इन्द्रधनुष क्षितिज के - भगवान अटलानी Indradhanush Kshitij Ke - Hindi book by - Bhagwan Atlani
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इन्द्रधनुष क्षितिज के

भगवान अटलानी

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1989
पृष्ठ :231
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1587
आईएसबीएन :00000

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भगवान अटलानी का उपन्यास ‘इन्द्रधनुष क्षितिज के’ कोरामिन के इन्जेक्शन लगाकर डूबती साँसों को पुनर्जीवित करने की साजिश का लैंडस्केप है।

Indradhanush Kshitij Ke

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज़ादी के बाद हमारे देश की राजनीति का मुखौटा किस तरह विकृत हुआ है इसकी सिलसिलेवा पड़ताल आज की महती आवश्यकता है। गिरते हुए मानदण्डों ने देश को पतन के भयानक कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिन आदर्शों के साथ राष्ट्र ने अपने पाँव पावों पर चलना शुरू कर दिया था, राजनीति ने उन पर धूल की अनगिनत पर्तें चढ़ा दी हैं। शिक्षा नीति हो, राजनीति हो और चाहे धर्म की गुत्थी; भौतिक समृद्धि के प्रति भूख जगाने की दुरभिसंधि हो, या शासन व शासित के बीच दूरियाँ बढा़ता कुटिल कुचक्र; नागफनी के जंगल, धैर्य को संत्रास की सीमाओं तक जकड़ने लगे हैं। क्षितिज पर अटके इन्द्रधनुष दिखाकर एक व्यूह का निर्माण होता है जिसमें अनेक आशाओं के साथ प्रवेश करना, उलझना और जूझना देशवाशियों की नियति हो गई है। भगवान अटलानी का उपन्यास ‘इन्द्रधनुष क्षितिज के’ कोरामिन के इन्जेक्शन लगाकर डूबती साँसों को पुनर्जीवित करने की साजिश का लैंडस्केप है।

उपन्यास से पहले

जिन सपनों की पूर्ति के लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी, वे सपने सिसक रहे हैं जिन आदर्शों को ताकते हुए लाठियाँ और गोलियाँ खायी गयीं, वे आदर्श मुँह चिढ़ा रहे हैं। आगे बढ़ना तो दूर रहा, हम पीछे खिसकते-खिसकते जिस ढलान पर उतर आये हैं, वह इतनी तीखी ढ़लान है कि सँभलना दुष्कर हो गया है। प्रगति करना और अधोगति को प्राप्त करना दो अलग-अलग परिणतियाँ हैं। हम 1947 में खड़े रह जाते तब भी शायद इतना बुरा नहीं होता किन्तु नैतिक मूल्यों की बलि देकर हम निरन्तर क्षुद्रता की ओर अग्रसर होते गये हैं।

प्रत्येक विचारवान व्यक्ति पीड़ित है। जनता है कि हम लगातार तेज़ी से पीछे जा रहे हैं। धनबल न सही आत्मबल तो हमारे पास था अब वह भी हमसे छूटता जा रहा है। जन सामान्य के सोच में बड़ी रेखा खींचकर सुस्थापित रेखा को छोटा करने की धारणा जड़ें खो रही है। भौतिक लाल-साएँ इस गति से बढी़ हैं कि व्यक्ति लूट पर उतारू हो गया है। जो कुछ है उसी में परिष्कार करते हुए नये को जोड़ने के स्थान पर हम पुराने को अवमानना की दृष्टि से देखने लगे हैं। इस प्रक्रिया में पुराने पर हमारी पकड़ क्षीण हो गई है जबकि नया हमारी पकड़ में नहीं आ रहा है। हमारी स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी हो गयी है।
शिक्षित-अशिक्षित, धनिक-निर्धन, विद्वान-मूर्ख, सामान्य-असामान्य किसी से भी देश की वर्तमान अवस्था पर बात शुरू करने की देर है, महसूस होता है कि मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया गया है।

असन्तोष, असन्तोष और असन्तोष। जैसे खून की जगह देश की शिराओं और धमनियों में असन्तोष बह रहा है। उदाहरण देते थकते नहीं हैं लोग। जो जहाँ है, वहीं के अछूते, स्वयं अनुभूत चुभते उदाहरण। चाहें तो पृष्ठों पर पृष्ठ भरते चले जायें। आश्वासनों की लहलहाती  फसल हर समस्या को फुसलाती रहती है। समस्याएँ केवल उनकी सुलझती हैं जो समर्थ हैं। कानून बनाता है, निर्बल उसका पालन करता है।
किसी प्रबुद्ध विचारक से बात की जाये तो वर्तमान अवस्था में सुधार के लिए उसकी दृष्टि तुरन्त किसी अन्य देश की तरफ उठ जाती है। वहाँ का ढाँचा चाहे अपनी समस्याओं से जूझ रहा हो किन्तु अपनी समस्याओं का निवारण उसे वहीं के ढाँचे में नज़र आता है। आस्थाओं के केन्द्र जो-जो देश हैं, उनमें प्रचलित प्रणालियों को मथकर एक नीति तय कर सकें इतनी सहिष्णुता किसी में नहीं होती। हर एक के सुझाये प्रयोगों में से देश को गुजारा जाये तो हजारों वर्षों में भी सही राह मिल पायेगी, सन्देह का विषय है। निश्चित है कि इस अवधि में बायें-दायें सब प्रयोगों से गुजरने के बाद देश की स्थिति आज के मुकाबले कई गुना बदतर हो जायेगी।

दुरवस्था पर धाराप्रवाह बोलने में सक्षम किसी सामान्य समझ के आदमी से समस्याओं के हल की चर्चा करने पर स्थिति और भी विकट हो जाती है। समाधान की बात करते-करते वह पलट-पलटकर बिगड़ती स्थितियों पर आ जाता है। सीधा पूछने पर कोई भी उत्तर नहीं होता। समस्या-समाधान का प्रश्न उन्हीं लोगों को सौंपकर कि जिन्होंने इसे सुलझाया है, दुबकने की कोशिश में जुट जाता है। वह भोगता है, महसूस करता है, शिकायतें करता है किन्तु सटीक समाधान अपरिहार्य होता है। कैसी विचित्र बात है कि सब जानते हैं, स्थितियाँ बहुत खराब हैं फिर भी सुधार का कोई उपाय किसी के पास नहीं है।

यही कारण है कि गरीबी हटाओ का गला फाड़कर लगाया गया नारा भी हमें आशा की दूधिया रोशनी में नहलाने लगता है। समस्याओं से बाहर निकलने की दृष्टि से थोड़ा-सा विश्वसनीयता भी कहीं कुछ नजर आ जाता है तो हम लट्टू हो जाते हैं। क्योंकि वह प्रपंच किया ही बहलाने और बहकाने के लिए जाता है। इसीलिए जब लोग दहाड़ें मारकर रोते हैं, योजना बनानेवाले ठहाके लगाकर हँसते रहते हैं। चूसनी मुंह में आते ही शहद के भ्रम में हमारा रूदन रुक जाता है। रुदन और बहलाव, सहारा देकर उठाने और जोर से धक्का मारकर-गिरा देने का यह सिलसिला खुद-ब-खुद हमारी असफलता की कहानी कहता है।

ज़रूरत है इमानदारी से मिल-बैठकर, विचार करके समाधान ढूँढ़ने की। अधोगति का दौर किसी तरह रोककर विकास के अवरुद्ध मार्गों को फिर खोलना होगा। राजनेताओं से अपेक्षा करना फ़िजूल है। चिन्तक, विचारक, प्रबुद्धजन सभी आग्रह छोड़कर जब इस काम में गम्भीरता से जुटेंगे नहीं, हल नहीं मिलेगा। बुद्धि को शारीरिक शक्ति पर प्रभुत्व स्थापित करना होगा। जो कुछ है उसे छोड़कर नहीं, उसे जोड़कर हमें पतन की खाई को पाटना होगा। हजारों वर्षों की बुद्धि और कौशल की थाती होते हुए हम स्वयं को कंकाल मानकर निरीहतापूर्वक दूसरों की ओर देखते रहें तो पतन की रफ्तार तीव्रतर ही होगी, रूकेगी नहीं।

‘इन्द्रधनुष क्षितिज के’ में पतन के जिम्मेदार सब कारणों का विश्लेषण करते हुए आज की राजनीति के चेहरे पर खड़ी मखमली नकाब हटाने की कोशिश की गई है। नकाब हटाने के बाद जो दागदार चेहरा हमारे सामने उजागर होता है वह सीमा तक हमें सतर्क करता है, उस सीमा की माप-जोख ही इस उपन्यास का देय होगी।
भगवान अटलानी



चुनाओं की घोषणा करते समय सुमन्त जी ने सपने में भी जिस बात की कल्पना नहीं की थी, वही हो रही थी। चालीस वर्षों से लगातार वे सत्ता की कुर्सी पर हैं। पहले मन्त्री और फिर राष्ट्राध्यक्ष के रूप में शतरंज की अनेक अकल्पित, असम्भावित, विचित्र चालें चलते हुए सुमन्त जी आज तक विजयी होते रहे हैं। विजय ने उनमें इतना आत्मविश्वास पैदा किया है कि वे हर तरह का खतरा उठाकर बाजी लगाते हैं। पैंतरे चलते हैं, जोड़-तोड़ बैठाते हैं। नाटक, अभिनय करते हैं। रुपया-पैसा, साधन-सुविधाएँ लुटाते हैं शराब, शरीर कोई भी चीज उन्हें विजय की ओर बढ़ने को दिशा में त्याज्य नहीं लगती। उनकी सम्पूर्ण शक्तियाँ मछली की आँख को देखने की अभ्यस्त हैं। उस आँख को भेदने के लिए क्या करना है, क्या करना चाहिए, क्या करना वांछित है, इससे उन्होंने कभी भेद नहीं किया है। इसलिए चुनावों की समय पूर्व घोषणा से पहले उन्होंने सभी स्त्रोतों से आकलन कराया था। गुप्तचर ढ़ाचे को सँभालने वाली तीनों एजेंसिया उनका मन्त्रिमण्डल, पार्टी के कार्यकर्ता, सबको विश्वास था कि चुनाव जीतने की दृष्टि से यह समय बहुत उपयुक्त है। पूरी तरह आश्वस्त हो जाने के बाद सुमन्त जी ने जो फैसला किया था, उसकी चूलें हिलती नजर आ रही थीं।

सत्ता के प्रारम्भिक कार्यकाल को छोड़कर उनकी आस्था कभी साधनों की पवित्रता में नहीं रही है प्रारम्भ में स्थितियाँ अलग थीं। देश आजाद हुआ ही था। आजादी के लिए किए गए समस्त प्रयत्न, समस्त त्याग और बलिदान आदर्श के ज्वलन्त बिन्दुओं की तरह सामने रहते थे। देश को विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ाने का संकल्प,उत्सुकता और लगन वाकावरण के कण-कण में महकता था। देश को गुलामी से मुक्ति मिली है। इसलिए स्थितियाँ बदल जाएँगी। ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब के बीच दीवारें नहीं रहेंगी। कोई बेरोजगार नहीं रहेगा। आर्थिक, सामाजिक प्रताड़ना का सामना नहीं रहेंगी। कोई बेरोजगार नहीं रहेगा। सबको आर्थिक न्याय मिलेगा। दुखों की सदियाँ बीत गईं, अब सुख के बादल बरसेंगे और जन-जन को तृप्त कर जायेंगे। हर ओर ऐसा उत्साह था, जिसमें किसी को अपने बारे में सोचने की सुधि नहीं थी। आदर्श थे, देश का विकास था, देश की प्रतिष्ठा और प्रगति थी, बस। उस माहौल में उच्चतर साध्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर साधन अपनाने की बात किसी को कल्पना में भी नहीं आती थी।

पहले चुनावों में इस बात की होड़ रही थी कि कौन कम-से-कम खर्चे में चुनाव लड़ता है। भाषा, जाति, सम्प्रदाय के आधार पर वोट लेने की बात किसी के मस्तिष्क में नहीं थी। उपयुक्त उम्मीदवार जीतना चाहिए, विरोधी उम्मीदवार भी चुनाव इसी भावना से लड़ रहे थे। पार्टी की और अपनी योजनाओं व कार्यक्रमों की चर्चा होती थी। कोई भी उम्मीदवार विरोधी के निजी जीवन को उधेड़ने की चेष्ठा नहीं करता था। नेता के कार्यक्रमों को, पार्टी की घोषित नीतियों को, उम्मीदवार की योग्यताओं, उसके सरोकारों को ध्यान में रखकर मतदाता वोट देते थे। सुविधाएँ, शराब, रुपये, जाति, बिरादरी, पद, नाम, प्रतिष्ठा मतदान को प्रभावित नहीं करते थे। जब अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर देशहित सर्वोपरि बन जाये तो साधनों की अपवित्रता की बात कौन सोच सकता है ?

सुमन्त जी युवा और मेधावी वकील थे। गुलामी, गुलामी का माहौल, आजादी की अहिंसक लड़ाई देख चुके थे। उस उम्र के दौर में देश के लिए जितनी सक्रियता सम्भव थी, सुमन्त जी ने दिखाई थी। आन्दोलनों में भाग लेते रहे थे। इतनी कम उम्र में भी जेल हो आये थे। पढ़े-लिखे, समझदार, समर्पित पार्टी कार्यकर्ता होने के नाते उन्हें चुनावों में प्रत्याशी बनाया गया था। उनकी पार्टी की साख बहुत जबरदस्त थी। उनकी पार्टी ने देश को आजादी दिलाई है, उनकी पार्टी ही देश का हित साध सकती है, सामान्य आदमी के मन में यह विश्वास था कि। परिणामतः वे भी जीते और उनकी पार्टी भी।
 पहली-पहली सरकार में ही उन्हें मन्त्री बनाया गया। देश को आगे बढ़ाने का अदम्य उत्साह लेकर उन्होंने कुर्सी सँभाली थी। जनता उनकी है, वे जनता के हैं, यह भावना अपने चरम पर थी। प्रारम्भिक वर्षों में जनता से सम्पर्क बनाये रखने की विशिष्ट लालसा के कारण कभी दूरियाँ पैदा करने की चेष्ठा नहीं की  उन्होंने। मुक्तभाव से सार्वजनिक स्थानों पर जाना, सार्वजनिक समारोहों में भी भाग लेना, सुरक्षा गार्ड का ताम-झाम साथ न रखना, कुछ ऐसे विषय थे जो सभी मन्त्रियों की दृष्टि में रहते थे। इस्तेमाल के लिए मन्त्रियों को बड़े-बड़े बँगले उपलब्ध कराये गये थे। कार, टेलीफोन, नौकर-चाकर, पी० एस० और असिस्टेंट दिये गए थे। बँगलों के बाहर सुरक्षा गार्ड लगाए गए थे।

 जिन स्वप्नों को लेकर आए जनप्रतिनिधियों ने मन्त्री पद सँभाले थे। प्राप्त सुविधायओं के अम्बार उनकी पूर्ति में रुकावट महसूस होते थे। अन्दर ही अन्दर अपराध-बोध होता था, यह सोचकर कि जिस देश में लाखों लोग असुविधाओं में, रूखा-सूखा खाकर या भूखे पेट सोने को विवश हैं, उस देश के मन्त्री बड़े-बड़े बँगलों में रहकर विशिष्ट सुविधाओं का उपयोग करते हैं।

किन्तु समय के साथ महसूस होता चला गया था कि एक मन्त्री को विधायिका सदस्य से और विधायिका सदस्य को साधारण नागरिक से ऊँचाई पर रहना चाहिए। काम-काज और प्राशासन से जुड़े तकाजों की माँग महसूस होने लगी थी- यह कि हर समय, हर एक को मिलने-जुलने की इजाजत न दी जाये। सोचने और काम करने के तरीके बदलने की आवश्यकता के साथ दिशाएँ और वरीयताएँ बदलने लगी थीं। धीरे-धीरे साधनों की पवित्रता का सूत्र भी हाथ से छूटता गया था। यह प्रक्रिया इतने स्वाभाविक रूप से सम्पन्न हुई थी कि बदलने का अहसास सुमन्त जी को कभी हुआ ही नहीं।
लक्ष्य पर दृष्टि अधिकाधिक गड़ती गईं, साधनों की पवित्रता की धारणा लुप्त होती गईं तो तन्त्र में और भी कई अवांछित, अनचाही बातों का समावेश होता चला गया। जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, धन, सुविधाओं, कम्बलों, शराब आदि के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश सर्वसामान्य बनती गईं। चुनाव के दौरान और दैनिक जीवन में झूठे वादे करने और उन्हें तोड़ने का क्रम शुरू होता गया। सत्ता, पद सम्पर्कों और सिफारिशों के बूते पर उचित-अनुचित काम होने लगे और लाभ उठाने तथा लाभ पहुँचाने का सिलसिला चल निकला। लाइसेंस परमिट आदि में अपने-पराये का ध्यान रखा जाने लगा। बड़े-बडे़ सौदों में कमीशन लेने की प्रथा चल पड़ी। निजी पार्टी के लाभ के लिए गये धन के बदले देने वालों को लाभ पहुँचाया जाने लगा। लाभ उठाने और लाभ पहुँचाने के नये-नये तरीकों का आविष्कार किया जाने लगा। दिखाने के लिए देशहित में वास्तव में निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए सौदे और अनुबन्ध किए जाने लगे।

चुनाव जीतने, कुर्सी हथियाने की कला में भी स्थितियों के अनुसार विकास होता गया। चुनाव जीतना और चुनाव जीतने के लिए किसी भी तरीके से वोट प्राप्त करना सफलता की पहली, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सीढी़ बन गया। ‘बाह्य शक्तियों से देश को खतरा है....विघटनकारी ताकतें शक्तिशाली हो गईं हैं’ जैसे नारे देकर जनमत को अपने पक्ष में करना और चतुराई से सही समय का आकलन करके चुनाव कराना, चुनाव जीतने के लिए एक तरह से अनिवार्य बन गया।

वातावरण तैयार करके, स्थितियों का जायजा लेकर किया गया फैसला भी गलत हो सकता है, यह भी नहीं सोचा था उन्होंने। चुनाव कब लड़ना चाहिए, कौन से क्षेत्र से किसे ख़ड़ा करना चाहिए, कहाँ से चुनाव जीतने के लिए कौन से तरीके अपनाने चाहिए, धन की व्यवस्था कैसे की जानी चाहिए, कौन से क्षेत्र में कितना पैसा, कितनी प्रचार-सामग्री, कितनी जीपें, कितने कार्यकर्ता भेजने चाहिए, इन सब बातों का भली भाँति आकलन किया था सुमन्त जी ने। वातावरण भी अनुकूलता के सन्दर्भ में आवश्यक जानकारियाँ उन्होंने पहले ही जुटा ली थीं। विपक्ष की कमजोर और अपनी मजबूत स्थिति के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हो जाने के बाद ही उन्होंने चुनाव का निर्णय लिया था। उनकी पार्टी के अलावा कोई एक विकल्प देश के पास नहीं है, इस बात का उन्हें भरोसा था।

इसलिए पूर्ण विश्वास से की गई चुनावों की घोषणा में कहीं कोई कमी रह गई है, इस बात की आशंका उन्हें तिलमात्र भी नहीं थी। प्रारम्भ में बीस दिनों तक किसी प्रकार की विपरीत सम्भावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती थी। फिर एकाएक स्थितियाँ बदलने लगीं। समान कार्यक्रम, समान नीतियों पर मतैक्य के आधार पर एक नई पार्टी का गठन हुआ। सभी मध्यममार्गी पार्टियाँ नई पार्टी में शामिल हो गई। एक चुनाव चिह्न, एक उम्मीदवार लेकर चुनाव की रणनीति बनाई गई।

सुमन्त जी ने विपक्ष को खिचड़ी, भानुमति का कुनबा आदि उपमाएँ देकर स्वंय को समझाने और जनता को नई पार्टी से विरक्त करने की भरकस कोशिश की। चुनाव जीत भी गये तो नेता के प्रश्न पर नई पार्टी टूटी जाएगी, उन्होंने यह चुनौती दी, तो नई पार्टी ने तुरन्त सर्वसम्मत नेता की घोषणा भी कर दी। धीरे-धीरे देश का वातावरण बदलने लगा एक-एक क्षेत्र से उम्मीदवारों के स्थान पर उनकी पार्टी और नई पार्टी के उम्मीदवार में सीधे मुकाबले की स्थितियाँ बन गईं। सरकारी वोट बँटने और कटने की आशाएं समाप्त हो गईं। सरकारी मशीनरी सत्ता-धारी पार्टी के हाथ का सबसे बड़ा हथियार होती है। गलत आदेश को न मानने के सिद्धान्त का नई पार्टी के नेता का आह्वान कुछ ऐसा रंग लाया कि सरकारी मशीनरी का साथ तो क्या सहानुभूति भी सुमन्त जी की पार्टी के साथ नहीं रही। पुरानी गणना गलत सिद्ध हो ही रही थी। इस तरह स्पष्ट संकेत थे कि सरकारी मशीनरी भी अन्दर से नई पार्टी के साथ हो गई है।

लगातार निराशाजनक समाचार आ रहे थे। छोटे-मोटे नेताओं के चुनाव अभियानों, चुनाव रैलियों की स्थिति बहुत खराब थी। सभाओं में उपस्थिति बहुत कम रहती थी। व्यक्तिगत सम्पर्क के दौरान लोग सीधे जवाबदेही करते थे। इल्ज़ाम और लांछन लगाते थे। उनकी पार्टी का झण्डा लगाने में लोग हिचकिचाते थे। कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ गया था, पैसा देकर जिन लोगों को पोस्टर लगाने का ठेका दिया जाता था, वे रात को पोस्टर लगाते थे और दूसरे दिन पोस्टर फाड़ देते थे। वातावरण इतना विरोधी हो गया था कि जोर देकर साहसपूर्वक दलील देना भी दूभर हो गया था। समन्त जी ने स्वयं देखा था कि उनकी अपनी सभाएँ जहाँ किसी भी अन्य नेता के मुकाबले अधिक भीड़ को आकर्षित किया करती थीं अब कमजोर पड़ने लगी हैं। और तो और, चुनाव सभा में उनके भाषण के बीच में ही नई पार्टी के पक्ष में नारे लगाते हुए लोग लौटना शुरू कर देते हैं। चुनाव-सभा समाप्त होते-होते तो ऐसा लगता है, जैसे सभा उनकी पार्टी ने नहीं, नई पार्टी ने बुलाई थी।

नई पार्टी का सम्पर्क अभियान, उनकी चुनाव सभाएँ, उनके घोषित नेता का भाषण बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों में होता है। सम्पर्क अभियान के दौरान उम्मीदवारों के गले में लोग रुपयों की मालाएँ डासते हैं। ने जिस क्षेत्र में जाते हैं वहां के निवासी उनके साथ हो लेते हैं और इस तरह थोड़ी-सी देर में ही एक बड़ा जलूस सम्पर्क अभियान पर जाता हुआ नजर आता है। चुनाव-सभा में स्वेच्छा से लोग चन्दा एकत्र करते हैं। अपने खर्चे से झण्डे बनाकर मकानों, दुकानों, वाहनों पर लगाते हैं, नई पार्टी के घोषित नेता की चुनाव सभा में जाते हुए लोगों का प्रवाह देखकर ऐसा आभास होता है, जैसे दूसरी ओर जाने के रास्ते बन्द हो गए हों। अपनी चुनाव सभा को नई पार्टी की रैली में बदलने देखकर कई बार तो उन्हें इतना क्रोध आता है कि इच्छा होती है वे फट पड़ें। पिछले चालीस सालों में सुमन्त जी को कभी भी इतना अपमान, इतना तिरस्कार नहीं सहना पड़ा है। अब तक हमेशा लोगों ने उन्हें सिर-आँखों पर बैठाया है। अपमान का कड़वा घूँट उन्हें असह्य लगता है। किंतु वे जानते हैं कि समुद्र की इन उद्धिग्न, उच्छृंखल लहरों को आक्रोश से शान्त नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थितियाँ पैदा होने पर वे अभूतपूर्व संयम से काम लेते है हुए खामोश खड़े रहकर मुस्कराते रहते हैं। कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते है।

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