पलायन - वैभव कुमार सक्सेना Palayan - Hindi book by - Vaibhav Kumar Saxena
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पलायन

वैभव कुमार सक्सेना

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15418
आईएसबीएन :978-1-61301-662-6

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गुजरात में कार्यरत एक बिहारी

Palayan - a Hindi Novel by Vaibhav Saxena

जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह इस उपन्यास को भी दो पहलुओं में देखा जा सकता है । इसके एक पहलू से मां की संवेदनाएं जुड़ी हैं तो वहीं दूसरे पहलू में भाषा के आधार पर समुदाय के विभाजन को स्पष्ट किया है।

भारत में 26 से अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं। जब हम गुजरात पहुँचते हैं तो गुजराती सुनने को मिलती है वहीं पंजाब पहुँचते हैं तो पंजाबी या फिर महाराष्ट्र पहुँचे तो मराठी और बिहार पहुँचे तो बिहारी, ऐसे में कहीं अगर कर्नाटक पहुँच गए तो कन्नड़ और तमिलनाडु पहुँच गए तो तमिल या फिर आंध्रा पहुँचे तो तेलगु और केरल पहुँचे तो मलयालम । लेकिन अगर जब मराठी को पंजाबी या फिर गुजराती को बिहारी से बात करनी हो तब हिंदी बोली जाती है कहने का अर्थ है हिंदी में वो ताकत है जो संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बांधती है। ऐसे में अगर यह भाषाएं समुदाय बनकर भारत के लोगों में दीमक की तरह विभाजन का काम करें तो देश की एकता संदेह की दृष्टि में आ जाती है।

जब गुजरात में हिंदी बोलने वाले को हिंदी भाषी बोलकर संबोधित किया जाता है तब ऐसा मालूम होता है कि कहीं न कहीं वह व्यक्ति गुजराती बोली और हिंदी बोली दोनों के समुदाय को अलग-अलग रखने की कोशिश कर रहा है। भारत को समृद्ध बनाने के लिए भारत के नागरिक अपने ही राज्य में नहीं बल्कि भारत के अलग-अलग राज्यों में जाकर काम करते हैं । ऐसे में उस राज्य के कई लोग अतिथि मानकर दूसरे राज्य से आए लोगों के साथ अच्छा व्यवहार कर उन्हें सम्मान देते हैं तो थोड़े ही कुछ लोग भाषा को आधार मानकर खुद को अपना अलग समुदाय का समझकर, उनके साथ दुर्व्यवहार भी कर बैठते हैं।

पुरोवाक्

प्रत्येक राज्य में भारतीयों का रंग रूप लगभग एक समान है। भारत में रह रहा व्यक्ति किस राज्य से ताल्लुक रखता है इसकी तुलना रंग के आधार पर नहीं की जा सकती। अगर कोई बिहारी मध्यप्रदेश या उत्तरप्रदेश में जाकर हिंदी बोलता है तब उससे उसका वतन नहीं पूछा जाता क्योंकि मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश के निवासियों की भाषा मूल रूप से हिंदी है। लेकिन अगर वही बिहारी अन्य प्रदेश जैसे महाराष्ट्र, गुजरात व अनेक हिंदी न बोले जाने वाले प्रदेशों में जाकर हिंदी बोलता है तो उससे उसका वतन पूछ लिया जाता है। तब वह गर्व से कहता है- `बिहार`। बिहार में जन्म लेने वाले बिहारी जन्म से तो बिहार के है लेकिन उनके कार्य संपूर्ण भारत में प्रचलित है।

आधुनिक भारत के विकास में सीमेंट, सरिया, सिरेमिक व प्लास्टिक जैसे अन्य सामान का उत्पादन तेजी से हो रहा है। मूल रूप से इन फैक्टरियों में काम करने वाले श्रमिक बिहारी ही पाए जाते हैं। बिना श्रमिकों के इन फैक्टरियों का उत्पादन करना असंभव है। आज रहने के लिए मकान, आने जाने के लिए मोटरकार , बिजली व अन्य सुख सुविधाओं में बिहारी श्रमिकों का श्रम देखा जा सकता है।

गुजरात का अहमदाबाद शहर, इसकी आबादी और इसमें काम कर रही कंपनियों की गिनती नहीं। गुजराती लोग स्वादिष्ट भोजन और घूमने – फिरने में बहुत ही दिलचस्पी रखते हैं। यह वही गुजरात है जिसमें माँस और मदिरा दोनों का सेवन ही आदर्शों के खिलाफ है। ऐसे में उतर भारतीयों का गुजरात आना और माँस मदिरा का सेवन करना गुजरतियों के मन में उतरभारतीयों के प्रति एक अलग ही विचार स्थापित करते हैं। कुछ लोग तो बेचूक कहने में नहीं रुकते कि उतर भारतीय लोग गुजरात आकर गुजरात को गंदा कर रहे हैं।

28 सितंबर 2018 को गुजरात में साबरकांठा जिले के गांभोई गांव की सिरेमिक कंपनी में काम करने वाले एक उत्तर भारतीय द्वारा 14 माह की मासूम से हैवानियत की घटना सामने आई। इस घटना ने संपूर्ण उत्तर भारतीयों का सिर गुजरातियों के सामने लज्जा से झुका दिया। 29 सितंबर को मासूम से बलात्कार की आग पूरे गुजरात में फैल गई। जहाँ सभी गुजराती व उत्तर भारतीयों को मिलकर आरोपी को सजा देने के लिए एकजुट होना चाहिए था वहीं गुजरातियों ने गैरगुजरातियों को गुजरात गंदा करने का आरोपी मानकर गुजरात छोड़ने की नसीहत दी।

धीरे-धीरे हिंसा अहमदाबाद में भी फैल गई। गुजरातियों द्वारा मकान खाली कराए जाने लगे थे। करीब पचास हजार से अधिक लोग पलायन कर चुके थे। गुजरात की अर्थव्यवस्था थम रही थी। उद्योगपति व उद्योग अध्यक्ष, पुलिस और सरकारी मंत्रियों से लगातार संपर्क में लगे हुए थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बिहारियों की सुरक्षा को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी से बातचीत जारी थी। रेलवे स्टेशन पर हजारों की तादात में उत्तर भारतीयों की भीड़ जमा हो गई थी... ।

- वैभव सक्सेना

अनुक्रम

पलायन (एक बिहारी की कथा)
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पलायन (एक बिहारी की कथा)

1

अमरकांत बिहार का रहने वाला है जो पिछले 3 वर्ष से गुजरात के अहमदाबाद शहर में अफ़सर वर्ग की अच्छी नौकरी कर रहा था। अमरकांत के पिता सरकारी मास्टर हैं स्वाभाविक रूप से अमरकांत की पढ़ाई में किसी भी प्रकार की जरूरत का अभाव नहीं था। अमरकांत का मानना था कि प्राइवेट नौकरी सबसे बेहतर होती है जिसमें व्यक्ति अपनी कार्यकुशलता के अनुसार आगे बढ़ता है। अमरकांत के पिताजी बिहार में सरकारी नौकरी करने की सलाह दे रहे थे मगर अमरकांत ने अपनी जिद पर प्राइवेट सेक्टर ही चुना।

बिहारी या तो श्रमिक होते हैं या फिर अफ़सर। अमरकांत के स्वभाव में दोनों ही थे। अमरकांत ने अपने घर की गरीब हालत अपनी आँखों से देखी थी इसलिए अमरकांत को श्रमिक अफसर भी कह सकते हैं।

अमरकांत के डिपार्टमेंट में कुल नौ लोग हैं, जिनमें आठ गुजराती हैं। एक अमरकांत अकेला बिहारी। लेकिन अमरकांत के चंचल व निर्मल स्वभाव के कारण सभी लोग अमरकांत को बहुत पसंद करते हैं। साहब का क्या, साहब को तो बस अच्छा काम चाहिए जो कि अमरकांत बखूबी कर लिया करता था। अमरकांत के साहब राजकोट से हैं और वह अक्सर राजकोट की तारीफ किया करते थे जैसे मानो कि उन्हें अहमदाबाद में रहना बिल्कुल पसंद नहीं।

अमरकांत ऑफिस में था तभी अमरकांत के पास अमित का फोन आया। अमित अमरकांत के मकान मालिक का इकलौता बेटा है। अमरकांत ने फोन उठाकर बोला – "हैलो ! हाँ अमित बोलो।"

अमित ने कहा –"भैया पूरी कोलोनी खाली हो रही है। सभी गैरगुजरातियों से घर खाली कराए जा रहे हैं।"

अमरकांत ने कहा- "क्यों?”

अमित ने सटीक उत्तर दिया – "साबरकांठा में हुए रेप की वजह से। ठाकोर समाज के लोग एकजुट हो गए और सभी जगह आंदोलन कर रहे हैं।"

अमरकांत ने पूछा- "क्या मेरा घर भी खाली कर दिया गया?”

अमित ने कहा – "नहीं नहीं ! माँ ने बचा लिया पिताजी ने तुम्हारे कमरे का ताला तोड़ दिया था और सामान बाहर रखने ही वाले थे कि माँ ने उन्हें रोक लिया। पिताजी भी आंदोलन में एकजुट हो गए हैं।"

अमरकांत ने आखिरी शब्द में कहा – "ठीक है ! मैं ऑफिस के बाद घर आता हूँ।"

वह सहमा उठा। उसने पहले पुलिस थाने जाना ठीक समझा। वह इससे पहले कभी पुलिस थाने नहीं गया था और जाना भी नहीं चाहता था। ऑफिस खत्म होते ही उसने पुलिस स्टेशन की ओर रुख किया। थोड़ी ही दूर पहुँचा था की उसको दोबारा अमित का फोन आया। अमित ने बोला कि वह उसको अपने मोटरसाइकिल से लेने आ रहा है, वह कहाँ है?

अमरकांत आखिर किन शब्दों में कहता कि वह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने जा रहा है। अमरकांत ने अमित से ऑफिस आने का आग्रह किया। अमरकांत रास्ते का रुख बदलते हुए वापस ऑफिस पहुँचा। थोड़े ही समय में अमित अमरकांत को लेने पहुँचा और दोनों ने मोटरसाइकिल से घर की ओर रवानगी की। अमित ने रास्ते चलते अहमदाबाद की संपूर्ण स्थिति अमरकांत को सुनाई साथ ही बताया कि पिताजी का भी उतरभारतीयों पर गुस्सा ज्यादा बढ़ गया है।

अमरकांत के घर पहुँचते ही अमित के पिताजी ने हिसाब के कागज अमरकांत के सामने लाकर रख दिए और पांच दिन के अंदर घर खाली करने की नसीहत दी। अमरकांत ने कागज हाथ में ले लिए।

अमित की माँ ने अमरकांत के हाथों से कागजों को वापस लेते हुए कहा, "कोई जरूरत नहीं है घर खाली करने की अचानक वह कहां जाएगा।"

"इसलिए तो पांच दिन की मोहलत दे रहा हूँ वरना तुरंत ही खाली करा लेता।" अमित के पिताजी ने तेज आवाज करते हुए बोला।

अमित की माँ के स्वर भी तीव्र हो गए मानो वह अमरकांत की माँ हो- "नहीं पांच दिन में भी नहीं करेगा खाली। साबरकांठा में रेप हुआ उसमें इसका क्या कसूर। मैं पिछले तीन साल से अमरकांत को जानती हूँ अमरकांत ऐसे स्वभाव का कतई नहीं। उसमें इसका कोई दोष नहीं है वह घर खाली नहीं करेगा।"

अमित के पिता जी बोले- "अरे ! तुम इनको सपोर्ट कर रही हो इन्हीं लोगों के कारण तो गुजरात में बेरोजगारी बढ़ रही है। गुजरातियों को जहां नौकरी मिल नहीं रही, वहीं गैरगुजरातियों को नौकरी दिए जा रही हैं कंपनियाँ। आज तुम्हारा अमित बेरोजगार बैठा है, इन्हीं लोगों की वजह से।"

अमित की माँ ने झल्लाते हुए कहा– "बेरोजगारी गुजरात में नहीं पूरे भारत में ही है और अमित के भाग्य में नौकरी होगी तो मिल ही जाएगी। जिसके भाग्य में होती है नौकरी उसे ही मिलती है।"

अमित की पढ़ाई हाल ही जुलाई में खत्म हो चुकी थी। बेरोजगारी अधिक होने के कारण अमित के कॉलेज में कोई कंपनी नहीं आई थी। अमित अमरकांत की मदद से ऑनलाइन नौकरी तलाशने में लगा रहता था। अमित एवं अमरकांत की पढ़ाई भी एक ही थी इसलिए दोनों में खूब जमती थी। जो भी पढ़ाई के विषय में अमित को समझ नहीं आता वह अमरकांत से पूछ लिया करता था इसी तरह दोनों में दोस्ती भी खूब थी।

आखिरकार अमित की माँ ने अमरकांत की जान बचा ही ली। अमरकांत को सांस में सांस आ गई, अमरकांत सोचने लगा- 'अमित गुजराती बोलता है इसलिए उसकी माँ गुजराती है मैं बिहारी बोलता हूँ इसलिए मेरी माँ बिहारी है लेकिन जब भी हम हिंदी बोलते हैं तब हमारी माँ भारत माँ हो जाती है। क्यों ना यह पूरा देश हिंदी बोलता गुजराती, बिहारी, मराठी में कोई फर्क ही नहीं होता। पर हो भी तो हो, आखिर माँ तो माँ होती है चाहे वह बिहारी अमरकांत की हो या गुजराती अमित की। माँ प्रेम में भाषा नहीं बल्कि हर भाषा में प्रेम ढूंढती है चाहे वह मूक ही क्यों न हो।'

अमरकांत ने गुजराती सीखने का निश्चय किया। अमरकांत गुजराती सीखकर गुजराती और बिहारी के भेदभाव को मिटाना चाहता था।

कुछ समय बाद ही अमरकांत के भाई का बिहार से टेलीफोन आया। अमरकांत ने सबकुछ कुशल मंगल की सूचना दी। अमरकांत की माँ बिहार में बहुत डरी हुई थी। अमरकांत को मालूम न था कि बात घर तक पहुँच गई मगर आज के डिजिटल इंडिया में मंत्री को सुई भी चुभ जाए मतलब बुखार भी आ जाए तो वह भी मोबाइल पर आ जाता है तो फिर यह तो आग थी जो पूरे गुजरात में लगी हुई थी। उसको क्यों ना बताते?

अमरकांत का अक्टूबर विचारों से भरा रहा। नवंबर में साहब ने दिवाली पर घर जाने से रोक लिया कारण पूछा तो कंपनी का बहुत सारा काम बताया। अमरकांत ने दिसंबर में घर जाने का निश्चय किया।

आगे....

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