Swarna Rekha
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उपन्यास >> सुवर्ण रेखा

सुवर्ण रेखा

दुर्गा प्रसाद खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 1988
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15390
आईएसबीएन :0

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हिन्दी में श्रेष्ठ वैज्ञानिक उपन्यास

दुर्गा प्रसाद खत्री का वैज्ञानिक उपन्यास

एक वैज्ञानिक को अचानक यह पता लगा कि समुद्र के पानी में कई धातुएं घुली हुई हैं और उसमें सबसे महत्वपूर्ण मात्रा है स्वर्ण' (सोने) । बस फिर क्या था उसने तरह तरह के प्रयोग कर डाले और आखिर अन्त में उसे सोने को जल से छान कर अलग करने की तर्कीब मिल ही गई । देखते देखते उसने अरबों रुपये का सोना इकट्ठा कर लिया। तब फिर उस धन की बदौलत उसने क्या क्या गजब काम किये, यह इस उपन्यास में पढ़िये....

सुवर्ण रेखा

मोमियाई

“ओ हो, मिस्टर मायर्स, आप आ गये ! इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए !!"
सिन्ध प्रान्त के इन्सपेक्टर जेनरल ऑफ पुलिस सर मोदीलाल ने आगन्तुक से हाथ मिलाते हुए दूसरा हाथ एक कुरसी की तरफ बढ़ाया और तब कहा, "क्या आप हवाई जहाज से आए मिस्टर मायर्स? ट्रेन कनेक्शन तो इतनी जल्दी ले आने वाला कोई है नहीं पटना से !"
मिस्टर मायर्स ने जवाब दिया, "जी हां, मैं एयरोप्लेन से ही आया हूं। डच कम्पनी के जहाज में भाग्यवश एक सीट मुझे मिल गई।"
"ठीक है, तभी।" कह कर सर मोदीलाल कुछ अन्यमनस्क से हो गए और न जाने क्या सोचने लगे। मायर्स भी जो उनकी आदतों से बखूबी वाफिक थे चुपचाप बगैर बोलेचाले बैठे रहे। लगभग पांच मिनट तक एकदम सन्नाटा रहा, तब सर मोदीलाल ने इस तरह अपनी चुप्पी को तोड़ा :
सर मोदी : मिस्टर मायर्स, मैं यह सोच रहा था कि किस जगह से वह विषय उठाऊँ जिस पर आपकी सलाह लेने के लिए मैंने आपको तकलीफ दी है, पर सब से अच्छा यही होगा कि मैं आपके सामने वह कागज रख दूं जिसे देख कर मुझे आपका खयाल आया। उसको पढ़ने के बाद आप ज्यादा अच्छी तरह सोच सकेंगे कि मामला क्या है।
सर मोदीलाल ने अपने टेबुल का एक दराज खोला और उसमें से लाल फीते से बंधा कागजों का एक छोटा पुलिन्दा निकाला जिसमें का एक कागज अलग करके उन्होंने मायर्स की तरफ बढ़ाया। कागज हिन्दी के किसी अखबार से काटा हुआ एक टुकड़ा जान पड़ता था पर चूंकि मायर्स हिन्दी अच्छी तरह पढ़ और बोल सकते थे अस्तु बिना तरद्दुद के उसको पढ़ गये। कागज में यह लिखा हुआ था :
आवश्यकता --
एक होशियार जासूस की जो अपने काम में यकता हो। पहरे और हिफाजत के काम के लिये। तनखाह -- वास्तव में योग्य व्यक्ति के लिये दस हजार रुपये महीने।
एक बार, दो बार, तीन वार, मिस्टर मायर्स उस कागज को पढ़ गये। तब धीरे से उसे टेबुल पर रखते हुए बोले, “आश्यर्च, बड़े आश्चर्य की बात है ! जासूसी के काम के लिए और दस हजार रुपया महीना !!"
बड़े गौर से उनकी तरफ देखते हुए सर मोदीलाल ने पूछा, "तब क्या आप इस विज्ञापन को झूठा समझते हैं?"
मायर्स : हरगिज नहीं। मगर आश्चर्य मैं इस बात पर कर रहा हूं कि वह शख्स कौन हो सकता है जो पहरे के काम के लिए इतनी ज्यादा रकम खर्च करने को तैयार हो, फिर इससे भी बढ़ कर बात यह कि इस मुल्क में कौन इतना बड़ा दौलतमन्द हो ही सकता है जो अपने जासूस को बड़े लाट साहब की तनख्वाह दे सके ! एक बात यह भी सोचने लायक है कि यह विज्ञापन किस अखबार में छपा? मैं समझता हूं कि इसका पता न लग सका होगा?
सर मोदी : (सिर हिला कर) नहीं, न तो यही पता लग सका कि किस अखबार में यह विज्ञापन छपा, और न यही मालूम हो सका कि किसने छपाया। विज्ञापन के अन्त में न तो विज्ञापनदाता का ही नाम पता छपा है और न कोई पोस्ट बाक्स या ठिकाना, इसी से कुछ भी पता न लग सका यद्यपि चेष्टा मैंने बहुत की।
मायर्स : तो क्या यह किसी पागल द्वारा किया गया कोई मजाक है? सर मोदी : (कुछ कहते कहते रुक कर) क्या आप इसे पागलपन समझते हैं?
मायर्स : (सिर हिला कर) नहीं, मैंने तो पहिले ही कहा कि मैं इसे झूठा विज्ञापन नहीं समझता।
सर मोदी : क्या आप बतावेंगे कि इस नतीजे पर आप किस तरह पहंचते हैं?
मायर्स : (कागज को पुनः उठा और उलट कर दिखाते हुए) दो सबबों से, एक तो यही कि इसमें विज्ञापनदाता का कोई परिचय या पता ठिकाना दिया नहीं गया है, _और दूसरा यह कि यह किसी अखबार का कटिंग हई नहीं है !
मोदी : (उछल कर) ठीक! ठीक! ठीक! इन्हीं बातों ने मुझे भी इस कागज को सच्चा मानने पर मजबूर किया। मेरे मन में यह खयाल उठा कि विज्ञापनदाता ने अपना कुछ भी परिचय इसलिये नहीं दिया कि वह यह समझता है कि जिस जासूस को वह दस हजार रुपया महीना तक देने को तैयार है उसे कम से कम इतना होशियार तो होना ही चाहिये कि केवल इस विज्ञापन से विज्ञापनदाता को खोज निकाले और उससे मिले। अगर वह इतना भी नहीं कर सकता तो तो इतनी लम्बी तनखाह पाने के काबिल भी नहीं है।
मायर्स : बेशक आपका सोचना ठीक है और मेरा भी बिल्कुल यही खयाल है।
मोदी : और दूसरी बात जो आपने कही कि यह किसी अखबार का कटिंग हई नहीं है, वह भी मैंने जांच कर देख ली। हिन्दुस्तान में जितने भी हिन्दी अखबार छपते हैं सबकी खोज मैंने करवा डाली पर किसी में ऐसा कोई विज्ञापन नहीं छपा।
मायर्स : ठीक है, मगर में इस नतीजे पर बिल्कुल दूसरी ही तरह पर पहुंचा हूं। यह देखिये इस विज्ञापन की सब लाइनों तथा कालम को अलग करने वाले जो रूल कागज के दोनों पुश्त पर दिखाई पड़ रहे हैं वे आगे पीछे दोनों तरफ ठीक एक पर एक पड़ रहे हैं। अखबारों को छापती समय इतना ध्यान कभी दिया नहीं जाता कि कालम पर कालम और लाइन पर लाइन पड़े। ऐसे चिकने मोटे कागज पर हिन्दी में कोई अखबार छपता हो यह भी कम से कम मेरे अनुमान से परे है। खैर यह सब तो हुआ, आप यह बतलायें कि इस विज्ञापन को देख के आपको इतनी घबराहट क्यों हुई कि आपको मुझे बुलवाना पड़ा और सो भी इतनी उतावली में !
मोदी : हां वह मैं बताता हूं, पर उसके पहिले इतना और सुन लीजिये कि यह कागज मेरे हाथ में पड़ा कैसे?
मायर्स : जी हां, बेशक मैं यह जानने को भी उत्सुक हूं।
मोदी : लगभग तीन महीने के हुए होंगे कि एक दिन माधोसिंह मेरे पास आए और....आप जासूस इन्सपेक्टर राव माधोसिंह को तो जानते होंगे? __मायर्स : हां हां, वही जिन्होंने बम्बई के नकली मोतियों वाले केस के मुजरिमों को पकड़ा था?
मोदी : ठीक है, वही। मेरे ऊपर दुष्टों ने जब बम चलाया तब से सिन्ध गवर्नमेन्ट मेरी हिफाजत के लिये बहुत सजग हो गई है और मुझे दो जासूस इन्सपेक्टर
खास अपनी जान की हिफाजत के लिये रखने की हिदायत हुई है। इस काम के लिए मैंने एक तो माधोसिंह को चुना था और दूसरे दीन मोहम्मद को जिनका नाम भी शायद.......
मायर्स : मैं खान साहेब दीन मोहम्मद को भी अच्छी तरह जानता हूं। मेरा उनका साथ लाहौर की गोपी बीबी के खून वाले मुकदमे में रह चुका है। वह भी अपने फन के बड़े ही उस्ताद और काबिल आदमी हैं।
मोदी : ठीक, ठीक, तो वही माधोसिंह मेरे पास इस कागज को लाये। मैं इसी . कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था कि जब वह आए और एक महीने की छुट्टी की दर्खास्त की। मैंने ताज्जुब से पूछा कि इतनी लम्बी छुट्टी किस लिए मांगते हो? तब कुछ हीले हवाले के बाद उन्होंने यह कागज मेरे सामने रखा। इसे देख मैं हंस पड़ा क्योंकि मुझे यह किसी पगले या मजाकिये की करतूत मालूम हुई, लेकिन चूंकि वे बहुत आग्रह के साथ छुट्टी मांग रहे थे इसलिए मैंने उनकी केवल एक हफ्ते छुट्टी मंजूर कर ली--यह कह कर कि इस विज्ञापन को प्रकाशित करने वाले का पता इस 'बीच में लगा देना तब फिर आगे के लिए छुट्टी या पूरी रिहाई ही मांग लेना अगर यह नौकरी मिल जाय, मगर वह फिर मेरे पास लौट कर आये ही नहीं !
मायर्स : फिर लौट कर आये ही नहीं! और इस बात को तीन महीने हो गये!!
मोदी : हां करीब करीब। मैंने उनकी बहुत तलाश की पर कुछ पता न लगा कि वे कहां गए या क्या हुए? और ताज्जुब तो यह कि उनके घर वाले भी इस बारे में कुछ नहीं बता सकते।
मायर्स : अच्छा तब?
मोदी : उनको गायब हुए करीब तीन हफ्ते के गुजरे होंगे जब मेरे दूसरे बॉडी गार्ड यानी दीन मोहम्मद वैसा ही कागज लिये मेरे पास पहुंचे और उन्होंने भी छुट्टी मांगी। मैंने एकदम इनकार कर दिया और माधोसिंह वाला मामला बता कर कहा कि जब तक वे वापस न आ जायंगे तुमको छुट्टी न मिलेगी।
मायर्स : तब क्या हुआ?
मोदी : माधोसिंह अपने वाला कागज अपने साथ ले गये थे पर दीन मोहम्मद से यह कागज लेकर मैंने अपने पास रख लिया। मगर मेरी इनकारी का कोई नतीज नहीं निकला और दूसरे ही दिन दीन मोहम्मद भी गायब हो गये।
मायर्स : दस हजार रुपया बहुत होता है!!
मोदी : और उस दिन से आज तक उनका भी कुछ पता नहीं। अब मालूम नहीं कि वह भी इसी नौकरी की लालच में चले गए या किसी दूसरी मुसीबत में गिरफ्तार हो गए!
मायर्स : (सिर हिला कर) हुक्मउदूली करेंगे ऐसी तो दीन मुहम्मद साहब से मुझे उम्मीद नहीं, हां किसी आफत में पड़ गये हों यह हो सकता है।
मोदी : हां ऐसा ही कुछ खयाल मेरा भी होता है, फिर भी मुझे बहुत फिक्र पेदा हो गई है और उन दोनों का पता लगाने के लिए मैंने कई आदमी छोड़े हैं।
मायर्स : सो तो जरूरी बात है, तो क्या मुझे भी.....
मोदी : नहीं नहीं, सिर्फ इतना ही मामला होता तो मैं कभी आपको तकलीफ न देता। अभी आप जरा आगे की बातें भी सुनिये।
मायर्स : जी हां, जी हां, कहिए।
मोदी : दीन मोहम्मद के गायब होने के सात या आठ दिन बाद यहां के प्रसिद्ध मिल ओनर मिस्टर स्मिथसन मेरे पास आए और बोले कि पन्द्रह रोज से उनके चीफ इन्जीनियर 'वान लिकर' गायब हैं जिनका कछ पता नहीं लग रहा है। इस बात की पुलिस में वे रिपोर्ट कर चुके थे तथा ऊपरी जांच पड़ताल भी बहुत करा चुके थे। इसके एक हफ्ते बाद राय जगतनारायण के लड़के राय श्यामनारायण गायब हो गये। राय श्यामनारायण को शायद आप न जानते हों, ये अभी हाल ही में सिविल एवियेशन का 'बी' सार्टिफिकेट लेकर इंगलैण्ड से लौटे हैं। इसके बाद दो हफते के भीतर दो बहुत बड़े डाक्टर, दो केमिस्ट, और दो पहलवान हमारे प्रान्त से गायब हो गये। सब मिला कर दस आदमी तीन महीने में गायब हुए और ऐसा गायब हुए कि जरा भी सूराग किसी का न लग सका।
मायर्स : (आश्चर्य से) अरे !! और ये सब के सब गए कहां?
मोदी : (दुःख से) ईश्वर ही जाने ! मगर कल जो घटना हुई उसने मेरे मन में बड़े बुरे और डरावने ऐसे ऐसे खयाल पैदा किए जिन्होंने मुझको इस कदर परेशान किया कि मुझे तार देकर आपको बुलाना पड़ा। अब आप ही इस गुत्थी को सुलझाइयेगा तो यह सुलझेगी !
मायर्स : कल क्या हुआ?

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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