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उपन्यास >> साकेत

साकेत

दुर्गा प्रसाद खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 1983
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15392
आईएसबीएन :0

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वैज्ञानिक उपन्यास

श्री दुर्गाप्रसाद खत्री लिखित वैज्ञानिक उपन्यास

साकेत

 

वचन भंग
[ १ ]

"यह क्या दादा इतनी जल्दी कैसे? हम लोग तो अभी महीनों बाद आपके लौटने की आशा कर रहे थे !" प्रोफेसर गामट ने फ्रामजी से कहा जो अपने हवाई जहाज की सीढ़ी से उतर रहे थे।
फ्रामजी ने जवाब दिया, "बड़ी गड़बड़ी हो गई गामट!" गामट ने ताज्जुब से पूछा, "गड़बड़ी ! सो क्या दादा?"
इस बीच दादा के बाकी मित्रों और साथियों ने वहां पहुंच उन्हें चारो तरफ से घेर लिया था। फ्रामजी ने इन सभों ही की ओर एक बार नजर घुमा कर देखा और तब बोले, "मेरा सोचा विचारा तो सब नष्ट हुआ चाहता है गामट, पश्चिमी राष्ट्र दगा दे रहे हैं।"
गामट : यह तो इनका स्वभाव ही है, लेकिन फिर भी दगा कैसी क्या और क्यों?
फ्रामजी : कहीं आराम से बैठ कर कहना क्या ज्यादा मुनासिव न होगा?
गामट : जरूर होगा, पर संक्षेप में कुछ कह दीजिये नहीं तो हम लोगों के पेट में चूहे कूदते रहेंगे।
फ्रामजी : ठीक है तो सुनो, बात यह कि अमेरिका के दबाव डालने पर इंगलैंड और उसके जोर देने पर आस्ट्रेलिया ने चीनियों और जापानियों को अपने देश में वसाना मंजूर तो कर लिया था* (* अमेरिका पर किस तरह का दबाव फ्रामजी ने डाला सो पाठक 'सागरसम्राट' उपन्यास में पढ़ चुके हैं, अगर न पढ़ा हो तो अब पढ़ लें।) पर एक ही लाट इन 'पूर्वियों' का वहां पहुंचा था कि उन लोगों का मत बदल गया और आट्रेलिया ने इन पूर्वियों को बसाने से फिर इनकार कर दिया। आगे और लोग न आवें सो भी नहीं, जो आ गये थे उन्हें भी लौट जाने को मजबूर करने लगे, अस्तु मुझसे झगडा हो गया और मैंने उन्हें अल्टिमेटम दे दिया कि या तो चीनियों और जापानियों को खुलेआम बसने दो जैसा कि तय हो चुका है, और या फिर मुझसे लड़ने को तैयार हो जाओ।
गामट : मगर बात कुछ समझ में न आई। आस्ट्रेलिया में चीनियों और जापानियों को बसाना जब इन लोगों ने मंजूर कर लिया तो फिर इनके इस तरह पलट जाने का कारण क्या हो गया ?
फ्रामजी : यों तो मुझे इसमें सभी पश्चिमी देशों की शरारत जान पड़ती है, लेकिन तब बात यह कि आस्ट्रेलिया वालों ने शायद सोचा होगा कि थोड़े थोड़े सौ सौ पचास पचास करके ये चीनी जापानी उस देश में पहुंचेगे। पर मेरे पचास जहाजों पर एक साथ ही जो करीब पौने तीन लाख लोग एक ही दफे में वहां जा पहुंचे तो वहां तहलका मच गया।
गामट : पौने तीन लाख !!
फ्रामजी : हां, वे सब तो चूहों की तरह उन सब जहाजों में भर गये जो उनको लेने भेजे गये थे। तुम तो वीनियों को जानते ही हौ, उनकी तो खाटें भी सतमंजिली होती हैं, जब जहाजों पर चढ़ने लगे तो हद कर दी। मैं भी क्या बोल सकता था? और सच तो यह है कि मुझे खुद भी अनुमान न था कि ये इतने भर गये होंगे सिर्फ पचास जहाजों में !
गामट : खैर तब ?
फामजी। एक दो जहाज खाली होते होते तो आस्ट्रेलियन गवर्नमेन्ट दहल उठी और उसने बाकी जहाजों को किनारों से हटा लेने का हुक्म दिया, मगर कोई एक ही बन्दरगाह पर तो ये इतने जहाज लगे न थे, करीब बाईस तेईस बन्दरों पर लगे थे, अस्तु सब जगह इन्तजाम करते और खबर भेजवाते तक तो आधे से ज्यादे जहाज खाली हो चुके थे। बाकी के जहाजों को जब हटाने को कहा गया तो सब चीनी और जापानी पानी में कूद कूद के तट पर जाने लगे। बड़ा ऊधम मच गया। कई जगह गोलिये चलाने की नौबत आ गई जिसका मैंने प्रबल विरोध किया। अन्त में आस्ट्रेलियन गवर्नमेन्ट ने मुझे गिरफ्तार करने का हुक्म दिया, मुझे खबर लग गई और साथ ही यह भी मालूम हो गया कि अमेरिका और इंगलैंड की भी इसमें सम्मति है .......
गामट : अमेरिका ने तो शायद सोचा हो कि इसी तरह आप करोड़ दो करोड़ हिन्दुस्तानियों को लाकर कहीं उनके अपने देश में न उतार दें।
फ्रामजी : जो कुछ भी हो ! खैर, मुख्तसर यही कि रंजन बड़ी चालाकी से आस्ट्रेलियन सिपाहियों के घेरे में से मुझको उड़ा कर ले आया और मैंने भी सोचा कि एक बार अपने दोस्तों से सलाह करने के बाद ही तब कुछ कार्रवाई करूं, इसी से सीधा यहीं चला आया हूं। अब जो कुछ सलाह होगी वैसा किया जायगा।
गामट : खैर सलाह बात तो होती ही रहेगी, आप सही सलामत आ गये यही बहत है। पर कम से कम आने से पूर्व सूचना तो दे दिये होते। हमें तो हफ्तों से आपकी कोई खबर ही नहीं थी और इसी से मन में तरह तरह की आशंकाएं उठ रही थीं।
फ्रामजी : मेरी भेजी हई खबरें जान बूझ कर दबा दी जाती थीं और मेरा निजी बेतार का यंत्र बिगड़ गया था।
गामट : अच्छा चलिये, नहा धो कर कुछ जलपान और तब थोड़ी देर. आराम कीजिये, बाद में सलाह बात होती रहेगी। यह मंडली फ्रामजी के बंगले की तरफ बढ़ी।

[ २ ]

पश्चिमी-राष्ट्र-समूह की ओर से 'सागर' राज्य के अधिपति फ्रामजी जमसेठजी को--
"-सूचित किया जाता है कि उन्होंने लाखों लाखों एक देश के निवासियों को दूसरे देश में बसाने की जो नीति अपनाई है वह विभिन्न राष्ट्रों में आर्थिक सामाजिक और नैतिक विप्लव उत्पन्न कर देने वाली है और उसका फल बहुत भयंकर हो सकता है।
"-यह मानते हुए भी कि 'सागर-राष्ट्रपति' का इसके भीतर कोई निजी स्वार्थ या निजी ध्येय नहीं है, हमलोग इस नीति में बहुत तरह की ऐसी बुराइयां देख रहे हैं जिनकी ओर उस समय जब कि प्रत्यक्ष रूप से इस प्रस्ताव पर विचार हुआ हमारा ध्यान न गया था।
"-अस्तु यह उचित जान पड़ता है कि इस समूचे प्रश्न पर पुनः एक बार विचार कर लिया जाय।
"और इसी लिये हम लोग हिज एक्सेलेन्सी फ्रामजी जमसेठजी को निमंत्रण देते हैं कि लंडन या वाशिंगटन में पधारें और पुनः हम लोगों के साथ इस विषय पर विचार करें।
"यह मान लिया जाता है कि तब तक उस संधि के अनुसार कार्य करना स्थगित रहेगा जो वाशिंगटन में सागर राज्य और ब्रिटेन-अमेरिका के बीच में हुई थी।"
कुछ ऊंचे स्वर में फ्रामजी ने वह कागज पढ़ा जो उनके हाथ में था और जिसका मजमून हमने ऊपर लिखा, और तब अपने साथियों की तरफ देखा जो उन्हें घेर कर बैठे हुए थे।
जरा देर सन्नाटा रहा, तब पंडित श्यामरत्न बोले, "मुझे तो यह दादा को बुला कर कैद कर लेने की कोई साजिश जान पड़ती है।"
हाफिज हब्राहीम बोले, "बेशक ऐसा ही है।"
प्रॉफेसर रिचर्डसन ने कहा, "दादा की जगह उनका कोई प्रतिनिधि भी जा सकता है।
कई लोग बोल उठे, “भेजने की जरूरत ही क्या है ?"
गामट ने कहा, "यदि बात करनी है तो किसी न किसी को जाना तो पड़ेगा ही!" गरज कि तरह तरह की बातें कोग कहने लगे।
फ्रामजी कुछ देर चुपचाप सबकी सुनते रहे तब पुनः बोले, "एक सूचना मेरे एक बहुत ही विश्वस्त मित्र ने मेलबोर्न से भेजी है, उसको भी सुन कर तब आप लोग इस विषय पर विचार करें तो शायद बेहतर हो।"
एक दूसरा कागज उठा कर उन्होंने पढ़ा :-
"पश्चिमीय राज्यों की साधारण धारणा यह हो रही है कि नवीन 'सागर' राज्य में करोड़ों मन सोना और अगाध रत्नराशि छिपी है और वे राष्ट्र बलपूर्वक उस पर व ब्जा कर लेना चाहते हैं। इसी इरादे से पहिले तो आपको किसी बहाने से वे हटावेंगे और तब एक साथ ही कई राज्य कई ओर से आपके देश पर आक्रमण करेंगे। बहुत से जंगी और हवाई जहाज इसी निमित्त तैयार किये जा रहे हैं। आक्रमण करने का कोई बहाना भी शीघ्र ही ढूंढ़ लिया जायगा।"
इस समाचार ने वहीं उपस्थित लोगों को और भी उद्विग्न कर दिया। क्रोध ने ....

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