दलित जीवन की कहानियाँ - गिरिराजशरण अग्रवाल Dalit Jivan ki Kahaniyan - Hindi book by - Girirajsharan Agarwal
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दलित जीवन की कहानियाँ

गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :157
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1571
आईएसबीएन :81-7315-178-4

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प्रस्तुत संकलन की कहानियाँ भारतीय मनीषा को झकझोरती हुई उसकी मानसिक ऊहापोह का ऐसा चित्र प्रस्तुत करती हैं जिसमें शोषक वर्ग बेनकाब होकर रह जाता है...

Dalit Jivan Ki Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ठुकराये हुए लोग

दलित वर्ग का ध्यान आते ही उस शोषण का ध्यान आता है, जो इतिहास में पहली बार आदमी ने आदमी के साथ किया था। और जब शोषण के इस इतिहास का ध्यान आता है तो इतिहास पूर्व के उस मानव की छवि सामने आ जाती है, जिसने अभी फल-फूल और वनस्पति से सामूहिक रूप में अपना आहार जुटाते-जुटाते प्रथम बार एक अतिरिक्त शक्ति जुटाकर औजार से काम लेना आरंभ किया।

इस संदर्भ में मानव-जीवन के विकास पर टिप्पणी करते हुए ज्यूरिस ने बड़ा ही तीखा वाक्य लिखा था- ‘‘उस समय जब मानव अपने चारों हाथ-पैरों सहित धरती पर फैली हुई हरी-हरी घास से अपनी भूख मिटाने में व्यस्त था, तभी उनसे किसी एक चतुर ने इच्छा की, सोचा, संकल्प किया और अपने दो पैरों के बल पर सीधा खड़ा हो गया। तब उसने झुके हुए लोगों को हांकना आरंभ कर दिया।’’ हो सकता है कि यह केवल एक व्यंग्य हो लेकिन कभी-कभी व्यंग्य में में एक तीखा सत्यता निहित रहता है। मानव-इतिहास के संदर्भ में यही तीखा सत्यता इस वाक्य में भी व्यक्त हुआ है।

कहने की आवश्यकता नहीं है हजारों-लाखों वर्ष पूर्व का जो टूटा-फूटा इतिहास हमें उपलब्ध है अथवा हम उस युग की कुछ सच्चाइयों को विभिन्न अन्वेषणों से प्राप्त कर पाए हैं, उनसे यह सिद्ध हो गया है कि आदिमयुग का सामाज एक वर्गविहीन समाज था। उसमें जातियां, संप्रदाय, ऊंच-नीच, भेद-भाव, राजा और प्रजा का अंतर नहीं था। विडंबना यह हुई कि सामूहिक रूप से प्राकृतिक आहार जुटाते-जुटाते जब आदि युग के मानव को इस बात की आवश्यकता का अनुभव हुआ कि वह शारीरिक शक्ति के अतिरिक्त दूसरे साधनों की खोज करे, जिनसे वह जीवन के लिए अधिक उपयोगी सामग्री जुटा पाए तब उसने अपने हाथों को अधिक लंबा और प्रभावशाली बनाने की विधि सीखी। अब उसके पास पांच उंगलियों वाले हाथ ही नहीं, उन हाथों में तीर-कमान तथा अन्य हथियार भी थे। यहाँ पहुँचकर आदमी इस योग्य हो गया था कि वह अपने और अपने परिवार की दैनिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त कुछ वस्तुएं संकट के समय के लिए भी एकत्र कर सके।
एक कदम आगे चलकर जब आदमी ने जमीन की छाती चीरकर अन्न उपजाने की विधि सीख ली तो उसके लिए उसे अधिक मानव-श्रम की आवश्यकता अनुभव हुई। यहीं से आदिम समाज के कृषियुग में दास-प्रथा ने जन्म लिया। सामंतवाद और दासता की प्रथा जुड़वां बच्चों की तरह एक साथ पैदा हुईं। विकास के एक अंग ने अभिशाप के एक इतिहास को जन्म दिया। यही दास-प्रथा आगे चलकर मानव-श्रम के शोषण की एक सुनियोजित पद्धति बन गई।

सामंती युग का इतिहास इस बात का साक्षी है कि आदमी ने अपनी सुविधाओं की प्राप्ति के लिए अपने ही जैसे दूसरे आदमी की मेहनत का शोषण करना सीखा। हर वह शक्तिशाली सरदार, जो अपने कबीले का मुखिया होता था, दूसरे समुदाय पर अपनी साधन-शक्ति के बल पर आक्रमण करता, विजय में हाथ आई संपत्ति के साथ-साथ उसे मानव की शक्ल में काम करने वाली मशीनें भी हाथ आतीं, जिससे वह अपनी आय और सुविधाओं को बढ़ाने के लिए गुलामों की तरह व्यवहार करता। इस तरह जैसे-जैसे पैदावार के साधनों पर व्यक्तिगत सामंतों का अधिकार जमाता गया, समाज में भी वर्ग-भेद भी बढ़ता गया।
यही वर्ग आगे चलकर आदमी और आदमी के बीच में अलगाव और घृणा का आधार बना। हम वर्गों में बंटे हुए जिस सामाज के अंदर सांस ले रहे हैं, उनका इतिहास बहुत पुराना है। उसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि सामाजिक धरातल को भीतर तक फोड़कर उस स्थान में प्रविष्ट कर गयी हैं, जहां से इनको उखाड़ फेंकना सुधारवादियों की कल्पना मात्र दिखाई देता है। इसके लिए आवश्यकता है एक बड़ी क्रांति की, एक बड़े बदलाव की, जो इनको जड़मूल से समाप्त करने की सामर्थ्य रखता हो।

जहाँ तक शोषित और दलित वर्ग की समस्याओं का प्रश्न है, वह आज से पहले तक लगभग सामाजिक स्तर की थीं, लेकिन अपने युग तक आते-आते, जबकि हम स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके हैं और हमने अपने संविधान में मानव-अधिकारों की समानता को सिद्धांततः स्वीकार कर लिया है, यह समस्या सामाजिक स्तर से आगे बढ़कर मनोवैज्ञानिक हुई और अब राजनीतिक भी हो गई है।

दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान राजनीति के हथकंडों ने इन समस्याओं को जितना सुलझाया नहीं है, उतना उलझा दिया है। यह उलझाव सामाजिक भी है और मनोवैज्ञानिक भी। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम इनके समाधान के लिए पिछली एक शताब्दी से जो दृष्टिकोण अपनाए हुए हैं, वह भी सुधारवादी ढंग का है। इन समस्याओं का समाधान सुधारवादी दर्शन से संभव नहीं है। मानव-शोषण का लंबा इतिहास यह तो बताता है कि आर्थिक कारणों ने समाज में विभिन्न वर्गों को जन्म दिया था। उत्पादन के रिश्तों ने समाज को एक विशेष स्वरूप किया, जिसमें उत्पादन का साधन रखने वाला श्रेष्ठ और अपने श्रम से उत्पादन करने वाला निम्न ठहराया गया। यह मानकर भी आर्थिक विषमताओं से जुड़ी हुई इस समस्या को हम सुधारवादी तरीके से हल करने निकले हैं तो विश्वास नहीं होता कि हम अपने लक्ष्य पर पहुंच भी सकते हैं।

यहीं पर एक और वास्तविकता की ओर इशारा करना भी आवश्यक है। दलित वर्गों में जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ हो चुके हैं और अपने वर्ग के स्तर से निकलकर साधन-संपन्न वर्गों में जा मिले हैं, शोषण करने वालों में बराबर के हिस्सेदार हो गए हैं। ऐसे सभी लोग आज शोषित वर्गों के सदस्य नहीं, शोषण-कर्ताओं की श्रेणी में बैठे हैं। ऐसे लोगों की गिनती काफी लंबी हो सकती है। ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा केवल इसलिए हुआ कि हमने दलित वर्गों के उद्धार का जो कार्यक्रम बनाया, वह सामूहिक इतना नहीं था, जितना व्यक्तिगत था। इस पृष्ठभूमि में स्वाभाविक रूप से यही होना था कि जो व्यक्तिगत साहस अथवा योग्यताएं रखते थे, वे आगे बढ़े और पीछे रह जाने वालों से बेखबर हो गए। स्पष्टतः ऐसे सभी लोगों को हम शोषित वर्ग की सूची में नहीं रख सकते, भले ही वे शोषित वर्ग से निकलकर आए हों। यह वास्तविकता इस बात को भी सिद्ध कर देती है कि समाज में वर्गों की समस्या आर्थिक है, धार्मिक या नैतिक स्तर की नहीं है।

एक कठिनाई यह भी है कि हम जिस सामाजिक व्यवस्था में जी रहे हैं, उसकी सीमाएं अभी तक वहीं हैं, जो आज से बहुत पहले थीं। बहुत क्रांतिकारी, बहुत प्रगतिशील बनने पर भी हम अपनी सुख-सुविधा के लिए निर्बल लोगों की मेहनत का शोषण करने का मोह त्याग पाने के लिए तैयार नहीं हैं। हम व्यवहारतः शोषित वर्गों के इस संघर्ष को भी सहन करने के लिए प्रस्तुत नहीं हैं, जो हमसे दूसरों के श्रम का शोषण करने का अधिकार छीनता हो। हम ऐसे किसी संघर्ष को पनपने देने या सफल होने की अनुमति नहीं देना चाहते। हम चाहते हैं कि पैदावार के समस्त साधनों पर हमारा अधिकार बना रहे और हम मानव-शक्ति की अतिरिक्त मेहनत का फल स्वयं भोगते रहें। ऐसे समाज के परिवर्तन का उत्तरदायित्व पूरी तरह उन्हीं वर्गों पर आ पड़ता है, जो कुचले हुए हैं, दलित हैं, शोषित हैं।

ठुकराये हुए लोग विषय पर लिखी गई कहानियों का संकलन करते हुए मेरी अंतरात्मा बार-बार मुझसे यही पूछती थी कि क्या साहित्य के माध्यम से समाज के इस कोढ़ का उपचार संभव है ? क्या क़लम में इतनी ताक़त है कि वह कुरीतियों, रूढ़ियों और ग़लत परंपराओं की कटीली झाड़ियों को साफ करने में सार्थक हो ? क्या कवि, साहित्यकार, कहानीकार या कला के किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला यह दावा कर सकता है कि वह समाज के अंदर पनपते हुए इस बहुत पुराने नासूर का इलाज शब्दों के द्वारा करने में सफल हो सकता है ? जो उत्तर मुझे मिला वह यह था कि साहित्य पूरी तरह समाज-सुधारक की भूमिका नहीं निभा सकता।

साहित्य तो रोगी को उसके रोग का अहसास दिला सकता है और इस प्रकार उसके उचित उपचार के लिए प्रेरित कर सकता है। इतना भी हो तो मैं समझता हूं कि साहित्यकार और साहित्य ने अपना कर्तव्य पूरा किया। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि हम साहित्य से इतनी आशा अवश्य रख सकते हैं कि उसके माध्यम से यथास्थिति में जीवन व्यतीत करने वाले असंख्य लोग अपनी वर्तमान परिस्थितियों से असंतुष्ट हों और असंतोष उन्हें ऐसी तमाम श्रृंखलाओं को तोड़ने पर विवश करे जो शताब्दियों से उनके पैरों में पड़ी हुई हैं।

मैं समझता हूं कि इस संकलन की कहानियाँ यदि यथास्थिति से उबरने और उस मार्ग को खोजने के लिए हम सबको तैयार करें, जहां आदमी और आदमी के बीच कोई फासला नहीं है तो यह सामाजिक क्रांति की दिशा में एक बड़ा योगदान होगा।

एक और अन्त


टुनरा पहले भट्टी पर रोज नहीं जाता था, कभी-कभी दोस्तों-यारों के कहने पर ही जाता था। तब उसे गांजा पीने की बेहद लत थी। दारू के नशे को वह गांजा के नशे के आगे कुछ मानता ही नहीं था। सुमनी के बार-बार कहने पर भी वह अपने गंजेडी स्वभाव को नहीं बदल पाया था। हर रोज, जब वह शाम को फाटक में रिक्शा जमा करके घर आता, सुमनी उस पर खीजती। तेजाब-सी बातें कहती, जब उसका मुंह महकता और आँखें लाल होतीं; लेकिन टुनरा पर कोई प्रभाव नहीं।
अब तो खैर, सांझ फाटक में रिक्शा जमा करके सीधे नावादा की भट्ठी में जा घुसता है। छककर पीता है। तब तक पीता है, जब तक उसके होशोहवास गुम नहीं हो जाते। और तब उसे यह नहीं पता कि वह वहीं जूठे चुक्कड़ों को चखना के फेंके हुए जूठे पत्तों के बीच पसर जाता है। उसके दोस्त-मित्र उसे संभालकर घर ले जाते हैं या वहीं पड़ा रहता है। रात में भट्ठी वाला भट्ठी बन्द करने से पहले कुत्ते की तरह उसे पैर से हुलकवाता है। नहीं उठता तो दो बाल्टी पानी उसके सिर और अधनंगे बदन पर फेंकवाता है। अगर इससे भी कुछ नहीं होता, तब दो-तीन आदमियों से उसे टंगवाकर सड़क के किनारे बोरे की तरह डलवा देता है-‘‘सरवा रोज एहीजे पड़ जाला, जैसे एकर बाप की जमींदारी होखे इहां।’’

आज तो टुनरा की नींद बिल्कुल सुबह में ही खुली थी। ट्रक का खलासी उसे झकझोरकर उठा रहा था। उठकर खड़ा हुआ। सड़क पर एक तरफ एक ट्रक खड़ा था और दूसरी तरफ एक बस खड़ी थी। पों-पों, चांय-चांय दोनों हार्न बजा रहे थे। रास्ता काटने के लिए खलासी उसे उठा रहा था। टुनरा के उठ खड़ा होते ही सरदार ट्रक आगे बढ़ाता हुआ कह रहा था- ‘‘ओय, बे-औरत के आदमी है क्या ?’’ टुनरा को बहुत बुरा लगा। लेकिन चुप रह गया। सुबह की उमस भरी ठहरी हुई हवा में बस और ट्रक काफी ऊपर तक धूल टांगकर निकल गये, घर्र-घर्र करते।
टुनरा ने इधर-उधर अपने गमछे के लिए देखा। भट्टी के दरवाजे में गमछा खोंसा हुआ था। पूरा शरीर धूल से सन गया था। गमछा लेकर और गंजी निकालकर उसने बदन झाड़ा। धोती का फेंटा खोलकर उसे भी झा़ड़ लिया और फिर पछुआ खोंसकर घुटने तक धोती पहन ली उसने। यह गमछा और धोती दोनों उसने पटना में स्टेशन के पास फुटपाथ की दुकान पर से खरीदे थे, जब वह नन्हुआ को खोजने पटना गया था। दोनों ही बिल्कुल नये थे।

पूरी तरह सुबह हो आई थी। लोग सड़क पर आने-जाने लगे थे। एक आदमी को हाथ में घडी बांधे आते हुए देखकर उसने समय पूछा। साढे छः हो रहे थे। मन में हल्की चोट-सी लगी। तूफान एक्सप्रेस और पंजाब मेल की सवारियाँ हाथ से निकल गयीं। लेकिन अब वह पहले की तरह नहीं मरता, इन सब बातों के लिए। अब सुमनी भी नहीं, नन्हुआ भी नहीं। अकेला पेट के लिए कौन मरे साला ! अब क्या बचा है कि जान देनी है ? अपने लिए ? हुत् !
वह जल्दी-जल्दी स्टेशन की ओर लपकने लगा। रेलवे लाइन के उस पार दिशा-मैदान होकर स्टेशन पर चाय पी लेगा, तब रिक्शा निकालेगा। अब तो शटल की सवारियां ही मिलेंगी। वह जल्दी-जल्दी लपक रहा था। देखा, स्टेशन की तरफ से रिक्शों और टमटमों का रेला आ रहा था, सवारियों को लादे हुए। महेशरा दो औरतों को उनके सामान के साथ लादे रिक्शे को खींचे आ रहा था। टुनरा ने पूछा, ‘‘कौन गाड़ी है, महेसर ?’’

‘पंजाब ! तू रेक्सा ना निकालऽ हा का ?
‘‘ना...पंजाब लेट रहे का ?’’ टुनरा ने आगे निकलते हुए महेसरा से ऊंची आवाज में पूछा।
‘‘हाँ !’’ महेसरा ने भी दीर्घ स्वर में कहा।
फर-फराहित होकर और स्टेशन पर चाय पीकर टुनरा सीधे फटक पर पहुंचा। फाटक में ताला बंद था। उसने झांकर भीतर देखा, टूटे हुए एक रिक्शा को छोड़कर सभी रिक्शे निकल चुके थे। मन उदास हो गया। सड़क पर आया तब बंधुजी तिवारी की चाय-दुकान के बाहर बेंच पर बैठे हुए दिखाई पड़े। रोज की तरह धुला हुआ खादी का कुर्ता-पाजामा पहने थे और गांधी-टोपी सिर पर रखे हुए थे। टुनरा को अपनी तरफ आते हुए देख रहे थे। जाकर टुनरा उनसे बोला,
‘‘मालिक, सब रेक्सवा दे देनी हां ? एगो हमरा के न रखनी हां ?’’
‘‘दे देनी, तोर पता रहता आजकल कि कौन दुनिया में ते रहे तड़े। कहां रहत छौ-सात दिन से ?’’

टुनरा पैर के अंगूठे से जमीन कोड़ता हुआ बिना उसकी तरफ देखे बोला, ‘‘का कही कि कहां रही !’’ बंधुजी ने उसको ऊपर-नीचे घूर कर देखा, ‘‘आ ई नया गंजी आ नया गमछा से त लागतड़े कि एकदम...‘ससुररिये से आवतड़े’ ’’ कहते-कहते वे रुक गये। फिर बोले, ‘‘बीच में कौनों दोसर काम के चक्कर में पड़ गइले हा का ?’’
‘‘ना, हमनी से का दोसर काम होई, रेक्शा चलावल छोड़ के।’’
‘‘दोसरा को रिक्शा चलावे के मिल गइल रहऊ का ?’’
‘‘ना, देखनी हा हमरा के कहीं छौ-सात दिन से ?’’
‘‘कहां रहस इतना दिन तब ?’’
‘‘नन्हुआ के जोहे के फेरा में रहीं।’’
‘‘हाँ रे, नन्हुआ मिलल कहीं ?’’
‘‘ना’’, टुनरा ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। मन उसका भारी हो आया।
‘‘आ जाये दीहीं बंधुजी, ना भेंटाइल त टुनरा के मौजे नु बा। अकेला जीव बा अपना खाई-पीही रंग काटी। कि ना रे टुनरा ?’’ तिवारी ने व्यंग्य किया। टुनरा के मन में आया कि कहे, ‘‘हं हो तिवारी, तोहार बेटा भुलाइत तब नु पता चलित कि बाप के करेजा कईसन करेला।’’ लेकिन चुप रहा। ज्यादा बोलने की इच्छा नहीं हो रही थी। बंधुजी से बोला, ‘‘हऊ रेक्सवा पड़ल बा तौन देब ?’’

‘‘ले जइबे त ले जो। अगिला चक्का पंचर बा आ टाल बा। बनवा के चलाव, हमरा का इतराज बा। हमरा त भाड़ा से काम बा।’’
‘‘आऊर कुछ नइखे नु बिगड़ल ?’’
‘‘आऊर कुछ ना बिगड़ल होखे के चाही, चल देख ले चलीं ?’’
‘‘चलीं।’’
फाटक से रिक्शा निकालकर टुनरा महबूब मियां की दुकान पर रिक्शा मरम्मत कराने नहीं गया। थाना के सामने वाली दुकान चला गया। महबूब मियां की दुकान पर अब उसे खड़ा होने की हिम्मत भी नहीं होगी। नन्हुआ की याद के दर्द को वह कैसे बांध पायेगा। महबूब मियां की दुकान की तरफ गर्दन मोड़कर देख-भर लिया। करीब नन्हुआ की उम्र का ही एक छोकरा साइकिल में हवा भर रहा था। नन्हुआ की जगह अब उसने ले ली थी। मबबूब मियाँ को क्या फिकर है नन्हुआ के लिए ?

न जाने क्यों, आज सुबह से ही टुनरा को बार-बार सुमनी की याद आ रही थी। नन्हुआ की उतनी नहीं। सुमनी का चेहरा बार-बार उसकी आँखों के आगे उभर आता। कभी शादी से पहले की सुमनी का भोला-भाला खिलखिलाता चेहरा, कभी शादी के बाद का गंभीर चेहरा, कभी नन्हुआ को गोद में लिए आंसुओं से भरा चेहरा और ...और कभी ढिबरी की टिमटिमाती रोशनी में घुट-घुटकर दम तोड़ता हुआ उसका भयानक और आखिरी चेहरा। सब दिन देखे थे सुमनी टुनरा के साथ। थोड़े-से दिनों में ही कैसा नाटक उन दोनों ने मिलकर खेला, और खत्म हो ही गया सब कुछ ...
रिक्शा ठीक हो गया तब टुनरा ने गद्दी को हाथ से इधर-उधर ठोंका। कंधे पर गमछा उतारकर झाड़ा और पैडल मारता हुआ सीधे चौक चला आया। अब तो शटल और फर्स्ट पसींजर की सवारियों का समय भी निकल चुका था। सेकंड पसींजर की सवारियां ही मिलेंगी। टुनरा रिक्शे को आगे-पीछे रेंगता हुआ चिल्लाने लगा, ‘‘चलिए टेसन ! टेसन, टेसन ! टीर्रन...टीर्रन...आइए बाबू, टेसन चलेंगे ?...टेसन....टेसन !...’’

चिल्लाते-चिल्लाते एक बार फिर सुमनी ने उसकी आँखों में कहीं से झांका...
हां, नाटक की शुरूआत सुमनी के साथ उसकी भेंट से ही शुरू हुई थी। सुमनी पहली ही नजर में उसे भा गयी थी। कद थोड़ा छोटा था सुमनी का, लेकिन सुन्दर थी। गोरी थी, नाक-नक्श तीखे थे और देहयष्टि आकर्षक थी। टुनरा के दिमाग में यह बात कभी आयी ही नहीं कि सुमनी चमरटोली की है। वह तो जैसे मंत्र मुग्ध हो गया था, बस ! तब टुनरा की सारी दुनिया सुमनी के गोरे आकार में सिमट आयी थी।
कुछ ही दिनों में उसने सुमनी से बातचीत बढ़ा ली थी।

एक दिन टुनरा ने चिट्ठी में उसे रात में नल पर आने के लिए कहा। उस दिन शाम होते-होते सुमनी के पैर से ठोकर लगकर पानी से भरा घड़ा जमीन पर लुढ़क गया। पानी भरने वह नल पर आयी थी। स्ट्रीट लाइट की रोशनी रो रही थी। सुमनी की आँखें टुनरा के रास्ते पर टिकी थीं। टुनरा ने आकर उसकी हथेली पर लाल कागज में लिपटा एक जोड़ा छागल रख दिया था। ‘‘खोल के देख एमें का बा।’’
सुमनी ने कागज कांपते हाथों खोला। स्ट्रीट लाईट की मद्धिम रोशनी में चांदी के सफेद दाने चमके। वह तो हाथ में पड़ते ही समझ गयी थी कि इसमें क्या है। उसने घड़ी भर टुनरा को देखा और अगल-बगल देखकर कागज सहित छागल ब्लाउज में डालकर साड़ी
ठीक कर ली। कुछ बोली नहीं। टुनरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने बलात् अपना हाथ छुड़ा कर घड़ा-बाल्टी उठा लिए। ‘‘छोड़ऽ, कोई आ जाई।’’

टुनरा को खुद ही पूरी तरह नहीं याद कि सुमनी के साथ आखिर कब तक उसका बाहरी संबंध चलता रहा था, और कब से शुरू हुआ था। लेकिन एकाध साल इस तरह जरुर बीते होंगे जब चमरटोली से एकाएक सुमनी गायब हो गयी। काफी हंगामा उठ खड़ा हुआ था चमरटोली में। दो-चार दिन बाद भी जब टुनरा घर नहीं लौटा, तब पता चला कि वह भी उसी दिन से गायब है जिस दिन से सुमनी।

टुनरा के मा-बाप थे नहीं। एक बड़ा भाई था, जो कलकत्ता गया तो दस वर्ष से फिर वापस नहीं आया। दूर की एक मौसी थी उसके मोहल्ले में। टुनरा उसी के साथ रहता था। अपनी कमाई भी उसी को देता था। टुनरा के भी भागने की बात का पता चलने पर चमरटोली के आठ-दस आदमी जुट गये थे-‘‘अगर पता चल जाई बुढ़िया कि तोर लौंडा के साथ सुमनी भागल बीया, त तोर आ तोर लौंडा के गुड़िया-गुड़िया कर देब जा।’’
और बुढ़िया टूट पड़ी थी-‘‘आ जा लोग होने ! जहिया पता चल जाई कि टुनरा चमनई जोरे भागल बा ओह दिन हम हंसुआ से ओकर गर्दन सबके सामने अपना दुआरी पर उतार देब।’’

‘‘आछा, हमनी के पता लगावतनी नुं। पता लाग जाई त साले कहांर लोगन के एकेक गो घर लहका देब जा।’’
कहांर के दो-चार घर गली में जुट गये थे चमर टोली वाले भाला-बर्छे निकाल ले आये। माधो बाबू और तिरभूवन के बीच-बचाव से स्थिति संभली। लेकिन रोज सुबह के वक्त माधो बाबू के नल पर आठ-दस आदमी लेकर सुमनी का बाबू चिल्लाता, ‘‘महल्ला लहका देब साले तू लोग देखा ता अभी....’’
टुनरा के रिक्शे पर एक आदमी आकर बैठ गया। वह चिल्ला रहा था, ‘‘चलिए, एक आदमी टेसन। टेसन-टेसन...बस एक सवारी और...आइये एक आदमी...!’’ टीर्रन, टीर्रन...ट्रैफिक के सिपाही ने हल्के-से एक रूल जमा दिया उसकी पीठ पर ‘‘साला बढ़ा आगे। ‘‘कबसे एक आदमी-एक आदमी’ कर रहा है।’’ टुनरा रिक्शा पांच कदम आगे ले जाकर आगे पीछे करने लगा,’’ चलिए बाबू टेसन, एक आदमी ! एक आदमी टेसन !...’’

कई महीने बाद टुनरा दिखाई पड़ा-घनी मूछों और बेतरतीब ढंग से बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ। बंधुजी का रिक्शा चला रहा था। तरी मुहल्ला में झूलन बाबू के मकान के नीचे नाली के बगल वाली छोटी-सी अंधेरी कोठरी उसने ले रक्खी थी। सुमनी दरवाजा बन्द किये भीतर रहती। छः-सात दिनों में मुहल्ले के किसी औरत, मर्द या बच्चे ने उसकी सूरत भी नहीं देखी थी। रात के दो तीन बजे वह पोखर पर से वह हो आती।
हफ्ता भर बीतते-बीतते आखिर पूरी चमरटोली झूलन बाबू के मकान के पास पहुँच गई लाठी-बर्छे के साथ। टुनरा की मौसी को चमरटोली की एक जवान लड़की बाहर खींच लायी। गली में ही आठ-दस औरतें उस पर हाथ और कुहनियां बरसाने लगीं। झोंटा, साड़ी और कपड़े नोचने लगीं। सुमनी की माई और बहन तो उसकी छाती में मुक्के और कुहनी धब-धब मार रही थीं।

मुहल्ले में कहांरों के नाम से कोई टोली नहीं है। कहांर के चार पांच घर ही हैं। दूसरे-दूसरे मुहल्ले से पता नहीं कैसे बिजली की तरह कहांर की औरतें गली में जुट गयीं। झोंटा-झोंटौवल काफी देर तक चलता रहा। लोग उन्हें छुड़ाने में असफल रह गये थे। बाकी औरतें अपने-अपने ओसरों, चौखटों और छतों पर आँखे फाड़े और छाती पर हाथ रखे खड़ी थीं।
कुछ देर बाद दोनों दल अलग-अलग होकर गालियाँ बक रहे थे। सुमनी की माई तो एकदम साड़ी का पछुआ खोंसकर सबके सामने ताल ठोंक रही थी, ‘‘सुमनी के त हम घठियाइए देब, तनी कहांरिन के इ लौंड़ा सामने पड़े तब पता चले...’’ तीन चार घंटों तक दोनों दल सड़ी-सड़ी गालियों की बौछार करते रहे।

उधर झूलन बाबू के मकान के पास चमरटोली के सब मर्द बैठे हुए थे हथियार लिए हुए। टुनरा को शायद खटका मिल गया था। उनके हाथ वह लगा ही नहीं। सुमनी के घर की दो-चार औरतें आकर जोर जबर्दस्ती दरवाजा खोलाकर उसका झोंटा खींचते हुए घर ले गयीं। झूलन बाबू को चेता दिया कि उनके साथ भी हिसाब-किताब समझ लिया जायेगा। वे चुपचाप कांपते हुए खड़े थे।

टुनरा को एक सवारी और मिल गई। चिल्लाना उसका बन्द हुआ। रिक्शा स्टेशन की तरफ खींचने लगा....

झगड़े का यह माजरा दो-चार दिन और रहा। मुहल्ले का वातावरण भारी बना रहा। सुमनी के पेट में टुनरा का बच्चा रह गया था। औरतों ने जी भर कर उसे मारा और झोंटा नोच कर गली में धकेल दिया।
हफ्ते भर के अन्दर सबने देखा टुनरा सुमनी को लेकर अपनी मौसी के घर में रहने लगा था। उसकी मौसी ने दो में से एक कोठरी दोनों के लिए बिल्कुल अलग कर दी थी। टुनरा ने अपना चूल्हा-चक्की ओसारे में एक तरफ कर लिया था। उसकी मौसी भी क्या करती। टुनरा को नहीं रखती तो पेट कौन भरता। मुहल्ले की किसी औरत को कभी तेल मालिश करने और बैना फेरने से कितना मिलता जो गुजारा हो पाता।

लेकिन टुनरा की कमाई ज्यादा और असली हकदार घर में आ गयी थी। सुमनी धीरे-धीरे अपनी जबान चलाने लगी थी। झंझट और मुंहाठूठी टुनरा की मौसी और उसके बीच खूब होती। असल में टुनरा की मौसी ही दिन-रात सुमनी को ‘करिखाही, चमईन-चमईन’ करती रहती। सुमनी कितना चुप रहती। उसकी भी जबान थोड़े दिनों में कैंचियों की तरह चलने लगी थी।
एक दिन तो सुमनी ने गुस्से में आकर ओसारे में टंगे हुए मौसी के सारे कपड़ों को, चौकी को और तुलसी के चौतरे पर रक्खे लोटे को छू दिया। अब तो समझिए कि टुनरा की मौसी के देह में आग ही लग गयी। बुढ़िया ने एकदम सुमनी का झोंटा पकड़कर जमीन पर पटक ही तो दिया था उसे। और उसके ऊपर चढ़ बैठी थी ‘‘तोरे ई मजाल हरामखोर, ससुरी , चमईन !... हरामजादी तोर मतारी के...गोर बाडे त अपने के बाभिनी समझतरे !....करिखाही, हरामजादी...’’ सुमनी के पेट में जोर का दर्द होने लगा था वह किसी तरह अपने को छुड़ाकर रोती हुई कोठरी में चली गयी थी।



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