Vayu Purana - Hindi book by - Rampratap Tripathi Shastri - वायुपुराणम् - रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री
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वायुपुराणम्

रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :1016
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15688
आईएसबीएन :0

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प्रकाशकीय

नमः पुराणप्रभवे युगस्य प्रभवे नमः।

चतुर्विधस्य सर्गस्य प्रभवेउनन्तचक्षुपे।।

सम्मेलन के प्रतिष्ठापक स्वर्गीय राजर्षि श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन ने सम्मेलन द्वारा पुराणों के हिन्दी अनुवाद की योजना बनायी थी, जिससे भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूलाघार पुराण सुगमता से घर-घर पहुँच सके तथा उनके अध्ययन और अनुशीलन से सभी लोग लाभान्वित हों। तदनुसार ठण्डन जी के समय में ही मत्स्य एवं वायुपुराण का केवल हिन्दी अनुवाद मात्र सम्मेलन से प्रकाशित हुआ था, जिनकी सारी प्रतियाँ अब समाप्त हैं। कुछ समय के पश्चात्‌ पुनः पुराण प्रकाशन योजना चालू का गयी तो विद्वानों के सुझाव पर पाठान्तर के साथ मूल श्लोक और अनुवाद सहित पुराणों के प्रकाशन का निश्चय किया गया। तदनुसार ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुरण और अग्निपुराणों का मूल श्लोक के साथ हिन्दी अनुवाद सम्मेलन से प्रकाशित हुआ, जिसका प्रबुद्ध पाठकों ने अत्यधिक स्वागत किया। इससे प्रोत्साहित होकर सम्मेलन ने मत्स्य, वायु एवं बृहन्नारदीय पुराण को भी श्लोक एवं उसके अनुवाद के साथ छापने की योजना बनायी। इन तीनों में मुद्रित वायुपुराण पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।

पहले वायुपुराण, वाड्मयमर्मज्ञ विद्वानों के कथनानुसार विशालकाय ग्रन्थ था, जिसका एक भाग शिवपुराण के रूप में परिवर्तित हो गया है। संप्रति वायुपुराण में बारह सहस्न श्लोक ही पाये जाते हैं। महाभारत और हरिवंशपुराण में इसका उल्लेख आता है। महाकवि बाणभट्ट (६०० ई०) ने अपने ग्राम में वायुपुराण के पाठ का वर्णन किया है। इसमें बौद्ध और जैन धर्म का उल्लेख नहीं है, पर गुप्त साम्राज्य का उल्लेख है। यही नहीं, इसमें गया माहात्म्य बहुत विशद रूप से वर्णित है। संगीत विषय पर भी एक अध्याय है। 'सर्गश्च प्रतिसर्गश्च'-इत्यादि सुप्रसिद्ध पुराण लक्षण इसमें पूर्णतया घटित होते हैं।

इस पुराण का अनुवाद स्वर्गीय पण्डित रामप्रताप त्रिपाठी ने किया था। उसी को सम्मेलन ने इस संस्करण में स्थान दिया है। इसमें मूल श्लोक आनन्दाश्रम पूना से प्रकाशित 'वायुपुराण' से लिये गये हैं। किन्तु मूल श्लोक तथा यत्र-तत्र हिन्दी अनुवाद में भी स्वर्गीय पण्डित श्री तारिणीश झा ने सपरिश्रम संशोधन किया है। इस संस्करण को प्रूफ संशोधन द्वारा दोषमुक्त करने का कार्य श्री रमेशकुमार उपाध्याय ने किया है, उनके प्रति भी मेरा साधुवाद। शुभमस्तु।

रामनवमी                                                                                                                     विभूति मिश्र

संवत्‌ २०७२ वि०                                                                                                          प्रधानमन्त्री

                                                                                                                     हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद

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