Saagar Samrat
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सागर-सम्राट

दुर्गा प्रसाद खत्री

प्रकाशक : लहरी बुक डिपो प्रकाशित वर्ष : 1985
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15399
आईएसबीएन :0

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वैज्ञानिक उपन्यास

।।श्री:।।
सागर-सम्राट
 [१] मायाविनी

"चाचाजी! चाचाजी!! चाचाजी!!!"
सोने वाले ने एक करवट ली, शायद उसकी आंखें भी थोड़ी देर के लिए. खुली, मगर फिर तुरन्त ही झप गईं, और वह पुन: नोंद में डूब गया। पुकारने वाले ने फिर बुलाया--"चाचाजी! चाचाजी!!''
आवाज बड़ी धीमी थी, स्वर कैसा कुछ डरा हुआ सा, तब भी बार बार की पुकार ने सोने वाले की नींद को आखिर तोड़ ही दिया। इस बार उसने पूरी तौर पर आंखें खोल दी और इधर उधर सिर घुमा कर देखा। घनघोर अंधकार, हाथ को हाथ तक नहीं सूझता था, फिर भी कहीं से आती बहुत ही धीमी 'आवाज सुन पड़ी-- 'चाचाजी!'
उतने ही धीमे स्वर में जवाब गया--"कौन है? क्या है?'
तुरन्त ही बोलने वाले ने फिर कहा, 'आप ही हैं न चाचाजी?''
इसने कहा, "यह मैं किसकी आवाज सुन रहा है?''
जवाब मिला, "बताता है. पहिले अपना नाम बताइये।''
''मैं हूं मोदीलाल, तुम कौन हो और कहां से बोल रहे हो?'
जरा रुक कर जवाब मिला, "नाम बताना खतरनाक हो सकता है, क्या मेरी आवाज पहिचान नहीं सकते?''
'हां पहिचान गया, अच्छा जरा ठहरो।''
सर मोदीलाल उठकर बैठ गए। घनघोर अन्धकार मे कुछ दिखाई पड़ना एकदम असंभव था पर वे अन्दाज से आवाज का रुख पहिचान कर उसी तरफ को खसके, मगर माथा खट से पत्थर के साथ लड़ा जिससे वे सिर खुजलाने लगे। अन्दाज से उन्होंने समझा था कि उनके सिनि बैठकर कोई बोल रहा है, पर सिहनि तो कुछ नहीं, सिर्फ गुफा की पथरीली दीवार थी। उन्होंने दोनों हाथ दोनों तरफ फैलाए और पैरों को भी लंबा किना, मगर कहीं कुछ नहीं, कोई नहीं, तब यह आदमी कहां से बोल रहा है? ताज्जुब करते हुए उन्होंने कहा, "तुम कहां से बोल रहे हो?'' .
जवाब आया--''मैं आपके पास ही हूं पर आप मुझे छू या देख नहीं सकते। मैं ज्यादा देर यहां रुक भी नहीं सकता। थोड़ी देर बाद फिर आऊंगा तब पूरी बातें करूंगा, आप तव तब ठीक इसी जगह रहिएगा। अबकी मैं पुकारूंगा नहीं सिर्फ दो बार ठोकर मारूंगा, आप भी जवाब में दो दफे अपने सिर्हाने के पत्थर को ठोंकिएगा, मगर धीरे ही से। अच्छा बिदा।''
आवाज बंद हो गई, मोदीलाल भी नीचे सरक कर अपने बिछावन पर हो लिए. पर उसी समय बगल ही से कोई धीरे से बोला, ''यह कौन था ?''
मोदीलाल ने कहा, "मायर्स, इधर आ जाओ, अच्छी खबर है।''
मि० मायर्स अपने बिछौने से खिसक कर मोदीलाल के बगल में आ गए जिन्होंने बहुत ही धीरे से कहा, 'श्रीधर है, मेरा भतीजा।''
ताज्जुब से मायर्स बोले, "हैं! वह था। तव डूब मरा नहीं!!''
फीकी हंसी के साथ मोदीलाल ने कहा, ''भूत की आवाज तो नहीं जान पड़ती थी!''
मायर्स धीरे से हंसे तब बोले, ''मगर यहां आया कैसे? और गया किधर? इस गुफा का मुहाना तो वह देखिए सामने ही दिखाई पड़ रहा है। और यहां बैठे पहरेदार को भी बाहर वाली रोशनी में मैंने अभी अभी उठ कर कहीं जाते देखा है, वह देखिए फिर आ बैठा!'
मोदीलाल बोले, ''यही ताज्जब तो मुझको भी है। आवाज सिह ने की तरफ से आई थी, पर इधर तो गूफा की पथरीली दीवार मात्र है जिससे टक्कर खाया हुआ सिर अभी तक भन्ना रहा है।'' .. .
मायर्स आहिस्ते से उठे और मोदीलाल के सिरहाने की तरफ जा हाथ से टटोलने लगे | पहाड़ी गुफा, सब तरफ चट्टान ही चट्टान, ऊबड़ खाबड़, टेढ़ी मेढ़ी, फिर भी वे सब तरफ टटोलते ही गए और आखिर एक जगह हाथ रखकर बोले यहां, इस जगह, पत्थर में कैसी कुछ एक दरार सी जान पड़ती है।
बहुत कम चौड़ी, एक दियासलाई मात्र जाने लायक, पर ऊंचाई हाथ भर के करीब है। क्या इधरही से तो आवाज नही आई!" सर मोदीलालभी उठे और.. जहां पर मायर्स का हाथ था वहां टटोलकर बोले, 'हां है तो सही, और इसमें से ...... (रुक कर ) इसमें से कुछ गर्म हवा सी भी आती जान पड़ती...... (फिर जरा रुककर ) हां जरूर कुछ है और किसी तरह की बू भी इसमें है, देखिये आप नाक लगाकर सुंघिए जरा यहां!'' मायर्स ने वैसा ही किया और तुरन्त कहा, ''हां ठीक तो है, किसी तरह की गैस की महक यहां से आ रही है, जरूर यह दरार इस पार से उस पार की किसी दूसरी गुफा तक है, मगर.....!''
इसी समय मोदीलाल ने उनको एक खोंचा मारा और नीचे घिसक अपने विछावन पर हो गए | मायर्स ने भी घूमकर देखा और फुर्ती से अपनी जगह पर चले गये। फौरन ही उनकी नाक इस तरह पर बजने लग गई मानों गहरी नींद में घर्राटे ले रहे हो।...
मुहाने पर का.पहरेदार दर्वाज़ा खोल अंदर घुसा और दियासलाई बालकर उसने इस गुफा के सब कैदियों को देखा, तब एक दो तीन करके गिना | सभों को ठीक और नींद में मर्दो से बाजी लगाए पा वह निश्चिन्त मन से फिर अपने ठिकाने जा वैठा और कुछ गुनगुनाने लगा, दर्वाजा बंद हो गया।
दो वार 'खट-खट' की.ठोकर की आवाज सुनते ही मोदीलाल उठे और उन्होंने भी पत्थर के एक टुकड़े से अपने सिहाने की चट्टान पर दो ठोकर धीरे धीरे लगाई।
आवाज आई-- चाचाजी'!''
इन्होंने जवाब दिया. 'हां।'
फिर सवाल हुआ, 'आप लोगों का पहरेदार क्या कर रहा है? '
मोदीलाल जिनकी निगाहें पहिले ही उस तरफ घूम चुकी थी, बोले, 'लेटा है, जान पड़ता है सो गया है।''
पूछने वाले ने फिर पूछा, ''हम लोगों की आवाज उस तक तो नही जायगी?':
मोदीलाल बोले: "नहीं, यहां से काफी दूर है, और नजर के अंदर भी है, हिले डुलेगा तो मैं खबर दूंगा, अपनी तरफ की तुम जानो!''
जवाब आया, ''इधरे भी अभी.घंटे भर तक कोई खतरा नहीं है। अच्छा और पास आ जाइये और सुनिये।''
मोदीलाल बोले, ''मैं दरार से एकदम मुंह मटा कर बातें कर रहा हूं, पर खैर तुम्हारी आवाज मुझको स्पष्ट सुनाई पड़ रही है। पहिले बताओ तुम कैसे. पहुंचे, किस हालत में हों. क्या कैदी हो? और माया का कुछ पता है?"
बोलने वाले अर्थात श्रीधर ने कहा, ''मैं और माया गोताखोरों की पौशाक पहिनकर यहां आए। रास्ते में किसी समुद्री जीव के आक्रमण से माया की पोशाक फट गई जिससे टोप में पानी भर वह वेसुध हो गई। मैं खींचता हुआ यहां तक ले आया। कुछ लोग उसे उठा ले गए, मैं छिपा बैठा रहा।"
मोदी : तो क्या डूब कर मर ही गई वह? .
श्रीधर : नहीं, सुनता हूं फ्रामजी की दवा 'मोमियाई' की मदद से अब उसकी हालत धीरे धीरे सुधर रही है। -
मोदी : और तुम?
श्रीधर : कई रोज तक छिपा छिपा फिरता रहा। आखिर एक दिन मौका मिला और यहा के एक आदमी की जगह दखल कर बैठा हूं। इस समय उन्हीं में मिला जुला काम किया करता हूं।
मोदी : पहिचाना नहीं अभी तक किसी ने तुम्हें?
श्रीधर : जहां मुझे काम करना पड़ता हां पहाड़ के अंदर से कई तरह की अजीब गैसे निकला करती हैं जिनसे यहावाले तरह तरह के काम लिया करते हैं | जो लोग यह काम करते हैं उन्हें गाते बचाव के लिए हरदम गैस से बचने वाले टोप पहिने रहना पड़ता है, वही मेरे मुंह परभी रहता है इसी से अब तक बचा आ रहा हूं।
मोदी : मगर फिर भी खाने पीने के वक्त, या....?
श्रीधर : साथ काम करने वालों में से कोई पहिचानता नहीं, सरदारों से बचा रहता हूँ।
मोदी : फिर भी भण्डा फूटने का डर तोहई है। श्रीधर०। और कुछ कर भी क्या सकता!
मोदी : मैं बताऊंगां तुमको | कुछ और हाल सुनाओ। ऊपर वाले 'कैम्प' की कोई खबर?* ( इसका खुलासा हाल 'स्वर्ग-पुरी' उपन्यास में पाठक पढ़ चुके हैं और हमें आशा है कि उन्हें पूरी तरह से याद भी होगा। अगर न याद उपन्यास को एक बार पुन: पढ़ जाइए।)
श्रीधर : फ्रामजी ने बम का गोला चलाकर कैम्प को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला।
मोदी : हां इतना तो मुझे मालूम हो चुका है, और यह भी सुनचुका हूं कि अमेरिकन गवर्नमेन्ट की ओर से कैम्प तोड़ देने का हुक्म आ चुका था जब यह दुर्घटना हुई। तब? इन सरकारों ने कोई बदला नहीं लिया?

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