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लाल-पञ्जा

दुर्गा प्रसाद खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 1985
पृष्ठ :156
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15397
आईएसबीएन :0

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क्रान्तिकारी वैज्ञानिक उपन्यास

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क्रान्तिकारी वैज्ञानिक उपन्यास

।।श्रीः।।
लाल-पञ्जा (क्रान्तिकारी उपन्यास)
[१] मोती की माला

आगरे की ग्रान्ट रोड पर मशहर फतेहाबाद बंक का दफ्तर है। दफ्तर क्या इसे एक महल कहना उचित होगा, क्योंकि जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं उस समय उत्तरी हिन्दुस्तान में फतेहाबाद बंक की टक्कर का मातबिर तथा पूंजीदार और कोई भी बंक न था। प्रायः सभी बड़े बड़े शहरों में इसकी. शाखाएँ थीं, पर हेड आफिस आगरा होने के कारण इस जगह के कारबार का कुछ पूछना ही न था। बड़े हाल में सैकड़ों क्लर्क काम करते थे और रुपयों की झनझनाहट के मारे कान बहरे होते थे। रोज हजारों नहीं बल्कि लाखों रुपयों के लेन देन होते थे तथा बंक को मुनाफा भी भरपूर होता था, फिर शान शौकत और सजावट की कमी क्या हो सकती थी!
बंक के बड़े मैनेजर पण्डित रामनाथ गिग्गा काश्मीरी ब्राह्मण हैं। करेन्सी और फाइनेन्स के मामले में श्री रामनाथ प्रसिद्ध और विज्ञ पण्डित माने जाते थे और इसी से फतेहाबाद जैसे मशहूर बंक के जनरल मैनेजर बनने का इनका सौभाग्य हुआ था। इनकी उम्र लगभग पैंतालिस वर्ष के होगी। चेहरा सुडौल और भरा हुआ, आंखें चमकदार और तेज, मांछ दाढ़ी सफाचट, बदन मजबूत और भरा हआ था। हमेशा अंगरेजी पोशाक कोट पैन्ट हैट टाई आदि से ही सुसज्जित रहा करते थे और अपने घर में भी अंगरेजी फैशन से ही रहते थे।
इस समय पण्डित रामनाथ अपने दफ्तर में लम्बे टेबुल के सामने गद्दीदार कुर्सी पर बैठे हुए हैं। सामने दो क्लर्क खड़े और बहुत से कागजों का ढेर लगा हुआ है जिन पर वे दस्तखत कर रहे हैं और दोनों क्लर्क उठाते, सोखते से सुखाते, तथा सरियाते जाते हैं। इसी समय दरबान ने सामने आ सलाम कर कहा, "हुजर, शम्साबाद के राजा साहब तशरीफ ला रहे हैं।"
शम्साबाद के राजा साहब इस बंक के सबसे अमीर और मातविर ग्राहक थे, साथ ही बंक के शेयर-होल्डर और डायरेक्टरों में भी थे। इस प्रान्त में इनके जेसा बड़ा अमीर और दौलतमन्द अन्य कोई जमींदार न था। प्रायः इनका काम नौकरों और गमाश्तों के जरिये ही हआ करता था, इसी से आज स्वयम् इनके आने की खबर सुन' पण्डित रामनाथ को कुछ आश्चर्य हुआ। अभी वे कुरसी से उठ ही रहे थे कि दर्वाजे का रेशमी पर्दा हटा और राजा साहब अन्दर आ पहुंचे। पण्डितजी ने आगे बढ़ राजा साहब से हाथ मिलाया। दोनों क्लकों ने कुछ सकपकाते हुए लम्बी सलामें की, और एक ने मखमली कुर्सी आगे बढ़ाई। राजा साहब ने उस पर बैठते हए कहा, “पंडितजी, मैं आपके कीमती वक्त का कुछ हिस्सा लेने आया हूं।"
पण्डितजी ने कहा, "हां हां, फरमाइये, बेशक कोई जरूरी बात होगी जो आपने खुद ही तकलीफ की!”
राजा साहब यह सुन कर उन दोनों क्लर्कों की तरफ देखने लगे। पंडितजी ने उनका मतलब समझ दोनों को चले जाने का इशारा किया और उनके चले जाने के बाद राजा साहब ने गहरी निगाह से चारो तरफ देखा और किसी को भी उस कमरे में न पा अपनी कुरसी और पास घसीटे वे धीरे धीरे कहने लगे, “पण्डितजी, मैं एक बड़े भारी तरदुद में पड़ कर आपके पास आया हूँ।"
पण्डितजी ताज्जुब के साथ राजा साहब का मुंह देखने लगे। भला राजा साहब को किस बात का तरदद? उनके तो खद लाखों रुपये इधर उधर लगे रहा करते हैं ! पण्डितजी का सोचना विचारना चिन्ता फिक्र तरदुद सब कुछ रुपये ही के सम्बन्ध में होता था अस्तु राजा साहब के तरदुद को भी उन्होने द्रव्य सम्बन्धी ही कोई तरदुद समझा और कहा, "मैं और यह बंक आपकी सेवा में हाजिर हैं, आप जल्दी कहें कि क्या बात है?"
राजा साहब ने शायद पण्डितजी की बात सुनी नहीं क्योंकि वे अपनी जेबों में कुछ ढढ रहे थे। आखिर भीतर की जेब से उन्होंने लाल रंग का एक लिफाफा निकाला और पण्डितजी के हाथ में देकर कहा, “यही मेरे तरदुद का सवव है।"
पण्डित रामनाथ ने सरसरी निगाह से उस लिफाफे को देखा । किर के मजबूत मोटे लाल कागज को चौकोर मोड़ के यह भदा लिफाफा बनाया गया था। उस पर पता या नाम तो किसी का भी न था, पर हाँ जोड़ पर बड़ी सी लाल रंग की एक मोहर जरूर की हई थी। पण्डितजी की तेज निगाहों ने तुरन्त ही यह भी देख लिया कि इस मोहर पर किसी आदमी या कारखाने का नाम अथवा मोनोग्राम नहीं है बल्कि पांचों उँगलियों और हथेली सहित दो छोटे पंजों का चिह्न बना हुआ है, पर इधर बहत गौर न करके पण्डितजी ने उसके अन्दर रक्खी हुई चीठी निकाली और राजा साहब से पूछा, "क्या मैं इसे पढ़?" राजा साहब के "जी हाँ" कहने पर उन्होंने उसे खोला और पढ़ा। टेढ़े मेढ़े कुटुंगे और अजीब बदसूरत हरफों में यह मजमून था :
"राजा साहब,
“आज से तीन दिन के अन्दर वह मशहर मोती की माला जो आपको अपनी उन नानी साहिबा से मिली है जिनका हाल ही में इन्तकाल हुआ है, हमारे पास पहुंच जानी चाहिये। शहर के वाहर पंचपेड़वा के ढ़हे पर जो कूआँ है, उसमें डाल देने से वह हमें मिल जायगी।
"खबरदार ! खबरदार !! अगर तीन दिन के भीतर माला उस कुएँ में नहीं डाल दी गई तो आपके लिए अच्छा न होगा! होशियार, होशियार !!"
उस चीठी का मजमून बस इतना ही था और इसके नीचे किसी के दस्तखत के बजाय लाल रंग की स्याही से वैसा ही दो पंजों का निशान बना हुआ था जैसा पण्डितजी मोहर के ऊपर देख चुके थे।
चीठी को पढ़ पण्डितजी ने राजा साहव की तरफ देखा जो बड़ी बेचनी और घबराहट में डवे हुए मालूम होते थे। पण्डितजी ने कहा, "किसी बदमाश की शैतानी है !" राजा साहब ने एक लम्बी साँस लेकर कहा, "आप इस माला का पूरा हाल नहीं जानते इसी से ऐसा कहते हैं। आप पहिले इस माला को देखिये और तब मुझसे इसका हाल सुनिये ।"
राजा साहब ने मखमल का एक केस भीतरी जेब से निकाला और टेबुल पर रख कर उसे खोल अन्दर से मोतियों की एक माला निकाल कर पण्डितजी के हाथ पर रख दी। पण्डितजी ने बड़ी मुश्किल से एक ताज्जुब की आवाज अपने मुंह से निकलने से रोकी। इतने बड़े बड़े सुडौल और चमकदार तथा एक ही नाप के मोतियों की माला अभी तक उनकी नजरों से कभी गजरी न थी। उनकी विज्ञ आँखों से तुरन्त ही कह दिया कि यह वीस लाख रुपये से कम दाम की किसी तरह नहीं है। कुछ देर तक देख उन्होंने उसे केस में रख दिया और राजा साहब का मुंह देखने लगे । राजा साहव ने इस तरह कहना शुरू किया:
"यह मोती की माला मेरे नाना की है या यों कहना चाहिये कि थी। जिस समय उनकी मौत हुई उस समय मेरी नानी की उम्र सिर्फ छब्बीस वर्ष की थी। इस डर से कि शायद दौलत के जाल में फंस कर वे राह कुराह पर पैर न रख दें या जिस किसी खयाल से भी हो, मेरे नाना साहब ने अपने सब जेपर
और जवाहिरात ( जिसमें मेरी परनानी के भी बहुत से थे) अपने छः दोस्तों की एक कमेटी बना उसके सुपुर्द कर दिये और कमेटी को हिदायत कर दी कि जब उनकी स्त्री अर्थात् मेरी नानी की उम्र पचास बरस की हो जाय तब वे जवाहिरात उन्हें वापस कर दिये जायें।
"चौबीस बरस तक वे चीजें उस कमेटी के कब्जे में रहीं और इस बीच में मेरी नानी बड़ी मुश्किल से अपना गजर उन दो चार गाँवों की आमदनी से चलाती रहीं जो मेरे नाना साहब उनके लिए छोड़ गये थे। इधर कुछ ही दिन हुए उन्होंने अपनी जिन्दगी के पचास साल पूरे किये और उस कमेटी ने वे जवाहिरात और जेवर उन्हें सौंप दिये जिनमें यह माला भी थी। इन चीजों को वापस पाने के तीन दिन बाद उन्हें एक चीठी मिली जिसे मैं अभी आपको दिखाऊँगा और जिसके पाने के चौथे दिन सुबह को वे अपने पलंग पर मुर्दा पाई गई!"
राजा साहब ने जेब के अन्दर से एक और चीठी निकाली और पण्डितजी के हाथ में दे दी। यह भी ठीक वैसे ही लिफाफे के अन्दर थी और इसकी मोहर पर भी ठीक उसी तरह का दो पंजों का लाल ठप्पा किया हुआ था। पण्डित रामनाथ ने लिफाफे के अन्दर से चीठी निकाली और पढ़ी, मोटे कागज पर वैसे ही टेढ़े तिरछे कुढगे अक्षरों में लिखा हुआ था
"रानी साहिबा,
"आपके खाविन्द के जो जवाहिरात आपको हाल ही में मिले हैं उनमें एक...

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