स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व सूत्र - स्वामी विवेकानन्द Swami Vivekananad Ke Netratwa Sutra - Hindi book by - Swami Vivekanand
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स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व सूत्र

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15401
आईएसबीएन :0

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स्वामीजी के विपुल साहित्य का गम्भीर अध्ययन कर उनके नेतृत्व एवं विकास सम्बन्धी सिद्धान्तों का सराहनीय संकलन प्रस्तुत ग्रंथ में किया गया है

भूमिका

श्री ए. आर. के. शर्मा द्वारा लिखित ग्रंथ “स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व सूत्र' के प्रकाशन से अतीव हर्ष हो रहा है। शर्माजी ने स्वामीजी के विपुल साहित्य का गम्भीर अध्ययन कर उनके नेतृत्व एवं विकास सम्बन्धी सिद्धान्तों का सराहनीय संकलन प्रस्तुत ग्रंथ में किया है। यह सर्वविदित है कि परमपूज्य ठाकुर के लीला संवरण के पश्चात् उनके संन्यासी शिष्यों का सफल नेतृत्व स्वामीजी ने ही किया था। अपने अमेरिका आदि देशों के प्रवासकाल में स्वामीजी ने अपने संन्यासी गुरुभाईयों, शिष्यों, मित्रों को अनेक उद्बोधक पत्र लिखे थे, जिनमें जाने-अनजाने नेतृत्व के शाश्वत सिद्धान्त वर्णित हैं, उनमें से अनेक पत्र या पत्रांश इस ग्रन्थ में संकलित हैं। निश्चय ही वे सिद्धान्त श्रीरामकृष्ण भावधारा से अनुप्राणित तथा त्रिकाल सत्य हैं। अतः प्रत्येक के लिये पठनीय एवं मननीय हैं।

वर्तमान युग में सर्वत्र, विशेषकर नैगम जगत् में नेतृत्व क्षमता के विकास को प्राथमिकता दी जा रही है। नेतृत्व विकास के आधुनिक सूत्र प्रतिपादित किये जा रहे हैं, परन्तु स्वामीजी द्वारा स्वयं के जीवन में पग-पग पर अनुभूत और प्रतिष्ठापित साहस, धैर्य, सत्यनिष्ठा, निरन्तर प्रयास - जैसे मौलिक गुणों के बिना वे आधुनिक नेतृत्व सूत्र निष्प्राण एवं निरर्थक हैं। स्वामीजी द्वारा अनुमोदित इन गुणों के संयोग से ही समाज को, राष्ट्र को, विश्व को सर्वतोभावेन सफल नेतृत्व प्राप्त हो सकेगा यही इस लघु कलेवर ग्रन्थ का कथ्य है।
आशा है स्वामी विवेकानन्दजी की 150वीं जयन्ती वर्ष के अवसर पर प्रकाशित इस ग्रन्थ से सुधी पाठक लाभान्वित होंगे।

धन्तोली, नागपुर 08-02-2013

स्वामी ब्रह्मस्थानन्द
अध्यक्ष रामकृष्ण मठ,

 

अनुक्रमणिका

1) परिचय ... 9
साहस एक बहु-मुखी प्रज्ञा है,
केवल शारीरिक साहस का नाम नहीं
2) शारीरिक साहस ... 31
पुरुषार्थी बनें, साहसी बनें
3) नैतिक साहस ... 61
जगत् चाहे जो कहे, क्या परवाह है,
मैं अपना कर्तव्य पालन करता चला जाऊँगा
4) मानसिक धैर्य ... 85
दुर्बलता का उपचार सदैव उसका चिंतन करते रहना नहीं है,
वरन् बल का चिंतन करना है।
5) निरंतर प्रयास ... 107
अनंत सहनशीलता रखो - जीत तुम्हारी होगी।
6) सत्य निष्ठा ... 127
उठो, जागो, सत्य में विश्वास करने का साहस करो -
सत्य के अभ्यास का साहस करो
7) मेधाशक्ति ... 157
मेधाशक्ति और शरीर की मांस-पेशियों का बल साथ साथ विकसित होना चाहिए...
सारा संसार तुम्हारे सामने नतमस्तक हो जाएगा




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