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नरेन्द्र-मोहिनी

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 1988
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15389
आईएसबीएन :0

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देवकी नन्दन खत्री का रहस्य-रोमांच से भरपूर उपन्यास

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रहस्य रोमांच से भरपूर उपन्यास

।। श्री।।
नरेन्द्र-मोहिनी
पहिला भाग
पहिला बयान

"इस वक्त जंगल कैसा भयानक मालूम पड़ता है ! इस चाँदनी ने तो और भी रंग जमाया है। पेड़ों में से छन कर जमीन पर पड़ती हुई दूर तक दिखाई देती है। बीच बीच में कटे हुए पेड़ों की थुन्निया निगाहों के सामने पड़ कर मेरे दिल के साथ क्या काम करती हैं इसे मैं ही जानता हूँ !"
धीरे धीरे यह कहता हुआ बीस बाईस वर्ष के सिन का एक युवा बड़े भारी और डरावने जंगल में इधर से उधर घूम रहा है। गोरा रंग, हर एक अंग साफ और सुडौल, चेहरे से जवांमर्दी और बहादुरी बरस रही है, मगर साथ ही इसके फिक्र और उदासी भी इसके खूबसूरत चेहरे से मालूम पड़ती है।
घूमते घूमते इस नौजवान बहादुर के कान में एक दर्दनाक रोने की आवाज आई जिसे सुनते ही वह चौंक उठा और इधर-उधर ध्यान लगा कर देखने लगा, मगर फिर वह आवाज न सुन पड़ी।
वह दर्दनाक आवाज ऐसी न थी कि जिसे सुन कर कोई भी अपने दिल को सम्हाल सकता। हमारा नौजवान बहादुर तो एक दम परेशान हो गया, क्योंकि यह जितना दिलेर और ताकतवर था उतना ही नेक ओ रहमदिल भी था। आवाज कान में पड़ते ही मालूम हो गया था कि यह किसी कमसिन औरत की आवाज है जिस पर कोई जुल्म हो रहा है। इससे आखिर न रहा गया और यह उसी आवाज की सीध पर पश्चिम की तरफ चल निकला।
थोड़ी ही दूर जाने पर फिर वैसी ही दर्दनाक आवाज इस बहादुर के बाईं तरफ से आई जिसे सुन यह बाईं तरफ को मुड़ा और थोड़ी ही देर में उस जगह जा पहुंचा जहाँ से वह पत्थर जैसे कलेजे को भी गला कर बहा देने वाली आवाज आ रही थी।
वहाँ पहुँच कर इसकी तबीयत और भी घबड़ाई, खौफ ताज्जुब और गुस्से से अजब हालत हो गई, और कलेजा धक-धक करने लगा क्योंकि उस जगह पर ही दृश्य देखा।
जिस जगह पर यह जवान पहुंच कर खड़ा हुआ उसके सामने ही एक बड़ा पीपल का पेड़ था। इस आधी रात के सन्नाटे में हवा के लगने से उस पेड़ की पत्तियाँ खड़खड़ा रही थीं। उसी पेड़ की एक मोटी डाल के साथ एक लाश लटक रही थी जिसके पैर में रस्सी बंधी हुई थी और सिर नीचे की तरफ था। इसी लाश को देख कर हमारे नौजवान बहादुर.की वह दशा हुई थी जैसा कि हम ऊपर लिख चुके हैं।
उस लाश को देख कर नौजवान ने म्यान से तलवार खैंच ली जो उसके कमर में बंधी हुई थी और आगे बढ़ा। पास जाने से मालूम हुआ कि यह लाश एक औरत की है। साड़ी उसकी जमीन पर लटक रही थी और कई जगह से बदन नंगा हो रहा था, दोनों हाथ भी नीचे की तरफ लटक रहे थे।
वह बहुत गौर से उस लाश को देखने लगा। इतने ही में हवा का एक तेज झटका आया जिसके सबब से पेड़ की तमाम छोटी-छोटी डालियाँ हिल-हिल कर झोंका खाने लगीं और वह डाली भी जो चन्द्रमा की रोशनी को उस लाश तक पहुँचने नहीं देती थी जोर से एक तरफ को हट गई और चन्द्रमा की रोशनी बहुत थोड़ी देर के लिये उस लाश के ऊपर आ पड़ी। साथ ही नौजवान के बिल्कुल रोंगटे खड़े हो गये, क्योंकि उस औरत का चेहरा जो पेड़ के साथ बेहोश उल्टी लटक रही थी. उस चाँद से किसी तरह कम न था जिसकी रोशनी क्षण भर के लिये उसके बदन पर पड कर उसकी हालत नौजवान को दिखला दी थी।
नौजवान को इस चाँद की रोशनी में एक बात और भी ताज्जुब की दिखलाई पड़ी। वह उल्टी लटकी हुई औरत बिल्कुल जड़ाऊ जेवरों से लदी हुई थी जिसे देख कर नौजवान के खयाल कई तरफ दौड़ाने लगे।
जल्दी से उस लाश के पास जाकर देखने लगा कि इसमें कुछ दम है या नहीं। नाक पर हाथ रक्खा, सांस चल रही थी। मालूम हुआ कि यह नाजुक औरत अभी तक जीती है। अब इसकी तबीयत कुछ खुश हुई और इसने इस बात पर कमर बाँधी कि जिस तरह हो सकेगा इसे उतार कर इसकी जान बचाऊंगा और उसे शैतान के बच्चे को पूरी सजा दूंगा जिसने इसके साथ ऐसी बुराई की।
यह सोच कर वह बहादुर नौजवान पेड़ पर चढ़ गया और बहुत होशियारी के साथ उस रस्से को खोला जिससे वह औरत लटक रही थी। उसे धीरे धीरे जमीन पर छोड़ा और तब आप भी नीचे उतर आया और उसकी टाँग से रस्सी खोल उसे सीधा कर पेड़ के साथ खड़ा कर दिया मगर हाथ से थामे रहा जिसमें उसके बदन का तमाम खून जो बहुत देर तक उल्टे रहने के सबब से सिर की तरफ उतर आया था लौट कर तमाम बदन में फैल जाय।
कुछ देर बाद उस औरत ने आँख खोली और बैठना चाहा। बहादुर नौजवान ने धीरे से पेड़ के सहारे उसे बैठा दिया और पूछा “अब मिजाज कैसा है?" जिसके जवाब में वह कुछ न बोली, हाँ आँख उठा कर चन्द्रमा की तरफ देखा, फिर सिर नीचे करके बहुत धीरे धीरे बोलने लगी :
औरत : आपने मेरी जान बचाई ! इसका बदला मैं किसी तरह पर नहीं दे सकती! अगर जन्म भर आपके जूठे बर्तन मांजूं तो भी पूरा नहीं हो सकता।
नौजवान : इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, मैंने तुम्हारे साथ कोई नेकी नहीं की बल्कि मैंने अपनी भलाई की कि अपने को पाप का भागी होने से बचाया। मैंने अपनी जान लड़ा कर तुम्हारी जान नहीं बचाई, राह चलते इस जगह आ पहुंचा और तुमको इस हालत में देख कर जो कुछ हो सका किया। मैं तो क्या कोई पत्थर के कलेजे वाला भी इस जगह आकर तुम्हारी सी औरत को ऐसी दशा में देखता तो बिना बचाये कहीं जा सकता था? तिस पर जो जरा भी जानता होगा कि ईश्वर कोई चीज है उससे तो स्वप्न में भी कभी ऐसा न होगा, इसलिये मैंने अपनी ही भलाई की कि अपने को राक्षस कहलाने से बचाया।
इस बीच में कई दफे हवा के झोंके आये जिन्होंने उस पीपल की डालियों को हटा हटा कर चन्द्रमा की रोशनी को उन दोनों तक पहुँचने दिया जिससे एक को दूसरे ने कुछ अच्छी तरह देखा। हर दफे उस नाजुक औरत ने मीठी मीठी बातें कहते उस नौजवान की सूरत को देखा मगर देख देख सिर नीचा कर लिया तथा तब बात खतम होने पर यह जवाब दिया -
औरत : मुझे इतनी बुद्धि नहीं है कि आपकी इन बातों का जवाब दूं क्योंकि आखिर तो औरत हूँ, हाँ मैं इतना जरूर कह सकती हूँ कि आपने मेरे साथ जो कुछ किया उसे मैं ही जानती हूँ कहने की सामर्थ्य नहीं और बहुत बातें करने का यह मौका भी नहीं क्योंकि अगर हम लोग यहाँ देर तक रहेंगे तो जरूर हम तीनों ही की जान बुरी तरह जायगी।
नौजवान : (ताज्जुब से ) यहाँ पर तो सिवाय हमारे तुम्हारे तीसरा कोई भी नहीं है! तब तुमने यह कैसे कहा कि हम तीनों की जान जायगी?
औरत : ( ऊंची साँस लेकर ) हाय ! मेरी बहन भी इसी जगह है।
नौजवान : ( चौंक कर ) हैं, यहाँ पर तुम्हारी बहन भी है ! कहाँ है जल्दी बताओ जिसमें उसके भी बचाने कि फिक्र की जाय !!
औरत : ( हाथ से बतला कर ) इसी जगह गड़ी है।
नौजवान : अगर जमीन में गड़ी है तो वह कब की मर गई होगी !!
औरत : ( चन्द्रमा की तरफ देख कर ) नहीं नहीं, उसे गड़े बहुत देर नहीं हुई है, मुझको लटकाने के बाद बदमाशों ने उसे गाड़ा है। सिवाय इसके वह एक बहुत लम्बे चौड़े संदूक में रख कर गाड़ी गई है अस्तु जरूर अभी तक जीती होगी।
इतना सुनते ही वह नौजवान उठ खड़ा हुआ और उस औरत की बताई हुई जमीन को खंजर से खोदने लगा, उधर वह नाजुक औरत अपने हाथों से वहाँ की मिट्टी हटाने लगी।
सन्दूक बहुत नीचे नहीं गाड़ा गया था इसलिये उसके ऊपर वाला तख्ता बहुत जल्द निकल आया।
सन्दूक में ताला नहीं लगा था। नौजवान ने आसानी से उसका पल्ला उठा कर किनारे किया और तब दोनों ने मिल कर उस औरत को सन्दूक बाहर निकाला जो उसके अन्दर बेहोश पड़ी हुई थी। इसके बदन के भी कुछ गहने जड़ाऊ थे। और साड़ी भी बेशककीमती थी मगर चेहरा साफ नजर नहीं आता था, तो भी कुछ-कुछ पड़ती हुई चन्द्रमा की रोशनी उसकी खूबसूरती को छिपा रहने नहीं देती थी।
सन्दूक के बाहर निकलने और ठण्ढ़ी हवा लगने पर भी दो घड़ी के बाद कहीं जाकर उसे होश आया। तब तक वह नौजवान और वह नाजुक औरत अपने रूमाल और आंचल से उसके मुंह पर हवा करते रहे।
होश में आते ही उस औरत ने चौंक कर उस नौजवान तथा उस नाजुक ...

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