोक्ष प्राप्ति में भी सहायक माना गया है। अत: युवकों और युवतियों को बिना विवाह किये काम का सेवन अर्थात् मैथुन नहीं करना चाहिए।

कामशास्त्र के अध्ययन के बिना जो काम में प्रवृत्त होता है वह निश्चय ही वासनात्मक जीवन का प्रतीक बन कर अपने साथ अपने सगे-सम्बन्धियों को भी पतन के मार्ग पर ढकेलने का प्रयास करता है। ऐसे ही व्यक्ति काम के प्रभाव में बहकर पशु-पक्षी की तरह बेतहाशा कामुकता अर्थात् अबाधित वासना के अभिभूत होकर अपने श्रेयस् और स्वास्थ्य को सत्यानाश कर बैठता है। उसके पास मानवीय मर्यादा और आदर्श नहीं रह जाता। इस तरह वह अपने मानवीय. कांचन जीवन को काँच बनाकर एवं सुखसाधनों से हाथ धोकर अपने ही पाँवों पर अपने हाथ से कुल्हाड़ी मारने का प्रयास करता है।

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