ताना बाना - मंजु मधुकर Tana Bana - Hindi book by - Manju Madhukar
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ताना बाना

मंजु मधुकर

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :140
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1558
आईएसबीएन :81-7721-058-0

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ कहानी संग्रह...

Tana Bana

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘ताना-बाना’ कथा-संग्रह की सभी कहानियाँ विभिन्न विषयों की होते हुए भी नारी प्रधान हैं। इसमें उच्च-मध्यम वर्ग की महिलाओं की भावना एवं समस्याओं का वर्णन है।
ताना-बाना कथा संग्रह की सभी कहानियाँ विभिन्न विषयों की होते हुए भी नारी प्रधान हैं। इसमें उच्च मध्यम वर्ग की महिलाओं की भावनाओं एवं समस्याओं का वर्णन है। ताना-बाना सरल दस्तकारी में दक्ष पढ़ी-लिखी आभिजात्य परिवार की गृहलक्ष्मी का जीवन है।

‘टिकुली’ हिंदू डॉक्टर युवती की मुसलमान सहपाठी से प्रेम-विवाह कर घर बसाने की गाथा है। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि उसके माथे की टिकुली पर रीझने वाला आधुनिक विचारों का उसका शौहर ‘टिकुली’ से ही चिढ़ने लगा।
    ‘त्रिनेत्र को चुनौती’ और ‘उतरन’ हास्य बिखेरती कहानियाँ हैं। छोटी और चुटकीपूर्ण होते हुए भी इनमें कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य ही है।
    ‘नैहर का नेह’ कहानी बहुत सरल, परंतु मर्मस्पर्शी है।
    ‘किलकारी’ अंतर्मन से निकली एक सरल, मासूम एवं प्यारी सी कहानी है।

भूमिका


    प्रस्तुत कहानी-संग्रह ‘ताना-बाना’ अंतर्मन में पैठती कहानियों का गुलदस्ता है। मूलतः गृहिणी होने के नाते मेरी कहानियों के कथानक घर-गृहस्थी की चारदीवारी से ही निकले हैं। विषयवस्तु आभिजात्य वर्ग की भी है, परंतु अधिकतर मध्यम वर्गीय परिवार, विशेषकर उच्च-मध्यम वर्गीय, की ही है। मेरी धारणा है कि मध्यम वर्ग ही समाज का वह वर्ग है, जो समाज के नियम एवं मूल्यों का परंपरापूर्वक निर्वाह करता है। संस्कार एवं संस्कृति का पूर्ण द्योतक है। मैं स्वयं भी इसी वर्ग का नेतृत्व करती हूँ। प्रथम मैं एक बेटी, बहू, पत्नी, माँ, बहन, भाभी, सास, एवं नानी हूँ, अतः उन सब पदवियों को प्राप्त कर कथानक तो घर से ही उठा लिये जाते हैं।

    बाल्यावस्था से ही पारिवारिक वातावरण पठन-पाठन में रुचि का कारण बना। प्रोफेसर पिता के प्रोत्साहन ने जहाँ एक ओर वातावरण मिलने के कारण अनेक बाधाओं एवं गृहस्थी के दायित्वों का निर्वहण करते हुए भी पति के सहयोग एवं प्रेरणा द्वारा रुक-रुककर चलने वाली लेखनी अबाध गति से चल निकली।

    हृदयस्पर्शी विषय कागजों पर कहानी बनकर बिखरे और आरंभ हो गई लेखन की अनवरत यात्रा। परंतु यह अवश्य है कि जब तक विषय अनुकूल नहीं मिलता लेखनी आगे नहीं बढ़ती।
     श्रीगणेश किया विद्यार्थी जीवन में विद्यालय-विश्वविद्यालय की पत्र-पत्रिकाओं द्वारा। पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के पश्चात् विदेश की धरती पर जब साहित्यिक वार्ताओं का सिलसिला आरंभ किया तो पत्रिकाओं में छिटपुट लेख, संस्मरण भी लिखे; परंतु हदयस्पर्शी अनुभव कथा-कहानी बन कागजों पर उतार पाठकों के समक्ष आए।

    इस संग्रह की सभी कहानियाँ हृदय का तार हैं। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि मेरी कहानियाँ नारी-प्रधान होती हैं। मुझे गर्व है कि मैं भारतीय गार्हस्थ्य नारियों का प्रतिनिधित्व करती हूँ। ‘ताना-बाना’ की सभी कहानियाँ विभिन्न विषयों पर हैं। इनमें उच्च-मध्यम वर्ग की महिलाओं की भावनाओं एवं समस्याओं का वर्णन है।
    ‘ताना-बाना’ सरल, दस्तकारी में दक्ष, पढ़ी-लिखी अभिजात परिवार की गृहलक्षमी का जीवन है। वह स्त्री तो लाक्षणिक है, वरन् सभी भारतीय महिलाओं का जीवन ‘ताना-बाना’ ही तो है।
    ‘चन्न चणे ते पाणी पीना’ एक व्यंग्यात्मक कथा है।

    ‘कर्मण्येवाधिकारास्ते’ में मंद बुद्धि पुरुष से ब्याही कर्मठ स्वाभिमानी युवती की कथा है, जिसने अपने जीवन में कर्म और कर्तव्य को ही प्राथमिकता दी है।
    ‘शापमुक्त’ कहानी की नायिका एक डॉक्टर पिता की गोद ली लाडली युवती है, जो अपने ददिया ससुर द्वारा उसकी वास्तविकता ज्ञात होते ही उपेक्षित कर दी जाती है; परंतु संपूर्ण कहानी का अंत पढ़ने से ही विदित होता है कि अंततः ‘शापमुक्त’ कौन हुआ।

    ‘टिकुली’ हिंदू युवती की मुसलमान सहपाठी से प्रेम-विवाह कर घर बसाने की गाथा है। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि उसके माथे की टिकुली पर रिझाने वाला आधुनिक विचारों का उसका शौहर ‘टिकुली’ से ही चिढ़ने लगा।
    ‘त्रिनेत्र को चुनौती’ और ‘उतरन’ हास्य बिखेरती कहानियाँ हैं। छोटी और चुटकी भरी होते हुए भी इनमें कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य ही है।
    ‘नैहर का नेह’ कहानी बहुत सरल, परंतु मर्मस्पर्शी है।
    ‘किलकारी’ एक सरल, मासूम एवं प्यारी सी कहानी है। यह सत्य है कि कथा-कहानियाँ कोरी गल्प तथा मिथ्या कथा ही नहीं होतीं, इनमें कहीं-न-कहीं यथार्थता का पुट अवश्य ही होता है। कोई घटना, कोई पात्र तो अवश्य ही जीवन-यात्रा में मन-मस्तिष्क को छू कर निकल जाता है और लेखक अथवा लेखिका का हृदय ठिठककर उस घटना एवं पात्रों का अवलोकन करता है और एक कथा तैयार हो जाती है।
    ‘ताना-बाना’ संग्रह आपके हाथों में है, साथ ही पसंद एवं नापसंद का निर्णय भी।

—मंजू मधुकर   

चन्न चणे ते पाणी पीना


    ‘‘हैल्लो!’’
    ‘‘हैल्लो, मैं बोल रई गीता।’’
    ‘‘हाँ-हाँ, बोलो।’’ दीपाली ने उतावली में कहा।
    ‘‘सुन, पंद्रह की है करवाचौथ। अपनी पिंकी की तो पैल्ली करवाचौथ है न, तो साड्डे घर ही सब्ब जुड़ेंगे। हमारी तो तू जानती ही है कि सब सरदार पंजाबियों की ही सोसाइटी है, खूब रौनक होनी है।’’ गीता उत्साह से बोली।
    ‘‘लेकिन गीता, दिल्ली में तो सब सोलह की ही कर रहे हैं।’’ दीपाली ने गीता की वाणी को ब्रेक लगाया।
    ‘‘सुहा, कोलकाता में तो बीस बरस से देख रही है कि सभी त्योहार एक दिन पैल्ले ही होता है और हाँ, पेन-शेन पर्स में रख लेना। बाद में हाउजी के भी एक-दो राउंड हो जाने है।’’

    ‘‘अरे हाँ, अबकी तो तेरी बहू के घर से खूब बायना आय होगा।’’ दीपाली ने अपनी सरल सखी को छेड़ते हुए कहा।
    ‘‘बायना न सुहा, मेरे और दस बारह हजार सुहा हो गए। नवी साड़ी, नवा सूट, झुमके पिंकी को दिए। चल तू जल्दी आना, मिलकर बातें करेंगे।’’
    दीपाली ने फोन रखा और मुसकरा उठी।
    इतने बरस बीत गए, पर गीता नहीं बदली। वही बातचीत—आधी पंजाबी और आधी हिन्दीवाली। बात-बात पर हर अच्छी-बुरी बात के बीच ‘सुहा’ का तकियाकलाम। अब आज ही सुहाग के त्योहार के बीच ‘सुहा’, ‘सुहा’ की पुनरावृत्ति।
    दीपाली और गीता लगभग तीस बरस पश्चात  सुयोग से कोलकाता में मिलीं। वैसे दोनों का शैशव एवं कैशोर्य साथ ही बीता। यौवनावस्था की दहलीज पर भी दोनों अंतरंग सखियों ने संग-संग ही पाँव रखा था। दोनों अनेक खट्टी-मीठी स्मृतियों में समान भागीदार थीं।

     गीता गाजियाबाद में दीपाली के पुश्तैनी विशाल बँगले से सटी शरणार्थियों की बस्ती में रहती थी। दीपाली के माता-पिता दोनों ही सुप्रसिद्ध चिकित्सकों में थे और गीता का परिवार बंटवारे में सब कुछ गँवाकर शरणार्थी बन भारत आया था। उसके चाचा और पिता वगैरह कपड़े अदि का व्यापार जमा रहे थे। पारिवारिक स्तर, बौद्धिक एवं सामाजिक दृष्टि से भिन्न होने पर भी दोनों की घनिष्ठता उदाहरण ही थी।
    व्यस्त माता-पिता की इकलौती पुत्री के एकाकी सूनेपन को गीता की जीवंतता ने भरा था। कई बार वह उसके घर जा कर मक्की की गरम-गरम रोटी और सरसों का साग खाकर आती। गीता का परिवार दीपाली के देखते-ही-देखते दिल्ली-गाजियाबाद के सुप्रसिद्ध कपड़ा व्यापारियों में से एक हो गया था।

    जहाँ दीपाली की दादी माँ अभावहीन जीवन में भी छोटे-छोटे दुःख-दर्द ढूँढ़ कुछ-न-कुछ रोना रोती ही रहती थीं, वही गीता की कर्मठ दादी—जिन्होंने विभाजन में अपने पति एवं ज्येष्ठ जवान पुत्र को खो दिया था—दर्जनों आभावों में भी भावी अभाव-रहित जीवन की कल्पना कर प्रसन्न होती रहतीं। सच पूछो तो उन्हीं के कारण गीता एवं दीपाली की मैत्री-डोर बँधी हुई थी। गीता की दादी दीपाली की दादी का हाथ बँटाने प्रायः ही आती रहती थी। दीपाली के पितामह आदि ने इस शरणार्थी परिवार की वक्त-वेवक्त खासी मदद की थी। गीता का परिवार इस बात का एहसान भी नहीं मानता था।

    दोनों की मित्रता हमजोलियों की आँखों की किरकिरी तो थी ही, अध्यापिकाएँ भी अचरज करती थीं। कहाँ तो सदैव पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहने वाली कोमल, सभ्य, सुसंस्कृत, मृदुभाषी छात्रा दीपाली और कहाँ खेल-कूद, रस्साकशी, दौड़ आदि में अव्वल आने वाली और ग्रेस नंबरो से उत्तीर्ण होने वाली छात्रा गीता, जो सुंदर गोरी होते हुए भी कठोर सुगठित देह-यष्टिवाली थी।

    गीता ने घिसट-घिसटकर बारहवीं परीक्षा उत्तीर्ण की। दोनों सखियाँ कालेज गईं और गीता ने बी.ए. प्रथम वर्ष में ही लुढ़ककर पढ़ाई लिखाई छोड़ कर कुकिंग एवं सिलाई-कढ़ाई की कक्षा जॉइन कर ली। धीरे-धीरे गीता का परिवार दिल्ली के साउथ एक्सटेंशनवाली कोठी में ही जाकर रहने लगा था। कभी-कभी जब गीता मिलने आती तो दीपाली उसे कम-से-कम ग्रेजुएट करने की सलाह देती। इस पर गीता हँस कर कहती, ‘‘यार, पढ़ना-वढ़ना क्या है ! पापाजी बिजनेसवाला मुंड़ा ढूँढ़ रहे हैं तो वही कौन सा ग्रेजुएट होगा। बस ठीक-ठाक काम-काजवाला हो तो मैं उसकी बीवी बन सारी जिंदगी ऐश करूँगी।’

    और एक दिन गीता की डोली सज भी गई। पंजाब के एक खाते-पीते परिवार में उसका रिश्ता तय हुआ था। गीता की विदाई में भावुक दीपाली फूट-फूटकर रोई तो गीता ने ही उसे चुप कराते हुए कहा था, ‘न रो, न, कुछ आँसू अपनी विदाई के लिए बचाकर रख।’ और दोनों सखियाँ खिलखिलाकर गले लग गईं।
    गीता ब्याही गई, परंतु उसके ब्याह की उमंग, रौनक और धूमधाम की अशुचिता दीपाली को भी लग गई। उसका कोमल हृदय भावी सपनों के राजकुमार के सपने दिखाने लगा था; परंतु दीवाली के माता-पिता तो उसे डॉक्टर बनाने पर तुले हुए थे।

    दीपाली माता-पिता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी, लिहाजा एम.एस-सी. बायो-केमेस्ट्री कराकर डॉक्टर साहब को ब्याह दी गई।
    गीता आसन्नप्रसवा होते हुए भी अपने हँसमुख गोल-मोल, गोरे-चिट्टे आनंदी पति देव और दो वर्षीय पुत्र को गोद में लेकर उसके ब्याह में सम्मिलित होने आई थी। उसकी जुबान पर बस अपने पति चोपड़ा साहब का ही नाम था और चोपड़ा साहब दिलोजान से गीता पर फिदा थे।
    जाते-जाते उसके आँसू पोंछते-पोंछते गले मिलकर बोली, ‘‘आखिरकार बन ही गई तू डॉक्टरनी। देखें, अब कब मिलना होता है।’’

    वही इन दोनों अंतरंग सखियों की अंतिम भेंट थी और उसके पश्चात् तीस वर्ष न जाने कहाँ हवा हो गए। दीपाली पंद्रह वर्षों तक तो विदेशों में ही धूमती रही। जब भी मायके जाती तो विस्मृत मित्र परिचितों के समाचार मिल ही जाते। इसी दौरान ज्ञात हुआ कि गीता के पति ने कोलकाता में व्यापार जमाया, जो खूब फूल-फल रहा है, वगैरह-वगैरह।
    दीपाली की दोनों बेटियाँ पढ़ लिख कर ब्याही गईं। उसके पति ने भी विख्यात हृदय चिकित्सक बन काफी नाम कमा लिया था और सुयोग कुछ ऐसे बने कि दीपाली के पति को कोलकाता के एक प्रसिद्ध अस्पताल के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ का प्रधान पद मिला और अंततः दोनों सहेलियों ने एक-दूसरे को ढूँढ ही लिया।
    दीपाली को आज भी याद है—एक वर्ष पूर्व की भाद्रपद की स्वेद बिंदुओं से ओत-प्रोत, प्रखर रवि रश्मियों से आप्लावित वह दोपहरी।

    मध्याह्न के दो बजे थे। वह अस्त-व्यस्त, हैरान-परेशान अपने अकर्मण्य परिचरों से पैकिंग खुलवा सामान व्यवस्थित करा रही था कि देखा, एक भरी-पूरी गत यौवना, कर्तित केश, रंग पुते मुखड़े, भारी जेवरात एवं आधुनिक पतली शिफॉन की चमकीली साड़ी में दहलीज पर आ खड़ी हुई। साथ में फलों और मिठाइयों के टोकरे थे। दीपाली सकपकाकर भीतर खिसकने का प्रयत्न कर रही थी कि आगंतुका गले से लिपट गई।
    ‘‘अरे, शरमा क्यों रही है ? मुझे तो पैल्ले से ही पता था कि तू मुझे इसी गत में मिलेगी। तेरा साफ-सफाई का नशा ही ऐसा है। चेहरा चाहे चमके या न चमके, घर जरूर चमक जाना है। चल, कपड़े-वपड़े बदल। सूरत ढंग की कर, फिर बातें होंगी।’’
    ‘‘अरे गीता, तू !’’ दीपाली ने गीता की नॉन स्टाप सुपर फास्ट को तुरंत विराम दिया।
    ‘‘हाँ, मैं ! बड्डे आदमी की मैडम है तू तो, अखबारों में फोटो सहित समाचार पढ़ा और समझ गई कि डॉ. पौलुत्य वर्मा और कोई नहीं, मेरी सहेली के ही श्रीमानजी हैं। इतना कठिन नाम और किसी का हो ही नहीं सकता। याद हैं न, इस नाम का शादी में मैंने कितना मखौल उड़ाया था।’’

    तीस वर्ष का अंतराल अंतरंगता को और भी प्रगाढ़ बना गया था। दोनों सखियों की मैत्री की डोर दोनों के पतियों ने भी थाम ली और दोनों परिवारों के पारिवारिक संबंध बन गए। गीता एवं चोपड़ा साहब उन दोनों का बहुत ख्याल रखते।
    रात के खाने पर दीपाली अपने पति को भोजन परोसते हुइ बोली, ‘‘गीता का फोन आया था, करवाचौथ का बता रही थी।’’
    ‘‘अरे हाँ, गीता का नाम लेने से याद आया कि चोपड़ा साहब आए थे चेकअप कराने। सब ठीक है, बस परहेज करें और लम्बी सैर करें। फोन करो तो बता ही देना।’’
    करवाचौथ से एक दिन पहले रात्रि को दोनों पति-पत्नी रात्रि भोज के लिए बैठे ही थे कि धड़धड़ाते हुए गीता और चोपड़ा साहब आ धमके। दोनों सरगई लेकर आए थे।

    ‘‘वाह भाभीजी, यह तो आपने बहुत अच्छा किया। आपकी सहेली रानी तो हमें यही ताने-उलाहने दे रही थी कि परदेश में तो कोई सरगई देने वाला भी नहीं है।’’ डॉक्टर साहब प्रसन्न हो बोल उठे।
    ‘‘ल्ये भैन की याद नहीं आई। भैन लगती हूँ तेरी उम्र में तुझसे कुछ बड़ी ही निकलूँगी।’’ गीता की बात सुन दीपाली अभिभूत हो उठी।
‘‘लीजिए चोपड़ा साहब, रिपोर्ट लीजिए अपनी। सब ठीकठाक है, बस परहेज और सैर लंबी करिएगा। भाभीजी यह आपकी ड्यूटी है।’’ डॉ. वर्मा ने अपनी ड्यूटी निभाई।
    ‘‘परहेज न सुआ कि परेज कराऊँ, सुक्खी रोट्टी तो साड्डे गले विच फसेंदी है। और मरे इस कलकत्ते में जब तक सो के उट्ठो तो धूप ही निकल आती है।’’

    गीता के साथ डॉक्टर साहब की मीठी नोक-झोंक सदा की भाँति चल रही थी और चोपड़ा साहब सदा की भाँति नाश्ते पर टूटे हुए थे।
    गीता ने जैसे-तैसे उन्हें उठाया, ‘‘अब चलिए भी, कल सुबा जल्दी भी तो उठना है। अच्छा दीपा, मैं चली, तू सरगई टैम से कर कल जल्दी घर आ जाना, जरा सज-धज के ।’’
    दूसरे दिन गीता के निर्देशानुसार दीपाली मध्याह्न दो बजे ही गीता के घर पहुंच गई। विशाल हॉल धवल चाँदनियों, बालिशों एवं बेलफूलों की लड़ियों से लकदक कर रहा था।
    यह सजावट तो औपचारिक ही थी वरन् गीता के गृह की उष्णता ही अतिथियों को सहज कर देती थी।
    गीता दीपाली को देखकर खिल उठी, परंतु सदा की आपादमस्तक श्रृंगारिका गीता आज हलके मेकअप, हलकी-फुलकी साड़ी में बड़ी फीकी सी लग रही थी। वैसे भी गीता थकी-थकी और बीमार-सी ही दिख रही थी।

    कल तो सरगई देने आई तो ठीक ही थी। अब लगता है, व्रत का प्रभाव है। चोपड़ा साहब की भक्त गीता ने एक घूँट पानी, चाय, कॉफी कुछ नहीं पिया होगा, जबकि रक्तचाप और शुगर की दवाइयाँ भी वह ग्रहण कर रही थी।
    ‘‘यह क्या गीता, मुझसे तो बोल रही थी कि लाल बनारसी पहनकर आना और स्वयं क्या श्रृंगार किया है तूने !’’ दीपाली रुष्ट सी होकर बोली।
    ‘‘ठीक है, ठीक है। अब पिंकी के सजने-धजने के दिन हैं।’’ गीता झेंपकर बोली।
    ‘‘अच्छा-अच्छा, पहन ले, पहन ले जब तक बहू नहीं।’’ दीपाली को गीता को छेड़ने में ही आनंद आ रहा था।      
    ‘‘तूने तो बड़ा इंतजाम कर लिया।’’

    ‘‘हाँ, भई, पहले दोनों बाहुओं के वक्त भी किया, पर क्या सिला मिला। दोनों बड़े बेटों पर जितना मैंने और चोपड़ा साहब ने ध्यान दिया उतना शायद ही कोई ध्यान दे पाए। उनके टेस्ट होते तो किट्टी-शिट्टी सब छोड़ देती। पढ़ाई, कोचिंग में दिन-रात को एक कर देती है। खैर, उन दोनों ने भी हमें निराश नहीं किया। बड़ा बना आई.आई.टी. इंजीनियर और छोटा बना डॉक्टर। पर फिर क्या, बड़े ने निकलते ही बंगाल की जादूगरनी ब्याह ली और छोटा एम.डी. करने वास्ते लंदन क्या गया उसे वहाँ की डायना ने ही उड़ा लिया। दोनों ही बाहर बस गए। तुझे तो पता है न कितना बड़ा त्योहार है यह हम लोगों का ! मेरा शुरू से ही दिल करता था कि पंजाब सोहणी कुड़ी आए और साथ-साथ सरगई करें। चन्न चणे तो पाणी पिएँ, पर बड़ी बंगालन ने तो मछली चाप खाकर सरगई की माछी झोल खाकर व्रत खोला। दूसरी को खास दीपावली और करवाचौथ के वास्ते बुलावाया गया। पाँच फीट आठ इंचवाले मेरे बेटे की छह फीट की अंग्रेजन को देखने सारी सोसाइटी इकट्ठी हुई। करवाचौथ पर बनारसी साड़ी पहना सजा-धजा थालियाँ बंटाने बैठाया तो बड़े चाव से बैठी; लेकिन साड़ी एक ओर तथा थाली लोटा दूजी ओर। और जानती है, मैडम ने ब्लाउज व पेटीकोट में ही जैसे-तैसे अर्घ्य दिया।’’
    गीता के सुनाने के ढंग से ही दीपाली हँसते-हँसते दोहरी हो गई।

    ‘‘अब चन्न चणे ते पाणी क्या पीना था, जब सारे दिन सोमरस के घूँट पीती रही थी। उसके बाद से तो आई नहीं।’’
    ‘‘ठीक है गीता, अब आ गई न तेरी मनपसंद बहू।’’
    ‘‘हाँ, वैसे तो पहले दोनों का हश्र देख तीसरे को मैंने ज्यादा पढ़ाया ही नहीं। बी.काम. करते ही बिजनेस में लगा दिया। ऐसा बढ़िया चला रहा है कि चोपड़ा साहब भी दंग हैं। आज्ञाकारी भी बहुत है। पिंकी भी खूब अच्छी है; पर देखो आगे क्या बनता है। अब सरगई भेजी थी, सुना है सोत्ती ही रै गई, खाई नहीं।’’
    गीता ठंडी साँस भरकर बोली।
    ‘‘भेजी थी मतलब तुम सबने साथ बैठ कर नहीं खाई ?’’
    ‘‘अब क्या बताऊँ...’’ वह अपनी बात पूरी कर पाती कि तभी कोलकाता में ही रहने वाली उसकी रिश्ते की ननद आशाजी सिर से पाँव तक गहनों, कपडों से लकदक, स्थूल काया साथ में दुबली-पतली सीक-सी आठ-नौ बरस की उनकी पौत्री ने प्रवेश किया। हाँफती-हाँफती सोफे पर धँस गई।

    ‘‘अस्सी तो थल्ले बैठेंगे नई।’’ उनके लिए चाँदनी के ऊपर छोटे स्टूल की व्यवस्था तुरत-फुरत की गई। इसी बीच साटनी सूट, जालीदार जरेदाजी के दुपट्टों से सुसज्जित चार-पाँच सरदारनियों के हुजूम का आगमन हुआ।


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